छाँव भी लगती नहीं अब छाँव [कविता] - लाला जगदलपुरी

हट गये पगडंडियों से पाँव / लो, सड़क पर आ गया हर गाँव। / चेतना को गति मिली स्वच्छन्द, / हादसे, देने लगे आनंद / खिल रहे सौन्दर्य बोधी फूल / किंतु वे ढोते नहीं मकरंद। / एकजुटता के प्रदर्शन में / प्रतिष्ठित हर ओर शकुनी-दाँव। / हट गये पगडंडियों से पाँव / लो, सड़क पर आ गया हर गाँव। / आधुनिकता के भुजंग तमाम / बमीठों में कर रहे आराम / शोहदों से लग रहे व्यवहार / रुष्ट प्रकृति दे रही अंजाम। / दुखद कुछ ऐसा रहा बदलाव / छाँव भी लगती नहीं अब छाँव। आगे पढ़ें... →

कवि डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ जी के सान्निध्य में - डा॰ महेन्द्रभटनागर

ग्वालियर-उज्जैन-इंदौर नगरों में या इनके आसपास के स्थानों (देवास, धार, महू, मंदसौर) में वर्षों निवास किया; एतदर्थ ‘सुमन’ जी से निकटता बनी रही। ख़ूब मिलना-जुलना होता था; घरेलू परिवेश में अधिक। जा़हिर है, परस्पर पत्राचार की ज़रूरत नहीं पड़ी। पत्राचार हुआ; लेकिन कम। ‘सुमन’ जी के बड़े भाई श्री हरदत्त सिंह (ग्वालियर) और मेरे पिता जी मित्र थे। हरदत्त सिंह जी बड़े आदमी थे; हमारे घर शायद ही कभी आये हों। पर, मेरे पिता जी उनसे मिलने प्रायः जाते थे। वहाँ ‘सुमन’ जी पढ़ते-लिखते पिता जी को अक़्सर मिल जाया करते थे। ‘सुमन’ जी बड़े आदर-भाव से पिता जी के चरण-स्पर्श करते थे। लेकिन, ‘सुमन’ जी में सामन्ती विचार-धारा कभी नहीं रही। आगे पढ़ें... →

भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति [आलेख] - डॉ. काजल बाजपेयी

संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है। संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। मैं बचपन से दो प्रकार की संस्कृतियों के बारे में सुनती आ रही हूँ। भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति या अंग्रेजी संस्कृति।  आगे पढ़ें... →

बृहस्पतिवार, 16 फरवरी 2012 / Labels: ,

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा० रमन सिंह के द्वारा "आमचो बस्तर" का विमोचन [साहित्य समाचार] - अजय यादव



उपस्थित लोगों का एक दृश्य
बस्तर के अतीत और वर्तमान पर आधारित उपन्यास “आमचो बस्तर” (लेखक: श्री राजीव रंजन प्रसाद) का विमोचन दिनांक १५ फरवरी, २०१२ को नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित एक भव्य समारोह में छत्तीसगढ़ के माननीय मुख्यमंत्री डा० रमन सिंह ने किया। समारोह की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा० प्रेम जनमेजय ने की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार श्री एन०के०सिंह, साहित्यकार श्री गिरीश पंकज, श्री शरद चंद्र गौड़, श्री पंकज झा आदि कई गणमान्य लोगों ने अपनी उपस्थिति द्वारा इस आयोजन को सफल बनाया।
पुस्तक का विमोचन
इस अवसर पर बोलते हुये माननीय मुख्यमंत्री ने बस्तर के सच और उसकी पीड़ा को स्वर देने की श्री राजीव रंजन की पहल को एक महत्वपूर्ण कदम माना। उन्होंने आशा जताई कि इस शोधपूर्ण उपन्यास को पढ़ने के बाद बुद्धिजीवी व सामान्य पाठक बस्तर को एक अलग और अधिक सकारात्मक रूप से देखेंगे। उन्होंने माना कि अभी वे स्वयं यह पूरा उपन्यास नहीं पढ़ पाये हैं तथापि इसके जितने अंश उन्होंने पढ़े हैं उससे उन्हें लगता है कि यह उपन्यास पाठक को इसे पूरी तन्मयता और गंभीरतापूर्वक पढ़ने के लिये विवश करता है। अत: वे स्वयं भी इसे पूरा पढ़ने को उत्कंठित हैं।

लेखक  का सम्बोधन
इससे पहले श्री राजीव रंजन प्रसाद ने उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुये बताया कि कैसे तथाकथित प्रगतिवादी और मानवाधिकारवादी लोगों ने दुनिया को बस्तर का वही रूप दिखाया है जो नक्सलवादी आधार क्षेत्र मे उन्हें सप्रयास दिखाया गया। बस्तर क्षेत्र और उसके निवासियों के विषय में बोलते हुये राजीव ने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी है कि भले ही बस्तर राज्य मराठाओं, अंग्रेजों या अन्य बाहरी शासकों के अधीन रहा हो, यहाँ की जनता ने कभी अपना सिर बाह्य शक्तियों के आगे नहीं झुकाया। विभिन्न कालक्रमों पर हुये दशाधिक आंदोलनों द्वारा यहाँ की जनता अपनी राजनैतिक और सामाजिक जागरूकता का प्रमाण लगातार देती रही है। आज वही बस्तर इन तथाकथित जनपैरोकारों के कारण अपनी वास्तविक पहचान खोता जा रहा है। उसकी सामाजिक रीतियाँ टूट रही हैं। आज बस्तर मांदर की थाप पर मदहोश हो कर नाचता नहीं है बल्कि बारूद के धमाकों से सिहर उठता है।

मीडिया से मुखातिब माननीय मुख्यमंत्री
वरिष्ठ पत्रकार श्री एन०के०सिंह ने कहा कि वे स्वयं एक बार बस्तर भ्रमण के बाद वहाँ की दशा से आहत हो कर नक्सलवाद समर्थक लेख लिख चुके हैं परंतु बाद में जब उन्होंने इस विषय में और जानकारी जुटाई तो उन्हें अपना विचार बदलना पड़ा। उन्होंने मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग से आग्रह किया कुछ भी लिखने या दिखाने से पहले यह सुनिश्चित करें कि जो दिख रहा है वह वास्तव में कितना सच है।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डा० प्रेम जनमेजय ने कहा कि सामान्यत: साहित्यिक पुस्तकों के विमोचन के लिये आने वाले राजनेता बिना पुस्तक पढ़े लेखक को बधाई देकर अपने कार्य की इतिश्री कर लेते हैं। परंतु डा० रमन सिंह जी ने जिस तरह इस पुस्तक के विषय में कहा उससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने इसके कुछ अंश तो निश्चित ही पढ़े हैं। आगे उनका यह कहना कि वे यह पुस्तक अवश्य पढ़ेंगे, लेखक की सफलता है क्योंकि पुस्तक की सफलता इसी में है कि वह पाठक को उसे पढ़ने के लिये विवश कर सके। साथ ही उन्होंने राजीव रंजन जी के भाषण का उल्लेख करते हुये कहा कि उनकी आवाज से उनकी पीड़ा ज़ाहिर होती है और यही सृजनात्मक पीड़ा एक अच्छी रचना की सबसे पहली शर्त है। अंत में लेखक को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी लेखन में हिन्दीतर विषयों खासकर तकनीकी विषयों से आने वाले लोग बहुत कम हैं, ऐसे में राजीव जैसे लोग हिन्दी साहित्य को एक अलग दृष्टिकोण देकर और भी समृद्ध कर सकते हैं।


बाद में श्री पंकज झा, श्री गिरीश पंकज, श्री शरद चन्द्र गौड़ आदि ने भी श्रोताओं को सम्बोधित किया तथा लेखक को शुभकामनायें दी। तदुपरांत जलपान के साथ सभा विसर्जित हो गई।

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बुधवार, 15 फरवरी 2012 / Labels: , ,

यह दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है [डॉ. शहरयार से बातचीत] [डॉ. शहरयार को श्रद्धांजलि स्वरूप विशेष प्रस्तुति] - डॉ. प्रेमकुमार




उर्दू के मशहूर शायर अखलाक मोहम्म्द खान 'शहरयार' का सोमवार देर शाम निधन हो गया. यह खबर साहित्य जगत के लिए सदमे से कम नहीं। 'शहरयार' 76 साल के थे और पिछले साल उन्हें 2008 के साहित्य के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया था.
साहित्य शिल्पी पर डॉ. शहरयार का यह साक्षात्कार हमने लगभग डेढ वर्ष पूर्व प्रस्तुत किया था। आज ’शहरयार’ को श्रद्धांजलि स्वरूप हम इसे पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं।

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कमलेश्वर शहरयार को एक खामोश शायर मानते थे। एक ऐसा खामोश शायर जब इस कठिन दौर व खामोशी से जुड़्ता है, तो एक समवेत चीखती आवाज मे बदल जाता है। बडे अनकहे तरीके से अपनी खामोशी भरी शाइस्ता आवाज को रचनात्मक चीख में बदल देने का यह फन शहरयार की महत्वपूर्ण कलात्मक उपलब्धि है। वे मानते है कि शहरयार की शायरी चौकाने वाली आतिशबाजी और शिकायती तेवर से अलग बड़ी गहरी सांस्कृतिक सोच की शायरी है और वह दिलो दिमाग को बंजर बना दी गयी जमीन को सीचती है।

अकादमी पुरस्कार के अतिरिक्त विभिन्न स्तरों पर देश विदेश में सम्मान और ख्याती प्राप्त शहरयार के उर्दू में ‘इस्में आज़्म’, ‘सातवाँ दर’, ‘हिज्र की जमीन’ शीर्षकों से आए काव्य संग्रह काफी चर्चित और प्रशंशित हुए हैं। ‘ख्वाब का दर बंद है’ हिन्दी और अंग्रेजी मे भी प्रकाशित हो चुका है तथा ‘काफिले यादों के’, ‘धूप की दीवारे’, ‘मेरे हिस्से की ज़मीन’ और ‘कही कुछ कम है’ शीर्षकों से उनके काव्य संग्रह हिन्दी मे प्रकाशित हो चुके है। ‘सैरे जहाँ’ हिन्दी मे शीघ्र प्रकाश्य है।

‘उमराव जान’ की गजलों से शहरयार को जो ख्याति, जो सम्मान मिला उसे वे अपनी उपलब्धि और खुशकिस्मती मानते हैं। फिल्म को आज के संदर्भ में वे काफी ‘इफेक्टिव मीडिया’ मानते हैं। वे कहते है कि उन्होने अपनी आइडियोलाजी के लिये इस मीडिया का बेहतर इस्तेमाल किया। एक श्रेष्ठ और समर्पित कवि के अतिरिक्त वे एक संवेदनशील, विनम्र, आत्मीय और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले व्यक्ति हैं। प्रस्तुत है डॉ. प्रेम कुमार से उनकी बातचीत

[ नोट - डॉ. प्रेम कुमार ने बेहद विस्तार से शहरयार को जानने व इस मंच पर प्रस्तुत करने का उल्लेखनीय कार्य किया है इसके लिये साहित्य शिल्पी समूह उनका आभार व्यक्त करता है। अंतरजाल की सीमाओं के मद्देनजर दो खंडो और चालीस पृष्ठों में प्रेषित इस साक्षात्कार के महत्वपूर्ण अंश मुख्य पृष्ठ पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं। शेष बातचीत पढने के लिये प्रस्तुत साक्षात्कार के नीचे दिये गये लिंक पर चटखा लगायें]

लेखन के शुरुआती दौर के विषय में कुछ बतायें

ये मुझे याद नहीं आता. बार-बार सोचा है - कोई ऐसा सिरा नहीं मिला कि पकड़ कर कह सकूँ कि मैं शायरी की तरफ जाने वाला था। बेसिकली यह याद आता है कि खलीलुर्रहमान साहब, जो बड़े कवि और आलोचक थे, ए.एम.यू. में रीडर थे; से मिलना-जुलना होता था। जब मैंने तय किया कि मुझे थानेदार नहीं बनना है तो घर से अलग होना पड़ा। तब मैं खलीलुर्रहमान के साथ रहने लगा।...। तो शुरू में मेरी जो चीजें छपीं, ऐक्चुअली वो मेरी नहीं हैं। बाद में अचानक कोई मेरी ज़िंदगी में आया.... नहीं, यह कांफीडेंशियल है... मैं कितना ही रुसवा हो जाऊँ इस उम्र में, किसी और को रुसवा क्यों करूँ?.... तब दुनिया मुझे अज़ीब लगने लगी और फिर मैं शायरी करने लगा। बी.ए. की आखिरी साल में शेर लिखने की रफ़्तार तेज हो गई। एम.ए. में साइकोलोजी में दाखिला लिया और जल्दी ही अहसास हुआ कि फैसला गलत लिया है। दिसम्बर में नाम कटा लिया। फिर चार छ: महीने केवल शायरी की - खूब छपवाई। ऊपर वाले की मुझ पर.... हाँ, यूँ मैं मार्क्सिस्ट हूँ फिर भी मानता हूँ कि कोई शक्ति है; कोई बड़ी ताक़त है जो मेरी चीजों को तय करती रही है। उर्दू की बहुत अच्छी मैगजींस में मेरी चीजें छपने लगीं। तेज़ रफ़्तारी से सामने आया। फिर एम.ए. उर्दू में ज्वाइन किया। उस दौर में मेरा और मासूम रज़ा राही का कम्पिटीशन चलता था। जी, हमने बी.ए. साथ-साथ किया, फिर मैं एक साल पीछे हो गया।

इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती।


पिछले दिनों हिन्दी में “ कविता की मौत “ और गद्य के भविष्य पर काफी कुछ कहा गया है। पिछले दिनों काजी अब्दुल सत्तार ने पोयट्री पर कई कोणों से प्रहार करते हुए इक्कीसवीं सदी को फिक्शन की सदी कहा है। एक शायर होने के नाते आप इन बिन्दुओं पर किस प्रकार सोचते है?

देखिये इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती। पोयट्री से लुत्फ उठाने के लिये, उसे एप्रीशिएट करने के लिए कई चीज जरूरी हैं-म्यूजिक, पेंटिग, फिलासफी, मीटर्स बगैरह। उन्हें जानना जरूरी है। यदि आपको आईरकी सोसायटी चाहिये और उसमें वैल्यूज की बुनियाद चाहिये, तो पोयट्री जरूरी है। सारी दुनिया की जुबानों में पहले पोयट्री पैदा हुई फिर फिक्शन। फिक्शन को लोमैन भी पढ़ सकता है, पर पोयट्री का लुत्फ बहुत कुछ जानने पर ही लिया जा सकता है। बड़ा फिक्शन भी पोयट्री के बिना नहीं लिखा जा सकता।

हिंदी में तो मंच के स्तर के गिरते जाने की........?

वो तो उर्दू में भी है। अच्छे बुरे हर तरह के लोग जाते भी हैं। नहीं किसी के साथ पढने-न-पढ़ने की शर्त नहीं रखी। यह सही है कि खाली लिटरेरी हैसियत के प्रोग्राम अच्छे लगते हैं यह दुनिया कुछ खास लोगों के लिए नहीं बनी है, हर तरह के लोग उस में मौज़ूद हैं। और उन्हें मौजूद और जिंदा रहने का हक है। खुद हम जिन लोगों को कंटेम्प्ट के साथ देखते हैं, उनका एक रोल है वो जिस सतह पर लोगों को एंटरटेन करते हैं, उसकी भी एक जरुरत है। हम-आप भी अगर अपने आपको अपने बनाए हुए जाल से थोडा सा निकाल सकें तो हमको भी वो चीजें अच्छी लगती हैं।

मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए।


मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए।

अदब में फ़ार्म और कटेंट की बहस में हमेशा उलझावा रहा है, इसीलिये कि अदब में इन दोनो को अलग-अलग देखना नामुमकिन है। ये तो हम उसका असेस्मेंट करने में, उसको एप्रीशिएट करने में अपनी सहूलियत के लिये अलग-अलग कर के देखते हैं और कभी एक चीज पर और कभी दूसरी चीज पर ज्यादा एम्फ़ैसिस देने लगते हैं। मैं उन लोगों में हुँ जिनका ख्याल है कि अगर कोई मजबूरी आन पड़े और हमें फ़ार्म और कटेंट में से किसी एक को तस्लीम करना पडे तो मैं कंटेट को अहमियत दूंगा

उर्दू में शायरी की ताकत के नाम पर प्राय: गज़ल का जिक्र किया जाने लगता है। आप भी पहले नज़्म की तुलना मे गज़ल के रूप को बेहतर मानते रहे हैं। गज़ल और नज़्म के स्तर पर आज आप शायरी या शायर को किस तरह अलग अथवा बेहतर-कमतर मानते हैं।

गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है।


पहले मेरा इस पर रूख दूसरा था। अब चेंज किया है, मैने अपनी राय को। अब दोनों में ही में सभी तरह की प्राब्लम्स फेस करता हूँ। गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है।

गज़ल की ताकत या कमजोरी की बात नहीं है। उसके फार्म ने न खुशी है, न खामी है। इस्तेमाल करने वाले पर है। हमारे यहाँ इसका बहुत चलन रहा है। उसके जरिये जो भी कहा जाता है वो बहुत ही जल्द और बहुत से लोगों तक पहुचता है। ग़ज़ल के बारे मे हर बार कहा गया है कि अपने जमाने का साथ नहीं दे सकरी पर इकबाल, फैज सबने साबित किया कि दे सकती है। मुशायरे की शायरी से हिन्दी या उर्दू मे अंदाज नहीं लगाना चाहिए।

हमारे यहाँ बहुत से शायर है-अच्छे शायर, जिन्होने गजल बिल्कुल नहीं लिखी पर उनकी शायरी कुछ खास लोगों की शायरी है। शायरी मे शायर की अपनी सोच होनी चाहिए, पहचान होनी चाहिए। कुछ खास बातें उसकी होनी चाहिए, लेकिन उसकी पहुँच खास के साथ आम लोगों तक भी हो। तब वह एक सच्ची और अच्छी शायरी होती है। उर्दू मे इसकी सब से बड़ी मिसाल गालिब है, बहुत गहरी, बहुत फिलासफी कल बातें करते है और जिन्दगी की ऐसी सच्चाइयाँ सामने लाते है, जो हमें हैरान कर देती हैं। उनकी जुबान भी , ईडियम कहिए, वो आसान नहीं है, लेकिन इसके बावजूद एक सतह पर आम आदमी भी उससे लुत्फंगूज होता है, मजा लेता है।

गज़ल और नज़्म की जहाँ तक बार है, हम उर्दू वालों का मिजाज गज़ल मे इतना रच-बस गया है कि वो नज़्म को उतना पसंद नही करता। यही वजह है कि उर्दू में वो शायर नुक्सान में रहे, जिन्होने सिर्फ नज़्में लिखी। आम मकबूलियत में अनकी गजलों का बड़ा हाथ है। अगरचे अदब को सतह पर देखा जाए तो उनका असली कंट्रीब्यूशन उनकी नज़्मो मे है।

आपने गजल की जिस खूबी-खामी और उर्दू शायरों की पसंद व मिजाज की बात की है वह तो अपनी जगह है पर आपको भी ऐसा लगता है कि गजलों में अपने पूर्वर्तियो की छाया अथवा नकल या दोहराव अधिक बहुत अधिक दिखाई देता है। मौलिकता के संदर्भ में आप उर्दू गजल को कहा देखते है?

ऐसा नही है। ये दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है। दूसरे दर्जे के शायर है और वे सब मिलकर बड़ी शायरी बनते है। फैज, मकदूम, मज़ाज़, जज़्बी, सरदार बगैरह मिलकर एक शक्ल बनाते है। अच्छे शायर है ये सब और अच्छी बात यह है अलग-अलग अच्छे शायर होना। हर शायर का जहाँ प्वांइट आफ व्यू होगा वह उससे देखेगा चीजों को। सिलेक्ट करने न करने का आला प्वाइंट आफ व्यू है। ऐसा मालूम होता है कि कुछ सिमलीज व मेहाफर्स बार बार आ रहे है। उससे लगता है कि रिपिट कर रहा है शायर अपने को। अच्छा सच्चा शायर कोशिश करता है कि अपने को रिपीट न करे। अब जैसे रात आया या सहर आया कहीं। पालिटिकल सोशियो प्राबलम्स है, अपनी बात है, कहने मे कुछ सिम्बल हैल्प करते है। इसलिये रात और दिन सिम्बल बन गए। सिचुएशन की मुख्तलिफी से फैज की, मेरी, पाकिस्तान का रात या दिन अलग होंगे। बहुत से दौर अदब मे ऐसे आते है और आए है जहाँ शायरो की बात ओवर लैप करती है। वह पूरे दौर की बात बन जाती है। एक्सटर्नल फोर्सेज, बहुत से लोगों को एक तरह से सोचने को मजबूर कर देती है। जब सब लोग एक तरह से सोचने को मजबूर हो जाए तो जाहिर है कि उनकी जुबान मे भी समानताएँ नजर आती है। पर ये उपरी समानताएँ होती है। सरसरी नजर से, कैजुअली जो पढ़्ता है, उसे यह धोखा है कि सब एक तरह की बातें कर रहे हैं। शायरी मे हर शायर की इडिवीजुअलिटी जरूर मौजूद रहती है। इसलिए क्रिएट करने वाले की अपनी जो आइडैंटिटी है, वह गुम नही होती। शायरी या कोई भी सीरियस आर्ट-फार्म पढ़्ने सुनने देखने वाले से थोडी सावधानी और थोडा वक्त मांगता है। जाकिर साहब का यह कथन कि “अगर कोई काम इस काबिल है कि किया जाए तो फिर उसे दिल लगाकर किया जाए अदब पर भी पूरी तरह लागू होता है।

आपको मुशायरो मे भी बुलाया जाता रहा है। आप शिरकत भी करते रहे है। ऐसा क्यों है कि आपकी मुशायरो के बारे मे अच्छी राय नही है? अपनी कुछ खामियो के बावजूद मुशायरो या कवि सम्मेलन अपनी अपनी भाषाओं को लोकप्रिय तो बना ही रहे है?

इंडिया मे मुशायरों और कवि सम्मेलनों मे सिर्फ चार बाते देखी जाती है- पहली, मुशायरा कंडक्ट कौन करेगा? दूसरी- उसमे गाकर पढ़्ने वाले कितने लोग होगे? तीसरी- हंसाने वाले शायर कितने होंगे और चौथी यह कि औरतें कितनी होगीं? मुशायरा आर्गेनाइज –पेट्रोनाइज करने वाले इन्ही चीजों को देखते है। इसमे शायरी का कोई जिक्र नहीं। हर जगह वे ही आजमाई हुई चीजें सुनाते है। भूले बिसरे कोई सीरियस शायर फँस जाता है, तो सब मिलकर उसे डाउन करने की कोशीश करते है। इसे आप पॉपुलर करना कह लीजिए। फिल्म ग़ज़ल भी बहुत पॉपुलर कर रहे है। पर बहुत पापुलर करना वल्गराइज करना भी हो जाता है बहुत बार। इंस्टीट्यूशन मे खराबी नहीं, पर जो पैसा देते है, वे अपनी पसंद से शायर बुलाते है। उनके बीच मे सीरियस शायर होगे तो मुशकिल से तीन चार और उन्हे भी लगेगा जैसे वे उन सबके बीच आ फँसे है। जिस तरह की फिलिंग मुशायरो के शायर पेश करते है, गुमराह करने वाली, तास्तुन, कमजरी वाली चीजें वे देते है, सीरियस शायर उस हालात मे अपने को मुश्किल मे पाता है।

आप हिन्दी के साहित्य और साहित्यकारों से भी आत्मीय व करीबी स्तर पर जुडे रहे है। हिन्दी –उर्दू साहित्य को अगर आज तुलनात्मक दृष्टि से हम देखना चाहें, तो क्या मुख्य समानताए या असमानताए उनके बीच दिखती है? हिन्दी गजल के बारे मे विशेष रूप से अपनी राय जाहिर करते हुए आप अन्य विधाओ मे लिखे गए साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे मे अपने अनुभव, अपने विचार प्रकट करना अवश्य चाहेगे?

हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है।


मैने हिन्दी साहित्य को हिस्टोरिक प्रोस्पेक्टिव मे सिस्टेमेटिक और आर्गेनाइज्ड ढंग से नही पढ़ा। पर हाँ जिन लोगो से सम्बन्ध रहे है उन्हे पढा है। भले ही सिस्टेमेटिक ढंग से नहीं पर मैने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गिरिधर राठी, अशोक वाजपेयी, भारती, शमशेर, दुष्यंत, केदारनाथ, त्रिलोचन, नागार्जुन, श्रीकांत वर्मा वगैरह को पढ़ा है। वह अलग शायरी है। इसमे कम्पेयर नहीं। हिन्दी मे लोग गजल लिखते है, यह अच्छी बात है। पर दुष्य़ंत ने जो छाप लगा दी, वह बिलकुल अलग है। किसी भी तरह देखे वह गजल है। हम जिस तरह के मीटर के आदी है, हिन्दी शायरी हमें थोडी प्रोजेक लगती है। हम जिस तरह के मीटर और रिदम के कायल है, उसकी वजह से यह अहसास होता है कि जैसे वह प्रोज के करीब है। महादेवी, निराला मे ऐसी बात नहीं। पर जहा तक थाट-कंटेट को बात है, बहुत सीरियस शायरी है। वहाँ क्रिटीहिज्म मैने सुनी ज्यादा है, पढ़ी कम है। अपनी तकरीर मे नामवर सिंह बहुत इम्प्रेस करते है। उनका रिकार्ड काफी दिनों से एक जगह ठहरा हुआ है। मुझे कमलेश्वर और नामवर की तकरीर में अंतर नहीं लगता। दोनो इम्प्रेस करते है और दोनो के कुछ पहलू ऐसे है तो ज्यादा देर मुतस्सिर करते है। हिन्दी मे फिक्शन अच्छा है। कमलेश्वर, मोहन राकेश यादव, मुन्नू, शानी, श्रीलाल शुक्ल को पढ़ा है। एक खास पीरियड में राकेश , कमलेश्वर, यादव, शानी ने अच्छा लिखा है।

खराबियाँ-अच्छाइयाँ दोनो मे कॉमन है। हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है।

आपके बारे में कहा जाता है कि आपने अपने लेखन से हिन्दी उर्दू के बीच एक पुल बनाया है। आप हिन्दी में भी काफी लोकप्रिय हैं। आपकी लोकप्रियता में फिल्म के गीतों की क्या भूमिका है? आप अपनी उपलब्धियों और देश की वर्तमान हालत पर क्या कुछ कहना चाहते हैं?

मैं हिन्दी या उर्दू को नहीं लिख रहा, बल्कि उन लोगों के लिये लिख रहा हूँ जो खास तौर पर उर्दू भाषा भाषी हैं पर स्क्रिप्ट नहीं जानते, उन लोगों के लिये इनकी मातृभाषा उर्दू नहीं है पर मेरी शायरी पसंद करते हैं। मेरे शेर सुन कर, मुझसे मिल कर खुश होते हैं, मुझे प्यार देते हैं। हिन्दी में ज्यादा पॉपुलर होने की वजह यह है कि वे छापते हैं, पैसे देते हैं, इज्जत देते हैं, मानते हैं। उर्दू में खुद छपवानी पडती हैं किताबें।

मेरी ज़िन्दगी में फिल्म के मेरे गीतों नें बहुत अहं रोल अदा किया है। मैं अपनी लिटररी अहमियत की वजह से फिल्म में गया फिर आम स्तर पर फिल्म की वजह से लिटरेचर में मेरी अहमियत बढी। मोहब्बत, शौहरत, दौलत, इज्जत, बच्चे...आदमी जो ख्वाहिश कर सकता है मुझे खूब मिला। वैसे आप जानते हैं पूरी तरह कोई मुतमइन नहीं होता। शायद आदमी के ज़िन्दा रहने को जरूरी है कि वह किसी चीज की ख्वाहिश करता रहे।किसी चीज की कमी महसूस करता रहे।

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं।


न जिसकी शक्ल है कोई, न जिसका नाम है
कोई इक एसी शै का क्युँ हमेँ अज़ल से इंतज़ार है

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं:-

आज का दिन बहुत अच्छा नहीं तस्लीम है
आने वाला दिन बहुत बहतर है, मेरी राय है।

आपको उमरावजान के गीतों के कारण बेहद ख्याति मिली। फिल्म जगत के आपके अनुभव कैसे रहे हैं? फिल्मों के लिये गीत लिखते हुए स्वयं को कितना समर्थ और अनुकूल मानते हैं?

मुझे ज़िन्दगी में बहुत सी चीजें फिल्म के गानों की मकबूलियत से मिलीं। दूर दराज मुल्कों में जो मुशायरों में बुलाया जाता है तो उसमें यही इंट्रोडेक्शन काफी होता है कि ये उमरावजान के गीतों के लेखक हैं। मेरे बच्चों से अक्सर यह सवाल किया जाता है कि आप उन्ही शहरयार के बच्चे हैं, जिन्होने उमरावजान के गाने लिखे हैं? मैं आवाम की पसंद की अहमियत का हमेशा कायल रहा हूँ। अगर कोई किसी को पसंद करता है तो उसमें कुछ न कुछ अच्छा जरूर है। नासिर काज़मी का एक मिसरा है – “कुछ होता है जब पलके खुदा कुछ कहती है” मकबूलियत की अपनी जगह है।

वहाँ निन्यानबे प्रतिशत गाने धुनों पर लिखे जाते हैं, फौरन वहीं पर। हम नहीं लिख सकते। बहुत दिनों से यह काम हो रहा है। साहिर वगैरह बहुत लोगों नें लिखे। लगता है जैसे कफन तैयार है अब मुर्दा तैयार कीजिये। जब तक हम कहानी कैरेक्टर का हिस्सा न बना लें गीत को कैसे लिखें? क्रियेटिव प्रोसेस इंटरकोर्स से मिलता जुलता है। उसको प्राईवेसी जरूरी है। हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते।

पिक्चर को मन इस लिये होता है कि उस मीडियम का इफैक्ट है। हमारी बहुत सी बातें जो वैसे नहीं पहुँच रहीं वहाँ से पहुँचें। हमने उस मीडिया को अपनी आईडियोलॉजी के लिये इस्तेमाल किया है। हमें खडे होने के लिये सही जगह मिलनी चाहिये, हम उसके सारे रिग्वायरमेंट पूरे कर सकते हैं। मेरे अनुभव बहुत अच्छे रहे हैं वहाँ के। हमें हमेशा यह अहसास रहा कि हम युनिवर्सिटी के नौकर हैं। हमने मुशायरों फिल्मों के लिये छुट्टियाँ जाया करना ज़रूरी नहीं समझा। बाहर के ऑफर्स उन दिनो एवायड करते रहे। अब रिटायरमेंट के बाद हम वक्त देना अफोर्ड कर सकते हैं।
*****



अंत में शहरयार साहब की लिखी एक बेहद खूबसूरत गज़ल! तलत अज़ीज साहब की गाई इस गज़ल को फिल्म ’गमन’ के लिये संगीतबद्ध किया था सुप्रसिद्ध संगीतकार जयदेव ने। तो आइये सुनते हैं ये गज़ल:

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सोमवार, 13 फरवरी 2012 / Labels: ,

पुस्तक प्रिव्यू - उपन्यास “आमचो बस्तर” पर एक दृष्टि तथा कुछ उपन्यास अंश - सजीव सारथी

उपन्यास:- आमचो बस्तर
लेखक- राजीव रंजन प्रसाद
प्रकाशक – यश प्रकाशन,
नवीन शहादरा, नई दिल्ली
अभी बहुत समय नहीं गुजरा जब बस्तर का नाम अपरिचित सा था। आज माओवादी अतिवाद के कारण दिल्ली के हर बड़े अखबार का सम्पादकीय बस्तर हो गया है। वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैय्यर के शब्द हैं – ‘बस्तर अनेक सूरदास विशेषज्ञों का हाथी है, सब अपने अपने ढंग से उसका बखान कर रहे हैं। बस्तर को वे कौतुक से बाहर बाहर को देखते हैं और वैसा ही दिखाते हैं।‘ माओवाद पर चिंता जताते हुए इस अंचल के वयोवृद्ध साहित्यकार लाला जगदलपुरी कहते हैं कि ‘नक्सली भी यदि मनुष्य हैं तो उन्हें मनुष्यता का मार्ग अपनाना चाहिये।‘ अब प्रश्न उठता है कि इस अंचल की वास्तविकता क्या है? क्या वे कुछ अंग्रेजी किताबें ही सही कह रहे हैं जिनमें गुण्डाधुर और गणपति को एक ही तराजू में तौला गया है, भूमकाल और माओवाद पर्यायवाची करार दिये गये हैं। बस्तर में माओवाद के वर्तमान स्वरूप में एसे कौन से तत्व हैं जो उन्हें ‘भूमकाल’ शब्द से जोडे जाने की स्वतंत्रता देते हैं? क्या इसी जोडने मिलाने के खेल में बस्तर के दो चेहरे नहीं हो गये? एक चेहरा जो अनकहा है और दूसरा जिसपर कि एक बस्तरिया कहावत ही सही बैठती है – “कावरा-कोल्हार” (काक-कोलाहल)। लेखक का मानना है कि इन्ही प्रश्नों के मनोमंथन के दौरान ही उपन्यास “आमचो बस्तर” की संकल्पना हुई।

उपन्यास में दो समानांतर कहानियाँ हैं। पहली कहानी है जो प्रागैतिहासिक काल से आरंभ करते हुए प्राचीन बस्तर में संघर्ष के चिन्ह तलाशती है, प्रचलित मिथकों में संघर्ष के मायने ढूंढती है। नल-वाकाटक-नाग-गंग तथा काकतीय/चालुक्य वंश के शासनकाल (जिसमें मराठा आधिपत्य एवं ब्रिटिश आधिपत्य का काल सम्मिलित है) में हुए सशस्त्र विद्रोहों के पीछे के कारण और भावनायें तलाश करती है।.....शताब्दियों से बस्तर के आदिवासियों को अपनी लडाईयाँ लडते हुए इतनी समझ रही है कि उन्हें क्या चाहिये और शत्रु कौन है। यह चाहे 1774 की क्रांति में कंपनी सरकार का अधिकारी जॉनसन हो या कि 1795 के विद्रोह में कम्पनी सरकार का जासूस जे. डी. ब्लंट। 1876 के हमलों के पीछे आदिवासियों के हमलों का लक्ष्य सरकारी कर्मचारी (मुंशी) थे जिससे भिन्न किसी भी व्यक्ति पर आक्रमण नहीं किया गया तो 1859 के कोई विद्रोह में केवल उनकी ही हत्या की गयी जिन्होंने चेतावनी के बावजूद भी सागवान के वृक्ष काटे। पुनश्च, अपने राजा, मराठाओं, ब्रिटिश सरकार तथा स्वतंत्र भारत सरकार के विरुद्ध जो भूमकाल हुए वे हैं – हलबा विद्रोह (1774-1779), भोपालपट्टनम संघर्ष (1795), परलकोट विद्रोह (1825), तारापुर विद्रोह (1842-1854), मेरिया विद्रोह (1842-1863), महान मुक्ति संग्राम (1856-57), कोई विद्रोह (1859), मुरिया विद्रोह (1876), रानी-चो-रिस (1878-1882), महान भूमकाल (1910), महाराजा प्रबीर चंद्र का विद्रोह (1964-66)। इस सभी क्रांतियों के सूत्रधार उपन्यास के पात्र हैं। उपन्यास की समानांतर चलने वाली दूसरी कहानी बस्तर के शिक्षित नवयुवकों के संघर्ष की है। इन पात्रों और उनके जीवन संघर्ष की अनेकों घटनाओं के माध्यम से शोषण, हत्याओं तथा वर्गसंघर्ष के माओवाद से संबंध को समझने का एक प्रयास भी है। उपन्यास में कोशिश की गयी है कि घटनाओं का वर्णन करते हुए ही बस्तर के पर्यटन स्थल, यहाँ की सांस्कृतिक विशेषतायें, तीज त्यौहार, देवी-देवता और आस्था, पहनावा, लोक नृत्य, दशहरा आदि का विवरण भी हो जिससे इस उपन्यास के पाठक के मन में बस्तर क्षेत्र की एक स्पष्ट तस्वीर उभर सके। उपन्यास में लेखक नें विषय की जटिलता के कारण रिपोर्ट और कहानी को जोडने का प्रयोग किया है। लेखक नें रिसर्च आधारित इस उपन्यास के निष्कर्षों के सर्वे- तकनीक का भी प्रयोग किया है जिसमें बस्तर के लगभग सभी हिस्सों से सभी उम्र के शिक्षित आदिवासियों, अशिक्षित आदिवासियों, गैर-आदिवासियों से सामाजिक-आर्थिक स्थिति, विकास को ले कर उनकी सोच, पर्यावरण पर उनका दृष्टिकोण आदि को ले कर कई प्रश्न उनके सम्मुख रखे। उपन्यास में पंडा बैजनाथ, नरोन्हा से ले कर ब्रम्हदेव शर्मा तक जो प्रशासक रहे हैं उनकी नीतियों और दूरगामी प्रभावों पर भी बात की गयी है।

आतीत के आन्दोलन यह बताते हैं कि आदिवासी जागरूक हैं और अपनी लडाई स्वयं लडना जानते हैं उन्हें विचारचाराओं की घुट्टी पिला कर हो सकता है हम उनके भीतर के मूल तत्व से ही वंचित हो जायें या कि इस अंचल की पहचान ही बदल जाये। स्वत:स्फूर्त आन्दोलनों और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिये होने वाले सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध के बीच की बारीक रेखा पर उपन्यास में चर्चा की गयी है। वस्तुत: यह उपन्यास माओवाद का विश्लेषण करने की अपेक्षा बस्तरियों की वह दिशा और दशा को चित्रित करता है जो थोपे गये युद्ध के कारण हो गयी है। उपन्यास यह विश्लेषित करता है कि किस तरह मुलुगु के जंगलों में मिल रही असफलता के बाद तथा कई राज्यों से सीमा जुड़े होने के कारण नक्सलवादी अबूझमाड क्षेत्र में प्रविष्ठ हुए। स्वयं को बनाये रखने के लिये मुद्दो की पहचान बाद में की गयी तथापि पैंतीस वर्ष से अधिक की अपनी उपस्थिति में उपलब्धि के नाम पर तेन्दू पत्ता के दाम निर्धारण के अलावा कोई ठोस उपलब्धि गिनाने के लिये नहीं है। बस्तर क्षेत्र में किसी मजदूर या किसान आन्दोलन में प्रतिनिधित्व का श्रेय भी माओवादियों को नहीं जाता। अपनी भैगोलिक विवशताओं के कारण वाम-अतिवादियों की शरणस्थली बना अबूझमाड़ देख रहा है किस तरह आदिम परम्परायें, जीवनशैली और भाषा सभी नष्ट होते जा रहे हैं।

कुछ अंश उपन्यास से –
आदरणीय स्वजन!

बस्तर के अतीत और वर्तमान की त्रासदी पर केन्द्रित मेरा उपन्यास "आमचो बस्तर" यश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है जिसका लोकार्पण 15.02.2012 को छत्तीसगढ राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह करेंगे। इस अवसर पर आपकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है। विस्तृत कार्यक्रम की जानकारी संलग्न आमंत्रण पत्र में दी गयी है |
विनीत-
राजीव रंजन प्रसाद
07895624088

“तुमने झारखण्ड में कभी सुना है कि माओवादी उलगुलान कर रहे हैं? नहीं न? तो फिर बस्तर में वे ‘भूमकाल’ शब्द को कैसे ओढ़ सकते हैं? इस शब्द में आत्मा है। यह बस्तर के आदिवासियों की एकता, संगठन क्षमता और संघर्ष का प्रतीक शब्द है। इस शब्द की अपनी मौलिकता है। माओवादियों द्वारा भूमकाल शब्द के इस्तेमाल पर मुझे आपत्ति है।“


“क्या इससे कुछ फर्क पड़ता है?”


“हाँ कल कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढियाँ यह समझें कि भूमकाल 2004 को आरंभ हुआ। भूमकाल सलवा जुडुम के खिलाफ लड़ाई थी। भूमकालिये गणपति, किशनजी, गुडसा उसेंडी आदि आदि हैं। मैं यह मानता हूँ कि भूमकाल शब्द का इस्तेमाल आदिवासियों की पहचान मिटाने की साजिश है। जब तक गुण्ड़ाधुर की वीरता, काल कालेन्द्र के संघर्ष या ड़ेबरीधुर के बलिदान की कहानियाँ धूमिल नहीं होंगी बारूदी सुरंग में मारी जा रही लाशो पर लाल सलाम का जयघोष भूमकाल नहीं कहा जा सकता।” दीपक ने अपने भावावेश को दबाने के लिये निधि की हथेली जोर से दबा दी।


“क्या तुमको नहीं लगता कि बस्तर पर जो लेखन हो रहा है उससे लोगों की रुचि....”


“ठहरो ठहरो। तुम गलत ट्रैक पर जा रही हो। बस्तर पर कम, इन दिनों माओवादियों और उनके आधार क्षेत्र पर अधिक लिखा जा रहा है। आश्चर्य की बात है न कि किसी की रुचि यहाँ के लोग, उनकी परम्परायें, उनकी जीवन शैली, उनकी चाहत, उनके सपने....किसी में नहीं है। हालिया लेखन ने घर-घर तक पहुँचाया है कि माओवादी कैसे रहते हैं, क्या खाते हैं क्या सोचते हैं...”
-----------


“तो आप माओवाद का बस्तर में क्या भविष्य देखते है?” दीपक ने पूछा।


“मैं ड़रा हुआ हूँ। मुझे बुरे सपने आते हैं। तुम लोग माड़ इलाके से आ रहे हो। दीपक क्या वहाँ तुम्हे वही गाता गुनगुनाता बस्तर दिखा? बंदूख ताने पीटी करते और लाल सलाम चीखते लोग वो हैं जिनसे मिट्टी की खुशबू ने मुँह मोड़ लिया है। तुमने वहाँ माँदर की थाप पर गाये जाते लोग गीत सुने? अब तो साम्राज्यवाद से विरोध के गीत होते है। इन गीतों में जीवन नहीं है, मस्ती नहीं है बस्तरियापन नहीं है। घोटुल मर गये। धीरे धीरे अपना अस्तित्व खो रहे हैं भीमादेव, आंगादेव, पाटदेव, भैरवदेव, लिंगो और माँ दंतेश्वरी भी। भूत-प्रेत, जादू-तोना, झाड़-फूक, सिरहा-गुनिया, पँजियार, पेरामा, गायता....कुछ भी नहीं रहा। मेले मड़ई और मुर्गा लड़ाई के बिना कैसा बस्तर? और कुछ ऐसा भी बदलाव हुआ है जो कभी सोचा नहीं था। अरुन्धति राय का लेख पढ़ना ‘वाकिंग विद द कामरेडस’; वो खुलासा करती हैं कि ‘आदिवासी औरतें केवल वर्ग-शत्रु की नृशंस हत्या दिखाने वाला वीडियो देखना पसंद करती हैं।‘ क्या यह बस्तर की आदिवासी औरतों की बात हो रही है? क्या इतना बदलाव हो गया है? क्या तुममे यह हिम्मत है कि अपने अखबार में यह सवाल खड़ा करो कि वो कौन लोग है जो आदिवासी युवतियों को नृशंस हत्याओं के वीडियो दिखा रहे हैं? साफ है कि किस तरह मासूम दिमाग से खेला जा रहा है और उनके भोलेपन की हत्या की जा रही है।”
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“तो क्या आप सलवा जुडुम के समर्थक हैं?” निधि नें चुभने वाला सवाल किया।


“निधि यह एक खेमा पकडने वाली बात है जो सही नहीं है। एसा ही सवाल है जैसे कि अरे आप वामपंथी नहीं हैं तो निश्चित ही दक्षिणपंथी हैं? अगर मुझे इन दोनों साँचों में ढ़लने से इनकार हो तो? तुम्हें मैं एक कहानी बताता हूँ शायद उसके बाद हमें बहस में पड़ने की जरूरत न रह जाये।“


“जी...”


“कहानी मंगलू की है जिससे मैं दंतेवाड़ा में मिला था। तब वह सलवाजुडुम कैम्प में रह रहा था। मैने पूछा कि अपना घर-बाड़ी छोड कर क्यों भाग आये? उसने बताया कि उसके गाँव में माओवादी लोगों का हुकुम चलता है इससे उसे शिकायत नहीं थी। समस्या शुरु हुई जब उसके दो मुर्गों में से एक मुर्गा उसके ही पड़ोसी को बटाई में मिल गया। तुम्हें मालूम ही होगा कि किसी गाँव को अपने कब्जे में लेने के बाद जन-जानवर गणना की जाती है फिर माओवादी सभी धन-पशुधन को बराबरी के आधार पर बाँट देते हैं। रोज आधा पेट सोने वाला मंगलू पूंजीपति हो गया था क्योंकि अपने खून-पसीने से उसने दो मुर्गे सम्पत्ति बना ली थी। मंगलू इस बटाई के लिये सहमत नहीं था। उसने विरोध किया लेकिन दो चार थप्पड खाने के बाद उसे समानता का सिद्धांत समझ में आ गया। मंगलू के कुछ दिन भीतर ही भीतर कुढ़ते हुए बीते। दुर्भाग्य से उसका मुर्गा मर गया। अब उसकी पीड़ा और बढ़ गयी थी। बटाई में चला गया मुर्गा वापस पाने के लिये वह पडोसी से रोज झगड़ने लगा। बात सरकार चलाने का दावा करने वालों तक भी पहुँची लेकिन मंगलू को मुर्गा वापस नहीं किया गया। मंगलू के लिये यह मुर्गा दिन की तड़प और रात का सपना बन गया था। एक दिन जब बर्दाश्त नें जवाब दे दिया तो वह उठा और अपने मुर्गे की गर्दन मरोड़ कर गाँव से भाग गया.....।“ मरकाम नें कहानी को शून्य में छोड़ दिया।

सुनिए पुस्तक का एक अध्याय, लेखक राजीव रंजन प्रसाद के स्वर में - चावल के दाम


सुनिए एक और अध्याय - नक्सलवाद और समकालीनता (स्वर: राजीव रंजन प्रसाद )


उपन्यास "आमचो बस्तर" का विमोचन दिल्ली में १५ फरवरी को होने जा रहा है, जिसमें आप सब सादर आमंत्रित हैं. सभी श्रोता जो दिल्ली और आस पास के क्षेत्रों में रहते हैं इस साहित्यिक कार्यक्रम में अवश्य पधारें.

प्रस्तुति साभार : रेडियो प्लेबैक इंडिया

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प्रवासी साहित्य की आलोचना के लिये नये मापदण्ड बनें [साहित्य समाचार] -मधु अरोड़ा


(परिसंवाद के उद्घाटन अवसर पर मुंबई से प्रकाशित पत्रिका 
 सृजन संदर्भ’’ के प्रवासी लेखन विशेषांक का लोकार्पण करते हुए तेजेन्द्र शर्मा, डा. चन्द्रा कृष्णमूर्ति, डा. दामोदर खड़से, डा. असग़र वजाहत, डा, हर्षा मेहता, काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी एवं. डा. संजीव दुबे।) 
महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के सहयोग से कथा यू.के. लन्दन एवं एस.आई.ई.एस. कॉलेज (मुंबई) के हिन्दी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में प्रवासी हिन्दी साहित्य उपलब्धियां और अपेक्षाएं  विषय पर आयोजित दो-दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया। प्रसिद्ध कथाकार और कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा, परंपरागत आलोचना प्रवासी साहित्य के साथ पूरा न्याय नहीं कर सकती. उन्होंने सवाल किया कि लेखक तो प्रवासी हो सकता है, क्या किसी भाषा का साहित्य भी प्रवासी हो सकता है? साहित्य को अलग अलग ख़ांचों में बांटना घातक सिद्ध हो सकता है।
एस.एन.डी.टी. महिला विद्यापीठ की पूर्व कुलगुरु डॉ. चंद्रा कृष्णमूर्ति की अध्यक्षता में महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डा. दामोदर खड़से  ने परिसंवाद का उद्घाटन करते हुए कहा कि प्रवासी साहित्यकारों ने विश्व स्तर पर हिन्दी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. विशेष अतिथि के रूप में लन्दन (यू.के.) से पधारी  कथाकार  ज़किया ज़ुबैरी  ने कहा कि आलोचक हमें बताएं कि उनकी प्रवासी साहित्य से क्या अपेक्षाएं है. मुख्य अतिथि  डॉ. असग़र वजाहत  ने बीज वक्तव्य में कहा कि प्रवासी लेखन ने विगत दो दशकों में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है. उसे किसी से अपनी जगह पूछने की जरूरत नहीं है।. उन्होंने जोर दिया कि प्रवासी साहित्य के दायरे में पाकिस्तान और बंगला देश को भी शामिल किया जाना चाहिए। परिसंवाद के आरम्भ में प्राचार्या डॉ. हर्षा मेहता ने महाविद्यालय एवं हिन्दी विभाग द्वारा किये जा रहे उल्लेखनीय कार्यों की चर्चा करते हुए अतिथियों का स्वागत किया. हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ.संजीव दुबे ने परिसंवाद में मेहमानों का स्वागत किया. सत्र की शुरूआत में काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी ने कथा यू.के. की ओर से डा. संजीव दुबे को एक लैपटॉप उपहार में भेंट किया।
अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद के प्रवासी साहित्य की अवधारणा पर केंद्रित प्रथम सत्र में डॉ.रामजी तिवारी (पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, मुंबई विश्वविद्यालय), डॉ. श्याम मनोहर पाण्डेय (पूर्व प्रोफ़ेसर, ओरिएंटल विश्वविद्यालय), श्री सुंदरचंद ठाकुर (सम्पादक, नवभारत टाइम्स) ने महत्वपूर्ण विचार रखे। प्रवासी लेखकों में श्रीमती ज़किया ज़ुबैरी (यू.के.), श्री तेजेंद्र शर्मा (यू.के.), श्रीमती नीना पॉल (यू.के.), श्री उमेश अग्निहोत्री (यू.एस..), डॉ.अनीता कपूर (यू.एस..), श्रीमती देवी नागरानी (यू.एस..), श्रीमती अंजना संधीर (यू.एस..) एवं  श्रीमती स्नेह ठाकुर (कनाडा) ने प्रवासी साहित्य के विविध पक्षों पर महत्वपूर्ण वक्तव्य दिए.
(कवि सम्मेलन के दौरान मंच पर बैठे हुए बाएं से देवी नागरानी, काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी, प्राचार्या हर्षा मेहता, स्नेह ठाकुर। खड़े हुए बाएं से उमेश अग्निहोत्रि, अंजना संधीर, देवमणि पाण्डेय, तेजेन्द्र शर्मा, नीना पॉल, संजीव दुबे।)
  
प्रवासी साहित्य पर अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद के पहले दिन की शाम प्रवासी कवि सम्मेलन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण यादगार बन गयी. श्री देवमणि पाण्डेय के संचालन में श्रीमती ज़किया ज़ुबैरी (यू.के.), श्रीमती नीना पॉल (यू.के.), श्रीमती देवी नागरानी (यू.एस..), डॉ. अंजना संधीर(यू.एस..), श्रीमती स्नेह ठाकुर (कनाडा)  एवं श्री तेजेंद्र शर्मा (यू.के.) ने अपनी ताज़ा कविताओं एवं ग़ज़लों का पाठ किया. महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने रंगारंग नृत्य-गीत प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया. इस रंगारंग कार्यक्रम की विशेष प्रस्तुति रही एक नेत्रहीन बच्चों के बैण्ड का कव्वाली गायन। कथा यू.के. की संरक्षक काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी ने संस्था की ओर से इस बैण्ड का उत्साह बढ़ाने के लिये उन्हें पांच हज़ार रुपये की राशि प्रदान की।
प्रवासी साहित्य कि अवधारणा, प्रवासी हिन्दी कविता, प्रवासी हिन्दी कहानी, प्रवासी हिन्दी उपन्यास तथा विविध विधाओं में लिखे जा रहे प्रवासी साहित्य पर केंद्रित विभिन्न सत्रों में कथाकार श्रीमती सूर्यबाला, श्रीमती सुधा अरोड़ा, डॉ. हरियश राय,  डॉ.एम.विमला (बंगलोर),  डॉ.शांति नायर (केरल), डॉ.विजय शर्मा (जमशेदपुर), डॉ.लालित्य ललित (दिल्ली) ने अपने विचार रखे. सुश्री अजंता शर्मा (दिल्ली), डॉ. सुमन जैन, डॉ. सतीश पाण्डेय, डॉ.एस.पी.दुबे, डॉ. अनिल सिंह, डॉ. शशि मिश्रा, डॉ. उषा राणावत,  डॉ. उषा मिश्रा, श्रीमती मधु अरोड़ा, श्रीमती रेखा शर्मा,  डॉ. मिथिलेश शर्मा, श्री दिनेश पाठक, डॉ.मनीष मिश्रा, डॉ. अशोक मरडे, डॉ.संदीप रणभिरकर, सुश्री गीता सिंह, श्री एस.एन.रावल, डॉ.श्यामसुन्दर पाण्डेय, डॉ.जयश्री सिंह, श्रीमती तबस्सुम ख़ान आदि ने अनेक प्रवासी रचनाकारों के अवदान पर केंद्रित प्रपत्र प्रस्तुत किये.
(विद्यार्थियों के नेत्रहीन बैण्ड ने रंगारंग कार्यक्रम में कव्वाली प्रस्तुत की।)

इन प्रपत्रों में उषा प्रियम्वदा, सुषम बेदी, ज़किया ज़ुबैरी, सुधा ओम ढींगरा, सुदर्शन सुनेजा, रेखा मैत्र, जय वर्मा, नीना पॉल, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, पुष्पा सक्सेना, उमेश अग्निहोत्री, अर्चना पैन्यूली एवं तेजेन्द्र शर्मा आदि प्रवासी साहित्यकारों के अवदान पर चर्चा की गयी. उक्त प्रपत्रों के अतिरिक्त प्रवासी साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों पर भी वक्ताओं ने अपने विचार रखे. परिसंवाद में मुंबई के प्रतिष्ठित रचनाकारों, समीक्षकों, पत्रकारों एवं प्राध्यापकों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही.
प्रपत्र वाचकखास तौर पर बधाई के पात्र हैं, क्योंकि उन्होनें कठिन प्रयासों से प्रवासी लेखन को पढ़ा, चिंतन-मनन करके अपने चुनाव के प्रवासी भारतीय रचनाकार के बारे में डूबकर उनके काव्य, कहानी, उपन्यास की कड़ियाँ जोड़कर, अपने प्रपत्र को सोच और शब्दों में बुनकर बहुत ही स्रजनात्मक ढंग से अपने-अपने विषयों पर रौशनी डाली। यह इस सम्मेलन की अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है।
समापनन सत्र की अध्यक्षता की एस.आई.ई.एस.  कॉलेज की प्राचार्या डॉ॰ हर्षा मेहता ने, विशेष अतिथि रहे डॉ॰ लालित्य ललित (संपादक, नेशनल बूक ट्रस्ट, नयी दिल्ली), जबकि प्रमुख वक्ता थे कथाकार तेजेन्द्र शर्मा । अंत में इस अधिवेशन के संयोजक एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ॰ संजीव दुबे ने सभी विशेष मेहमानों, वरिष्ठ साहित्यकारों के प्रति आभार प्रकट किया। कथा यू.के. एवं एस.आई.ई.एस. कॉलेज के सफल प्रयासों के लिए प्राचार्या डॉ॰ हर्षा मेहता, इस अधिवेशन के संयोजक एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ॰ संजीव दुबे, कथा यू.के के महासचिव एवं कथाकार श्री तेजेंद्र शर्मा को बधाई।  
परिसंवाद के आयोजन में डॉ. उमा शंकर, प्रो. रजनी माथुर, प्रो. लक्ष्मी, प्रो. कमला, प्रो. सुचित्रा, प्रो. सीमा, प्रो. शमा, प्रो. वृशाली एवं विद्यार्थियों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई.

- मधुलता अरोड़ा

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