.....प्रात: 6 बजे से:- सावन के मौसम में प्रेम की अनुभूति है कजरी [आलेख] - कृष्ण कुमार यादव ..........अपरान्ह 1.00 बजे से:- ऊँघती आँखों से [गज़ल] - धीरेन्द्र सिंह ..........

Saturday, July 11, 2009

ऊँघती आँखों से [गज़ल] - धीरेन्द्र सिंह

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ऊँघती आँखों से गुज़रे खाबों को पढ़कर
कल की रात काटी है किताबों को पढ़कर

उनके चेहरे को पढना न मुनासिब हो सका
दीद किया उनका उनके हिजाबों को पढ़कर

दवात लिए बैठा हूँ कब से किरदार न मिले
लिखा जो लिखा हश्र-ओ-गिर्दाबों को पढ़कर

वाह मेरा खसद-ऐ-यार देखिये तो सही
सवालों को लिखा उनके जवाबों को पढ़कर

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

धीरेन्द्र सिंह का जन्म १० जुलाई १९८७ को छतरपुर जिले के चंदला नाम के गाँव में हुआ था| आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा चंदला में ही पूरी की। वर्तमान में आप इंदौर में अभियन्त्रिकी में द्वितीय वर्ष के छात्र हैं| कविताएँ लिखने का शौक आपको अल्पायु से ही था, किन्तु पन्नो में लिखना कक्षा नवीं से प्रारंभ किया| आप हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में रचनाएं लिखते हैं। आपका 'काफ़िर' तखल्लुस है|
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सावन के मौसम में प्रेम की अनुभूति है कजरी [आलेख] - कृष्ण कुमार यादव

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भारतीय परम्परा का प्रमुख आधार तत्व उसकी लोक संस्कृति है। शहरी क्षेत्रों में भले ही संस्कृति के नाम पर फिल्मी गानों की धुन बजती हो, पर ग्रामीण अंचलों में अभी भी प्रकृति की अनुपम छटा के बीच लोक रंगत की धारायें समवेत फूट पड़ती हैं। विदेशों में बसे भारतीयों को अभी भी कजरी के बोल सुहाने लगते हैं, तभी तो कजरी अमेरिका, ब्रिटेन इत्यादि देशों में भी अपनी अनुगूंज छोड़ चुकी है। सावन के मतवाले मौसम में कजरी के बोलों की गूंज वैसे भी दूर-दूर तक सुनाई देती है -
रिमझिम बरसेले बदरिया,
गुइयां गावेले कजरिया
मोर सवरिया भीजै न
वो ही धानियां की कियरिया
मोर सविरया भीजै न।

वस्तुत: ‘लोकगीतों की रानी’ कजरी सिर्फ गायन भर नहीं है बल्कि यह सावन मौसम की सुन्दरता और उल्लास का उत्सवधर्मी पर्व है। चरक संहिता में तो यौवन की संरक्षा व सुरक्षा हेतु बसन्त के बाद सावन महीने को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। सावन में नयी ब्याही बेटियाँ अपने पीहर वापस आती हैं और बगीचों में भाभी और बचपन की सहेलियों संग कजरी गाते हुए झूला झूलती हैं-
घरवा में से निकले ननद-भउजइया
जुलम दोनों जोड़ी साँवरिया।


रचनाकार परिचय:-

कृष्ण कुमार यादव का जन्म 10 अगस्त 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0) में हुआ। आपनें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नात्कोत्तर किया है। आपकी रचनायें देश की अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं साथ ही अनेकों काव्य संकलनों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आपकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं: अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट-150 ग्लोरियस इयर्स (अंग्रेजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ :1857-1947 की गाथा (2007)।

आपको अनेकों सम्मान प्राप्त हैं जिनमें सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य-मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य श्री, साहित्य विद्यावाचस्पति, देवभूमि साहित्य रत्न, सृजनदीप सम्मान, ब्रज गौरव, सरस्वती पुत्र और भारती-रत्न से आप अलंकृत हैं। वर्तमान में आप भारतीय डाक सेवा में वरिष्ठ डाक अधीक्षक के पद पर कानपुर में कार्यरत हैं।

छेड़छाड़ भरे इस माहौल में जिन महिलाओं के पति बाहर गये होते हैं, वे भी विरह में तड़पकर गुनगुना उठती हैं ताकि कजरी की गूँज उनके प्रीतम तक पहुँचे और शायद वे लौट आयें-
सावन बीत गयो मेरो रामा
नाहीं आयो सजनवा ना।
.....................
भादों मास पिया मोर नहीं आये
रतिया देखी सवनवा ना।

यही नहीं जिसके पति सेना में या बाहर परदेश में नौकरी करते हैं, घर लौटने पर उनके सांवले पड़े चेहरे को देखकर पत्नियाँ कजरी के बोलों में गाती हैं -
गौर-गौर गइले पिया
आयो हुई के करिया
नौकरिया पिया छोड़ दे ना।

एक मान्यता के अनुसार पति विरह में पत्नियाँ देवि ‘कजमल’ के चरणों में रोते हुए गाती हैं, वही गान कजरी के रूप में प्रसिद्ध है-
सावन हे सखी सगरो सुहावन
रिमझिम बरसेला मेघ हे
सबके बलमउवा घर अइलन
हमरो बलम परदेस रे।

नगरीय सभ्यता में पले-बसे लोग भले ही अपनी सुरीली धरोहरों से दूर होते जा रहे हों, परन्तु शास्त्रीय व उपशास्त्रीय बंदिशों से रची कजरी अभी भी उत्तर प्रदेश के कुछ अंचलों की खास लोक संगीत विधा है। कजरी के मूलत: तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी कजरी। बनारसी कजरी अपने अक्खड़पन और बिन्दास बोलों की वजह से अलग पहचानी जाती है। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का बखूबी उपयोग होता है, इसकी सबसे बड़ी पहचान ‘न’ की टेक होती है-
बीरन भइया अइले अनवइया
सवनवा में ना जइबे ननदी।
..................
रिमझिम पड़ेला फुहार
बदरिया आइ गइले ननदी।

विंध्य क्षेत्र में गायी जाने वाली मिर्जापुरी कजरी की अपनी अलग पहचान है। अपनी अनूठी सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण मशहूर मिर्जापुरी कजरी को ही ज्यादातर मंचीय गायक गाना पसन्द करते हैं। इसमें सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की मिठास और छेड़छाड़ के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है-
पिया सड़िया लिया दा मिर्जापुरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना
जबसे साड़ी ना लिअइबा
तबसे जेवना ना बनइबे
तोरे जेवना पे लगिहैं मजूरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना।

विंध्य क्षेत्र में पारम्परिक कजरी धुनों में झूला झूलती और सावन भादो मास में रात में चौपालों में जाकर स्त्रियाँ उत्सव मनाती हैं। इस कजरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हैं और इसकी धुनों व पद्धति को नहीं बदला जाता। कजरी गीतों की ही तरह विंध्य क्षेत्र में कजरी अखाड़ों की भी अनूठी परम्परा रही है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरू पूजन के बाद इन अखाड़ों से कजरी का विधिवत गायन आरम्भ होता है। स्वस्थ परम्परा के तहत इन कजरी अखाड़ों में प्रतिद्वन्दता भी होती है। कजरी लेखक गुरु अपनी कजरी को एक रजिस्टर पर नोट कर देता है, जिसे किसी भी हालत में न तो सार्वजनिक किया जाता है और न ही किसी को लिखित रूप में दिया जाता है। केवल अखाड़े का गायक ही इसे याद करके या पढ़कर गा सकता है-

इस कजरी को मशहूर भोजपुरी गायिका शारदा सिन्हा की आवाज में सुनने के लिये इस प्लेयर पर क्लिक करें

कइसे खेलन जइबू
सावन में कजरिया
बदरिया घिर आइल ननदी
संग में सखी न सहेली
कईसे जइबू तू अकेली
गुंडा घेर लीहें तोहरी डगरिया।

बनारसी और मिर्जापुरी कजरी से परे गोरखपुरी कजरी की अपनी अलग ही टेक है और यह ‘हरे रामा‘ और ‘ऐ हारी‘ के कारण अन्य कजरी से अलग पहचानी जाती है-
हरे रामा, कृष्ण बने मनिहारी
पहिर के सारी, ऐ हारी।

सावन की अनुभूति के बीच भला किसका मन प्रयि मिलन हेतु न तड़पेगा, फिर वह चाहे चन्द्रमा ही क्यों न हो-
चन्दा छिपे चाहे बदरी मा
जब से लगा सवनवा ना।

विरह के बाद संयोग की अनुभूति से तड़प और बेकरारी भी बढ़ती जाती है। फिर यही तो समय होता है इतराने का, फरमाशें पूरी करवाने का-
पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से
जायके साइकील से ना
पिया मेंहदी लिअहिया
छोटकी ननदी से पिसइहा
अपने हाथ से लगाय दा
कांटा-कील से
जायके साइकील से।
..................
धोतिया लइदे बलम कलकतिया
जिसमें हरी- हरी पतियां।

ऐसा नहीं है कि कजरी सिर्फ बनारस, मिर्जापुर और गोरखपुर के अंचलों तक ही सीमित है बल्कि इलाहाबाद और अवध अंचल भी इसकी सुमधुरता से अछूते नहीं हैं। कजरी सिर्फ गाई नहीं जाती बल्कि खेली भी जाती है। एक तरफ जहाँ मंच पर लोक गायक इसकी अद्भुत प्रस्तुति करते हैं वहीं दूसरी ओर इसकी सर्वाधिक विशिष्ट शैली ‘धुनमुनिया’ है, जिसमें महिलायें झुक कर एक दूसरे से जुड़ी हुयी अर्धवृत्त में नृत्य करती हैं।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ अंचलों में तो रक्षाबन्धन पर्व को ‘कजरी पूर्णिमा’ के तौर पर भी मनाया जाता है। मानसून की समाप्ति को दर्शाता यह पर्व श्रावण अमावस्या के नवें दिन से आरम्भ होता है, जिसे ‘कजरी नवमी’ के नाम से जाना जाता है। कजरी नवमी से लेकर कजरी पूर्णिमा तक चलने वाले इस उत्सव में नवमी के दिन महिलायें खेतों से मिट्टी सहित फसल के अंश लाकर घरों में रखती हैं एवं उसके साथ सात दिनों तक माँ भगवती के साथ कजमल देवी की पूजा करती हैं। घर को खूब साफ-सुथरा कर रंगोली बनायी जाती है और पूर्णिमा की शाम को महिलायें समूह बनाकर पूजी जाने वाली फसल को लेकर नजदीक के तालाब या नदी पर जाती हैं और उस फसल के बर्तन से एक दूसरे पर पानी उलचाती हुई कजरी गाती हैं। इस उत्सवधर्मिता के माहौल में कजरी के गीत सातों दिन अनवरत् गाये जाते हैं।

कजरी लोक संस्कृति की जड़ है और यदि हमें लोक जीवन की ऊर्जा और रंगत बनाये रखना है तो इन तत्वों को सहेज कर रखना होगा। कजरी भले ही पावस गीत के रूप में गायी जाती हो पर लोक रंजन के साथ ही इसने लोक जीवन के विभिन्न पक्षों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने का भी कार्य किया है। कजरी सिर्फ राग-विराग या श्रृंगार और विरह के लोक गीतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें चर्चित समसामयिक विषयों की भी गूँज सुनायी देती है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया। आजादी की लड़ाई के दौर में एक कजरी के बोलों की रंगत देखें-
केतने गोली खाइके मरिगै
केतने दामन फांसी चढ़िगै
केतने पीसत होइहें जेल मां चकरिया
बदरिया घेरि आई ननदी।

1857 की क्रान्ति पश्चात जिन जीवित लोगों से अंग्रेजी हुकूमत को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें कालापानी की सजा दे दी गई। अपने पति को कालापानी भेजे जाने पर एक महिला ‘कजरी‘ के बोलों में गाती है-
अरे रामा नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा
नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
घरवा में रोवै नागर, माई और बहिनियां रामा
सेजिया पै रोवे बारी धनिया रे हरी।

स्वतंत्रता की लड़ाई में हर कोई चाहता था कि उसके घर के लोग भी इस संग्राम में अपनी आहुति दें। ऐसे में उन नौजवानों को जो घर में बैठे थे, महिलाओं ने कजरी के माध्यम से व्यंग्य कसते हुए प्रेरित किया-
लागे सरम लाज घर में बैठ जाहु
मरद से बनिके लुगइया आए हरि
पहिरि के साड़ी, चूड़ी, मुंहवा छिपाई लेहु
राखि लेइ तोहरी पगरइया आए हरि।

उपभोक्तावादी बाजार के ग्लैमरस दौर में कजरी भले ही कुछ क्षेत्रों तक सिमट गई हो पर यह प्रकृति से तादातम्य का गीत है और इसमें कहीं न कहीं पर्यावरण चेतना भी मौजूद है। इसमें कोई शक नहीं कि सावन प्रतीक है सुख का, सुन्दरता का, प्रेम का, उल्लास का और इन सब के बीच कजरी जीवन के अनुपम क्षणों को अपने में समेटे यूँ ही रिश्तों को खनकाती रहेगी और झूले की पींगों के बीच छेड़-छाड़ व मनुहार यूँ ही लुटाती रहेगी। कजरी हमारी जनचेतना की परिचायक है और जब तक धरती पर हरियाली रहेगी कजरी जीवित रहेगी। अपनी वाच्य परम्परा से जन-जन तक पहुँचने वाले कजरी जैसे लोकगीतों के माध्यम से लोकजीवन में तेजी से मिटते मूल्यों को भी बचाया जा सकता है।
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Friday, July 10, 2009

आज का आसमान [कविता] - मुकेश पोपली

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रचनाकार परिचय:-

11 मार्च 1959 को (बीकानेर, राजस्‍थान) में जन्मे मुकेश पोपली ने एम.कॉम., एम.ए. (हिंदी) और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्‍नातकोत्‍तर किया है और वर्तमान में भारतीय स्‍टेट बैंक, दिल्‍ली में राजभाषा अधिकारी के पद पर कार्यरत है|

अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित मुकेश जी की रचनायें कई प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं| आपका एक कहानी संग्रह "कहीं ज़रा सा..." भी प्रकाशित है। आकाशवाणी, बीकानेर से भी आपकी कई रचनाओं का प्राय: प्रसारण होता रहा है।

आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं और अपना एक ब्लाग "स्वरांगन" चलाते हैं।

धूँ-धूँ जलता शहर देख
रो रहा है आज आसमान
भट्टी की तरह
सुलग रही जमीन है
काला पड़ गया आज आसमान
यही आसमान
पहले कभी बरसात लाया था
हर आँगन
हर गली को
बरखा की
मीठी खुशबू से महकाया था
नहीं थी ग़म की परछाईं
चारों तरफ खुशियों का ही साया था
पर हमने दिया
आसमान को घिनौना, विकृत कालापन
हँसते-खेलते परिवारों को
उजाड़ कर
खेतों-खलिहानों में
पत्थर लगाकर
पेड़ों को काट कर
अब हम फिर बेचैन हैं
वर्षा के लिए
और आसमान की तरफ
आँख लगाये बैठे हैं
मगर इस बार वो सँभल गया है
पृथ्वी पर हो रहे
तांडव-नृत्यों को पहचान गया है
नहीं दूँगा
पानी की एक बूँद भी
इस बात पर वो अडिग है
और न जाने
बादलों को कहां ले गया है ।
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शोभना [लघुकथा] - प्राण शर्मा

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क्या छोटा और क्या बड़ा, सबके लिए लता की चार साल की बेटी हद से ज़्यादा प्यारी थी। क्या भाव-भंगिमाएं थी उसके चेहरे की! सौम्य और निश्छल! जापानी गुडिया की तरह। उसका नाम भी कितना प्यारा था-- शोभना!

लता के घर से जो भी गुज़रता वो शोभना की मंद-मंद मुस्कराहट से अपनी झोली भर कर जाता। मोहल्ले की अधिकाँश महिलाएं अपने-अपने घर का काम निबटा कर लता के घर आ बैठती। वे शोभना से खूब लाड-प्यार करती। सामने वाली उमा तो उस पर लट्टू थी। कश्मीरी सेब जैसे उसके प्यारे-प्यारे और मीठे-मीठे गालों को चूमना उसका हर पल का काम था। मन ही मन में उसने शोभना को अपनी बहु बनाने की ठान ली थी। शोभना भी उमा से कुछ ज्यादा ही घुल-मिल गयी थी। अपनी प्यारी-प्यारी तुतली जबान में वो हमेशा ही कहती- "ऑंटी उमा, आप मुझे बौत अच्छी लगती हैं।" उमा भी चहक कर जवाब देती "तू भी तो मुझे बहुत-बहुत अच्छी लगती है। तू तो मेरे कलेजे का टुकडा है। मेरा बस चले तो मैं तुझे आठों पहर निहारती रहूँ।" उमा उसके हाथ-पैर चूमने लगती। शोभना भी अपनी छोटी -छोटी बांहों में उसे भरने की कोशिश करती।

आधी रात थी। शोभना को खांसी उठी। सुबह तक खांसी बढ़ती ही गयी. बाहर सर्दी की तेज हवा थी। पति घर में होते तो खांसी की दवाई केमिस्ट की दूकान से भाग कर ले आते। वे तीन दिनों के लिए अपने माता-पिता से मिलने के लिए अमृतसर गए हुए थे। इतनी ठंडी में शोभना को साथ लेकर केमिस्ट की दूकान पर जाना उसके लिए ख़तरा हो सकता था। बेचैन लता शोभना को घर में ही छोड़ गयी। केमिस्ट की दूकान पास ही थी। दस मिनटों का रास्ता था। यूँ गयी और यूँ आयी।

रचनाकार परिचय:-

प्राण शर्मा वरिष्ठ लेखक और प्रसिद्ध शायर हैं और इन दिनों ब्रिटेन में अवस्थित हैं।
आप ग़ज़ल के जाने मानें उस्तादों में गिने जाते हैं। आप के "गज़ल कहता हूँ' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैं, साथ ही साथ अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।

लता को गए पांच मिनट ही हुए थे कि उसके साथ वाले मकान में आग लग गयी। आग भयंकर थी। देखते ही देखते कई मकान लपटों की लपेट में आ गए। लता का मकान भी। हाराकार मच गया। रोने-चिल्लाने की आवाजें शुरू हो गयीं। अडोसी-पडोसी और सामने वाले बच्चों को लेकर बाहर निकल आये। उमा और उसका चार साल का बच्चा भी। जलती खिड़की से रोती-चिल्लाती शोभना ने बाहर झाँका। उमा ऑंटी नज़र आयी। उसमें हिम्मत बँधी। वो जोर से पुकार उठी- "उमा ऑंटी!" उमा ऑंटी को सुनाई नहीं दिया।

शोभना के मुंह से फिर पुकार उठी-- "उमा ऑंटी------!" तभी कमरे की छत से सुलगते सीमेंट के भारी-भारी टुकड़े शोभना के सर पर आ गिरे। उमा ऑंटी के कलेजे का टुकडा शोभना की प्यारी-प्यारी तुतली आवाज़ सदा के लिए खामोश हो गयी।

ऑंटी उमा कईयों की तरह अपने बच्चे को संभालने में लगी थी।
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Thursday, July 9, 2009

मौसम के मस्तक पर [कविता] - दीपक गुप्ता


रचनाकार परिचय:-

दीपक गुप्ता [का जन्म 15 मार्च 1972 को दिल्ली में हुआ। आप दिल्ली विश्वविद्यालय से कला में स्नातक हैं। आपकी प्रकाशित कृति हैं:- सीपियों में बंद मोती (कविता संग्रह) – 1995; आप की रचनायें देश के सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व टेलीविजन कार्यक्रमों में प्रसारित होती रही हैं।
मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं

अक्सर मुझ्सरे बतियाता है
मस्त हवाओं का हरकारा
आते जाते बतला जाता
क्या है प्रियतम हाल तुम्हारा

झंझाओं को झेल रही है
नित दीपक की जलती बाती
कितना जीवन शेष अभी है
मन ही मन मैं आंक रहा हूं

तन की तन से दूरी है पर
मन का है मन से चिर बंधन
मेरी सांसों मे सुरभित है
तेरी सांसों का ही चंदन

अब तो सावन की रितु भी
मुझको बिलकुल नहीं सुहाती
नीर लिये नयनों के नभ में
कल्पित सपने टांक रहा हूं

मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं
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जूलाई-2009 में अब तक प्रकाशित...

जूलाई -2009 में अब तक प्रकाशित...

जूलाई -2009 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
संस्मरण:-
वीडियो:- डॉ. कुँअर बेचैन,
बाल साहित्य:-
पुस्तक चर्चा:-

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