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[विरासत] चंद्रधर शर्मा गुलेरी – “उसने कहा था”
बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाडी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों मे हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर-- बचो खालसाजी, हटो भाईज', ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती है पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चिटौनी देने पर भी लीक से नही हटती तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं-- हट जा जीणे जोगिए, हट जा करमाँ वालिए, हट जा, पुत्तां प्यारिए. बच जा लम्बी वालिए। समष्टि मे इसका अर्थ हैं कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रो को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहियो के नीचे आना चाहती है? बच जा। ऐसे बम्बू कार्ट वालों के बीच मे होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पडता था कि दोनो सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ो की गड्डी गिने बिना हटता न था।
-- तेरा घर कहाँ है?
-- मगरे मे। ...और तेरा?
-- माँझे मे, यहाँ कहाँ रहती है?
-- अतरसिंह की बैठक में, वह मेरे मामा होते हैं।
-- मैं भी मामा के आया हूँ, उनका घर गुरु बाजार मे है।
इतने मे दुकानदार निबटा और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनो साथ-साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकरा कर पूछा-- तेरी कुड़माई हो गई? इस पर लड़की कुछ आँखे चढ़ाकर 'धत्' कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया।
दूसरे तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ, या दूध वाले के यहाँ अकस्मात् दोनो मिल जाते। महीना भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा-- तेरे कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही 'धत्' मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसी ही हँसी मे चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली-- हाँ, हो गई।
-- कब?
-- कल, देखते नही यह रेशम से कढा हुआ सालू। ... लड़की भाग गई।
लड़के ने घर की सीध ली। रास्ते मे एक लड़के को मोरी मे ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते को पत्थर मारा और गोभी वाले ठेले मे दूध उंडेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।
-- होश मे आओ। कयामत आयी है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आयी है।
-- क्या? -- लपचन साहब या तो मारे गये हैं या कैद हो गये हैं। उनकी वर्दी पहन कर कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नही देखा। मैने देखा है, और बातें की हैं। सौहरा साफ़ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।
-- तो अब? -- अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार कीचड़ मे चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा उधर उन पर खुले मे धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन मे पैरो के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गये होंगे। सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आवें। खंदक की बात झूठ है। चले जाओ, खंदक के पीछे से ही निकल जाओ। पत्ता तक न खुड़के। देर मत करो।'
-- हुकुम तो यह है कि यहीं...
-- ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम है... जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफ़सर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की ख़बर लेता हूँ।
-- पर यहाँ तो तुम आठ ही हो।
-- आठ नही, दस लाख। एक एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।
लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों मे घुसेड़ दिया और तीनों मे एक तार सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी रखने... बिजली की तरह दोनों हाथों से उलटी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा । धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी । लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'आँख! मीन गाट्ट' कहते हुए चित हो गये। लहनासिंह ने तीनो गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफ़ाफ़े और एक डायरी निकाल कर उन्हे अपनी जेब के हवाले किया।
साहब की मूर्च्छा हटी। लहना सिह हँसकर बोला-- क्यो, लपटन साहब, मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं । यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं । यह सीखा कि जगाधरी के जिले मे नीलगायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं । यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियो पर जल चढाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढते हैं । पर यह तो कहो, ऐसी साफ़ उर्दू कहाँ से सीख आये? हमारे लपटन साहब तो बिना 'डैम' के पाँच लफ़्ज भी नही बोला करते थे ।
लहनासिंह ने पतलून की जेबों की तलाशी नही ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनो हाथ जेबो मे डाले। लहनासिंह कहता गया-- चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखे चाहिएँ। तीन महीने हुए एक तुर्की मौलवी मेरे गाँव मे आया था। औरतो को बच्चे होने का ताबीज बाँटता था और बच्चो को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उसमे से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं। गौ को नही मारते। हिन्दुस्तान मे आ जायेंगे तो गोहत्या बन्द कर देगे। मंडी के बनियो को बहकाता था कि डाकखाने से रुपये निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है। डाक बाबू पोल्हू राम भी डर गया था। मैने मुल्ला की दाढी मूंड़ दी थी और गाँव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गाँव मे अब पैर रखा तो -- साहब की जेब मे से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ मे गोली लगी। इधर लहना की हेनरी मार्टिन के दो फ़ायरो ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी।
धडाका सुनकर सब दौड आये।
बोधा चिल्लाया-- क्या है?
लहनासिंह मे उसे तो यह कह कर सुला दिया कि 'एक हडका कुत्ता आया था, मार दिया' और औरो से सब हाल कह दिया। बंदूके लेकर सब तैयार हो गये । लहना ने साफ़ा फाड़ कर घाव के दोनो तरफ पट्टियाँ कसकर बांधी । घाव माँस मे ही था। पट्टियो के कसने से लूह बन्द हो गया।
इतने मे सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई मे घुस पड़े। सिखो की बंदूको की बाढ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहाँ थे आठ (लहना सिंह तक-तक कर मार रहा था। वह खड़ा था औऱ लेटे हुए थे) और वे सत्तर । अपने मुर्दा भाईयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे । थोड़े मिनटो में वे... अचानक आवाज आयी -- 'वाह गुरुजी की फतह ! वाहगुरु दी का खालसा!' और धड़ाधड़ बंदूको के फायर जर्मनो की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्कों के पाटों के बीच मे आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने से लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालो ने भी संगीन पिरोना शुरु कर दिया ।
एक किलकारी और-- 'अकाल सिक्खाँ दी फौज आयी। वाह गुरु जी दी फतह! वाह गुरु जी दी खालसा! सत्त सिरी अकाल पुरुष! ' और लड़ाई ख़तम हो गई। तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खो में पन्द्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कन्धे मे से गोली आर पार निकल गयी। लहनासिंह की पसली मे एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया। और बाकी का साफ़ा कसकर कमर बन्द की तरह लपेट लिया। किसी को ख़बर नही हुई कि लहना के दूसरा घाव -- भारी घाव -- लगा है। लड़ाई के समय चांद निकल आया था। ऐसा चांद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियो का दिया हुआ 'क्षयी' नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा मे 'दंतवीणो पदेशाचार्य' कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मनभर फ्रांस की भूमि मेरे बूटो से चिपक रही थी जब मैं दौडा दौडा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर उसकी तुरन्त बुद्धि को सराह रहे थे और कर रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते। इस लड़ाई की आवाज़ तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होने पीछे टेलिफ़ोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चली, जो कोई डेढ घंटे के अन्दर अन्दर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नज़दीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएंगे, इसलिए मामूली पट्टी बांधकर एक गाडी मे घायल लिटाये गए और दूसरी मे लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहनासिह की जाँघ मे पट्टी बंधवानी चाही। बोधसिंह ज्वर से बर्रा रहा था। पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जायेगा। वह गाडी मे लिटाया गया। लहना को छोडकर सूबेदार जाते नही थे। यह देख लहना ने कहा-- तुम्हे बोधा की कसम हैं और सूबेदारनी जी की सौगन्द है तो इस गाड़ी मे न चले जाओ।
-- और तुम?
-- मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना। और जर्मन मुर्दो के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होगीं। मेरा हाल बुरा नही हैं। देखते नही मैं खड़ा हूँ? वजीरासिंह मेरे पास है ही।
-- अच्छा, पर...
-- बोधा गाडी पर लेट गया। भला, आप भी चढ़ आओ। सुनिए तो, सूबेदारनी होराँ को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना।
-- और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझ से जो उन्होने कहा था, वह मैंने कर दिया।
गाडियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा-- तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाये हैं। लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी से तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?
-- अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना।
गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया। --वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।
मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है। जन्मभर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यो के रंग साफ़ होते है, समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है। लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर मे मामा के यहाँ आया हुआ है। दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं उसे आठ साल की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गई? तब वह 'धत्' कहकर भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा--हाँ, कल हो गयी, देखते नही, यह रेशम के फूलों वाला सालू? यह सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ । क्यों हुआ?
-- वजीरासिंह पानी पिला दे।
पच्चीस वर्ष बीत गये। अब लहनासिंह नं. 77 राइफ़ल्स मे जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा, न मालूम वह कभी मिली थी या नही। सात दिन की छुट्टी लेकर ज़मीन के मुकदमे की पैरवी करने वह घर गया। वहाँ रेजीमेंट के अफ़सर की चिट्ठी मिली। फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं, लौटते हुए हमारे घर होते आना। साथ चलेंगे।
सूबेदार का घर रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा। जब चलने लगे तब सूबेदार बेडे़ मे निकल कर आया। बोला-- लहनासिंह, सूबेदारनी तुमको जानती है। बुलाती है। जा मिल आ।
लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजीमेंट के क्वार्टरों मे तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाज़े पर जाकर 'मत्था टेकना' कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप।
-- मुझे पहचाना?
-- नहीं।
-- 'तेरी कुड़माई हो गयी? ... धत्... कल हो गयी... देखते नही, रेशमी बूटों वाला सालू... अमृतसर में...
भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।
-- वजीरासिंह, पानी पिला -- उसने कहा था ।
स्वप्न चल रहा हैं । सूबेदारनी कह रही है-- मैने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर मे ज़मीन दी है, आज नमकहलाली का मौक़ा आया है। पर सरकार ने हम तीमियो की एक घघरिया पलटन क्यो न बना दी जो मै भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज मे भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नही जिया । सूबेदारनी रोने लगी-- अब दोनों जाते हैं । मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टाँगे वाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे। आप घोड़ो की लातो पर चले गये थे। और मुझे उठाकर दुकान के तख्त के पास खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।
रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी मे चली गयी। लहनासिंह भी आँसू पोछता हुआ बाहर आया।
-- वजीरासिंह, पानी पिला -- उसने कहा था।
लहना का सिर अपनी गोद मे रखे वजीरासिंह बैठा है। जब मांगता है, तब पानी पिला देता है। आध घंटे तक लहना फिर चुप रहा, फिर बोला-- कौन? कीरतसिंह?
वजीरा ने कुछ समझकर कहा-- हाँ।
-- भइया, मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।
वजीरा ने वैसा ही किया ।
-- हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस। अब के हाड़ मे यह आम खूब फलेगा। चाचा-भतीजा दोनों यहीँ बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही बड़ा यह आम, जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने मैने इसे लगाया था।
वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे। कुछ दिन पीछे लोगों ने अख़बारो में पढ़ा---
फ्रांस और बेलजियम-- 67वीं सूची-- मैदान मे घावों से मरा -- न. 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह ।
भगवत रावत की कुछ कविताएं
बदलते हुए मौसम का मिजाज़
जब से भू मंडल नहीं रहा भौगोलिक
चढ़ गया है भूमंडलीकरण का बुखार
जब से ग़ायब होना शुरू हुई उदारता
फैला प्लेग की तरह
उदारतावाद
जब से उजड़ गए गाँवों, कस्बों और शहरों के
खुले मैदानों के बाज़ार
घर-घर में घुस गया नकाबपोश
बाज़ारवाद
यह अकारण नहीं कि तभी से प्रकृति ने भी
ताक पर रखकर अपने नियम-धरम
बदल दिए हैं अपने आचार-विचार
अब यही देखिए कि पता ही नहीं लगता
कि खुश या नाराज़ हैं ये बझल
जो शेयर दलालों के उछाले गए सेंसेक्स की तरह
बरसे हैं मूसलाधार इस साल
जैसे कोई अकूत धनवान
इस तरह मारे अपनी दौलत की मार
कि भूखे भिखारियों को किसी एक दिन
जबरदस्ती ठूँस ठूँसकर तब तक
खिलाए सारे पकवान
जब तक वे खा-खाकर मर न जाएं
जैसे कोई जलवाद केवल अपने अभ्यास के लिए
बेवजह मातहतों पर तब तक बरसाए
कोड़े पर कोड़े लगातार
जब तक स्वयं थक-हारकर सो न जाए
दूसरी तरफ देखिए यह दृश्य
कि ऐसी बरसात में, नशे में झूमतीं,
अपनी ही खुमारी में खड़ी हैं अविचलित
ऊँची-नीची पहाड़ियों
स्थित-प्रज्ञों की तरह अपने ही दंभ में खड़े हैं
ऊँचे-ऊँचे उठते मकान
और दुख से भी ज़्यादा दुख में
डूबी हुईं है सारी की सारी निचली बस्तियाँ
बह गए जिनके सारे छान-छप्पर-घर-बार
इन्हें ही मरना है, हव से, पानी से, आग से
बदलते हुए मौसम के मिजाज़ से
कभी प्यास से, कभी डूबकर
कभी गैस से
कभी आग से।
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इतनी बड़ी मृत्यु
आजकल हर कोई, कहीं न कहीं जाने लगा है
हर एक को पकड़ना है चुपके से कोई ट्रेन
किसी को न हो कानों कान ख़बर
इस तरह पहुँचना है वहीं उड़कर
अकेले ही अकेले होता है अख़बार की ख़बर में
कि सूची में पहुँचना है, नीचे से सबसे ऊपर
किसी मैदान में घुड़दौड़ का होना है
पहला और आख़िरी सवार
इतनी अजीब घड़ी हैं
हर एक को कहीं न कहीं जाने की हड़बड़ी है
कोई कहीं से आ नहीं रहा
रोते हुए बच्चे तक के लिए रुक कर
कहीं कोई कुछ गा नहीं रहा
यह केवल एक दृश्य भर नहीं है
बुझकर, फेंका गया ऐसा जाल है
जिसमें हर एक दूसरे पर सवार
एक दूसरे का शिकार है
काट दिए गए हैं सबके पाँव
स्मृति भर में बचे हैं जैसे अपने घर
अपने गाँव,
ऐसी भागमभाग
कि इतनी तेज़ी से भागती दिखाई दी नहीं कभी उम्र
उम्र के आगे-आगे सब कुछ पीछे छूटते जाने का
भय भाग रहा है
जिनके साथ-साथ जीना-मरना था
हँस बोलकर जिनके साथ सार्थक होना था
उनसे मिलना मुहाल
संसार का ऐसा हाल तो पहले कभी नहीं हुआ
कि कोई किसी को
हाल चाल तक बतलाता नहीं
जिसे देखो वही मन ही मन कुछ बड़बड़ा रहा है
जिसे देखो वही
बेशर्मी से अपना झंडा फहराए जा रहा है
चेहरों पर जीवन की हँसी कही दिख नहीं रहीं
इतनी बड़ी मृत्यु
कोई रोता दिख नहीं रहा
कोई किसी को बतला नहीं पा रहा
आखिर
वह कहाँ जा रहा है।
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चिड़ियों को पता नहीं
चिड़ियों को पता नहीं कि वे
कितनी तेज़ी से प्रवेश कर रही हैं
कविताओं में।
इन अपने दिनों में खासकर
उन्हें चहचहाना था
उड़ानें भरनी थीं
और घंटों गरदन में चोंच डाले
गुमसुम बैठकर
अपने अंडे सेने थे।
मैं देखता हूँ कि वे
अक्सर आती हैं
बेदर डरी हुईं
पंख फड़फड़ाती
आहत
या अक्सर मरी हुईं।
उन्हें नहीं पता था कि
कविताओं तक आते-आते
वे चिड़ियाँ नहीं रह जातीं
वे नहीं जानतीं कि उनके भरोसे
कितना कुछ हो पा रहा है
और उनके रहते हुए
कितना कुछ ठहरा हुआ है।
अभी जब वे अचानक उड़ेंगी
तो आसमान उतना नहीं रह जाएगा
और जब वे उतरेंगी
तो पेड़ हवा हो जाएंगे।
मैं सारी चिड़ियों को इकट्ठा करके
उनकी ही बोली में कहना चाहता हूँ
कि यह बहुत अच्छा है
कि तुम्हें कुछ नहीं पता।
तुम हमेशा की तरह
कविताओं की परवाह किए बिना उड़ो
चहचहाओ
और बेखटके
आलमारी में रखी किताबों के ऊपर
घोंसले बनाकर
अपने अंडे सेओ।
न सही कविता में
पर हर रोज़
पेड़ से उतरकर
घर में
दो-चार बार
ज़रूर आओ-जाओ।
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किसी तरह दिखता भर रहे थोड़ा-सा आसमान
किसी तरह दिखता भर रहे थोड़ा-सा आसमान
तो घर का छोटा-सा कमरा भी बड़ा हो जाता है
न जाने कहाँ-कहाँ से इतनी जगह निकल आती है
कि दो-चार थके-हारे और आसानी से समा जाएं
भले ही कई बार हाथों-पैरों को उलाँघ कर निकलना पड़े
लेकिन कोई किसी से न टकराये।
जब रहता है, कमरे के भीतर थोड़ा-सा आसमान
तो कमरे का दिल आसमान हो जाता है
वरना कितना मुश्किल होता है बचा पाना
अपनी कविता भर जान !
जो रचता है वह मारा नहीं जा सकता ||
मारने से कोई मर नहीं सकता
मिटाने से कोई मिट नहीं सकता
गिराने से कोई गिर नहीं सकता
इतनी सी बात मानने के लिए
इतिहास तक भी जाने की ज़रूरत नहीं
अपने आसपास घूम फिरकर ही
देख लीजिए
क्या कभी आप किसी के मारने से मरे
किसी के मिटाने से मिटे
या गिराने से गिरे
इसका उल्टा भी करके देख लीजिए
क्या आपके मारने से कोई .....
.........ख़ैर छोड़िए
हाँ हत्या हो सकती है आपकी
और आप उनमें शामिल होना चाहें
तो आप भी हत्यारे हो सकते हैं
बेहद आसान है यह
सिर्फ मनुष्य विरोधी ही तो होना है
आपको
इन दिनों ख़ूब फल फूल भी रहा है यह
कारोबार
हार जगह खुली हुईं हैं उसकी एजेंसियाँ
बड़े-बड़े देशों में तो उसके
शो रूम तक खुले हुए हैं
तोपों के कारखानों के मालिकों से लेकर
तमंचा हाथ में लिए
या कमर में बम बाँधे हुए
गलियों में छिपकर घूमते चेहरों में
कोई अंतर कहाँ है
इस सबके बावजूद
जो जीता है सचमुच
वह अपनी शर्तों पर जीता है
किसी की दया के दान पर नहीं
वह अर्जित करता है जीवन
अपनी निचुड़ती
आत्मा की एक-एक बूँद से
उसकी हत्या की जा सकती है
उसे मारा नहीं जा सकता
इस सबके बावजूद वह रहता है
दूसरों को हटा-हटा कर
चुपचाप ऊँचे आसन पर जा बैठे
दोमुँहे, लालची, लोलुप आदमी की तरह नहीं
अपनी ज़मीन पर उगे
पौधे की तरह,
लहराता
निर्विकल्प
निर्भीक
दुनिया का सबसे कठिन काम है जीना
और उससे भी कठिन उसे, शब्द के
अर्थ की तरह रचकर दिखा पाना
जो रचता है वह मारा नहीं जा सकता
जो मारता है, उसे सबसे पहले
ख़ुद मरना पड़ता है |
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शिनाख्त
चेहरे से ही किसी को पहचान पाना
संभव हुआ होता तो तीस-चालीस बरस
पहले ही उसे ठीक से
पहचान लिया होता
बोलचाल और व्यवहार की
कुशलता से ही कुछ पता लगता तो
इतने बरस उसके मोह में
क्यों पड़ा रहता
चरित्र की अंदरूनी पेचीदगियों
और उसकी बाहरी बुनावट में
इतनी विरोधी दूरियाँ भी हो सकती हैं
यह बड़ी देर से समझ आया
दरअसल आज़ादी के ठीक बाद
लोकतंत्र के ढीले-ढाले झोल के चाल चलन में
धीरे-धीरे युवा होते हुए आदमी ने
वे सारे पैंतरे विरासत में
उन दलालों से सीख लिए थे जो हमेशा
ऊँट की करवट देखकर ही अपनी
चाल चलते थे
जिनके एक हाथ में राष्ट्रीयता का झंडा होता था
तो दूसरे हाथ में स्वामीभक्त होने का तमगा
कुल मिलाकर यह कि उसने
सीखी ऐसी सधी हुई भाषा जो किसी को
नाख़ुश नहीं करती
उसने गढ़े ऐसे नारे जिनसे न कोई
असहमत हो, न कर सके कोई विरोध
उसने अख्तियार की ऐसी
सधी हुई विद्रोही मुद्रा जिससे उसके शरीर पर
खरोंच तक न आये
और तेवर विद्रोही का विद्रोही रहा आये
उसने हर लड़ाई में हमेशा छोड़ी एक
ऐसी अदृश्य जगह जहाँ दुश्मन से
हाथ मिलाने की गुंजाइश
हमेशा रही आये
और इस तरह संघर्ष और विद्रोह की
ताक़तवर प्रतिरोधी दीवार के बीच लगाई उसने सेंध
और बन बैठा हमारा-आपका नायक
फिर इसके बाद क्या हुआ
यह बताने की शायद अब कोई ज़रूरत नहीं
आप ही की तरह मैं भी पड़ा रहा भ्रम में
कि गिरावट के इस घटाटोप में कहीं
कोई तो है जो लड़ रहा है
पर वह तो उसकी रणनीति थी
सबके कंधों पर पाँव रख कर उस जगह पहुँचने की
जहाँ संघर्ष और विद्रोह का
कोई अर्थ रह नहीं जाता
रह जाता है वह और केवल वह
और उसी के इर्द-गिर्द गूँजती उसी की
जय जयकार
यह सच है कि इतने समय तक
ख़ामोश रह कर हमने
खो दिये अपने सच बोलने के सारे अधिकार
फिर भी जाते-जाते इस जहान से
कुछ न कुछ तो करना होगा कारगर उपाय
जैसे यही कि यह कविता या इसका आशय ही
कहीं बचा रह जाये
और आने वाली किन्हीं युवा आँखों में
रोशनी की तरह
समा जाये|
[चित्र: ब्ळोग समय संकल्प से साभार - वाल्टर बोज की पेंटिंग]
/ Labels: अनूप सेठी, भगवत रावत
[श्रद्धांजलि] मेरे हिस्से के रावत जी - अनूप सेठी
जब से खबर मिली है, भगवत रावत नहीं रहे, उनकी छवि रह-रह के आंखों के सामने तैर जाती है। जिंदादिल, आत्मी य और मुस्कुगराता चेहरा।
शायद 1991 की बात है, राजेश जोशी ने शरद बिल्लोऔरे पुरस्कातर समारोह के सिलसिले में भोपाल बुलाया। उन दिनों मैं और सुमनिका दोनों ही आकाशवाणी में थे। नई-नई शादी हुई थी। मैं सुमनिका को भी साथ ले गया। भगवत जी ने आग्रह करके हम लोगों को बुलाया। राजेश हम दोनों को अपने स्कूाटर पर बिठा कर उनके घर ले गए। रावत जी बेतकल्लुरफ, अपनेपन से भरे हुए। लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं।
रावत जी बरसों से गुर्दे की बीमारी के शिकार थे। एक बार इलाज के सिलसिले में मुंबई आए हुए थे। हम कुछ दोस्तक उनसे बांबे हास्पिबटल में मिलने गए। वहां भी बीमारी के बावजूद उत्साेह और जज्बेो से सराबोर। वहीं कविता का समां बांध दिया। तब 'सुनो हिरामन' श्रृंखला की कुछ कविताएं उन्हों ने सुनाईं। एक बार भोपाल के अभिनेता निर्देशक मुकेश शर्मा (जो मुंबई में रहते हैं) के घर पर मुलाकात हुई। उस रात की बातचीत कविता के मौजूदा परिदृश्य की परेशानियों पर केंद्रित रही।
कुछ साल पहले फिर से इलाज के लिए मुंबई में बेटे के पास आए। जसलोक में कई दिन रहे। हमारी उनके बेटे के घर पर मुलाकात हुई तो मधुमेह के इलाज के लिए बाबा रामदेव के प्राणायाम और आसान समझाते रहे।
एक बार सुमनिका ने फोन मिलाना था अपने पिता को, गलती से रावत जी को लग गया। तब भी उनकी बातचीत में वैसी ही आत्मी यता का झरना बह उठा। मैंने नए साल पर उन्हें एक कार्ड भेजा जिस पर यह मजमून लिखा -
जनवरी 2009
रावत जी को एक चिट्ठी
रावत जी
मैं आपको शुभकामना का कोई दूसरा कार्ड भेजना चाहता था
शब्द भी कुछ और ही होने थे
जैसे मित्र होने थे कुछ और
दुश्मनों के बारे में तो सोचा ही न था
लगता था बिन सेना के भी बचे रह जाएंगे देश
हमें क्या पता था सभ्यता की घंटी
गले में लटका लेने से बैल सींग मारना नहीं छोड़ता
जैसे सुमनिका ने फोन लगाया होता अमृतसर
लग गया भोपाल
यूं कहने को भूल हुई पर
कौतूहल बढ़ा चहक फैली
कान से होते हुए स्मित रेखाओं तक आई
गर्मजोशी का एहसास भी हुआ वैसा ही
जैसी पशमीने की गर्मी और नर्मी मिलती है
पापा की आवाज सुनकर
पर यह भी शायद ऐसा था नहीं
सुमनिका कहेगी वो तो गलती से दब गया
वो तो दबाव था लुका हुआ बरसों पहले का
जब रावत जी के घर गए थे भोपाल में
नहीं, मुकुल जब आए थे बिटिया को लेकर हमारे घर
तब की टाफी थी उसके लिए सहेज रखी अंगुलियों में
उसी की पन्नी में चमका था रावत जी का चेहरा
पर असल बात यह नहीं है रावत जी
सच कहता हूं कहना था मुझे कुछ ऐसा
करना था इस तरह का कुछ
कि चार में से दो दफे अस्पताल में न मिलता आपसे
बच्चे की तरह कंधे पर बिठा के
ले आता आपको खुले-खिले आकाश तले
तब यह वक्त न आया होता
इस तरह अकेले में बड़बड़ाने का
और स्यापा गलतियों गफलतों गलतफहमियों का।
मुझे लगता था यह कविता बन जाएगी, पर यह एक तरह का स्मृोति-शब्द -पुंज ही बना। जैसा कि मेरे साथ अक्स र होता है, अग्रजों के साथ संकोच का एक झीना पर्दा पड़ा रहता है। रावत जी भी पर्दे के उस पार ही थे। हालांकि उनके स्वीभाव की मस्ता पवन उस पर्दे को हर बार परे सरका देती थी। और हमारे हिस्से का स्ने्ह हमें मिलता रहा। यह बेहद निजी पूंजी है।
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[श्रद्धांजलि] लोक का चितेरा अब चुप है - विमलेश त्रिपाठी
भगवत रावत अब हमारे बीच नहीं रहे। उनसे मिलने और मिलकर बतियाने की साध अधूरी रह गई। बहुत दिन पहले एक दिन उनका फोन आया। मैं उनका नाम सुनकर सहज विश्वास ही नहीं कर पाया कि वे ही बोल रहे हैं। इससे पहले उनसे कभी बात नहीं हुई थी और मैं इस मुगालते में भी नहीं था कि वे मुझे जानते होंगे। शायद किसी पत्रिका में उन्होंने मेरी कविताएं पढ़ी थीं और तुरंत फोन किया था। मुझे अच्छा लगा। उनसे बात के दौरान ही पता लगा कि वे बीमार चल रहे हैं। बाद में कई कवि मित्रों से उनके बारे में सुना। उनकी कई कविताएं पत्रिकाओं में पढ़ चुका था और उनकी सहजता और लोक के प्रति अनुराग से मैं प्रभावित था। जब भाई अग्निशेखर ने मोबाइल पर संदेश भेज कर सूचना दी कि वे नहीं रहे तो एक झटका लगा। उनसे वादा किया था कि भोपाल आऊंगा तो जरूर मिलूंगा। लेकिन वह वादा अब कभी पूरा नहीं हो सकेगा।
मेरा शुरू से मानना रहा है कि बड़ा कवि वही हो सकता है जिसकी अपनी एक जमीन हो। और उस जमीन पर तो उसके पैर मजबूती से टिके ही हों, साथ ही वह इस दुनिया- जहान को भी अपनी क्रिटिकल आंख से देखने की क्षमता रखता हो। भगवत रावत में यह क्षमता थी। वे अपने लोक के प्रति सजग तो थे ही लोक से इत्तर उनका स्वर भी उतनी ही व्यापकता के साथ मुखर था। उनके लिए कविता और जीवन में बहुत कम अंतर था। उनकी कविताओं से उनको अलगा कर या उनसे उनकी कविताओं को अलगा कर मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। वे वही हैं जो कविता में हैं और जो कविता में है वही भगवत रावत हैं। उनके पास कभी भी अपने कवि या लेखक होने का दंभ नहीं दिखता। लेकिन शब्द उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, जिसके सहारे वे आदमीयत की खोज में निकले हैं। उनके लिए कविता लिखना जीवन भर उस आदमीयत की खोज ही रहा जिसे हमने इस समय खो दिया है, या निरंतर खोते-भूलते जा रहे हैं। एक कविता में वे लिखते हैं-
रही मेरी बात
तो मैं एक साधारण-सा - आदमी
संयोग से तुम्हारी ही तरह मनुष्यता को
शब्दों में खोजता रहा जीवन भर
उन्हीं के पीछे-पीछे भागता दौड़ता
अब थक-सा गया हूं, पर हारा नहीं हूं
और इस उम्र तक आते-आते
बड़ी मुश्किल से
अपमान, पारजय, असफलता,
संशय, अकेलापन, विफलता
वंचना और करूणा जैसे कुछ शब्द ही खोज पाया हूं
जिनकी अनुभूति में
लगता है कहीं बहुत गहरे में
जाकर छिप गई है मनुष्यता
अब इन शब्दों की आरती तो उतारी नहीं जा सकती
और न इनको महिमा मण्डित कर
उनका गुणगान ही किया जा सकता है
फिर भी मैं अब तक
इन्हीं शब्दों की आंच में
जो भी बन पड़ा बनाता-पकाता रहा हूं
और इन्हीं की ऊर्जा से अपना जीवन चलाता रहा हूं..। (अनहद-2, जनवरी, 2012 पृष्ठ 82)
यह कविता कवि की अपनी जीवन दृष्टि की परतें उधेड़ कर रख देती है। कवि के लिए मनुष्यता को बचाने की मुहिम सबसे पहले है। उसके साथ पराजय, वंचना, अपमान आदि सबकुछ है, लेकिन उसने हार नहीं मानी है। यह कविता संकेत करती है कि इस अभागे देश में कवि होना, शब्द को सबकुछ समझते हुए मनुष्यता की लड़ाई लड़ना कितनी तरह की वंचनाओं से गुजरने जैसा है, फिर भी कवि ने हार नहीं पानी है और अंततः वह शब्दों से ही ऊर्जा पाता रहा है।
भगवत रावत की कविता में लोक जीवन गहरे अनुस्युत है। वे बार-बार अपने लोक में लौटते हैं, क्योंकि कविता और मनुष्यता का भी उत्स लोक ही है। वे जब भी समय की मार से घायल होते हैं, उन्हें अपनी जमीन याद आती है, अपना लोक याद आता है, वे बार-बार लोक में लौटते हैं इस दुनिया को संबोधित करने की नई ऊर्जा ग्रहण करने के लिए –
‘देह और आत्मा में जब लगने लगती है दीमक
तो एक दिन दूर छूट गया पुराना खुला आंगन याद आता है
मीठे पानी वाला पुराना कुआँ याद आता है
बचपन के नीम के पेड़ की छाँव याद आती है।‘
डॉ. शंभुनाथ लिखते हैं – “कविता की संस्कृति धर्मशास्त्र और राजनीति के समान्यीकरणों का हमेशा अतिक्रमण करती है, क्योंकि उसका मुख्य आधार लोक जीवन है।“ ( वागर्थ, मई, 2012, पृष्ठ 49) आज कविता पर जो आक्षेप लग रहे हैं, वह दरअसल इस कारण है कि उसकी अपनी कोई जमीन नहीं दिखती। आज विदेशी कविताएं पढ़कर कविताएं लिखी जा रही हैं, कविता का स्वर इतना अंतर्मुखी होता जा रहा है कि पाठक और कविता के बीच का गैप और अधिक बढ़ता जा रहा है। कविता लिखते समय कवि संवेदनशील होता है, कविता लिखने के बाद वह उतना ही संवेदनहीन हो जाता है। कविता के साथ पाठक की ही दूरी नहीं बढ़ी, स्वयं कवि की भी दूरी बढ़ी है। शंभुनाथ लिखते हैं – “कविता भले अकेले व्यक्ति की रचना हो, एकांत का कर्म हो, वस्तुतः वह समूची संस्कृति की अभिव्यक्ति है।“
भगवत रावत के लिए कविता-कर्म व्यक्तिगत न होकर एक सामूहिक कर्म था। उनकी कविता में उनका लोक बोलता है, लोक संसकृति बोलती है। जाहिर है कि ऐसे समय में भगवत रावत जैसे कवि का जाना हिन्दी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है। एक शब्द शिल्पी लोक का चितेरा अब चुप है और हमें भी कुछ समय के लिए चुप कर
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[देस-परदेस] स्टीफे़न स्पैण्डर से बातचीत
....खून, मांस और गुलाबों की भाषा
ब्रिटिश कवि एवं लेखक स्टीफे़न स्पैण्डर से भारतीय लेखकों की बातचीत [प्रस्तुति - हेमंत शेष]
न्यूयॉर्क, में 7 मई, 1967 को ब्रिटिश कवि एवं लेखक स्टीफे़न स्पैण्डर ने प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘ऐनकाउण्टर’ के लेखक-सम्पादक-पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। प्रतिमास 40,000 ग्राहकों द्वारा पढ़ी जाने वाली इस पत्रिका से कई सालों का जुड़ा नाता तोड़ने का कारण कवि ने यह बताया कि हालांकि वर्षों से उड़ती हुई ख़बर कान में पड़ती रही कि इस पत्रिका के आर्थिक संयोजन में अमरीका की बहुचर्चित सी. आई. ए. (सेण्ट्रल इण्टेलिजेन्स एजेन्सी) का हाथ है, किन्तु इसकी पुष्टि वह एक महीने पहले ही कर सके। स्टीफे़न स्पैण्डर दशकों पहले भारत भी आये थे। लखनऊ में यशपाल जी के यहां आयोजित साहित्यिकों की गोष्ठी में उनका कई भारतीय लेखकों ने समीप से परिचय पाया था। ‘आपकी कविता-रचना की प्रक्रिया क्या है? या ‘आप कविता कैसे लिखते हैं ?’ आदि प्रश्न यदि कवियों से पूछे जायें, तो अधिकांश कहेंगे -‘कविता-रचना विश्लेषणीय नहीं है।’, ‘कवि-द्वारा कविता-रचना की प्रक्रिया नहीं बतायी जा सकती।’, ‘रचना पर प्रकाश डालना, कविता नहीं, आलोचक का काम है।’, कवि द्वारा प्रक्रिया की बात करना कविता के रस को भंग करना है।’ आदि आदि। किन्तु स्पैण्डर की सोच इससे बिलकुल अलग थी। यहाँ बरसों पुराने एक साक्षात्कार की पंक्तियां इस प्रत्याशा में, कि क्या पता आज पचास साल बाद भी वे हमारे कवियों और साहित्य में दिलचस्पी लेने वाले पाठकों को पठनीय लगें!
कहा जाता है कि ‘कवि जन्मजात हुआ करते हैं. और ये भी कि कविता अनायास सहज अभिव्यक्ति है, नैसर्गिक प्रेरणा का नतीजा ...आपकी कुछ कविताओं से भी ऐसा ही लगता है, आप कविता के बारे में क्या सोचते हैं?
पर यदि मैं कहूं कि मेरी कविता-रचना में नैसर्गिक प्रेरणा, अनायासता और जन्मजात कवित्व की जगह उतनी नहीं जितना सायास कवि होने की सार्थकता में विश्वास, एकाग्रता वगैरह तो क्या आपको ताज्जुब और निराशा होगी?
हमने तो यही जाना और सुना है ज्यों पहाड़ों में छिपे झरने स्वतः उमड़ते हैं, उसी प्रकार कवि-हृदय में अन्तर्हित भावना-उद्वेलन कविता बन फूट पड़ती है।
यह कथन अवश्य ही बहुत-से विशिष्ट कवियों पर ठीक बैठता होगा पर जहां तक मेरी कविता-रचना का सवाल है, मैं सचेतन रूप से की गयी उस यात्रा का वर्णन कर सकता हूं जो कविता के परमाणु-केन्द्र से प्रारम्भ हो कर कविता के अंतिम रूपाकार पाने तक की है।
कविता की प्रक्रिया पर आप की बातें तब तो बड़ी दिलचस्प होंगी।
मैं अपनी बात आप तक पहुंचाने के लिए अपनी कुछ कविताओं के सृजन के इतिहास को बताऊँगा और पांच तत्वों के अन्तर्गत मैं अपनी कविता-सृष्टि की बात रखना चाहूँगा।
वे पांच तत्व क्या हैं?
ये हैं- एकाग्रता, नैसर्गिक प्रेरणा, स्मरण-शक्ति, आस्था और गीत। सृजनशील लेखन के लिए लेखक की एकाग्रता अनिवार्य है। यह एकाग्रता गणित के सवाल-विशेष पर केन्द्रित एकाग्रता से अलग है। सृजनात्मक लेखन में, कवि, ध्यान को एक विशेष रूप से इस प्रकार केन्द्रित करता है कि अपने विचार के समस्त सम्भावित विकास-आयामों और निहित अर्थों के प्रति वह सचेत रहता है- जैसे किसी बढ़ते हुए पौधे का ध्यान यन्त्रवत् बढ़ते रहने की एक ही दिशा में केन्द्रीभूत न हो कर साथ-ही-साथ पत्तों पर पड़ती गरमाई और रोशनी, जड़ों से आती नरमाई और पानी आदि पर भी रहता होगा।
एकाग्रचित्त होने के लिए आपके लेखक को क्या कोशिशें करनी होती हैं?
जिसे हम कवियों की विचित्र सनक कहते हैं वह वास्तव में एक मशीनी आदत है, जो उन्हें एकाग्रचित्त करती है। कवि शिलर की सनक थी कि कविता-रचना के समय लेखन-डेस्क के ढक्कन के नीचे छिपे सड़े सेवों की गन्ध उसकी नाक में घुसती रहे। कवि ऑडन प्याले पर प्याले चाय चढ़ाते रहते हैं। मुझे भी कॉफ़ी पीने की लत है और केवल कविता लिखते समय सिगरेट पीता हूँ, वैसे नहीं। एकाग्रता का एक बिन्दु ऐसा भी आता है जब मैं मुंह में रखी सिगरेट का स्वाद भूलने-सा लगता हूं। और, उस समय मैं दो या तीन सिगरेटें एक साथ पी लेता हूं, ताकि एकाग्रता की जो दीवार मैंने अपने चारों ओर खड़ी की है, उसे भेद कर बाहरी संवेदनाएं अन्दर घुस सकें। किन्तु इसका यह अर्थ न लगायें कि सनकी आदतों का सम्बन्ध रचना के उत्तम या निम्न स्तर से है। वे लेखक-द्वारा स्वतन्त्र रूप से खुद द्वारा अर्जित एकाग्रता के छोटे-छोटे हिस्से हैं, न कि एकाग्रता के सब साधन। देह का स्वभाव है कि वह आपके ध्यान को कई प्रकार से बंटाये। इसलिए यदि ध्यान का बंटना कॉफ़ी, चाय या सिगरेट पी कर, एक ही रास्ते से, हो जाये तो ‘स्व’ के बाहर स्थित दूसरे विघ्न अन्दर प्रवेश नहीं करते।
यह भी तो माना जाता है कि काव्य-रचना का दत्तचित्त प्रयत्न एक ऐसी आध्यात्मिक क्रिया है जिसमें व्यक्ति मानसिक स्तर पर शरीर से विलग हो जाता है।
यह सही है, क्योंकि रचना-प्रक्रिया के समय मन और शरीर का पारम्परिक असन्तुलन होता है। इसलिए आवश्यक होता है कि भौतिक जगत् के साथ किसी संवेदना के लंगर द्वारा ठहराव बना रहे। मेरे लिए एकाग्रता दो प्रकार की है - एक तात्कालिक और सम्पूर्ण दूसरी वह, जिसके लिए रास्ता खोजना पड़ता है, और जिसका गन्तव्य कई मंज़िलों में प्राप्त होता है।
कुछ कवि तीव्र स्पष्ट, गहरी और उद्देश्यपूर्ण बुद्धि की ईश्वरीय देन से भासित होते हैं, और कुछ मद्धिम गति के, अनगढ़ या अदक्ष होते हैं। पर इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। उद्देश्य की सच्चाई या ईमानदारी और स्वयं को बिन खोया रख कर उस उद्देश्य की सम्पूर्ति कर पाना ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। मुझ में कविता के प्रति तात्कालिक रूप से एकाग्रचित्त होने की क्षमता बहुत कम है। मेरा मस्तिष्क स्पष्ट नहीं है, मेरी इच्छा दुर्बल है। विचारों का बाहुल्य और अभिव्यक्ति की अशक्त सामर्थ्य, मुझे दुःखी करते हैं। एक कविता लिखने बैठने के लिए, कभी-कभी तो दस कविताएं एक साथ विचार में आती हैं, जिन्हें कभी लिखने नहीं बैठता।
अपने कविता-लेखन के विषय में इतना स्पष्ट वक्तव्य तो सम्भवतया ही कोई कवि देना चाहेगा! आप अत्यधिक विनम्र हैं!
नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं है। विनम्रता कैसी, जब सब बातें बिलकुल सच हैं। मेरे कविता-लेखन की पूरी बात सुनने पर तो आप मुझे कवि भी कहना पसन्द न करें शायद।
भला क्या यह रहे हैं आप? ऐसा क्यों?
आप को बताऊँ – मेरे लिखने की मेज़ के पास अलमारी में लगभग बीस नोट-बुकें हैं, जिनमें पन्द्रह वर्ष से टूटे-फूटे विचार अंकित करता आ रहा हूं। मैं उनमें कविता-रचना के प्रसंग में उठे सब विचारों को रेखांकित करता रहता हूं। बाद में कुछ विचारों को कविता में काम ले लेता हूं और कुछ को रद्द भी कर देता हूं ।
कविता-रचने का यह ढंग काफी दिलचस्प और व्यवस्थित है।
मनोरंजक है या नहीं, मैं नहीं जानता किन्तु व्यवस्थित होने के कारण मुझे ज्यादा सुविधाजनक लगता रहा है। उदाहरण के लिए एक कविता के प्रसंग में नं. 3 वाले विचार की एक पंक्ति आज तक लिखी रही है, पर उसकी कविता पूरी नहीं हो पायी है। पंक्ति है: ‘ए लैग्वेज ऑफ़ फ्लैश एण्ड रोजे़ज़’ रक्त-मांस और गुलाबों की भाषा - जब कि 13 नम्बर की कविता अनेकानेक रूपाकारों में परिवर्तित होती हुई सम्पूर्ति की स्थिति में आ गयी। प्रारम्भिक विचार का आकार यों थाः
कुछ दिन होते हैं ऐसे, जब समुद्र किसी वीणा की भांति
ढालू चट्टानों के नीचे सपाट पसरा रहता है।
लहरें, सूरज की ताम्बई चमक से, तार की तरह जलती हैं।
खाली जगहों में आकाश (खेत और) झाड़ी और खेत और नाव
की छायाएं, मध्यान्ह में लेटी हैं
जब गरमी थक जाती है तो शायद
ज़मीन के भीतर से
दुपहर एक लम्बी सांस भरती है।
(जैसे कोई हाथ तारों के ओर छोरों को छूता हो जिससे वे झनझनाते हैं)
उन रिक्त स्थानों में,
स्थल और आकाश से आती
प्रत्येक पक्षी की कूक, कुत्तों की भौंक,
मनुष्य-पुकार
घोड़ागाड़ी की चरमराहट
मध्यान्ह के सम्पूर्ण संगीत के साथ
इस झंकार में डूब जाते हैं।
इस रूपाकार में कविता ऐसी ही है, जैसी कि स्मृति की आंखों में साफ़-साफ़ दिखाई देता चेहरा, जिसकी प्रत्येक रेखा और नाक-नक्श का निरीक्षण यदि मानसिक या वैचारिक स्तर-पर किया जाये तो धुंधलाता सा प्रतीत होता है।
इस कविता में समुद्र है- समुद्र जो चट्टानों के नीचे फैला हुआ है। चट्टानों की चोटियों पर खेत हैं, झाड़ियां हैं, घर हैं। गाड़ियों को घसीटते हुए घोड़े हैं...।
...हां। वे घोड़े गलियों में हैं, और कुत्ते तट से भी दूर अन्दर शहर में भौंकते हैं, घण्टियां कहीं दूर बजती हैं, एक सुहावने गरमी के दिन जब सागर अपने तट को अपने में समोता सा प्रतीत होता है तो ऐसा लगता है जैसे समुद्र का तट, झाड़ियों, गुलाबों, घोड़ों और मनुष्यों से पटा पड़ा है जब कि ये सब समुद्र से बहुत ऊपर हैं।
सुन्दर कल्पना है। इन पंक्तियों में भी तो कहा गया है कि छोटी छोटी झंकृत चमकती लहरें ऐसी हैं, जैसे वीणा के तार, जिन पर सूर्य का प्रकाश पड़ रहा है और इन तारों के बीच की खाली जगह पर तट का प्रतिबिम्ब है।
...और यह भी, कि ऐसे दिन, वह स्थल, जिसकी छाया समुद्र में पड़ रही है, समुद्र के भीतर इस तरह प्रविष्ट हुआ लगता है, जैसे वह समुद्र के नीचे स्थित हो। वीणा के तार, जैसे दृश्यगत संगीत हों, जो जल और स्थल को एकाकार कर रहे हैं।
क्या इन पंक्तियों में अंकित समुद्र दृश्य के प्रत्यक्ष वर्णन के पीछे कुछ और भी है जो कवि परोक्ष रूप से कहना चाहता है?
इसी दृश्य को दूसरी दृष्टि से देखने पर इसका प्रतीकात्मक मूल्य प्रकट होता है...।
समुद्र, मृत्यु और ‘अनन्त’ का प्रतीक है और स्थल प्रतीक है ग्रीष्म ऋतु एवं मनुष्य की एक पीढ़ी के लघु जीवन का, जो अनन्त के समुद्र में मिल जाती है। किन्तु कवि अपनी कल्पना के इस पक्ष से अवगत होते हुए भी इसको अभिव्यक्त करने का उसी में उलझने से बचता है। निजी दिवा-स्वप्न का प्राणान्वित सृजन उसका काम है। सृजन में मूल्य और उद्देश्य स्वयं बोलने चाहिएं। कवि के मन में यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसे निश्चित रूप से क्या कहना है, और क्या अनकहा रखना है। अनकहा अन्तर्निहित अर्थ - कविता की लय, ध्वनि और संगीत एवं उसके सर्वांगीण रूप से उद्भासित होता है।
आपने अपनी कविता के प्रथम रूप को कई बार बदला। अन्तिम रूप क्या था?
कविता की ये पंक्तियां कि ‘लहरें, सूरज की तांबे की-सी चमक से, तार की तरह जलती हैं ’ समुद्र के चित्र को संगीत के विचार से जोड़ती हैं। यह कविता की कुंजी-पंक्ति है। कविता के अन्तिम रूप में वह इस प्रकार आयी हैः
कुछ दिन होते हैं ऐसे, जब प्रसन्न-मन समुद्र, ज़मीन के नीचे
अनछिड़ी वीणा-सा लेटा रहता है।
दोपहर सारे तारों पर स्वर्णलेपन कर
उन्हें नयनों के प्रज्वलित संगीत से झंकृत कर देती है।
उन मृद-झंकृत लपटों के बीच के दर्पणमय पथ पर,
गुलाबों, घोड़ों और मीनारों से पटा समुद्र-तट
लहर-चिन्हित बालू के ऊपर चित्रित हुआ, जल में विचरण करता है।
कविता-रचना में किया गया यह परिश्रम अद्भुत रूप से सफल हुआ है किन्तु स्वतःप्रेरणा के बिना तो सृजन असम्भव है। कविता-रचना में नैसर्गिक प्रेरणा का क्या स्थान है?
कविता-रचना में, स्वतःप्रेरणा के अतिरिक्त, शेष सब परिश्रम और काम ही काम है। यह बात और है कि ‘परिश्रम या काम’ का अंश द्रुत गति से कुछ ही क्षणों में एक ही झटके में हो जाये, या कि वह धीमी गति से मंज़िल-दर-मंज़िल विकसित होकर पूरा हो। स्वतःप्रेरणा कविता का प्रारम्भ है और अन्तिम लक्ष्य भी। वह पहला विचार है, जो कवि के मानस में उपजता है, और वह अन्तिम विचार है, जिसे वह शब्दों द्वारा प्राप्त करता है। मेरे स्वतः प्रेरणा के अनुभव में एक पंक्ति, एक शब्द या एक विशेष वाक्यविन्यास झलकता है- या कभी-कभी एक अस्पष्ट, धुंधला-सा विचार का बादल मन पर छा जाता है, जिसको घनीभूत कर शब्दों की रिमझिम द्वारा बरसाने को जी चाहता है।
‘ए लैंग्वेज ऑफ़ फ्लैश एण्ड रोजे़ज़’ पंक्ति के साथ-साथ बहुत से अनुभव और विचारों का घटाटोप मन पर है- जो सम्भवतः वर्षों बाद कविता रूप में बरसे। इस पंक्ति की प्रेरणा का स्रोत एक घटना या स्थिति हैः मैं ब्लैक-कंट्री में से गुज़रती हुई ट्रेन के एक कॉरीडोर में खड़ा था। मेरी आंखों के सामने एक भू-दृश्य था, जहां पेट्रोल निकालने के कुएं खुदे हुए थे, जहां कृत्रिम पर्वत निर्मित थे, जैसे धरती की देह पर पीले दांत लगे ज़ख़्म हों। ऐसा लगता था जैसे किसी भयानक जंगली जानवर ने या दैत्य ने शिकार या खजाने की खोज में, धरती की खाल उधेड़ कर, उसे चीर फाड़ डाला हो। इसी समय वहां खड़े एक अन्य आदमी ने जैसे मेरे मन की बात कह दी- ‘‘यह सब कुछ मनुष्य निर्मित है।’ इसी क्षण मेरे मस्तिष्क में यह पंक्ति चमक उठी - ‘‘ए लैंग्वेज ऑफ फ्लैश एण्ड रोजे़ज़। इस लाइन के मन में आने से पहलेमेरा विचार-क्रम कुछ इस प्रकार था-
‘‘यह औद्योगीकृत भू-दृश्य जहां मालिक और श्रमिक, दोनों जीवन की इस जकड़न में कुछ इस तरह धंस गये हैं, जैसे यह भी ईश्वर द्वारा निर्मित हो- पर वास्तव में यह द्रश्य मनुष्य की इच्छा से बना है। इसी प्रकार जो भी दुनिया हमने निर्मित की है, जिसमें बिजली है, तार हैं, गन्दी बस्तियां और समाचारपत्र हैं, हमारी ही आन्तरिक इच्छाओं और विचारों की अभिव्यक्ति हैं। किन्तु ऐसा होते हुए भी, हमारी यह भाषा, हमारे वश से बाहर हो गयी है। यह अत्यन्त उलझी, उत्तरदायित्वहीन, सनकी बड़बड़ाहट है।
इस विचार ने मुझे बहुत पीड़ित किया। मैं सोचने लगा कि यदि मानव-कृत दृश्य, वस्तु या तथ्य, वास्तव में शब्दों ही जैसे हों, तो भाषा का वह क्या स्वरूप है जिसकी ओर हम उन्मुख हैं? इन विचारों की श्रृंखला के उत्तर के रूप में यह पंक्ति मेरे मन में कौंधी-‘ए लैंग्वेज ऑफ फ्लैश एण्ड रोजे़ज़।’
जब विचारों की श्रृंखला, प्रेरक स्थिति से उत्पन्न प्रतिक्रिया आदि सब मानस में है, तो प्रेरणा-पंक्ति को कविता के रूप में पूरा करने में असमर्थता कहां है?
जो कविता मैं लिखना चाहता हूं, उसको समझाना कितना सुगम है। काश, कविता लिखना भी ऐसा ही होता! लिखने के अर्थ हैं, इन सब अमूर्त विचारों के प्रतिबिम्बित अनुभवों को जीने का प्रयत्न अनन्त धैर्य और जागरूकता की अपेक्षा रखता है।
इसके अर्थ हैं कि कवि की स्मरण-शक्ति भी विशेष प्रकार की होती होगी जो वर्षों पहले प्राप्त प्रेरणा को मन में इस प्रकार सुरक्षित रख सकती है कि वह पुनः जाग्रत हो सके..
अवश्य। कवि वह व्यक्ति है, जो कुछ संवेदन प्रक्रियाओं के प्रभाव को, जिसकी अनुभूति में से वह गुजर चुका है, कभी नहीं भूलता। वह बार-बार उन अनुभवों को जी सकता है, उसी तीव्र एवं नवीन अनुभूति के साथ जैसा कि प्रारम्भ में जिया था। इसलिए यद्यपि टेलिफ़ोन-नम्बर,पते-ठिकाने या देखे हुए चेहरों के बारे में मेरी स्मृति बहुत कमज़ोर है किन्तु कुछ अनुभवगत संवेदनाएं जो मेरे चारों ओर घनीभूत होकर जम गयी हैं, मेरी स्मृति से नहीं जातीं। इसी आधार पर पुरानी अधूरी कविताओं के खण्डित अवशेष तत्काल ही मुझे उसी प्रारम्भिक संवेदनशील अनुभवों में पहुंचा देते हैं,
...
/ Labels: काबुलीवाला, भाषा सेतु, रवीन्द नाथ ठाकुर
[भाषा सेतु] रवीन्द्रनाथ ठाकुर – “काबुली वाला”
मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ी भर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है – आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग गई।
मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"
कँधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अँगूर की पिटारी लिए एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। जैसे ही वह मकान की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई। उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ न ले जाए। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुलीवाले की झोली के अंदर तलाश करने पर उस जैसे और भी दो-चार बच्चे मिल सकते हैं।
काबुली ने मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने उससे कुछ सौदा खरीदा। फिर वह बोला, "बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?"
मैंने मिनी के मन से डर दूर करने के लिए उसे बुलवा लिया। काबुली ने झोली से किशमिश और बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ न लिया। डरकर वह मेरे घुटनों से चिपट गई। काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ। कुछ दिन बाद, किसी ज़रुरी काम से मैं बाहर जा रहा था। देखा कि मिनी काबुली से खूब बातें कर रही है और काबुली मुसकराता हुआ सुन रहा है। मिनी की झोली बादाम-किशमिश से भरी हुई थी। मैंने काबुली को अठन्नी देते हुए कहा, "इसे यह सब क्यों दे दिया? अब मत देना।" फिर मैं बाहर चला गया।
कुछ देर तक काबुली मिनी से बातें करता रहा। जाते समय वह अठन्नी मिनी की झोली में डालता गया। जब मैं घर लौटा तो देखा कि मिनी की माँ काबुली से अठन्नी लेने के कारण उस पर खूब गुस्सा हो रही है।
काबुली प्रतिदिन आता रहा। उसने किशमिश बादाम दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर काफ़ी अधिकार जमा लिया था। दोनों में बहुत-बहुत बातें होतीं और वे खूब हँसते। रहमत काबुली को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई पूछती, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"
रहमत हँसता हुआ कहता, "हाथी।" फिर वह मिनी से कहता, "तुम ससुराल कब जाओगी?"
इस पर उलटे वह रहमत से पूछती, "तुम ससुराल कब जाओगे?"
रहमत अपना मोटा घूँसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।" इस पर मिनी खूब हँसती।
हर साल सरदियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता। जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता। उसे घर-घर घूमना पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता।
एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था। ठीक उसी समय सड़क पर बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया। देखा तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। रहमत के कुर्ते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा।
कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी। उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने इनकार कर दिया था। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई, और काबुली ने उसे छुरा मार दिया।
इतने में "काबुलीवाले, काबुलीवाले", कहती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षण भर के लिए खिल उठा। मिनी ने आते ही पूछा, ‘’तुम ससुराल जाओगे?" रहमत ने हँसकर कहा, "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।"
रहमत को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई। तब उसने घूँसा दिखाकर कहा, "ससुर को मारता पर क्या करूं, हाथ बँधे हुए हैं।"
छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई साल की सज़ा हो गई।
काबुली का ख्याल धीरे-धीरे मेरे मन से बिलकुल उतर गया और मिनी भी उसे भूल गई।
कई साल बीत गए।
आज मेरी मिनी का विवाह है। लोग आ-जा रहे हैं। मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत सलाम करके एक ओर खड़ा हो गया।
पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न चेहरे पर पहले जैसी खुशी। अंत में उसकी ओर ध्यान से देखकर पहचाना कि यह तो रहमत है।
मैंने पूछा, "क्यों रहमत कब आए?"
"कल ही शाम को जेल से छूटा हूँ," उसने बताया।
मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर में एक जरुरी काम है, मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।"
वह उदास होकर जाने लगा। दरवाजे़ के पास रुककर बोला, "ज़रा बच्ची को नहीं देख सकता?"
शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। वह अब भी पहले की तरह "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले" चिल्लाती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों की उस पुरानी हँसी और बातचीत में किसी तरह की रुकावट न होगी। मैंने कहा, "आज घर में बहुत काम है। आज उससे मिलना न हो सकेगा।"
वह कुछ उदास हो गया और सलाम करके दरवाज़े से बाहर निकल गया।
मैं सोच ही रहा था कि उसे वापस बुलाऊँ। इतने मे वह स्वयं ही लौट आया और बोला, “'यह थोड़ा सा मेवा बच्ची के लिए लाया था। उसको दे दीजिएगा।“
मैने उसे पैसे देने चाहे पर उसने कहा, 'आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! पैसे रहने दीजिए।' फिर ज़रा ठहरकर बोला, “आपकी जैसी मेरी भी एक बेटी हैं। मैं उसकी याद कर-करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ा-सा मेवा ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।“
उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकाला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनों हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है।
देखकर मेरी आँखें भर आईं। सब कुछ भूलकर मैने उसी समय मिनी को बाहर बुलाया। विवाह की पूरी पोशाक और गहने पहने मिनी शरम से सिकुड़ी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
उसे देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में वह हँसते हुए बोला, “लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?”
मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। मारे शरम के उसका मुँह लाल हो उठा।
मिनी के चले जाने पर एक गहरी साँस भरकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। उसकी समझ में यह बात एकाएक स्पष्ट हो उठी कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? वह उसकी याद में खो गया। मैने कुछ रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिए और कहा, “रहमत! तुम अपनी बेटी के पास देश चले जाओ।“
/ Labels: जितेन ठाकुर, मेरे पाठक
[मेरे पाठक] - जितेन ठाकुर
साहित्य में मेरे ‘गॉड फादर’
पाठक मेरे लिए एक सम्मोहन की तरह है। पाठक का पत्र ही मुझे अहसास करवाता है कि मेरा लिखना निरर्थक नहीं है। वह किसी अनजान खला में खो नहीं रहा है, बल्की किसी के हाथों तक पहुँच रहा है और उसी रूप में पहुँच रहा है जिस रूप में मैं पहुँचना चाहता हूँ।
दरअसल, पाठक तक पहुँचना हमेशा से मेरा लक्ष्य रहा है। इसीलिए 1978 में सारिका में छपी कहानी वजूद से लेकर मई 2012 में ‘शुक्रवार’ पत्रिका में छपी कहानी ‘सॉरी मिस्टर रावल’ तक मैंने हमेशा पाठकों का प्यार पाया है। 1978 में छपी पहली कहानी से ही पत्रों का ऐसा सिलसिला बना कि आज तक जारी है। स्नेह, दुलार और प्रोत्साहन से भरे पत्र। देश-काल की सीमाओं को तोड़ते हुए पत्र। लिखने और लिखते जाने के लिए उकसाते हुए पत्र। मेरा मानना है कि यह पाठकों का प्यार ही है जिसने कलम पर मेरी अंगुलियों की पकड़ को कभी ढ़ीली नहीं होने दिया और मैं लगातार पिछले लगभग चैंतीस वर्षों से पाठकों की दहलीज पर खड़ा दस्तक दे रहा हूँ।
यूं लिखने का सिलसिला तो उन्नीस सौ उन्हतर-सत्तर से ही नियमित रूप से शुरु हो गया था पर राष्ट्रीय स्तर पर पाठकों से संवाद की स्थितियाँ 1978 में सारिका में छपने के बाद ही बनी। आज बदली हुई परिस्थितियों में जब हाल ही में प्रकाशित मेरी कहानी के साथ मेरा फोन नं छापा गया है तो पाठकों के जितने प्यार भरे फोन और एसएमएस आ रहे हैं वह इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि साहित्य के पास आज भी पाठक है, बशर्ते आप की कलम में पाठक से जुड़ने की ताकत हो और रचना छापने वाली पत्रिका में पाठक तक पहुँचने का मादा। मुख्यधारा-मुख्यधारा का राग अलापने वाली वह कुछ पत्रिकाएँ जो बामुश्किल दो-तीन सौ छापी जाती हैं और फिर सौ लोगों तक पहुँच कर सिमट जाती हैं- अपने लिए ही पाठक नहीं जुटा पातीं तो फिर लेखक को पाठक कहाँ से देंगी।
यहाँ प्रसंगवश यह बताना भी आवश्यक हो जाता है कि ऐसी ही पत्रिकाएँ और उनके स्वनामधन्य सम्पादक अपने को केन्द्र में बनाए रखने के लिए प्रायोजित चर्चाएं आयोजित करते हैं और अपने लेखक को समझाते हैं कि तुम्हारा पाठक तक पहुँचने से ज्यादा जरूरी है- हमारी पत्रिका में बने रहना। क्योंकि हिन्दी साहित्य अब हमारी गिरफ्त में है और अब पाठक नहीं हम तय करेंगे कि कौन लेखक किस सौपान पर है। मेरा मानना है कि पाठकों की राय के बनिस्पत ऐसी व्यूह रचना से किसी लेखक को उठाना-गिराना, उस लेखक के परिश्रम और ऊर्जा को नष्ट करने जैसा है।
सौभाग्यवश मैंने लेखन का वह दौर देखा है जब पाठकों के असंख्य प्यार भर पत्र आते थे। संचार माध्यमों के कारण आज पत्रों की संख्या में अपेक्षाकृत कमी आई है, पर यदि रचना पाठक को छू जाए तो आज भी पत्र आते ही आते हैं। जनवरी 2012 को, नववर्ष की शुभकामनाओं से भरा हुआ एक कार्ड मुझे मिला। कार्ड भेजने वाला मेरे लिए बिल्कुल अनजान-अपरिचित था। पर तभी मैंने देखा कि कार्ड के एक कोने में छोटा-छोटा लिखा हुआ था- संदर्भ ‘भंवर’।
दरअसल, ‘भंवर’ क्रिकेट के मोहजाल पर लिखा गई एक ऐसी कहानी थी जो क्रिकेट के विश्वकप के दौरान मार्च 2011 में एक बड़े प्रसार वाले दैनिक पत्र में छपी थी। इस कहानी पर पहले भी पाठकों के पत्र आए थे, परंतु लगभग एक वर्ष बाद इस कहानी की याद और लेखक के पते को सहेज कर रखना- पाठक का प्यार ही तो है। फिर क्यों मैं अपने पाठकों पर गर्व न करूं।
मैं आज भी सिर्फ और सिर्फ पाठकों के लिए लिखता हूँ। इसीलिए मेरी प्राथमिकता ऐसे पत्र-पत्रिकाओं में छपने की होती है। जिनका स्तर भी हो और जो ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुँचते भी है। वर्षाें पहले ‘हंस’ में छपी मेरी एक कहानी के बाद, हरिद्वार से मुझे एक ऐसा पत्र मिला था जिसमें देश के कई नामचीन संगीतकारों, कलाकारों और दूसरे क्षेत्र की हस्तियों के काले कारनामों की फहरिस्त थी। पाठक का अनुरोध था कि मैं इस पर भी एक कहानी लिखूँ। यह उस पाठक का विश्वास और जुड़ाव ही था कि उसने मुझसे अपने मन की पीड़ा को साझा किया था।
मेरी कहानी ‘कोट लाहौर वाला’ पढ़कर तो एक स्थानीय पाठक मेरा घर ढ़ूंढते हुए आ पहुँचे और मुझसे वो कोट दिखाने का इसरार करने लगे। ऐसे कई किस्से हैं जो, जब भी मुझे याद आते हैं- गुदगुदाते हैं और मुझे ऊर्जा से भर जाते हैं।
पंजाब के आतंकवाद पर लिखी गई कहानी ‘दहशतगर्द’ हो पेटेंट कानून पर लिखी गई ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’, बाबरी मस्जिद पर लिखी गई ‘गर्द-ओ-गुब्बार’ या फिर जीवन से जुड़ी दूसरी पचासों कहानियाँ, मेरे पाठकों ने सबको हाथों-हाथ लिया है। मुझे रेखांकित करके प्रायोजित करने वाला कोई ‘गॉडफादर’ साहित्य में कभी नहीं रहा, बस पाठकों का स्नेह और अपनत्व ही है जिसने मुझे थकने नहीं दिया और साहित्य में बनाए और बसाए रखा। मुझे गर्व है कि मेरे पास आज देश-काल की सीमाओं को तोड़ता हुआ एक बड़ा पाठक वर्ग है।
नेपाल के गोविंदगिरी ‘प्रेरणा’ हो या कलकत्ता के प्रफुल्ल कोलख्यान, बर्लिन की सुश्री लोटेज्का हों या बिहार के सुबोध कुमार झा, जम्मू से ध्यान सिंह हों या कर्नाटक से एस0 श्रीनाथ, पूना जेन के वो कैदी पाठक हों या फिर राजस्थान के एक विाहर के भिक्षु हर्ष वीतराग मुझे ऐसे असंख्य पाठकों का प्यार मिला है। कई पाठकों के तो दुख-दर्द का भी मैं साझी रहा हूँ। यह वह लोग हैं जिनसे मैं न कभी मिला और शायद इस जीवन में कभी मिल भी न पाऊं, पर जिस तरह मेरे दिल में उनकी याद रहती है- मानता हूँ कि वह भी मुझे उसी तरह याद करते होंगे। ऐसे भी हजारों पाठक होंगे जिन्होंने मुझे कभी पत्र नहीं भेजा पर जिनके दिल को मेरी कहानियों ने छुआ होगा। बस! यही सोच किसी भी परिस्थिति में मुझे साहित्य से जुडे़ रहने की ताकत देता है और पाठक तक पहुँचने की मेरी कोशिशें और भी ज्यादा बढ़ जाती है। उनके भेजे हुए पत्र ही मेरे जीवन का वो सरमाया है जिसे पिछले चौंतीस साल से मैं तिल-तिल कर संजो रहा हूँ और रहते दम तक संजोता रहूँगा।
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4. ओल्ड सर्वे रोड़,
देहरादून
/ Labels: देवी नागरानी, लघुकथा
[लघुकथा] - देवी नागरानी
पत्थर दिल
रमेश कब कैसे, किन हालात के कारण इतना बदल गया यह अंदाजा लगाना उसके पिता सेठ दीनानाथ के लिये मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगा. अपने घर की दहलीज पार करके उसके बंगले के सामने खड़े होकर सोचते रहे - जो मान-सम्मान, इज्ज़त उम्र गुज़ार कर पाई आज वहीं अपने बेटे की चौखट पर झुकेगी, वो भी इसलिये कि उसकी पत्नी राधा मरन-शैया पर लेटी अपने बेटे का मुंह देखने की रट लगाये जा रही थी - मजबूरन यह क़दम उठाना पड़ा.
दरवाज़ा पर लगी बेल बजाते ही घर की नौकरानी ''कौन है?'' के आवाज़ के साथ उन्हें न पहचानते हुए पूछ बैठी " आपका परिचय"?
''मै रमेश का बाप हूँ, उसे बुलाएं'' और नौकरानी चकित मुद्रा में कुछ सोचती हुई अंदर संदेश लेकर गई और तुरंत ही रोती सी सूरत लेकर लौटी। जो उत्तर वह लाई भी वह तो उसके पीछे से आती तेज़ तलवार की धार जैसी उस आवाज़ में ही दीनानथ जी को सूद समेत मिल गया।
''जाकर उनसे कह दो यहां कोई उनका बेटा-वेटा नहीं रहता। जिस ग़ुरबत में उन्होने मुझे पाला पोसा,उसकी संकरी गली की बदबू से निकल कर अब मैं आज़ाद आकाश का पंछी हो गया हूँ। मै किसी रिश्ते-विश्ते को नहीं मानता। पैसा ही मेरा भगवान है। अगर उन्हें जरूरत हो तो कुछ उन्हें भी दे सकता हूँ जो शायद उनकी पत्नी की जान बचा पायेगा........".! और उसके आग ख़ामोशियों के सन्नाटे से घिरा दीनानाथ लड़खड़ाते क़दमों से वापस लौटा, जैसे किसी पत्थर दिल से उनकी मुलाकात हुई हो।
/ Labels: मैने पढी किताब, सरिता शर्मा
[मैंने पढ़ी किताब] - लव इन दि टाइम ऑफ कोलेरा
लव इन दि टाइम ऑफ कोलेरा [समीक्षा - सरिता शर्मा]
मैंने हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गेब्रियल गार्सिया मार्केज का उपन्यास ‘लव इन दि टाइम ऑफ कोलेरा’ पढा जिसे पेंगुइन ने प्रकाशित किया है। यह दुखद है कि अनेक विदेशी भाषाओँ में अनुवाद हो जाने और इस पार चर्चित फिल्म बन जाने के बावजूद इसे अभी तक हिंदी में अनुवाद नहीं लिया गया है। अभी इसमें स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम की नयी और एपिक संभावनाओं को तलाश करने की कोशिश की गयी है। इसे अविस्मरणीय पात्रों के माध्यम से अनूठी किस्सागोई और कलात्मक और काल्पनिक लेखन की शैली ‘जादुई यथार्थवाद‘ का प्रयोग करके लिखा है जिसमें असली किरदारों की कहानी में जादुई तत्व मिला दिए गए हैं और काल्पनिक घटनाक्रम का चित्रण वास्तविक लगता है।मार्केज को बिल क्लिंटन ने ‘किसी भी भाषा का सर्वश्रेष्ठ लेखक‘ बताया है और ल्योसा के अनुसार ‘पहले से चली आ रही भाषा मार्केज के संस्पर्श से जादुई हो जाती है।’
लव इन दि टाइम ऑफ कोलेरा नायक टेलीफ़ोन ओपरेटर फ्लोरेंतिनो एरीजा और कुलीन नायिका फरमीना डाजा के उत्कट प्रेम को दर्शाती है जो बढती उम्र और विपथनों के बावजूद बना रहता है। फरमीना डाजा के के पिता उन्हें अलग कर देते हैं।फरमीनो आर्थिक सुरक्षा और समाज में अपनी हैसियत सुधरने के लिए डॉक्टर अर्बिनो से शादी कर लेती है। डॉक्टर अर्बिनो हैजा के उन्मूलन में जुटा हुआ है।किताब की शरुआत में अर्बिनो के फोटोग्राफर दोस्त द्वारा आत्महत्या कर लेने पर अपनी मौत के बारे में भी सोचने लगता है।कुछ देर बाद ही डॉक्टर अपने तोते को आम के पेड़ से उतरने कि कोशिश में स्टूल से गिर जाता है और उसकी भी मृत्यु हो जाती है। फरमीना डाजा से बिछुडे हुए ५३ साल बीत जाने के बावजूद फ्लोरेंतिनो उसे पाने में सफल हो जाता है। अंत में दोनों प्रेमी नदी पर अनंत यात्रा पर निकल पड़ते हैं और उपन्यास इसी सन्देश के साथ खत्म होता है कि मौत नहीं बल्कि प्रेम ही सबसे महत्वपूर्ण है जिसका कोई अंत नहीं होता।
लव इन दि टाइम ऑफ कोलेरा में मृत्यु,विनाश और बुढ़ापे पर बहुत विस्तृत और गहन विचार किया गया है। डॉक्टर अर्बिनो के अनुसार सेंट अमूर द्वारा आत्महत्या करने का कारण बूढा हो जाने का भय है।वह महसूस करता है कि उसकी याददाश्स्त कमजोर होती जा रही है।उपन्यास में हम पात्रों को पहले युवा और जीवंत देखते हैं जो अंत में वृद्ध और अशक्त हो जाते हैं।फ्लोरेंतिनो गंजापन खत्म करने कि कोशिश करता है।फरमीना के बच्चों को इस बात पार ऐतराज है कि उनकी माँ बुढ़ापे में प्रेम सम्बन्ध बनाये।उसका बेटा फ्लोरेंतिनो को कहता है कि दुनिया बूढ़े लोगों से छुटकारा पा ले तो बेहतर होगा क्योंकि वे अधिक उनत्ति कर सकेंगे। शहर भी तबाह हो रहा है। अर्बिनो सोचता है’उसका शहर समय के छोर पर बिना बदले हुए खड़ा है।जहाँ पिछले चार दशक से धीरे धीरे बुढ़ापा और दलदल बढ़ गया है।ऐसा लगता है शहर अंतहीन सिविर युद्ध में मौत कि तरफ अग्रसर हो रहा है।रोमांस और मृत्यु कि थीम को आपस में मिला दिया गया गया है। मौत अनेक मार्गों से आती हैजैसे हैजे से ,युद्ध से, आत्महत्या और बदला लेने के कारण। मृत लोगों और पशुओं के शव नदी में और उसके किनारे दिखाई देते हैं।कीचड से मछारों का झुण्ड उठता है।मौत दुखद और निरर्थक है।
उपन्यास में मार्केज बार बार प्रेम की थीम की तरफ लौटते हैं और मानते हैं कि जीवन व्यवस्था या अधिकार की बजाय जूनून से नियंत्रित होता है। प्यार समाज के नियमों का उल्लंघन है मगर समाज के हर वर्ग में लगभग सभी लोग मान्य या अवैध प्रेम संबंधों में लिप्त दिखाए गए हैं व्यावहारिक बूढी वाले डॉटर अर्बिनो भी इसके अपवाद नहीं हैं। प्यार जीवन को सरस और सार्थक बनाता है।लेखक हर प्रकार के प्रेम का उत्सव मनाता है और किसी भी स्वरुप के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया नहीं है।वेश्यालय को ‘प्यार का संग्रहालय ‘ कहा गया है जहाँ आनेवाले लोग अपनी वस्तुएं छोड़ जाते हैं। फर्मिना अपने विवाहित जीवन में खुश नहीं है मगर चाहती है कि उसका पति मर जाये तो जन पायेगा कि वह उसे कितना प्रेम करती थी।वह जिंदगी की नयी शुरुआत के बारे में भी सोचती है।फ्लोरेंतिनी और उर्बिनो के लिए अवैध सम्बन्ध ऊब और बढती उम्र को परास्त करने का साधन है । इस उपन्यास में प्रेम के विभिन्न स्वरूपों को समझने की कोशिश की गयी है और उसके आदर्श तथा विकृत दोनों पहलुओं को उभारा गया है। यह प्रेम कहानी एक साथ भव्य,गंभीर और व्यग्यात्मक है।फ्लोरेंतिनो फूल खाकर उलटी कर देता है।अंतिम अध्याय में अध्यात्मिक प्लेग का जिक्र भी इसकी पुष्टि करता है।फ्लोरेंतिनो की ड्रेस और अत्यधिक भावुकता पिछली सदी के रोमांस की याद दिलाती है जो हास्यास्पद हो चुका है।कारोबार के पत्रों को भी वह काव्यात्मक बना देता है। इसके विपरीत अर्बिनो और दाजा का दाम्पत्य प्रेम अनेक कमियों के बावजूद सामंजस्य स्थापित कर लेता है। फ्लोरेंतिनो के ६०० से ज्यादा औरतों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता है और उन्हें कई खण्डों में रिकॉर्ड भी करता है।वह पढ़े हुए रोमंसों जैसा जीवन जीना चाहता है।वह फरमिना को लगातार प्रेम पत्र लिखकर प्रेम पत्र लिखने में सिद्धहस्त हो जाता है। फिर वह औरों के लिए भी प्रेम पत्र लिखने लगता है।।फ्लोरेंतिनो फर्मिना के प्रति अनेक सबंधों के बावजूद वफादार रहता है।पुस्तक के अंत में वृद्ध प्रेमियों का मिलन मार्मिक रुमानियत रहित है।यह सच्चा प्रेम है जिसमें अथाह शांति और स्वीकार्यता है।’ऐसा लगा वे वैवाहिक जीवन के कठिन दौर से सीधे प्रेम के ह्रदय में दाखिल हो गए हों।वे दोनों ‘न्यू फिडालटी’ नौका पार बठकर अपनी निजता को बनाये रखने के लिए हैजे के प्रतीक पीले झंडे को लगाकर नदी पर अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ते हैं।इस तरह बीमारी और बुढ़ापे के बदले प्रेम को विजयी दिखाया गया है।
/ Labels: ग़ज़ल, हिमकर श्याम
[ग़ज़ल] - - हिमकर श्याम
परिंदों से सीखी है जीने की अदा
उम्मीदों के संग जोड़ते रिश्ता नया
परिंदों से सीखी है जीने की अदा
जिधर देखिए, वहीं ग़म के मारे
ढूंढते फिर रहे खुशियों का पता
कौन लिखे बगावत की तहरीर यहां
चंद सिक्कों पे बिक जाते हैं रहनुमा
जिस तरफ देखा नजर आया ख़ला
नजर आता नहीं कहीं कोई रास्ता
न समझा है कोई और न समझेगा
अलग है सियासत का फ़लसफ़ा
अच्छा हुआ जो सबकुछ भूला दिया
इस अहद में फ़ुर्सत किसे जो रखे वास्ता
/ Labels: आओ धूप, कविता गौड़
[आओ धूप] - कविता गौड़ की कवितायें
घर
खाली मकान को घर कहते हो
ना बच्चों की किलकारियाँ
न सास की दुलार भरी फटकार
न ननद से तकरार व मुनहार
न ससुर व जेठ के खखारने
का संकेत
न बहु के पायल की मीठी
झुन-झुन सी आवाज
न देवर भाभी का मीठा परिहास
न शाम को पड़ोसिनों की बैठक
न मोहल्ले के बच्चों की धूम-धड़ाका
यह सब ना होते हुए भी
मकान अब घर कहलाते है
फर्नीचर व सजावट से होता है
घर के व्यक्तियों का आँकलन
लोगों के रहने की जगह में
रहते हैं अब लग्जरी सामान
ऐसा ही होता है आज का मकान
नहीं-नहीं आज का घर....आज का घर
बसंत
आया बसंत - आया बसंत
रंग हजार लाया बसंत
कुछ फूलों में कुछ कलियों में
कुछ मधुबन की गलियों में
कुछ पलाष में
कुछ गुलमोहर की कलियों में
कुछ कोयल की कूक में
कुछ आमों के बौर में
कुछ सुंदर नये पत्तों में
कुछ अच्छे मौसम में
कुछ प्यार में
कुछ मुनहार में
प्रेम रस लाया बसंत
आया बसंत आया बसंत
रंग हजार लाया बसंत
सावधान
सावधान ओ जंगलवासी
बना रहे हैं तुम्हें जो साथी
बहला-फुसला तुम्हें रहे हैं
सब्ज-बाग वो दिखा रहे हैं
जिनका खुद ईमान नहीं है
ईमान-धरम तुम्हें सिखा रहे हैं
डाल मुसीबत में वो तुमको
अपना धंधा चला रहे है
सांठ-गांठ है पहुंचे हुओं से
तुमको मोहरा बना रहे है
समझो अब तो समझ भी जाओ
इनके झांसे में न आओ
तुम स्वतंत्र हो स्वतंत्र रहोगे
अपने पर से जाल हटाओ
सावधान ओ जंगलवासी
इनके झांसे में न आओे
बदलाव
लाना चाहती हूं मैं बदलाव
गंदी राजनीति में
सड़े गले रीति-रिवाजों वें
संकीर्ण विचारों में
टूटते परिवारों में
लोगों की नैतिकता में
नौनिहालों की सोच में
किसानो के हल में
सेना के बल में
विदेश की नकल में
युवतियों की पोषाक में
युवकों के आचार में
व्याप्त भ्रश्टाचार में
वैष्विक संबंधों में
पर मैं अकेली
खदे दी जाति हूँ
हर देश हर शहर
गली कूचों से
फिर भी लगी हूँ
संघर्श में बदलाव के
....
खाली मकान को घर कहते हो
ना बच्चों की किलकारियाँ
न सास की दुलार भरी फटकार
न ननद से तकरार व मुनहार
न ससुर व जेठ के खखारने
का संकेत
न बहु के पायल की मीठी
झुन-झुन सी आवाज
न देवर भाभी का मीठा परिहास
न शाम को पड़ोसिनों की बैठक
न मोहल्ले के बच्चों की धूम-धड़ाका
यह सब ना होते हुए भी
मकान अब घर कहलाते है
फर्नीचर व सजावट से होता है
घर के व्यक्तियों का आँकलन
लोगों के रहने की जगह में
रहते हैं अब लग्जरी सामान
ऐसा ही होता है आज का मकान
नहीं-नहीं आज का घर....आज का घर
बसंत
आया बसंत - आया बसंत
रंग हजार लाया बसंत
कुछ फूलों में कुछ कलियों में
कुछ मधुबन की गलियों में
कुछ पलाष में
कुछ गुलमोहर की कलियों में
कुछ कोयल की कूक में
कुछ आमों के बौर में
कुछ सुंदर नये पत्तों में
कुछ अच्छे मौसम में
कुछ प्यार में
कुछ मुनहार में
प्रेम रस लाया बसंत
आया बसंत आया बसंत
रंग हजार लाया बसंत
सावधान
सावधान ओ जंगलवासी
बना रहे हैं तुम्हें जो साथी
बहला-फुसला तुम्हें रहे हैं
सब्ज-बाग वो दिखा रहे हैं
जिनका खुद ईमान नहीं है
ईमान-धरम तुम्हें सिखा रहे हैं
डाल मुसीबत में वो तुमको
अपना धंधा चला रहे है
सांठ-गांठ है पहुंचे हुओं से
तुमको मोहरा बना रहे है
समझो अब तो समझ भी जाओ
इनके झांसे में न आओ
तुम स्वतंत्र हो स्वतंत्र रहोगे
अपने पर से जाल हटाओ
सावधान ओ जंगलवासी
इनके झांसे में न आओे
बदलाव
लाना चाहती हूं मैं बदलाव
गंदी राजनीति में
सड़े गले रीति-रिवाजों वें
संकीर्ण विचारों में
टूटते परिवारों में
लोगों की नैतिकता में
नौनिहालों की सोच में
किसानो के हल में
सेना के बल में
विदेश की नकल में
युवतियों की पोषाक में
युवकों के आचार में
व्याप्त भ्रश्टाचार में
वैष्विक संबंधों में
पर मैं अकेली
खदे दी जाति हूँ
हर देश हर शहर
गली कूचों से
फिर भी लगी हूँ
संघर्श में बदलाव के
....
/ Labels: कहानी, सुधा अरोडा
[कहानी] सुधा अरोड़ा - “सात सौ का कोट”
'' बस, दो मिनट और लगेंगे भैन जी, तब तक आप ठंडा पियो। नहीं जी, तकल्लुफ की क्या बात है इसमें, ये तो हमारा फ़र्ज़ है! अच्छा, ठंडा नहीं तो चाय चलेगी ? अभी हाज़िर कर देते हैं! .....ओय मंगू, जरा भाप्पे के होटल से पैशलवाली चाय पकड़ ला! जी, ठीक फरमाया आपने, कोकाकोला बंद होने के बाद से ये जितने ठंडे निकले हैं, सब फ़िज़ूल! किसी का टेस्ट ही नहीं चढ़ता ज़बान पर ! क्या क्रेज़ था जी, उस चीज़ का भी, आधी दुनिया तबाह कर रखी थी! अपने जॉरज भाई को भी बस चढ़ गई सनक! बंद करवा के छोड़ी जी! ........बस , हो गया सिस्टर !
रामदीना, ज़रा जल्दी करवा दे भई, इनको देर हो रही है !.........आप कुछ महसूस न करें भैन जी! यह कैंची और कपड़े का मामला है। जरा सा हाथ कांपा या आंख फड़की, तो र्क्वार्टर आधा इंच का तो कटाई सिलाई में फर्क पड़ ही जाता है वैसे हमारे कारीगर पुराने हैं - अच्छी तनखा, मीठी ज़ुबान - ये दो ही नुस्खे हैं , फिर तो इनसे सिर के बल काम करवा लो, काम में नुक्स निकालने का मौका नहीं देते। ..... अब ये सौ-डेढ़ सौ ब्लाउज़ों में एकाध में तो कुछ उन्नीस बीस हो ही जाता है। होना उतना भी नहीं चाहिये वैसे। आखिर हमें भी रहना है कनॉट प्लेस पर ! कम्पटीशन बड़ा सख़त है जी आजकल। हमसे टक्कर लेने के चक्कर में दूसरों ने रेट आधे कर दिये। ये और बात है कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ा। हमारे ग्राहक कहीं नहीं जाते। बस, जी सब ऊपरवाले और आप जैसों की दुआ है .... वरना हम किस काबिल हैं .....कोई ग़लत कहा मैंने?
रामदीना, ज़रा जल्दी करवा दे भई, इनको देर हो रही है !.........आप कुछ महसूस न करें भैन जी! यह कैंची और कपड़े का मामला है। जरा सा हाथ कांपा या आंख फड़की, तो र्क्वार्टर आधा इंच का तो कटाई सिलाई में फर्क पड़ ही जाता है वैसे हमारे कारीगर पुराने हैं - अच्छी तनखा, मीठी ज़ुबान - ये दो ही नुस्खे हैं , फिर तो इनसे सिर के बल काम करवा लो, काम में नुक्स निकालने का मौका नहीं देते। ..... अब ये सौ-डेढ़ सौ ब्लाउज़ों में एकाध में तो कुछ उन्नीस बीस हो ही जाता है। होना उतना भी नहीं चाहिये वैसे। आखिर हमें भी रहना है कनॉट प्लेस पर ! कम्पटीशन बड़ा सख़त है जी आजकल। हमसे टक्कर लेने के चक्कर में दूसरों ने रेट आधे कर दिये। ये और बात है कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ा। हमारे ग्राहक कहीं नहीं जाते। बस, जी सब ऊपरवाले और आप जैसों की दुआ है .... वरना हम किस काबिल हैं .....कोई ग़लत कहा मैंने?
'' लो जी , गरमागरम चाय आ गई ! इस साल दिल्ली में ठंड कड़ाके की पड़ी है। चलो, यह 'अंगूठा ऊपर' मैं ही पी लेता हूं। अब बताओ, ये थम्स अप भी कोई नाम हुआ भला ? ....... सौ की सीधी बात कही आपने सिस्टर, ठंड के दिनों में जो बात एक प्याली चाय में है, वह किसी कोल्ड ड्रिंक में कहां। ...... पहले मैं चाय ही ऑफर करता था सिस्टर, पर मैंने देखा - सर्दी हो या ओले पड़ते हों - लड़कियां कोल्ड ड्रिंक के अलावा नाम ही नहीं लेतीं किसी चीज़ का!...... आप चाय के लिये पूछ लो तो यूं नाक चढ़ जायेगी जैसे तौहीन हो गयी हो! बस, जी, फ़ैशन की मार है और क्या! ...... आपकी तो बात ही और है जी, क्या घर डेकोरेट किया है आपने, दरवाज़ा खुलते ही आपकी सादगी और सलीके की दाद देनी पड़ती है। एं जी? मैंने कब देखा आपका घर, .....आपको याद नहीं जी, आपकी सिस्टर-इन-लॉ की शादी में उनके कपड़ों का बंडल मैं खुद पहुंचाने गया था आपके घर! नहीं जी, अंदर नहीं गया, पर हम तो बाहर से ही भांप लेते हैं लिफाफे का मजमून! वो कोई शेर है ना ...... ख़त का मजमून ..... अब जो भी वो है ..... आप मेरी बात समझ गईं ना?
'' ओए मंगू ....... कहां चला गया ....चल रामदीना, तू ही जरा गाड़ी में रखवा दे! ..... हां जी, आप देख लीजिये पहले - ट्रायल रूम ये रहा सामने! देर हो रही है? चलो घर जाके देख लेना। ठीक हो ही गया होगा। शिकायत का मौका नहीं देंगे आपको सिस्टर ! ये आपने कितने दिये? आपको याद नहीं हमने पहले ही कहा था कि ब्लाउज की सिलाई हमने बढ़ा दी है। स्लीवलेस और बांहोंवाले का सवाल नहीं है जी! आधे मीटर का ब्लाउज़ हो या सवा मीटर ..... मेहनत तो उतनी ही करनी पड़ती है बल्कि जितना छोटा ब्लाउज़ होता है, प्लीट्स डालने में उतना ज़्यादा ख्याल रखना पड़ता है। आप बेशक पूरे कनॉट प्लेस में पूछ आइये मैडम - साठ सेंटीमीटर में स्लीवलेस ब्लाउज़ बनाने वाला कोई दूसरा नहीं मिलेगा। हम तो मेहनत की कमाई में यकीन रखते हैं मैडम। यह क्या कि दो रुपये कम लिये और दस रुपये की लीर हड़प ली! दूसरे दर्ज़ियों की तरह हम यह कमीनापन नहीं करते! बिना पैसे लिये आपके तो कपड़े भी डिलिवर कर देते हैं जी, आप पहन कर देख लो, फिर देना। भरोसा तो करना ही पड़ता है जी अपने कस्टमर पर! अब वही तो अपना खुदा है! थैंक्यू मैडम! मुंबई में तो ब्लाउज़ की सिलाई पता है कितनी हो गई है पर हम जैसी फिटिंग कोई हमसे दूनी सिलाई लेकर भी कर दे तो कैलाश टेलर का नाम बदल देना! जी, छुट्टे नहीं मेरे पास। चलो, फिर एडजस्ट कर लेंगे। हम तो कहीं जाने वाले नहीं, फिर आना जी!
'' ..........शुक्र है परमात्मा का ! जान बची ! ....... अरे अरे अरे .... आओ भाईसाब, बैठो। बहुत दिनों बाद दर्शन दिये? सब राजी खुशी है? अपना भी बस चल ही रहा है। दुआ है आपकी ! जरा एक मिनट, मैं पानी पी लूं। आप भी पियो जी। नहीं?.......... अभी अभी आपने एक मैडम को बाहर जाते देखा होगा। मुझसे कोई पूछे तो मैं यही कहूं कि किसी को पागल कुत्ते ने काटा हो, तो औरतों के कपड़ों का धंधा करे। सामनेवाले के मगज का तो मलीदा बनाके रख देती हैं। कोई गलत कहा मैंने? आपको तो पता ही होगा। आपके बड़े भाईसाब की तो चांदनी चौक में साड़ियों की दूकान है। उस दिन देखा नहीं था? एक मैडम पधारीं, सौ साड़ियां खुलवाई और मुंह तिरछा कर बिना खरीदे चल दीं। अंदर से दांत पीसने का मन होता है पर दांत निपोरकर हंसना पड़ जाता है - फिर आना जी! बता रहे थे आपके भाई साब कि अच्छा हुआ, नहीं लेकर गई। अगर कोई औरत तीन साड़ियों के बीच डांवाडोल हो रही हो तो यह पक्का समझ लो कि अगर उसने एक पसंद कर भी ली तो दूसरे तीसरे दिन, चेहरे पर शराफत का मुलम्मा चढ़ाये, आवाज़ में मिश्री घोले साड़ी बदलने ज़रूर आयेगी। बड़े धीरज और सबर (सब्र) की ज़रूरत है भाईसाब! औरतों के कपड़ों का, या कपड़ों की सिलाई का या ज्वेलरी का या कॉस्मेटिक्स का - गरज ये कि औरतों के इस्तेमाल की किसी चीज़ का धंधा करो, तो अकल और दिमाग़ - दोनों ताक पर रख दो!
........ अब मैं आपको आज की बात बताऊं! अभी अभी जो मैडम नीले रंग की फिएट खुद ड्राइव करके ले गयीं ना, आठ ब्लाउज़ सीने के लिये दे गईं थीं। बोलीं - अर्जेन्ट हैं। नाप का ब्लाउज़ साथ लाना भूल गई़ थीं सो इस्माइल ने नाप ले लिया। अब कहती हैं कि सारे ब्लाउज़ आधा इंच ढीले हैं। अब उन्हें कैसे समझाऊं कि मैडम, उस दिन आपने नाप दिया था ''पीटर पैन'' पहनकर और आज आपने ब्रैंड चेंज कर लिया है तो ब्लाउज़ की फिटिंग में तो फर्क पड़ेगा ही।
...... नहीं जी, मज़ाक नहीं, मगर औरतों के शरीर का कोई भरोसा नहीं - घड़ी में माशा, घड़ी में रत्ती! बित्ते भर का ब्लाउज़ और सौ नखरे! .....
ओए रामदीना, ट्रायल रूम में रूम फ्रेशनर स्प्रे कर दिया था ना? हां ...... , और कोई काम भूल जाये, ये ना भूलियो। इन मैडमों की नाक बड़ी तेज़ होती है! अपना लेडीज़ टेलरिंग तो इनके नाक के सहारे ही चलता है! क्यों भाईसाब ....... गलत कहा मैंने? .....
'' लो, व्वो तो मैं भूल ही गया। पिछले महीने आपकी भरजाई के बर्थ डे पर साड़ी ली थी आपके भ्राजी की दूकान से, उसके पैसे देने रह गये। नहीं जी, आपने क्यों मांगने थे। यही तो आपकी शराफत है। मेरा भी उस तरफ कोई काम नहीं पड़ा इसलिये बात दिमाग़ से उतर गई। मैं तो सबसे कहता हूं कि भई - कपड़ा, साड़ी कुछ भी लेना हो तो जान - पहचानवाली दूकान से लो। वापस करने - बदलने में थोड़ा लिहाज़ रहता है।
अच्छा जी, तो कितने देने हैं आपको साड़ी के? चार सौ? लेकिन जी, वो तो कॉटन की साड़ी थी। आजकल तो सूती हैंडलूम के कपड़ों को आखर आई हुई है। कपड़ों की कीमत को तो आग लगी हुई है। आप कुछ तो रियायत करो जी। दूसरी जगहों में तो हम अड़कर भी कम करवा सकते थे पर यहां तो घर की बात है।
ये लो जी, मुझे तो याद ही नहीं रहा, सारा कैश तो मैं कल ही इकट्ठा करके ले गया था। परसों ज़रूर मैं आ जाऊंगा भुगतान करने के लिये। या आपकी भरजाई को भेज दूंगा। आप तो अपने भाई से बढ़कर हैं ......
'' बस जी, और क्या बताना है! हम तो जी लेडीज़ टेलरिंग खोलकर फंस गये। अच्छी भली दुकानदारी चलती थी। अब यह आपस की बात है - ब्याह शादी के सीज़न में अच्छा खासा पैसा बना लेते हैं - सिरफ कोट पतलून की सिलाई में। वो तो आपकी भरजाई मेरे पीछे लग गईं कि ये क्या बात हुई भला - अपनी टेलरिंग की शॉप है और उसे कपड़े बाहर से सिलवाने पड़ते हैं। बस जी, आपने औरतों की बात मान ली बिज़नेस में तो हो गई आपकी ऐसी की तैसी ...... लेकिन उस वक्त हमने भी सोचा कि अपना लगता क्या है - न हींग, न फिटकरी, मशीनें हैं ही अपने पास, क्यों ना 'दिहाड़ी' पर एक दर्ज़ी रख लें - एक ब्लाउज सीने के वो जितने लेगा, उससे चार गुने हमें बच जाएंगे।
बस जी, इस मुनाफे के चक्कर में हम तो मारे गये। यह लेडीज़ टेलरिंग डिपार्टमेंट खोला तो शगल के लिये था। आते जाते खूबसूरत लड़कियां दिखेंगी, महीन आवाज़ें सुनने को मिलेंगी, चुस्त जिस्म देखकर हमारे कारीगरों का भी, वो क्या कहते हैं -एंटरटेनमेंट होगा, आंखें ठंडी होंगी, धंधे में रंगीनी आएगी .....पर यहां तो मुसीबत ही मोल ले ली ! एड्डा औक्खा काम्म होर कोई नई जी!
''क्या पिओगे भाईसाब, चाय? माफ करना, बातों के चक्कर में चाय पूछना तो भूल ही गया। इस बार दिल्ली में सर्दी कड़ाके की पड़ी है वाकई! यह 'अगूंठा ऊपर' पीकर हमारी तो अंदर तक कुल्फियां जम गईं। पीनी पड़ गई जी। मंगवाई तो उन मैडम के लिये थी। बहुत तगड़ी पार्टी है। उनकी बहन की शादी में सबके सूट यहीं से सिले थे, साल भर का जुगाड़ हो गया था। फिर इतना लिहाज़ तो रखना ही पड़ता है। क्यों जी,ग़लत कहा हमने?
ओए रामदीने, यह मंगू कहां मर गया? हत्तेरे की .... ठंड के दिनों में दस बार पिशाब करने के बहाने ही गायब होगा और क्या! अब मैं भी तो हूं ना! सुबह से हिला नहीं कुर्सी से। कहने को हम मालक हैं! बड़े नमकहराम हो गए हैं जी आजकल के नौकर! साले ....कामचोर!
जा, ओए रामदीन, तू ही पकड़ ला जरा पेशल चाय! दो कप! ज़्यादा दूध वाली! कहना, मैंने मंगाई है! श शाब्बाश, ये पैसे ले, दौड़ जा!
उधर क्या देख रहे हो भाईसाब? अपना पुराना कारीगर है रामदीन तो! आपने पहले कभी देखा नहीं इसे! अच्छा, अच्छा, वो कोट? है न देखने लायक चीज़! आप क्या, दूकान पर हर आने जाने वाला इसके कोट को घूरता है! बेगानों से नहीं रहा जाता पूछे बग़ैर, फिर आप तो अपने हैं। बिल्कुल जी, हर कोई यही कहता है कि साले ने किसी ग्राहक का तो नहीं पहन रखा यह कोट!
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''इस कोट का किस्सा भी बड़ा मजेदार है जी! आप ज़रा इत्मीनान से बैठो। चा-शा पियो! मैं बताता हूं ......
''ओए इस्माइल, मिस्टर चोपड़ा एंड फैमिली के कपड़े बिल्कुल रेडी रखना! शाम चार बजे आने वाले हैं! बस जी , यही तो हमारी सिफत है - वक्त की पाबंदी! चार बजे आने का समय दिया तो साढ़े तीन बजे कपड़े तैयार होकर मेरे काउंटर पर! ......इस्त्री हो गये हैं कि नहीं, इस्माइल?........ यह रामदीन का डिपार्टमेंट है! वैसे तो जी, वह हमारी दूकान का पीर-बावर्ची-भिश्ती सबकुछ है! सुबह दूकान खोलकर झाड़ू लगाने से लेकर रात को हमारे घर के बरतन मांजने तक, वो हमारी उंगली के इशारे पर रहता है! यह मंगू-शंगू तो साले सब ऐवेंई है। नमक हराम! रामदीन जैसा आदमी तो आज के ज़माने में मुश्किल से ही मिलता है!
'' हां जी, तो मैं आपको सुना रहा था किस्सा कोट का! हुआ ये कि एक दुबले पतले गुजराती साहब अमरीका से आये! शादी करवाने आये थे हिंदुस्तान! एक सूट सीने को दे गये! बड़ा नफ़ीस कपड़ा। मुलायम इतना कि हाथ ना ठहरे ! मेड इन डेनमार्क! सौ फीसदी इंपोर्टेड! बोले - अर्जेण्ट डिलीवरी चाहिये। हमने कहा - जी, डबल सिलाई लगेगी। मान गये जी! तीन दिन बाद उनकी शादी थी, सो दो दिन बाद ही सूट लेने आ गये। तैयार रखा था। उतारा हैंगर से कोट! एक जगह थोड़ी सलवट दिखी। मैंने रामदीन से कहा - बेटा, ज़रा ये ज़रा कपड़ा सीधा कर दे! इस्त्री गरम की उसने। बस जी, इस्त्री को कोट पर रखने की देर थी कि बेड़ा ग़र्क! कोट का कपड़ा तो इस्त्री के लगते ही सिकुड़ गया। अजब डेनमार्की कपड़ा था साहब - ज़रा सी गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सका! एक सलवट निकालने के चक्कर में दस निशान पड़ गये। अब उस गुजराती साहब ने अपने कोट का यह हाल देखा तो उनका पारा सातवें आसमान पर, जैसे शादी तो उनकी उस कोट से ही होनी थी।
''मैंने बथेरे (बहुतेरे) हाथ पैर जोड़े कि साहब इस्त्री वाले कारीगर से गलती हो गयी। हम सिलाई के आधे पैसे छोड़ देते हैं और उसी कपड़े का पैच लगा देते हैं! लेकिन जी, पैच कहां लगता! साले कपड़े का डिज़ाइन ही ऐसा कि अपना उस्ताद रफूगर भी हिम्मत हार गया - कैसा भी पैच लगा लो, पैबंद छिपाये न छिपे। और ऐसा पैबंद शादी वाले कोट पर लगाकर इंपोर्टेड दूल्हा घोड़ी पर कैसे चढ़े? अपनी शक्ल चाहे सिकुड़ी हुई थी पर कोट के कपड़े की सिकुड़न बर्दाश्त नहीं हुई। लगे गाली गलौज करने कि ऐसा कपड़ा तो यहां किसी कीमत पर नहीं मिलेगा। ज़बान पर तो आया कि भले आदमी, अमरीका से ही सिलवा लाना था, यहां तक उठाकर क्यों लाये ....? वही तो मैं कहूं, अमरीका में सिलाई बड़ी महंगी है - यहां से बीस गुनी। वो तो हमारे ही मुल्क में दर्जियों की कोई क़द्र नहीं जी!
ख़ैर, मैंने उससे कहा कुछ नहीं। सोचा, ग़लती अपनी है, दो ऊंची बातें कह दीं, तो चार आदमियों में इश्तहार करता फिरेगा कि कैलाश टेलर की दूकान में मत घुसना, उसने मेरा सूट खराब कर दिया। दर्ज़ियों का तो धंधा आपको पता है, सिफ़ारिश से चलता है। एक कपड़ा ग़लत हुआ, दस ग्राहक टूट जाएंगे। सो मैंने कहा - चल भाई, पैंट उठा ले, कोट के पैसे हम दे देते हैं, पर वह तो अड़ गया - पूरे कपड़े के पैसे वापस करो। हमने कहा - भाईसाब, ऊंची आवाज़ में ना बोलो, इस तरह का यह पहला केस है, हमारी दूकान की रेपुटेशन खराब होती है!
बस जी, सुनकर तो वह फिरंट हो गया। बात पुलिस तक पहुंच गई कि मेन रोड की कैलाश टेलर की दूकान में जोर जोर की झड़प हो रही है। हमने रो-पीट कर सात सौ रुपये उसके पलले पकड़ाए और उसकी पैंट उसके हाथ थमायी। साथ में इतने लंबे हाथ जोड़े कि माफ करना ब्रदर, ग़लती हो गई। और क्या हो सकता था भला?
''अब जी, वह साला अमरीका रिटर्न्ड तो सात सौ रुपये लेकर चलता हुआ पर हमारी तो नींद हराम हो गई। सात सौ का कोट हमारे खीस पड़ गया। गरीब आदमी हैं जी, सात सौ की रकम कोई छोटी नहीं होती। ऐसा लगे जैसे बीच बाज़ार किसी ने जेब काट ली हो। इस रामदीन की ओर देखूं तो मेरा खून गरम हो कि इज़्ज़त की इज़्ज़त गयी और सात सौ की करारी चपत लगी सो अलग! और कोट ऐसा जी कि न मेरे काम का, न किसी और के! जैसा सींक- सलाई आदमी, वैसा कोट!
बस, जैसे बिजली की तरह यह बात ज़ेहन में आई कि यह कोट तो रामदीन को ही आ सकता है। वैसा ही दुबला-पतला, वैसी ही क़द-काठी! मैंने भी सोच लिया कि काक्का रामदीना, तूने कोट जलाया है तो मैं भी हलवाई का पुत्तर हूं ......! मेरा बाप अजमल खां रोड पर बरफी टुकड़े तोड़कर तोलता था सोने की तरह! हलवाई था न! बारह पन्द्रह कारीगर थे लेकिन मजाल किसी की कि एक समोसा या एक गुलाबजामुन उनकी आंख बचाकर मुंह में डाल ले .... वो तो हमारा ही जी नहीं लगा उस धंधे में - कौन भट्टी के आगे खड़े होकर समोसे कचौड़ियां तलवाये, कौन भिन भिन करती मक्खियों मच्छरों में खड़ा होकर गुलाब जामुन, बरफी, रसमलाई का हिसाब करे .....और फिर टेलरिंग का काम ज़रा साफ सुथरा लगा, सो जी हमने तो मिठाई का पुश्तैनी धंधा छोड़कर इधर का रुख कर लिया .....
अब आपसे क्या छिपाना ....घर की बात है सो बता रहा हूं ! एक शादी का घर हाथ आ जाये तो आधे साल की कमाई एक मुश्त मिल जाती है, क्या बुरा है!
''माफ करना, मैं भटक गया अपनी बात से। खैर जी, तो सात सौ की चपेड़ खाने वाला मैं भी नहीं था। दूसरे दिन सुबह दूकान का शटर खोला ही था कि रामदीन हाज़िर! साला वक्त का बड़ा पाबंद है। मैं चुप रहा। कुछ नहीं बोला। वो समझ रहा था कि मालक कल से नाराज़ हैं। चुप चाप मेरी ओर कनखियों से ताकता काम करता रहा।
फिर जब सब लोग आ गये, मुझे लगा, अब सही मौका है! गरीब को अकेले में डांट डपट दो, उस पर कोई असर नहीं होगा मगर उसके जातभाइयो के सामने उसे ज़लील कर दो तो वो पानी पानी हो जायेगा, मुंह ऊंचा नहीं करेगा। सो जी, मैं सबके सामने तवे की तरह गरम हो गया - रामदीने, तेरी जरा सी लापरवाही से मेरे सात सौ रुपये उड़ गये। कितनी बार तुझे समझाया है कि कोट पर रूमाल रख कर इस्त्री किया कर! इस्माइल इससे खार खाता है, कहने लगा - साहब, इसकी आयरन टेबल के सामने आपका काउंटर पड़ता है, बच्चू देखने लग गये होंगे कोई परी, बस, इस्त्री कोट पर धरी की धरी!
मैंने ज़रा सख्त आवाज़ में कहा - रामदीन, तू आज से अपना दूसरा बंदोबस्त कर ले, यहां अब मैं एक पल भी तुझे रहने नहीं दूंगा। अब जी, वह तो लगा रोने गिड़गिड़ाने, पैरों पर लोटने - इस शहर में तो जो हैं सो आप हैं माई बाप! और कौन अपना है! आप मेरी तनखा में से दस रुपये महीना काट लो!........तनखा में से काट लो - बस जी, मैंने पकड़ ली उसकी ज़बान! मैंने कहा - वाह दस रुपये महीने काटने लगा तो छह साल लग जाएंगे। मैंने दस साल टेलरिंग की शॉप चलाकर कोई घास नहीं छीली है। साफ कह दिया कि कोट तू ले ले, इन सर्दियों में पहन लेना और पचास रुपये महीना कटवाना है तो नौकरी कर वरना इसी वक्त रफा दफा हो जा! इतना सुनना था कि वो तो ज़मीन पर लोट गया - माई बाप, सौ रुपये में से पचास तो मेरे खाने पर खर्च हो जाता है, पचास घर भेजता हूं। घर पर औरत है, बूढ़े मां-बाप हैं। उनका क्या होगा!
आखिर बड़ा रो-धो कर दस रुपये हफ्ता मतलब महीने में चालीस रुपये कटवाने पर राजी हुआ। मैंने उसे समझाया कि देख, तू तो तब भी रहा फायदे में ही, मुफ्त में तुझे कोट मिल गया। दो सौ रुपये तो इसकी सिलाई ही हो जाती है। ..... और इस सात सौ पर सूद कितना हो जाएगा! कम से कम पचास रुपये सालाना - वो भी मैं छोड़ रहा हूं। वरना गांव में तुम लोगों का क्या हाल होता है, मुझे सब पता है। गांव का साहूकार तो एक पैसा नहीं छोड़ता, चाहे घर-बार, खेत-खलिहान, बीवी-बच्चे सब बिक जायें। क्यों जी, ग़लत कहा मैंने? फिर दिल्ली में ठंड क्या कम पड़ती है! मैंने कहा उससे - हर साल तू ठिठुरते हुए ठंड काटता है, इस बार शान से काटना। अरे, ऐसा कोट तो तेरी क्या, मेरी सात पुश्तों में भी किसी ने पहनकर नहीं देखा!
''नहीं जी, मार्च के पहले हफ्ते की बात है यह तो! सर्दियां खतम होने पर थीं। आठ महीने हो गये इसे तनखा कटवाते! बीच में एक बार फिर बिदक गया जी। बड़ी मुश्किल से रास्ते पर लाये। दो महीने पैसे कटवाये और लगा रोने कलपने - गांव से चिट्ठियां आ रही हैं, पैसा भेजो! मैंने कहा - ''देख, तू तो ऐसा कर, मां -बाप को तो पैसे भेज दिया कर पर अपनी औरत को यहां बुला ले, यहां घर पर काम करेगी, तू भी बाहर खाने की जगह उसके साथ घर पर ही खा लिया करना, रात को भंडारेवाली कोठरी में सो रहना! ये भी कोई ज़िन्दगी है भला - वो वहां ,तू यहां! ''..... बस जी , बात इसको जंच गई। बुलवा लिया इसने अपनी औरत को! ....
''बस, जब से आयी है, आपकी भरजाई को तो इतना आराम हो गया है कि पूछो मत! इसकी औरत ने सारा घर संभाल लिया है। पंजाबी खाना बनाने में तो बिल्कुल एक्सपर्ट हो गई है। ............ एक दिन घर आ जाओ भाईसाब, फिर देखो! ऐसे छोले-भटूरे बनाती है कि उंगलियां चाटते रह जाओ! धेले की चीज़ इधर से उधर नहीं होने देती, इतनी भरोसेवाली है! सारा घर खुला छोड़ देते हैं उस पर! बच्चों को भी बड़े लाड़ से रखती है। ऊपर से पैसा धेला कुछ नहीं देना पड़ता। आजकल तो दिल्ली में ऐसी कामवाली माई किसी कीमत ना मिले। आप तो जानते हैं, कैसी किल्लत है भरोसे के बंदों की दिल्ली जैसे शहर में! क्यों जी, ग़लत कहा मैंने? बड़ा सुख है जी, महीने में एकाध दिन वो बीमार पड़ती है तो रामदीन कपड़े, बर्तन, झाड़-पोंछ सब कर देता है। बस, इनके खाने में कोई रोक-टोक नहीं हमारी। पेट भर के खाते हैं। अपने बाप की बात हमेशा याद रखता हूं कि इन लोगों की तनखा दस रुपये कम करनी हो तो दो रुपये का खाना खिला दो। भूखे पेट को भर दो, फिर तो ये आपके ताज़िन्दगी गुलाम हो जाएंगे। हलवाई था न मेरा बाप, कभी तबीयत होती तो खुद सारे कारीगरों को लाइन से खड़ा करके बचे हुए समोसे-रसगुल्ले बांट देता। ना बांटे तो अगले दिन खराब हो जायें। तो घूरे पे फेंकने से तो बेहतर है किसी के पेट में जायें। बस जी, नौकर - चाकर उसमें ही खुश!
पर वो ज़माना और था भाईसाब - वो मेरे बाप का ज़माना - लोगों के हाजमे दुरुस्त थे। ये रामदीन तो ज़्यादा खा भी नहीं सकता। शुरु से फाका झेलते झेलते अंतड़ियां ऐसी सूख गई हैं कि ज़्यादा खाना हजम ही नहीं होता इसे, उल्टियां करने लगता है। हम भी कहते हैं - रामदीना, लालच किस बात का? जितना हजम हो, उतना ही खाओ .. क्यों जी, ग़लत कहा मैंने?
नहीं जी, पूरे पैसे अभी कहां। अभी तो मुश्किल से चार सौ कटवाये हैं। वो तो मैंने ही कहा - एतबार का आदमी है, पैसे आते रहेंगे। तू सूट पहन, मौज कर! अब कुछ तो लिहाज़ करना ही पड़ता है न जी, इन लोगों का .....
''हो-हो-हो! क्या लाख टके की बात कही है आपने भी! .........जवाब नहीं आपका भी भाईसाब ..... कि कोट तो बढ़िया है ..... लेकिन रामदीन की शकल ही कोट के साथ मैच नहीं करती, इसकी सूरत को रेनोवेट करना चाहिये। मगर भाईसाब, एक बात बता दूं आपको, यह मखौल रामदीन के साथ मत करना। आजकल हर कोई इससे मखौल करता है कि तेरी किस्मत अच्छी है वरना इतना महंगा कोट तुझे कहां पहनने को मिलना था! मखौल के जवाब में हंसने की जगह इसका चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। एक बार तो लगा, जैसे कोट उतारकर फेंक ही देगा ..... मगर इसने सिर्फ़ घूर कर देखा और चुप हो गया! सात सौ बड़ी रकम होती है जी, और इन लोगों के लिये तो और भी ....... है कि नहीं? ....पर आपको सच बताऊं तो इसकी शकल को देखकर कभी कभी तो मुझे डर लगने लगता है। वैसे तो रामदीन मेरा पुराना आदमी है, मेरा क्या बिगाड़ सकता है भला! बहुत होगा तो घर जाकर अपनी औरत को आंखें दिखा लेगा ..... लेकिन किसी दिन किसी राह चलते ने कोट को लेकर ज़्यादा छेड़ दिया और इसने कोट सचमुच उतार फेंका तो बात आगे भी बढ़ सकती है। आखिर इन भुक्खड़ों की जात का भरोसा भी क्या है! इनकी कौन सी इज़्जत आबरू है ...... क्यों जी, ग़लत कहा मैंने?
नहीं - नहीं जी, ऐसा हुआ तो नहीं है भाईसाब, मगर मैं आपसे अपना वहम बयान कर रहा हूं। ..... वैसे जानता ये भी है कि पूरे दिल्ली शहर में, मुझ जैसा फर्राख दिल मालिक चिराग़ लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगा -- दिल्ली जैसे महंगे शहर में दो बंदों को सर पर छत .... रहना-खाना-सोना ...सब फ्री ...... पर मैंने कहा न - इन भुक्खड़ों की जात का क्या भरोसा ..... इनकी कौन सी इज़्जत आबरू है ...... क्यों जी, ग़लत कहा मैंने? कही ना, सौ टक्के खरी बात ! ''
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