तिलगुजिया का पर्व संक्रांति [आलेख] - प्रो. अश्विनी केशरवानी
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश ‘संक्रांति‘ कहलाता है। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण और कर्क रेखा से दक्षिण मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन कहलाता है। जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होने लगता है तब दिन बड़े और रात छोटी होने लगती है। इस समय शीत पर धूप की विजय प्राप्त करने की यात्रा शुरू हो जाती है। उत्तरायण से दक्षिणायन के समय में ठीक इसके विपरीत होता है। वैदिक काल में उत्तरायण को ‘देवयान‘ तथा दक्षिणायन को ‘पितृयान‘ कहा जाता था। मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिये गए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवतागण पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएं शरीर छोड़कर स्वार्गादि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसीलिए यह आलोक का पर्व माना गया है।
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छाँव भी लगती नहीं अब छाँव [कविता] - लाला जगदलपुरी
हट गये पगडंडियों से पाँव /
लो, सड़क पर आ गया हर गाँव। /
चेतना को गति मिली स्वच्छन्द, /
हादसे, देने लगे आनंद /
खिल रहे सौन्दर्य बोधी फूल /
किंतु वे ढोते नहीं मकरंद। /
एकजुटता के प्रदर्शन में /
प्रतिष्ठित हर ओर शकुनी-दाँव। /
हट गये पगडंडियों से पाँव /
लो, सड़क पर आ गया हर गाँव। /
आधुनिकता के भुजंग तमाम /
बमीठों में कर रहे आराम /
शोहदों से लग रहे व्यवहार /
रुष्ट प्रकृति दे रही अंजाम। /
दुखद कुछ ऐसा रहा बदलाव /
छाँव भी लगती नहीं अब छाँव। आगे पढ़ें... →
कवि डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ जी के सान्निध्य में - डा॰ महेन्द्रभटनागर
ग्वालियर-उज्जैन-इंदौर नगरों में या इनके आसपास के स्थानों (देवास, धार, महू, मंदसौर) में वर्षों निवास किया; एतदर्थ ‘सुमन’ जी से निकटता बनी रही। ख़ूब मिलना-जुलना होता था; घरेलू परिवेश में अधिक। जा़हिर है, परस्पर पत्राचार की ज़रूरत नहीं पड़ी। पत्राचार हुआ; लेकिन कम।
‘सुमन’ जी के बड़े भाई श्री हरदत्त सिंह (ग्वालियर) और मेरे पिता जी मित्र थे। हरदत्त सिंह जी बड़े आदमी थे; हमारे घर शायद ही कभी आये हों। पर, मेरे पिता जी उनसे मिलने प्रायः जाते थे। वहाँ ‘सुमन’ जी पढ़ते-लिखते पिता जी को अक़्सर मिल जाया करते थे। ‘सुमन’ जी बड़े आदर-भाव से पिता जी के चरण-स्पर्श करते थे। लेकिन, ‘सुमन’ जी में सामन्ती विचार-धारा कभी नहीं रही। आगे पढ़ें... →
भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति [आलेख] - डॉ. काजल बाजपेयी
संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है। संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है।
मैं बचपन से दो प्रकार की संस्कृतियों के बारे में सुनती आ रही हूँ। भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति या अंग्रेजी संस्कृति। आगे पढ़ें... →
शुक्रवार, 27 जनवरी 2012 / Labels: कविता, जयनारायण बस्तरिया
महुवे के फूल [कविता] - जयनारायण बस्तरिया
साल के फूल
महुवे के फूल
तुम्हे खिलना है अनंत तक
मेरे बस्तर में
जरुरत नही गुलाब, चम्पा, मोंगरा तुम्हारी
जिसे लगाना था गुलाब
मेरे बालों में
वह शराब पी कर
मुर्गा बाज़ार में पडा है
आज बाज़ार
कल बीज पंडुम (आम की फसल का त्योहार),
परसों करसाड (मेंला) उसके बाद बासी तिहार
हप्तों ऑखें और होश नही खुलेंगे
चम्पा, चमेली, मोंगरा के फूल
उम्मीद मत रखना मुझसे
मै तुम्हे सिर में लगाउंगी
झरोखे से इठलाउंगी
गागर सर पर रख
बिना जरुरत, पानी लेने
चुऑ (पानी का सोता) तक जाउंगी
कोइ प्रेम गीत गाउंगी
नही, नही
बस्तर में आयतीत बारुद की गन्ध
सब फूलों की खुश्बु दबा देती है
अब तो फागुन भी
परसा (पलाश) के केसरिया फूलों के साथ
जंगल में आग ले कर आता है
जंगल में आग के धुवें में हर फूल मुरझाता है
परब, झेला और ददरिया
सारे प्रेम गीतो का दम घुट जाता है
चम्पा, चमेली, मोंगरा के फूल
सुनो पसीनें मे डूब जाओगें
दब जाओगे जरुर
मेरे सर में रखें
खेत, जंगल, देवता और लकडी के बोझ में
सुनो चम्पा, चमेली, मोंगरा के फूल
मुझे जीने दो
गाय-गोरु, खेत, जंगल, देवता और लकडी के बोझ में
सुनो चम्पा, चमेली, मोंगरा के फूल
मुझे तुम्हारी जरुरत नही है
पर
महुवे के फूल
साल के फूल
माल्कांगिनी के फूल
मुझे तुम्हारी जरुरत है
तुम खिलना अनंत तक बस्तर में मेरे और मेरे बच्चों के
पेट भरने के लिये के लिये
बुधवार, 25 जनवरी 2012 / Labels: प्रभुदयाल श्रीवास्तव, बुंदेली, लघुकथा
बाबाजू को आसीरबाद [बुंदेली लघुकथा] - प्रभुदयाल श्रीवास्तव
मंगलवार, 24 जनवरी 2012 / Labels: कविता, शक्ति प्रकाश
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता [कविता] - शक्ति प्रकाश
आलोचना, निंदा से भर्त्सना तक
गालियों, थप्पड़ों से जूतों तक
सब आपके ही अधिकार हैं श्रीमान
क्योंकि आप जनतांत्रिक बहुमत हैं
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो निश्चित
पाई जाएगी, कुछ कोटरों में
जब खोद निकालेगा कोई पुरावेत्ता
आपके बहुमत के जनतांत्रिक साम्राज्य के अवशेष
पाए जायेंगे आपके मदांध जुलूस
रोंदते हुए बोल्शेविकों की तरह मेंशेविकों को
अपने ऐतिहासिक दायित्व की एवज में.....
'विवादित' के कुछ लेबल मिलेंगे
जहाँ आपने जिन्दा दफ़न कर रखा होगा
अपनी असुविधाओ और सड़ांध मारती शंकाओ को.
आपसे विमुख कुछ सत्य पड़े मिलेंगे
लिए कनपटी के आर पार
आपकी गोलियों के निशान.
पाए जायेंगे कुछ जंग लगे आपके रहमोकरम के कटोरे
भरे होंगे जिनमे आपके प्रिय तथ्य
नजदीक में ही पड़ी होगी एक सुन्दर
ममीकृत सजाई हुई लाश
जिसके कानो में भरा होगा आपके मीडिया मैनेजमेंट का सीसा
गले में भरी होगी आपकी पकी हुई प्रशासनिक मिटटी
उसकी जुबान पर चढ़ा होगा वो मुल्लमा
जो आपके जूतों पर है
यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.....
अल्पमत शायद गाते गाते मरा था
रविवार, 22 जनवरी 2012 / Labels: अभिषेक तिवारी, सप्ताह का कार्टून
शनिवार, 21 जनवरी 2012 / Labels: कहानी, विजय कुमार सपत्ति
मुसाफ़िर [कहानी] - विजय कुमार सपत्ति
शुक्रवार, 20 जनवरी 2012 / Labels: गज़ल, शक्ति प्रकाश
गज़ल [ग़ज़ल] - शक्ति प्रकाश
रंगो खुश्बू फालतू, आबो हवा बेकार है
चाराग़र हो बेइमां तो हर दवा बेकार है
मोमिनों में आजकल ये बहस भी चलने लगी
ये खुदा बेकार है या वो खुदा बेकार है
लट्ठ के आगे लॅंगोटी खुल गई तो क्या कहें
मुद्दई बेकार है या मुद्दआ बेकार है
हम अज़़ल से जी रहे हैं तीरग़ी के खौफ में
बोलिये मत हाल ये इस मर्तबा बेकार है
आप हों बेध्यान ग़र और जल गई हों रोटियॉं
तो कहो आराम से बस, ये तवा बेकार है
जिन उसूलों की किताबों ने पलट दीं सल्तनत
आजकल हैं फ़ालतू, ग़ो हर सफ़ा बेकार है
बृहस्पतिवार, 19 जनवरी 2012 / Labels: पवित्रा अग्रवाल, लघुकथा
पाप -पुण्य [लघुकथा] - पवित्रा अग्रवाल
बुधवार, 18 जनवरी 2012 / Labels: डॉ. वेद व्यथित, मुक्तक
चुनावी मुक्तक - डॉ. वेद व्यथित
फिर से उड़ने लगें है झंडे फिर से नारे बाजी
फिर से होने लगी मिल कर वोट की सौदे बाजी
कहीं बिकेगी बस बोतल में कहीं नोट की गद्दी
इस से ही बदलेगी निश्चित कुछ लोगों की बाजी ||
मंहगाई और भ्रष्ट आचरण जैसे मुद्दे छोड़े
जाये दश भाड़ में सब ने इस से नाते तोड़े
हल हो जाये अपना मतलब ये ही एक एजेंडा
क्या सारे सुख अमर शहीदों ने इस हेतु छोड़े
बन जाएगी पुन: वही सरकार दुबारा वैसी
जैसे जनता लिती अभी तक और लुटेगी वैसी
कौन कहे अब एक दूसरे से सारे वैसे हैं
लूटना तो जनता को ही है सभी एक जैसे हैं
क्यों लिती जनता इस का उत्तर आसन नही है
कैसे मिटे गरीबी ये उत्तर आसन नही है
जब तक होगी सौदे बाजी वोट बिकेगा यूं ही
तब तक इस का हल होना इतना आसन नही है ||
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