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जलधि अगाध

देख रही हूँ--


गीली रेत

प्रत्यक्ष साक्षी है

उस तूफान की

जो अभी-अभी

होकर गुज़रा है


कण-कण

स्नेहासिक्त सा

उन्माद भरी

स्मृतियाँ

ईर्द-गिर्द


बढ़ता भावावेग

अपने साथ

बहाए ले जा रहा है

पगली---

लहरों को

बाँधना चाहती है

समुद्र को

समेटना चाहती है


नहीं जानती

लहरों का आवेग

और भावों का उद्वेग

क्षणिक होते हैं


चाह कर भी इन्हें

रोक नहीं पाएगी

मोहान्ध होगी

और--

दुःख पाएगी ।

21 comments:

  1. नहीं जानती
    लहरों का आवेग
    और भावों का उद्वेग
    क्षणिक होते हैं


    चाह कर भी इन्हें
    रोक नहीं पाएगी
    मोहान्ध होगी
    और--
    दुःख पाएगी

    सुंदर पंक्तियाँ !

    उत्तर देंहटाएं
  2. पंकज सक्सेना21 सितंबर 2008 को 9:32 am

    चाह कर भी इन्हें
    रोक नहीं पाएगी
    मोहान्ध होगी
    और--
    दुःख पाएगी

    जीवित कविता है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. शोभा जी! मैं इसे अब तक पढ़ी आपकी रचनाओं में बेहतरीन मानता हूँ. बहुत बहुत बधाई, इस खूबसूरत अभिव्यक्ति के लिये.

    उत्तर देंहटाएं
  4. शोभा जी की यह कविता उनका दार्शनिक बयान करती है। उनकी अब तक पढी कविता में श्रेष्ट में इसे रखना चाहूँगी

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर रचना है।

    नहीं जानती


    लहरों का आवेग


    और भावों का उद्वेग


    क्षणिक होते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  6. यह एसी रचना है जो किसी के भी मन पर अंकित रह सकती है। इस खूबसूरत रचना के लिये बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जिस सच्‍चाई से हम सब हैं परिचित
    उसमें और गहराई तक कराती है विजिट

    उत्तर देंहटाएं
  8. kavita mein peedha hai..
    sarita ki.. laharo ki. un ke laghu astitva ki.
    par mera maanana ye bhi hai ki mit jaana bhi astitva ka hi ek bhag hai..:-)
    Sundar kavita k liye badhai...

    उत्तर देंहटाएं
  9. नहीं जानती


    लहरों का आवेग


    और भावों का उद्वेग


    क्षणिक होते हैं



    बिल्कुल सही कहा आपने शोभा ..बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सही लिखा है आपने. लिखते रहे.

    उत्तर देंहटाएं
  11. शोभा जी, बहुत सुंदर रचना है।
    आपको पढ़ना हमेशा अच्‍छा लगता है।

    उत्तर देंहटाएं
  12. गीली रेत
    प्रत्यक्ष साक्षी है
    उस तूफान की
    जो अभी-अभी
    होकर गुज़रा है

    बहुत सुन्दर रचना,

    उत्तर देंहटाएं
  13. शोभा जी,

    आपकी इस कविता की अनेको विशेषतायें हैं। यह भाषा पर आपकी पकड ही नहीं बताती अपितु भावनाओं को शब्दों में पिरोने की आपकी दक्षता को भी स्थापित करती है। आपकी इस रचना से हर कोई स्वयं को जोड सकता है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  14. शोभा जी मैने आज तक आपकी जितनी भी कविताएँ पढ़ी हैं उनमें सर्वश्रेष्ठ रचना !
    बहुत खूब ...कम शब्दों मे इतनी सुंदर अभिव्यक्ति... वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  15. शोभा जी,

    रचना.. विशिष्ट शब्दों व भावों का सुन्दर संगम है..पढना बहुत अच्छा लगा.

    उत्तर देंहटाएं
  16. दार्शनिक रचना।
    आपकी बेहतरीन रचनाओं में से एक।
    बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  17. शोभा जी !
    बहुत ही अच्छी रचना,चरम और मर्म को छूती सी।

    उत्तर देंहटाएं

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