नाटक : एक सामान्य अवलोकन भाग :१ [नाटक पर स्थायी स्तंभ] – योगेश समदर्शी

नाटक का आज जो स्वरूप दिखाई देता है उस पर काफी कुछ कहा जा सकता है। नाटक साहित्य की जिस आवाज को मुखर करता है, उसमें संदेश मुख्य होता है। कहानी किसी नाटक का मुख्य तत्व नही है अपितु मुख्य तत्व है "कथ्य"। कथ्य, यानी कि वह बात जिसके लिये कहानी को नाटक बनना पडता है। जिसके बताने भर से काम नहीं चलता और उसे दिखाना जरूरी हो जाता है; जो लिखा नहीं जा सकता बस दिखाया जा सकता है। ऐसे तत्व ही किसी नाटक को कथा और कहानी से भिन्नता प्रदान करते है।
नाटक पढने में भी उस ‘कथ्य’ तत्व का भान नही किया जा सकता, इसी लिये नाटक पढना उतना रुचिकर नहीं होता, परंतु नाटक पढना भी साहित्य के दायरे में आ सकता है। नाटक पढना, नाटक करने के लिये बहुत जरूरी है। जो नाटक करता है उसे नाटक को कल्पना के साथ जोड कर पढना होता है, दृश्यों की रचना करते हुए पढ्ना पडता है। नाटक में लिखे संवादों को उस समय तक नहीं समझा जा सकता जब तक कि पाठक अपनी कल्पना में वैसे परिवेश की रचना ना कर ले जैसे परिवेश में नाटक लिखा गया है, इसी लिये मंच, नाटक को समझने और उसे दृशकों के लिये ग्राहय बनाने का काम करता है।

नाटक कैसा है, यह बात सबसे अधिक नाटक के लेखक पर ही निर्भर करती है, परंतु यदि नाटक का निर्देशक और कलाकार लेखक के "कथ्य" को नहीं समझें तो नाटक कितना भी अच्छा क्यों ना लिख दिया जाए, उसका सत्यानाश हो जाता है। कई नाटक लेखकों ने इसी डर से नाटक लिखने छोड दिये। कालांतर में, जो मंच से जुडे लोग हैं वही खुद नाटक लिखने भी लगे। यह भी एक कारण हो सकता है, कि नाटक में मसाला तो आ गया पर साहित्य खोता चला जा रहा है।

नाटक में संवाद का चयन, लेखक कहानी और उसमें निहित चरित्रों को दृशकों के सामने पूर्ण करने के उद्देश्य से रखता था, परंतु आज कल मंच से जुडे लोगों के द्वारा लिखे नाट्क अभिनेता को कुछ करने का मौका देने के चक्कर में साहित्य और चरित्रों की विशेषता को पीछे छोड देते है। कई बार लेखक भी मंच की मजबूरियों को साहित्य की परिधि में नजर अंदाज कर देता है, इससे निर्देशक और लेखक के बीच एक विवाद पनपता रहा। धीरे धीरे लेखक और निर्देशक एक होने का प्रचलन बढ गया। नाटक जिसे करना है वही नाटक लिखे भी, यह रवायत नाटक के मंच का फायदा भले ही करती रही हो परंतु इसने इस मंच को कुछ लोगों से दूर भी किया है।

नाटक के संवादों के साथ छेड छाड कुछ निर्देशक बिलकुल नहीं करते, अभिनेता को नाटक मे लिखे संवाद ज्यों के त्यों याद करने होते है, फिर, उन्हे आपने अभिनय को संवादो के आधार पर शक्ल देनी पडती है, जो सामान्यत: अभिनय को कठिन बनाता है। आदर्श स्थिती इसी की मांग करती है। नाट्क से पुन: लोगों और साहित्य को जोडने के लिये आज निर्देशकों और लेखकों के बींच खासे तालमेल की आवश्यकता है। नाटक लेखक और नाट्य मंच के लोग एक साथ तारत्म्य बैठा कर एक दूसरे के काम की कद्र करते हुये यदि ताल मेल से काम करें तो नाट्क आम लोगों की पहुंच तक ज्यादा जल्दी पहुंच सकता है।
नाटक के मंचित होने में निर्देशक की भूमिका किसी जहाज के पायलेट की होती है। निर्देशक चाहे तो अपनी सूझ बूझ के साथ नाट्क को उसके चरम तक पहुंचा सकता है। निर्देशक ही नाटक के हर पहलू का एक मात्र नियंत्रक होता है। उसकी समझ पर ही दर्शकों का निर्णय निर्भर करता है। निर्देशक के सामने चुनौती केवल लेखक को संतुष्ट करने भर की नही है, उसके सामने सभी अभिनेताओं की सुविधा-असुविधा है तो दर्शकों की मानसिकता की परख की भी जरूरत है। अतं निर्देशक का नाटक की प्रति पूर्ण समर्पण ही किसी नाट्क को उसका उच्चतम दे पाता है।
नाट्क मे अभिनय पक्ष सबसे कम और सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। नाटक के निर्माण मे -लेखक , निर्देशक, कला पक्ष, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि व्यवस्था, वस्तु नियंत्रण, संवाद व्यवस्थापकों के बाद अभिनेता सम्मलित होता है, फिर भी सभी अन्य उपघटक अभिनेताओं के अभिनय पर ही निर्भर हो जाते है। नाट्क की सफलता का सारा जिम्मा निर्देशक के बाद अभिनेता पर डाला जा सकता है। वस्तुत:, अभिनेताओं को नाट्क की संवेदना से जुडना होता है। "कथ्य" का असर जनता पर पडे, नाटक का संदेश दर्शक पूर्ण रूप से गृहण कर सके इसके लिये अभिनेता को अपनी पूरी क्षमताअओ का उपयोग करना पडता है। अभिनेता भाव भंगिमा के साथ साथ संवाद अदायगी में स्पष्टता पर विशेष ध्यान देना होता है।

अभिनय के विभिन्न अंगों पर विस्तार से अगली कडी में बात की जाएगी।

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क्रमश:
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12 Responses to “नाटक : एक सामान्य अवलोकन भाग :१ [नाटक पर स्थायी स्तंभ] – योगेश समदर्शी”

Udan Tashtari ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 6:16 am

अच्छा लगा..आगे इन्तजार है!


रितु रंजन ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 7:53 am

नाटक पर आम-जन को जानकारी कम ही है। आपने एक दृष्टिकोण दिया है।


पंकज सक्सेना ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 8:08 am

योगेश जी निर्देशन पर और जानकारी अपेक्षित है, थोडा संक्षिप्त हो गया। लेख बहुत अच्छा है।


रचना सागर ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 8:36 am

बहुत अच्छी जानकारी है नाटक पर। तस्वीरें किस नाटक की है और इसके निर्देशक आदि जानकारी भी प्रदान करते तो और अच्छा होता।


seema gupta ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 9:17 am

"Natak ke barey mey itna ghyan nahee hai, school ke ilava kabhee stage pr dekha bhee nahee, accha artical lga pdh kr"

Regards


राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 10:32 am

योगेश जी,


नाटक पर आपकी स
मझ गहरी है। आलेख के साथ साथ आप अपने अनुभवों का इसमें जो समावेश करते हैं उससे इसकी महत्ता बढ गयी है। यह सत्य है कि नाटक लेखक कम हैं और यह भी सच है कि निर्देशक की छेड-छाड बहुत से लेखक बर्दाश्त नहीं कर पाते..लेकिन इस खाई को भरने की नितांत आवश्यकता है जिससे नाटक का पुनर्जीवन हो...


***राजीव रंजन प्रसाद


praveen pandit ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 10:44 am

मुझे लगता है कि 'कथ्य' का चित्रण अधिक सुगम हो सकता है ,बशर्ते मंचीय रूप देने से पूर्व उसे 'विज़ुअलाइज़' कर लिया गया हो।
लेखक एवं निर्देशक का 'एकात्म' होना निश्चय हीनाटक की सफल प्रस्तुति के लिये सुखकर है ,और इसीलिये आवश्यक है।
यद्यपि सदैव संभव नहीं,तथापि दोनो का एक होना मंच को समृद्ध करने मे सहायक तो है ही।
जानकारी रुचिकर है ।

प्रवीण पंडित


अभिषेक सागर ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 11:02 am

साहित्य शिल्पी ने एक बहुत ही अच्छा स्तंभ शुरू किया है.... योगेश जी को बहुत बहुत बधाई


मोहिन्दर कुमार ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 11:28 am

योगेश जी,

नाटक जो विचारों को प्रेषित करने का अपने आप में एक सशक्त माध्यम है ..इस विधा की बारीकियों को आम जन तक पहुंचाने के लिये आभार


दिव्यांशु शर्मा ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 2:13 pm

समदर्शी जी,
पहले तो शुक्रिया कहना चाहूंगा |
आगे ये कि अजीब सी बात है जब कोई साहित्यिक विधा का मूल रूप चिडिया की किसी प्रजाति की तरह "extinct" होने लग जाए | पर ये शायद कालचक्र का हिस्सा ही है | समय के साथ सब बदलता है | पर जब विधा अपनी मूल उपयोगिता ही खोने लग जाए तो चिंता की बात है | आप के द्वारा प्रदत्त जानकारी से काफ़ी मदद मिली नाटक को समझने में और ये जानने में की ग़लती कहाँ हो रही है | आशा है जो नाटक लिख रहे हैं और सक्षम है , वे इसे पढ़ कर कुछ परिवर्तन लायेंगे | आदरणीय समदर्शी जी से अपेक्षा है कि नाटक लेखन की तकनीक से सम्बंधित भी कुछ प्रस्तुत करेंगे | जिस से नवीन लेखको को कुछ सहायता मिले | :-)


अजय यादव ने कहा…
29 सितंबर 2008 को 10:32 pm

योगेश जी! इस स्तंभ के माध्यम से नाटक विधा के बारे में बहुत उपयोगी जानकारी दे रहे हैं आप. आशा है कि आपका यह प्रयास नाटक के प्रति लोगों के रुझान को एक नयी दिशा देगा. हाँ, इसमें कुछ विस्तार अपेक्षित है. आभार!


गीता पंडित (शमा) ने कहा…
30 सितंबर 2008 को 12:49 pm

achchha lag raha hai....
prateeksha hai aglee kadee kee...

s-sneh


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