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हिन्दी साहित्य को जानने समझने वालों के लिए ‘छायावाद’ एक ऐसा विषय रहा है जिसकी परिभाषा एवं अर्थ पर आरंभ से आज तक अनेक साहित्य मनीषियों एवं साहित्यानुरागियों नें अपनी लेखनी चलाई है, एवं लगातार लिखते हुए इसे पुष्ट करने के साथ ही इसे द्विवेदी युग के बाद से पुष्पित व पल्लवित किया है। छायावादी विद्वानों का मानना है कि, सन. 1918 में प्रकाशित जयशंकर जी की कविता संग्रह ‘झरना’ प्रथम छायावादी संग्रह था। इसके प्रकाशन के साथ ही हिन्दी साहित्य जगत में द्विवेदीयुगीन भूमि पर हिन्दी पद्य की शैली में बदलाव दष्टिगोचर होने लगे थे । देखते ही देखते इस नई शैली की अविरल धारा साहित्य प्रेमियों के हृदय में स्थान पा गई । इस नई शैली के आधार स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा थे । कहा जाता है कि इस नई शैली को साहित्य जगत में परिभाषित करने एवं नामकरण करने का श्रेय पं. मुकुटधर पाण्डेय को जाता है। सन् 1918 से लोकप्रिय हो चुकी इस शैली के संबंध में सन् 1920 में जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘श्री शारदा’ में जब पं. मुकुटधर जी की लेख माला का प्रकाशन आरंभ हुआ तब इस पर राष्ट्र व्यापी विमर्श हुआ और ‘छायावाद’ नें अपना सम्मान स्थापित किया ।

‘छायावाद’ पर प्रकाशित लेखमाला व ‘छायावाद’ के संबंध में स्वयं पं. मुकुटधर पाण्डेय कहते हैं – ‘सन् 1920 में 'छायावाद' का नामकरण हुआ और जबलपुर की 'श्री शारदा' में हिन्दी में छायावाद शीर्षक से मेरी लेख-माला निकली। इसके पहले सन् 1918 में 'प्रसाद जी' का 'झरना' निकल चुका था, जो छायावादी कविताओं का प्रथम संग्रह था । ...... आचार्य शुक्‍ल नें Romanticism के पर्याय के रूप में जिसे स्वच्छंदतावाद, कहा था, वह 'छायावाद' का अग्रगामी था Romanticism जिसे हरफोर्ड नें heightening of sensibility भावोत्कर्ष कहा था, वही 'छायावाद' के रूप में परिणित हुआ था उसकी मुख्‍य विशेषतायें हैं, मानवतावाद सौंदर्यवाद, रहस्यवाद, रोमांटिक निराशावाद। 'छायावाद' की कुछ कविताओं में एक ऐसी मर्मभेदी करूणा ध्वनि पाई जाती है जो करूणा होने पर भी अत्यंत मधुर है। वह एक करूण व्‍यथा की कथा है, जो मनुष्‍य की साधारण समझ के बाहर की बात है। 'छायावाद' के सौंदर्य बोध और कल्पना में पूर्ववर्ती कविताओं से बडा अंतर था। छायावाद द्वारा द्विवेदी युगीन काव्यधारा का एक नई दिशा की ओर व्‍यपवर्तन घटित हुआ था।‘

छायावादी काव्य एवं ‘छायावाद’ शव्द के प्रयोग पर तद्समय साहित्य जगत में हो रही चर्चाओं में किंचित विरोध के स्वर भी मुखरित होने लगे थे जिसका कारण मूलत: निराला एवं उनके अनुयायियों के द्वारा छंदों का अंग भंग किया जाना था किन्तु यह सृजन के पूर्व का हो हल्ला था, आगे उसी लेख में पं. मुकुटधर पाण्डेय जी कहते हैं – ‘द्विवेदी जी नें सुकवि किंकर के छद्मनाम से 'सरस्वती' में छायावाद की कठोर आलोचना की । उनका व्यंग्यपूर्ण कटाक्ष था, जिस कविता पर किसी अन्य कविता की छाया पडती हो, उसे छायावाद कहा जाता है, तब मेरा माथा ठनका। लोग छाया शब्द का लाभ उठाकर छायावाद की छीछालेदर कर रहे थे। छायावादी कवियों की एक बाढ-सी आ गई। मैनें 'माधुरी' में एक लेख लिखकर नई शैली के लिये 'छायावाद' शब्द का प्रयोग नहीं करने का आग्रह किया। पर उस पर किसी नें ध्यान नहीं दिया, जो शब्द चल पडा, सो चल पडा ।‘ 

छायावाद हिन्दी साहित्य में स्थापित हो गया और इसे ‘छायावाद’ सिद्ध करने में पं.मुकुटधर पाण्डेणय के ‘श्री शारदा’ में प्रकाशित लेखमाला की अहम भूमिका रही । उनके इस लेखमाला के संबंध में प्रो. इश्वरी शरण पाण्डेय जी कहते हैं ‘श्री पाण्डेय जी की इस लेखमाला के प्रत्येक निबंध छायावाद पर लिखे गए बीसियों तथाकथित मौलिक शोधात्मक  प्रबंध ग्रंथों से एतिहासिक तथा साहित्यिक दोनों दृष्टियों से कहीं अधिक स्थायी महत्व के हैं । यह लेखमाला हिन्दी साहित्य की ‘दीप्ति-धरोहर’ हैं।‘ पं. मुकुटधर पाण्डेय की सरस्वंती में प्रकाशित कविता ‘कुकरी के प्रति’ को प्रथम छायावादी कविता माना गया एवं समस्त हिन्दी साहित्य जगत नें इसे स्वीकार भी किया । ‘कुकरी के प्रति पं.मुकुटधर पाण्डेय की ऐसी कविता थी जिसमें छायावाद के सभी तत्व समाहित थे, इस कविता के संबंध में डॉ.शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ नें रायगढ में कहा था – ‘कुकरी में तो भारत वर्ष की सारी संवेदना की परंपरा निहित है .... ’

30 सितम्बकर सन् 1895 को छत्तीसगढ के एक छोटे से गांव बालपुर में जन्में पं. मुकुटधर पाण्डेंय अपने आठ भाईयों में सबसे छोटे थे । इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई । इनके पिता पं.चिंतामणी पाण्डेय संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे और भाईयों में पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय जैसे हिन्दी के ख्यांत साहित्यकार थे। इनके संबंध में एक लेख में प्रो.अश्विनी केशरवानी जी कहते हैं – ‘पुरूषोत्तम प्रसाद, पद्मलोचन, चंद्रशेखर, लोचनप्रसाद, विद्याधर, वंशीधर, मुरलीधर और मुकुटधर तथा बहनों में चंदनकुमारी, यज्ञकुमारी, सूर्यकुमारी और आनंद कुमारी थी। सुसंस्कृत, धार्मिक और परम्परावादी घर में वे सबसे छोटे थे। अत: माता-पिता के अलावा सभी भाई-बहनों का स्नेहानुराग उन्हें स्वाभाविक रूप से मिला। पिता चिंतामणी और पितामह सालिगराम पांडेय जहां साहित्यिक अभिरूचि वाले थे वहीं माता देवहुति देवी धर्म और ममता की प्रतिमूर्ति थी। धार्मिक अनुष्ठान उनके जीवन का एक अंग था। अपने अग्रजों के स्नेह सानिघ्य में 12 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने लिखना शुरू किया। तब कौन जानता था कि यही मुकुट छायावाद का ताज बनेगा...?’

बाल्‍यकाल में ही पिता की मृत्यु हो जाने पर बालक पं.मुकुटधर पाण्डेय के मन में गहरा प्रभाव पडा किन्तु वे अपनी सृजनशीलता से विमुख नहीं हुए । सन् 1909 में 14 वर्ष की उम्र में उनकी पहली कविता आगरा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘स्वदेश बांध’ में प्रकाशित हुई एवं सन् 1919 में उनकी पहली कविता संग्रह ‘पूजा के फूल’ का प्रकाशन हुआ। इतनी कम उम्र में अपनी प्रतिभा और काव्य कौशल को इस तरह से प्रस्तुंत करने वाले पं. मुकुटधर पाण्डेय अपने अध्ययन के संबंध में स्वयं कहते हैं – ‘सन् 1915 में प्रयाग विश्व-विद्यालय की प्रवेशिका परीक्षा उत्तीर्ण होकर मैं एक महाविद्यालय में भर्ती हुआ पर मेरी पढाई आगे नहीं बढ पाई । मैंने हिन्दी, अरबी, बंगला, उडिया साहित्य का अध्ययन किसी विद्यालय या महाविद्यालय में नहीं किया। घर पर ही मैंनें उनका अनुशीलन किया और उसमें थोडी बहुत गति प्राप्त की।‘ महानदी की प्राकृतिक सुषमा सम्पन्न तट और सहज ग्राम्य जीवन का रस लेते हुए कवि नें अपनी लेखनी को भी इन्हीं रंगों में संजोया - 

कितना सुन्दर और मनोहर, महानदी यह तेरा रूप।
कलकलमय निर्मल जलधारा, लहरों की है छटा अनूप।
तुझे देखकर शैशव की है, स्मृंतियां उर में उठती जाग।
लेता है किशोर काल का, अँगडाई अल्हड अनुराग । 

अबाध गति से देश के सभी प्रमुख पत्रिकाओं में लगातार लिखते हुए पं. मुकुटधर पाण्डेय नें हिन्दी पद्य के साथ साथ हिन्दी गद्य पर भी अपना अहम योगदान दिया । पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित अनेकों लेखों व कविताओं के साथ ही उनकी पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित कृतियां इस प्रकार हैं – ‘पूजाफूल (1916), शैलबाला (1916), लच्छमा (अनुदित उपन्यास, 1917), परिश्रम (निबंध, 1917), हृदयदान (1918), मामा (1918), छायावाद और अन्य निबंध (1983), स्मृतिपुंज (1983), विश्वबोध (1984), छायावाद और श्रेष्ठ निबंध (1984), मेघदूत (छत्तीसगढ़ी अनुवाद, 1984) आदि प्रमुख है। हिन्‍दी जगत में योगदान के लिये इन्हें विभिन्न अलंकरण एवं सम्मान प्रदान किया गया । भारत सरकार द्वारा भी इन्हें ‘पद्म श्री’ का अंलंकरण प्रदान किया गया । ऐसे ऋषि तुल्य मनीषी का सम्मान करना व अलंकरण प्रदान करने में सम्मान व अलंकरण प्रदान करने वाली संस्थांयें स्वयं गौरवान्वित हुई । पं.रविशंकर विश्वविद्यालय एवं धांसीदास विश्वंविद्यालय द्वारा इन्हें मानद् डी.लिट की उपाधि भी प्रदान की गई ।

साहित्य प्रेमियों, साहित्य कारों और समीक्षकों नें इनकी रचनाओं की उत्कृष्टता के संबंध में बहुत कुछ लिखा जो समय समय पर पत्र- पत्रिकाओं में एवं पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित होती रहीं एवं सम्मान के साथ उनकी लेखनी को अंतरतम तक स्वींकार किया जाता रहा । साहित्‍य के शाष्त्रीय परम्पराओं से अनभिज्ञों के द्वारा भी पं. मुकुटधर पाण्डेय की रचनाओं को पढने और शब्दों की गहराई में गोता लगाने का काम आज तलक किया जा रहा है । पं.मुकुटधर पाण्डेय की रचना शैली पर डॉ. सुरेश गौतम जी कहते है - इनके काव्य में मानव-प्रेम, प्रकृति-सौंदर्य, करूणाजनित सहानुभूति, दु:खवाद, मानवीकरण, वैयक्तिकता, लाक्षणिकता, प्रतीकात्‍मकता, आध्‍यात्मिकता, संयोग-वियोग, अव्‍यक्‍त सत्ता के प्रति जिज्ञासा और गीतात्मकता की प्रधानता रही है । .... कमोबेश इनके सभी गीत संक्षिप्त एवं छायावादी शैली का पूर्वाभास है । छायावाद के कल्पना-वैभव की अट्टालिका का पहला द्वार मुकुटधर पाण्डेय हैं। इनकी गीत-पदचाप छायावादी रंगोली का सौंदर्य है जिनकी प्रतीतियों नें कालान्तर में ऐतिहासिक यात्रा करते हुए छायावाद की संज्ञा प्राप्त की।

अपनी रचनाओं के संबंध में स्वयं पं. मुकुटधर जी कहते हैं - ‘'मेरी रचनाओं में चाहे लोग जो भी खोज लें परन्तु वे विशुद्ध रूप से मेरी आंतरिक सहज अभिव्यक्ति मात्र है। मैंनें कुछ अधिक लिखा नहीं केवल कुछ स्फूर्त कविताऍं लिखी हैं । उनमें न तो कल्पना की ऊँची उडान है न विचारों की उलझन, न भावों की दुरूहता । उनमें उर्दू की चीजों की तरह चुलबुलाहट या बांकपन भी नहीं । वह सहज-सरल उद्गार मात्र हैं । ..... पर हम लोगों का महत्व अब केवल ऐतिहासिक दृष्टि से हैं। आजकल हिन्दी में बडे बडे कवि हैं, उनके सम्मुख हम नगण्य हैं ।'

90 वर्ष की उम्र तक हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में छायावादी परिर्वतन को स्थापित करा देने वाले तेजोमय चिर युवा का निधन 6 नवम्बर 1995 में रायपुर में लम्बी बीमारी के बाद हो गया। उन्होंनें स्वयं ही अपनी एक कविता में महानदी से अनुरोध करते हुए कहा था कि, ‘हे महानदी तू अपनी ममतामयी गोद में मुझको अंतिम विश्राम देना, तब मैं मृत्यु् – पर्व का भरपूर सुख लूटूंगा -

चित्रोत्परले बता तू मुझको वह दिन सचमुच कितना दूर, 
प्राण प्रतीक्षारत लूटेंगें, मृत्यु-पर्व का सुख भरपूर । 

‘कुकरी के प्रति’ के सर्जक और ‘छायावाद’ के प्रर्वतक संत, ऋषि पं. मुकुटधर पाण्डेय हिन्दी  साहित्य जगत में दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में सदैव प्रकाशमान रहेंगें एवं नवसृजनोन्मेषी मानसिकता की राह प्रशस्त करते रहेंगें । 

आज उनके जन्म दिवस पर हम कृतज्ञतापूर्वक उनका पुण्य स्मरण करते हैं एवं उनके चरणों पर अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं ।

16 comments:

  1. पं मुकुट्धर पाण्डेय के विषय में प्रस्तुत यह जानकारी दुर्लभ है। आपने बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है।

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  2. वाचस्पति पाण्डेय30 सितंबर 2008 को 8:28 am

    एसी जानकारियाँ सुलभ नहीं हैं। छायावाद के संदर्भ को आपने सरता से स्पष्ट किया है। मुकुटधर जी को स्मरण करना साहित्य को जीवित रखने का प्रयास किये जाने सदृश्य है।

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  3. संजीव जी,

    पं मुकुट्धर पाण्डेय के विषय मे इतनी दुर्लभ जानकारी देने के लिये धन्यवाद...

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  4. छायावाद एवं पं. मुकुट्धर पाण्डेय के बारे में इतनी दुर्लभ जानकारियाँ इतने सुलभ ढंग से उपलब्ध कराने के लिए आपको बहुत धन्यवाद्।

    ऐसे ही लिखते रहें

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  5. पाण्डेय जी के बारे में जानकारी देने का धन्यवाद | सब से अच्छी बात यह रही कि आपने छायावाद को भी समझाया (मेरी समझ सीमित है इस विषय में )| पंडित जी के बारे में और पढने की ललक उत्पन्न हुई है | धन्यवाद | आलेख की भाषा के लिए बधाई स्वीकारें | :-)

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  6. संजीव जी,


    आपका साहित्यानुराग और छ्त्तीसगढ प्रेम दोनों ही स्तुत्य है। बहुत अच्छी तरह से आपने आदरणीय मुकुटधर पाण्डेय जी का जीवन व कृतित्व प्रस्तुत किया है। साथ ही साथ छायावाद पर आपनी लेखनी नें एसा विवरन प्रस्तुत किया है जो आम तौर पर कहीं पठनीय नहीं है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  7. आपका प्रस्तुत करने का तरीका प्रशंसनीय है। इस जानकारी के लिये आभार।

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  8. संजीव जी,


    पं मुकुट्धर पाण्डेय के विषय में बहुत अच्छी जानकारी .....

    धन्यवाद |

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  9. इतनी अनोखी प्रतिभा पं० मुकुटधर पाण्डेय के बारे में मेरी जानकारी न के बराबर थी। धन्यवाद संजीव जी का, जिनके कारण मैं इतना जान पाया।
    शुक्रिया एवं बधाईयाँ।

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  10. विशिष्ट जानकारी हेतु आभार.. इस जानकारी को अगर विकिपीडिया से जोडा जा सके तो बहुत से लोग इसका लाभ उठा सकेंगे.

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  11. आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, इसके लिए साधुवाद। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़कर हिन्दी के उन्नयन में अपना सक्रिय सहयोग करें।

    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
    शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥


    शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। हार्दिक शुभकामना!
    (हिन्दुस्तानी एकेडेमी)
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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  12. जानकारी देने का धन्यवाद..

    ईद मुबारक!!
    नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाऐं.

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  13. संजीव जी!
    पं. मुकुटधर पाण्डेय के वि्षय में इससे पूर्व मेरी जानकारी भी नगण्य थी. उनके जीवन व कृतित्व से परिचय कराने के लिये आभार!

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  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी के कृतित्व, व्यक्तित्व और अन्वेषी प्रवृत्ति पर आपने एक शोधपरक लेख समर्पित किया है. वस्तुतः आपने अपने सद्प्रयास से इस लेख को भी पंडितजी के गरिमानुकुल उचाईयां देकर..धरोहर का रूप दे दिया है. संजीव भाई, मुझे आप एक संपूर्णतावादी की छवि में परिवर्तित होते दिख रहे हैं . कोटिशः बधाई.!!!

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