"आज बीवी बडा उछल रही थी...पूछने पर खत हवा में लहराते हुए बोली "मामा जी का खत आया है और छुट्टियों में मुम्बई बुलाया है"

"मैँ सोच में डूब गया कि ...
'क्या करें?'....
'जाएं के ना जाएं?'
"मन तो कर रहा था कि मना कर दूँ"...
"वजह...खर्चा बहुत हो जाएगा"
"सात-सात बच्चों को लेकर मुम्बई जैसे महँगे शाहर में जाना कौन सा आसान काम है?"

"बीवी ने तसल्ली दी कि...."चिंता क्यों करते हो?"
"मैँ हूँ ना"
"माननी पडी उसकी बात"..
"आखिर चलती तो उसी की ही थी ना"
"सो जाना पडा"

"मन ही मन सोचे जा रहा था कि बीवी वहाँ जा के पता नहीं क्या-क्या 'तमाशे'करेगी?"
"कौन-कौन से'गुल'खिलाएगी?"
"कुछ-कुछ बेफिक्र सा हो चला था मैँ"
"रग-रग से वाकिफ जो था उसकी"
"इसलिए गारैंटी तो थी ही कि किसी भी हालत में लेने के देने नहीं पडेंगे"

"बस टिकट कटाई और चल दिये अपनी सात बच्चों की'पलटन'ले 'मुम्बई'की ओर"
"पूरे रास्ते बीवी चहकती हुई मुझे सब समझाती जा रही थी कि..'किस से',...'किस तरह'पेश आना है...वगैरा-वगैरा"...
"प्लानिंग के मुताबिक स्टेशन पर उतरते ही उसकी तबियत ने बिगडना था" ...
"सो तबियत ना-साज़ हो चली थी अपने आप"
"हाय!...मैँ मर गयी"....
"हाय! मैँ मर गयी"...जो उसने कराहना शुरू किया तो फिर ना रुकी"
"मैँ आई ही क्यों?"...
"पता होता कि सफर में इतनी दिक्कत होगी,तो हम आते ही ना"....

"हुकुम के गुलाम के माफिक मैँ चुप-चाप दीन चेहरा लिये उसकी'हाँ में हाँ'मिलाता चला गया"
"पूरे रास्ते उलटियाँ करते आए हैँ ये बेचारे"मेरी तरफ इशारा करते हुए बीवी बोली
"अब इनकी भी तबियत ठीक नहीं रहती न"
"लम्बा सफर सूट जो नहीं करता है इन्हे"
"लाख समझाया कि सेहत ठीक नहीं है ,सो इस बार रहने दें"
"लेकिन ये माने तब ना...."
कहने लगे "बहुत दिन हो गये मामा-मामी से मिले"...
"दिल उदास हो चला है"
"सुनते तो मेरी बिलकुल हैँ ही नहीं ना"
"उफ!...ऊपर से मैँ भी बिमार पड गयी"
"अब इनका ख्याल कौन रखेगा?"बीवी रुआँसी होती हुई बोली
"मामा जी!आप एक काम कर दें"
"हमारा वापसी का टिकट कटवा दें"
"दिल्ली जाएंगे वापिस",....
"किसी तरह तबियत ठीक हो जाए बस"बीवी ऊपरवाले को हाथ जोड बोली....
"फिर कभी आ जाएंगे आपसे मिलने"
"आप भी नाहक परेशान होते रहेंगे हमारी खातिर?"

"इतना काहे को सोच रही हो ?"....
"सब ठीक हो जायेगा"मामी बोली

"हम आपको परेशानी में नहीं डालना चाहते"
"डाक्टर ने ताकीद जो की है कि जब तक ये पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते...
तब तक खालिस'केसर वाले दूध'और'जूस'के अलावा कुछ नही"
"ये डाक्टर भी पता नहीं क्या-क्या परहेज़ बता डालते हैँ?"

"कैसी बातें करती हो?"
"सब इंतज़ाम हो जायेगा"
"तुम बेकार में परेशान हो रही हो"
"सब चिंता छोडो और बस आराम करो"मामी बोली

"मुझे शर्म ना आएगी?"
"मेरे होते हुए आप काम करें"बीवी आहिस्ता से बोली....
मानो अपना फर्ज़ भर अदा कर रही हो

"अब जब तबियत ठीक नहीं है तो आराम करना ही होगा ना"
"तुम्हारी जगह अगर मेरी बेटी होती तो क्या उसे मैँ यूँ ही जाने देती?"

"जैसी आपकी मर्ज़ी"...
"बीवी की छुपी हुई कुटिल मुस्कान को समझ पाना मामा-मामी के बस की बात कहाँ थी?"

"दिन भर तो बीवी ने कुछ खाया-पिया नहीं"
"बस सर पे पट्टी बाँधे'हाय-हाय'करती रही और...
रात को अन्धेरे में चुप-चाप ठूसे जा रही थी दबा के माल-पानी"

"काम करने के नाम पे उसका सर...दर्द के मारे फटने को आता था लेकिन....
'खाते-पीते'और'घूमते-फिरते'वक़्त एक्दम टनाटन"

"अब इतने बावले भी नहीं थे हम"...
"पता था कि कब तबियत ने'ठीक'होना है और कब'ना-साज़'"
"खूब खातिरदारी हो रही थी...
"खाओ-पिओ और मौज करो के अलावा कोई काम नहीं था हमें"

"जूहू'...
'चौपाटी'...
'बान्द्रा'...
'पाली हिल',...
'फिल्म सिटी' कोई जगह भी तो हमने नहीं छोडी

"बीवी दिनभर पलंग तोडते हुए गप्पें मारती.... और मैँ ....
सोफे पे लदा-लदा उसकी ऐसी-तैसी करते हुए....
"कभी ये'खा'....तो कभी वो'पी'...
"मामा-मामी बेचारे दोनों हमारी ही तिमारदारी में लगे रहे"

"अपने घर में तो सब चीज़ ताले-चाबी के अन्दर थी...
यहाँ खुला मैदान देख बच्चों का मन डोल गया..
"बाल-सुलभ मन जो ठहरा"....
"रहा ना गया उनसे"
"टूट पडे एक-एक आईटम पर...
मानो ऐसा मौका फिर हाथ नहीं लगने वाला"
"कोई'कप्यूटर'से पंगे ले रहा था तो...
कोई'डी.वी.डी'प्लेयर से,...

कोई किताबों का इस्तेमाल'हवाई जहाज़'बनाने में कर रहा था....
तो कोई टीवी रिमोट के साथ'टक-टक'किए जा रहा था...
कभी'कार्टून नैट्वर्क'....
तो कभी'आज तक'"
"अपने बच्चे 'सबसे तेज़'जो थे
महँगा वाला'मोबाईल'तो पहल्रे ही दिन'कण्डम'हो चुका था"
"छोटे वाले ने तो जैसे उनका कोई भी बिस्तर सूखा ना छोडने की कसम खाई हुई थी"
"इधर चद्दर बदली ...उधर'फौवारा'चालू"
"खरबूजे को देख खरबूजे ने भी रंग बदल डाला"

"अपने'टामी'ने भी आँखे मूंद जोश में आ जो टांग उठाई...
नतीजन उनका नया'लैपटाप'अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था"

"खूब'चिल्लम-पों'हो रही थी "
"जिसके जो जी में आए वो ही कर रहा था"

"अब तक सब मिलकर साफ-सुथरे घर की'वाट'लगा चुके थे"
"कोई'रोकने'वाला...
कोई'टोकने'वाला जो नहीं था"

"मामा बडा दिलदार था सो कुछ नही बोला लेकिन...
मामी के चेहरे पे कई रंग आ-जा रहे थे"

"लेकिन अपुन को क्या?"
"ये तो वो ही सोचें..जिन्होने न्योता भेजा था"
"चूल्हे पर हर वक़्त देगची चढी रहती थी हमारी खातिर"
"नये-नये पकवानों की फरमाईश जो आती रहती थी हमारी ओर से"
"कभी'पिज़्ज़ा'तो कभी'गुलाब जामुन'"
"आवभगत तो हो रही थी अपनी"चाहे बुझे मन से ही सही

"हमारे बढते हौसले देख एक दिन मामी के सब्र का बाँध टूटना था सो टूट ही गया आखिर "
"बडे ही बेशर्म हैँ ये तो,...जाने का नाम ही नहीं ले रहे "
"हुँह!...बडे आए न्योता भेजने वाले"
"बडा प्यार उमड रहा था ना अपने भांजे पर?"
"अब भुगतो अपने आप"
"बाज़ुयेँ अकड गयी थी मिले बिना जनाब की"
"साँस अन्दर-बाहर नहीं हो रहा था ना?"
"करते रहो'सेवा-पानी'..मैँ तो चली मायके"
"तभी बुलाना वापिस...जब ये मुय्ये मुफ्तखोर दफा हो गए हों"

"मैँ दरवाज़े से कान लगाए चुप-चाप सुन रहा था सब"
"सर शर्म से पानी-पानी हुए जा रहा था"
"अब मामा-मामी से आँखे मिलाने की हिम्मत नहीं बची थी"
"सर झुका आहिस्ता से बोला..."जी काफी दिन हो गये हैँ...
"छुट्टियाँ खत्म होने को हैँ"....
"होमवर्क भी बाकी है बच्चों का"...
"सो अब चलेंगे"
"बीवी आँखे तरेरते हुए मुझे घूरे जा रही थी कि मैँ ये क्या बके चला जा रहा हूँ?" लेकिन मै बिना रुके बोलता चला गया

कमरे में घुसते ही बीवी दाँत पीसते हुए बोली"ये क्या बके चले जा रहे थे?"
"दिमाग क्या घास चरने गया था जो ऐसी बेवाकूफी भरी बातें किये जा रहे थे?"

मेरे सब्र का बाँध टूट गया,बोला...
"कुछ शर्म-वर्म भी है कि नहीं या वो भी बेच खायी?
"आखिर और कितना बे-इज़्ज़त करवाएगी?"

"समझ्दार को इशारा काफी था,बीवी चुप लगा के बैठ गयी"
"पता जो था कि अब अगर वो एक शब्द भी फालतू बोली तो आठ-दस तो पक्के ही समझो"
"ज़मीर जाग उठा था मेरा"
"उन्हें दिल्ली आने का न्योता दे हम चल पडे वापिस"
"पीछे मामा-मामी मंद-मंद मुस्काए चले जा रहे थे,....
आखिर उनका पिण्ड जो छूट गया था हम मुफ्तंखोरों से "

15 comments:

  1. वाह मार लिया मैदान
    राजीव भाई ने
    अमिताभ बच्‍चन की लंबाई को मात करती कहानियों के कहानीकार
    जया बच्‍चन से भी छोटी लघुकथा
    लिख ही डाली
    बधाई हो।

    अब हम हंसते ही रहेंगे
    बिना रुके
    पर इनकी लघुकथा
    अब इतनी भी लघु नहीं है
    शब्‍द ही तो कम हैं इसमें
    पर जमाने भर का विस्‍तार
    समेटे हुये हैं ये अपनेपन में।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बिलकुल एसे लोग भरे पडे हैं :) कहानी में हास्य के संपुट के साथ बीच बीच में आपकी व्यंग्यात्मक शैली उभर आती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पंकज सक्सेना4 अक्तूबर 2008 को 8:47 am

    आम है यह संदर्भ। अच्छी कहानी है। एक ही व्यक्ति के कहे गये संवाद को कई "इंवर्तेड कॉमा" में तोडना पढने में असहजता अवश्य उत्पन्न करता है, फिर भी आपके प्लॉट की प्रशंसा करनी होगी।

    उत्तर देंहटाएं
  4. 'very well written, or aisa hotta bhee hai, but the climax of the story is appreciable'

    regards

    उत्तर देंहटाएं
  5. I agree with seema ji, at least story has a positive end.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी कहानी है तनेजा जी..

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाकई बहुत ही मजेदार और मामा मामी के यहाँ जाने वालों के लिए शिक्षाप्रद :D कहानी है.
    बधाई .

    उत्तर देंहटाएं
  8. हम तो कई बार के भुक्त भोगी हैं, अच्छी कहानी।

    उत्तर देंहटाएं
  9. तनेजा जी,

    बहुत अच्छी कहानी है, खास कर वो पंच लाईने जिन्हे आपने कहानी के बीच बीच में प्रभावोत्पादकता के लिये डाला है। बधाई स्वीकारें..

    उत्तर देंहटाएं
  10. राजीव जी
    कहानी अच्छी लगी. हास्य का पुट दाल कर आपने रोचक बनाये रखा. samvaad भी प्रभावी रहे.

    उत्तर देंहटाएं
  11. हास्य का पुट लिए बहुत कुछ कहती हुई आपकी यह रचना प्रशंसनीय है ,

    उत्तर देंहटाएं
  12. अच्छी ...
    रोचक कहानी....

    तनेजा जी,
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  13. बढिया व्यंग्य है।
    अच्छे तरीके से शब्दों को पिरोया गया है।
    बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं

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