रंगमंच की खास बात ही उसकी मुक्तता है - मानव कौल [नाटक पर स्थायी स्तंभ] - योगेश समदर्शी

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मानव कौल, उन चंद युवा नाट्यकर्मीयों में से एक है जो नाटक को जीवन का अंग मानते है। जो नाटक के अलावा अपना कोई आस्तित्व ही नहीं मानते जिनके लिये मंच जीवन को जीने और समझने का प्रयोग स्थल है। वहाँ नाटक लिखते है, निर्देशित करते है, उनमे अभिनय करते है और पोषित होते है, चैन पाते है, सुख प्राप्त करते है। नाटक उनके लिये साधना है, तप है। "अरण्य" नामक नाटक ग्रुप का संचालन करने वाले मानव कौल से हमने बात की यहां प्रस्तुत है बातचीत के कुछ अंश...

आप अपने बारे में कुछ बताएं अपने जन्म मूल शहर और नाटक के क्षेत्र मे आने की संक्षेप कहानी की तरह

जन्म बारामूला खोजाबाग कश्मीर में...१९ दिसंबर १९७४... बाद में होशंगाबाद आ गए। नाटक की शुरुआत भोपाल में बतोर अभिनेता... फिर १९९८ में मुंबई में सत्यदेव दुबे के साथ बतोर अभिनेता काम किया। २००४ में खुद का ग्रुप खोला 'अरण्य" नाम से। पहला नाटक 'शक्कर के पाँच दाने' किया, फिर 'पीले स्कूटर वाला आदमी', फिर 'बलि और शंभू', फिर 'ईल्हाम' और 'ऎसा कहते हैं" अभी नए नाटक की तैयारी में लगा हूँ। एक उपन्यास भी लिख रहा हूँ, अंतिमा नाम से... कुछ कविताएँ भी लिखी है जो आपने ब्लाग में पढ़ी होगी...

नाटक के क्षेत्र मे कोई विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया आपने?

नही

नाटक पहले भोपाल और अब मुम्बई क्या अंतर है दोनो जगह पर?

भोपाल का थियेटर मुझे बहुत पसंद नही आया, उसका मुख्य कारण- नाटको का स्तर। एक समय जब भोपाल में अच्छा थियेटर होता था, इसके मैंने हमेशा किस्से ही सुने हैं....देखने और करने का सोभाग्य कभी प्राप्त नहीं हुआ। मुंबई में भी मैंने २००३ तक बतौर अभिनेता काम किया पर... गंदे और बिना कुछ बात कहे जाने वाले नाटको ने मेरा अभिनेता का पूरा रोमांच छीन लिया सो मैंने अभिनय बंद करके खुद के नाटक लिखे और प्रदर्शित किये... जिस तरह के नाटक में देखना और बतौर अभिनेता मैं करना चाहता था।

नाटक आर्थिक रूप से बहुत मद्दगार नही माना जात ऐसे में आजीविका का प्रश्न आपके सामने कभी खडा नहीं हुआ..

मैं अभी तक कैसे जी रहा हूँ मैं खुद नहीं जानता... पर हमेशा से ही मेरे पास कभी पैसा नही रहा है.... सो ऎसा नही था कि पैसा था अब नहीं है... और मुझे बहुत पैसे की कभी चाह भी नहीं रही.. नाटक के लिए मेरे कुछ दोस्त हैं जो मदद कर देते हैं... कुछ मैं अपने दोस्तों की फिल्मों में काम करके घर का खर्च जैसे तैसे निकाल लेता हूँ.... अभी तक तो कट गई है आगे भी कट ही जाएगी,,,:-)

यानि कि नाटक के दर्शक पैसा खर्च करके नाटक नहीं देखते पैसा कमाने के लिये कैमरे का मोहताज होना पडता है आज भी नाट्य कलाकार को?

नहीं ऎसी बात नहीं है... हिन्दी नाटको में तो कभी भी पैसा नहीं था... तो इस बात का दुख मनाना बेवकूफी है मेरी निगाह में... खास कर जिस तरीके के नाटक हम करना चाहते है वो प्रयोग हैं... उसमें दर्शकों की कोई भी ज़िम्मेदारी नहीं है... हम एक तरीके का रंगमंच करना चाहते है... जिसकी अपनी एक कीमत है... और हमें रंगमंच उसकी सारी शर्तों के साथ मंज़ूर है... समस्याएँ छोटी है रंगमंच बहुत बड़ा है।

"अरण्य" के बारे मे कुछ विशेष जो आप बतान चाहें

"अरण्य" कुछ दोस्तों ने मिलकर शुरु किया था... अभी तक मेरे लिखे और निर्दे्शित किये हुए नाटक ही इसमें खेले जा रहे हैं... पर जल्द ही दूसरों के लिखे और नि्र्दे्शित नाटक भी खेले जाएगें...

आपने कहा कि हिंदी नाटक में कभी पैसा नहीं था क्या इसी लिये इस मंच पर लोग या तो आते नहीं या टिकते नहीं और था अर्थ ना हो वहा विकास रुक सा जाता है... स्वांत सुखाय लोगों से कोई विधा कब तक पनप सकती है?

रंगमंच की खास बात ही उसकी मुक्तता है... चूकि इसमें हम अपनी बात अपने ढ़ंग से कह पाते है यह ही... इसका आनंद है...। जहाँ तक बात स्वान्त सुखाय की है तो कोई भी कला जो मुझे पसंद है वह हमेशा बहुत भीतर से कही हुई बात होती है जो हमेशा पहले खुद के लिए ही होती है... वह जब एक कहानी, नाटक या कविता का रुप ले लेती है तब कहीं जाकर वह दूसरों के लिए बन जाती है... जैसे दोस्तोवस्की का साहित्य तो बहुत अपनी खुद से की हुई बात ही है ना... पर वह इतनी इंमानदारी से कही गई बात थी कि युनिवर्सल हो गई। कला स्वांत सुखाई ही है....।मुझे समाज को बदलने में कोई दिलचस्पी नहीं है।

अंतिम प्रश्न, नाटक की लोकप्रियता पर आप क्या कहना चाहते है

नाटक एक छोटी विधा है.. वह कभी भी फिल्म या टीवी की लोकप्रीयता हांसिल नहीं कर सकती... और बहुत ही क्षणिक ऑर्ट है... जो प्रयोग खत्म होते ही खत्म हो जाता है... फिल्म बनते ही वह इतिहास का हि्स्सा हो जाती है... क्यों कि उसे वैसा का वैसा कभी भी देखा जा सकता है... नाटक हमेशा, रोज़ करते रहना पड़ता है और वह हमेशा छोटे से समूह के लिए होता है... तो उसकी तु्लना किसी और मनोरंजन से करना ही बेतुकी सी बात है...।

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13 टिप्पणियाँ:

  1. बेनामी says

    Nicely presented interview.

    -Alok Kataria


    रितु रंजन says

    नाटक जीवन का अंग ही है। बहुत नाटक देखे हैं और इस विधा से जुडे कलाकारों के जुनून को जानती हूँ। नाटक का पुनर्जीवन आवश्यक है। मानव कौल जी के विषय में जान कर बहुत अच्छा लगा। योगेश जी, बहुत बधाई।


    नंदन says

    अंधायुग देखी थी जो मेरे मन में इतिहास और अविस्मरणीय अनुभव बन कर बैठी है और एसा आनंद किसी फिल्म से कभी नहीं मिला। मैं नाटक को बडी विधा मानता हूँ।

    मानव से मिल कर अच्छा लगा।


    पंकज सक्सेना says

    बहुत अच्छा साक्षात्कार है, प्रस्तुति की बधाई। नाटक के अंश/दृश्यों के ऑडियो वीडियो भी इस स्तंभ मेंप्रस्तुत करें।


    डा. फीरोज़ अहमद says

    नाटक जीवन का अंग है.जीवन ही एक नाटक है.नाटक धीरे धीरे कम होता चला जा रहा है फिर भी कुछ लोग लिख रहे और अच्छा लिख रहे है.कुछ पत्र-पत्रिकाएं नाटक को छाप रही है .यह अच्छी बात है.योगेश जी को बधाई.


    DR.Shagufta Niyaz says

    बहुत अच्छा साक्षात्कार है .योगेश जी, बहुत बधाई।


    अभिषेक सागर says

    आज के समय मे कौल जी जैसे लोगों की नाटक क्षेत्र मे बहुत आवश्यकता है... बहुत अच्छा साक्षात्कार.. बधाई


    अनुज says

    मानव कौल से साहित्य शिल्पी मंच पर मुलाकात अच्छी रही। बहुत बेबाकी से अपने विचार उन्होंने प्रस्तुत किये। अरण्य को शुभकामनायें।


    मोहिन्दर कुमार says

    नाटक विधा से जुडे सभी लोग अपने जीवट व नाटक के प्रति लगाव के लिये प्रशन्सा के पात्र है. नाटक भले ही आज के युग में पिछड रहा हो परन्तु कलाकार की असली कावलियत नाटक के माध्यम से ही जानी जा सकती है..नो रिपीट नो रिटेक आपको अपना सब कुछ एक बार में ही देना है..यह शोचनीय विषय है कि नाटक से जुडे लोगों को अपनी जीविका के लिये भी जूझना पडता है.


    praveen pandit says

    मानव कौल से रू-ब-रू होना सौभाग्य है,और इसे संभव बनाने के लिये योगेश जी का आभार ।
    कुछ जिग्यासा है -मानवकौल जी को संबोधित।
    --हर नाटक एक प्रयोग है ,और होता ही रहेगा।ऐसे मे दर्शक की उपस्थिती उसकी ज़िम्मेदारी बन जाती है। यदि दर्शक इसे नहीं निभाता , तो रंग कर्मी की ज़िम्मेदारी क्या है?
    --नाट्य-लेखन स्वांतः-सुखाय हो सकता हैअन्य कलाओं -संगीत ,चित्रकला,साहित्य आदि आदि की भांति।परंतु अनिवार्यतः मंच व दर्शक की आवश्यकता क्या नाटक को स्वांतः-सुखाय की सीमा से बाहर नहीं ले जाती।
    --क्या समाज मे बदलाव लाना किसी नाटक की कसौटी होनी चाहिये ?
    --कुछ उपाय सोचे जा सकते हैं जो उन नाट्य-रसिकों के बीच भी तारतम्य बनाए रख सके जो आजीविका की दृष्टि से रंग कर्मी नहीं हैं।
    --पैसा खर्च करके शौक़ पूरा करने वाले समाज की कमी नहीं है । नाटक के लिये ही इतनी तंगी क्यों हैं?

    साभार
    प्रवीण पंडित


    pran sharma says

    Rangmanchiy natak se sambandhit
    Manav Kaul ne badee imaandaaree
    baaten kahi hain. Yogesh kee prastuti aesee lagee ki jaese
    unhone gaagar mein saagar bhar diya
    hai.


    आलोक शंकर says

    ye bhi khoob rahi


    राजीव रंजन प्रसाद says

    योगेश जी,

    मानव कौल जी को इस मंच पर प्रस्तुत करने का आभार। प्रवीण पंडित जी के प्रश्नों पर उनके विचार प्राप्त करने का यत्न कीजियेगा।

    अरण्य को हार्दिक शुभकामनायें।

    ***राजीव रंजन प्रसाद


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