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कभी देखो समाज को
बच्चे की निगाहों से
पल भर में रोना
पल भर में खिलखिलाना।

अरे! आज लड़ाई हो गई
शाम को दोनों गले मिल रहे हैं
एक दूसरे को चूम रहे हैं।

भीख का कटोरा लिए फिरते
बूढ़े चाचा की दशा देखी नहीं गई
माँ की नजरें चुराकर
अपने हिस्से की दो रोटियाँ
दे आता है उसे।

दीवाली है, ईद है
अपनी मंडली के साथ
मिठाइयाँ खाये जा रहा है
क्या फर्क पड़ता है
कौन हिन्दू है, कौन मुसलमां।

सड़क पर कुचल आता है आदमी
लोग देखते हुए भी अनजान हैं
पापा! पापा! गाड़ी रोको
देखो उन्हें क्या हो गया?

छत पर देखा
एक कबूतर घायल पड़ा है
उठा लाता है उसे
जख्मों पर मलहम लगाता है
कबूतर उन्मुक्त होकर उड़ता है।

बच्चा जोर से तालियाँ बजाकर
उसके पीछे दौड़ता है
मानों सारा आकाश
उसकी मुट्ठी में है।

21 comments:

  1. bahut achha pryas hai
    kafi achha laga hai
    aisa laga hai puri imandari k sth likha gaya hai

    उत्तर देंहटाएं
  2. खुशियों और गमों की साझेदारी ही एक मजबूत समाज की नींव डाल सकती है..बच्चों का भोलापन इसे बखूबी दर्शाता है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. पता नही क्यों ...............आदमी ऐसा ही क्यों नही रह पाता सारी उम्र.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह! सुबह बच्चों की आवाज और अब बच्चे की निगाह! बच्चे की मासूमियत को सामने लाती बहुत सुंदर रचना है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बच्चा जोर से तालियाँ बजाकर
    उसके पीछे दौड़ता है
    मानों सारा आकाश
    उसकी मुट्ठी में है।

    बहुत अच्छी कविता, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. A very nice poem describing the thoughts of a little child about the people around him! Thanks!

    उत्तर देंहटाएं
  7. पंकज सक्सेना23 अक्तूबर 2008 को 8:59 pm

    समाज को बच्चे की निगाह से दिखाने की आपकी कोशिश सफल है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बच्चे इसी लिये मन के सच्चे कहे जाते हैं। आपके दिखाये सारे दृश्य उनके मन की कोमलता ही बयान कर रहे हैं। एक बहुत अच्छी कविता की बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. दीवाली है, ईद है
    अपनी मंडली के साथ
    मिठाइयाँ खाये जा रहा है
    क्या फर्क पड़ता है
    कौन हिन्दू है, कौन मुसलमां।

    सच हीं कहा गया है कि
    इंसां जब तक बच्चा है,
    समझो तब तक सच्चा है!

    बहुत सही और बहुत बड़ी बात लिखी है आपने।
    बधाई स्वीकारें!

    उत्तर देंहटाएं
  10. दीवाली है, ईद है
    अपनी मंडली के साथ
    मिठाइयाँ खाये जा रहा है
    क्या फर्क पड़ता है
    कौन हिन्दू है, कौन मुसलमां।

    अच्छा लिखा है..आपने...अनवरत रहें.

    उत्तर देंहटाएं
  11. बच्चों के माध्यम से समाज को आईना दिखाने की अच्छी कोशिश है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बाल सुलभ निर्दोषिता बहुत ही सहज रूप मे उजागर हुई।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  13. बच्चा जोर से तालियाँ बजाकर
    उसके पीछे दौड़ता है
    मानों सारा आकाश
    उसकी मुट्ठी में है।


    बच्चे की मासूमियत को

    सामने लाती सुंदर रचना .....बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  14. Atisundar kavita...jitni bhi tarif karen kam hai. kk Yadav ji ko Sadhuvad.

    उत्तर देंहटाएं
  15. Yah kavita padhkar ek bar phir se bachha banane ki ji chahata hai...Yun hi likhte rahiye KK ji.

    उत्तर देंहटाएं
  16. Im very Thankful for such nice comments..it gives me inspiration.
    Regards,
    KK Yadav.

    उत्तर देंहटाएं
  17. कविता "बच्चे की निगाह" बड़ी समकालीन और प्रासंगिक लगी. बड़े सुन्दर भाव हैं-

    भीख का कटोरा लिए फिरते
    बूढ़े चाचा की दशा देखी नहीं गई
    माँ की नजरें चुराकर
    अपने हिस्से की दो रोटियाँ
    दे आता है उसे।

    दीवाली है, ईद है
    अपनी मंडली के साथ
    मिठाइयाँ खाये जा रहा है
    क्या फर्क पड़ता है
    कौन हिन्दू है, कौन मुसलमां।
    ....इस अनुपम प्रस्तुति हेतु बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  18. Atisundar...Itni sundar kavitayen kaise likhte ho ap...kuchh hame bhi batao.

    उत्तर देंहटाएं

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