गतांक से आगे...
नाटक का अभिनय पक्ष वास्तव में नाटक का मुख्य हिस्सा है। इसी पर सब कुछ टिका होता है. जैसे गीत गायक के लिये लिखे जाते हैं, ठीक इसी तरह नाटक केवल अभिनेताओं के लिये ही लिखे और खेले जाते है। नाटक में हिस्सा लेने वाले कलाकार बहुप्रतिभा के धनी होती हैं। नाटक में अभिनेता को नाचना गाना और ना जाने क्य क्या करना होता है। नाटक इसी लिये नवोदित कलाओं का संगम कहलाता है। अभिनेता किसी पात्र को ऐसा जीवंत बना सकता है कि वह किसी दूसरे व्यक्ति का कायाकल्प कर दे। 
नाटक मूल रूप से सामाजिक शिक्षण में महती भूमिका निभाते हैं। समाज में विभिन्न कहानियों और दृश्टांतों से लोगों को उलझनों और समस्याओं का समाधान दिया जाता है। नाटक का प्रत्येक दृश्य दृशक के लिये मनोरंजन के साथ साथ शिक्षा का भी बडा कारण बनता है। नाटक को सभी विधाओं से उत्तम दर्जा दिया जा सकता है, क्योंकि सामाजिक सामज्स्य का इससे उत्तम उदाहरण नहीं हो सकता। जो लोग नाटक कर रहे होते है चाहे वह मंच पर हो या मंच से परे, सभी का आपस मे सहयोग और तारतम्य ही नाटक के पूर्ण और अपूर्ण होनी की कसोटी है। 
नाटक किसी व्यक्ति का जीवन बदल सकता है। यह ताकत क्या कम है? बहुत उम्दा उदाहरण आता है महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी में लिखा है कि हरिश्चंद्र नाटक देख कर उनका जीवन बदल गया। वास्तव में नाटक में वह असर रूपी शक्ति होती है कि एक दम से लोगों के विचार, व्यव्हार और आचरण बदल सके। 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि नाटक का हर अंग महत्वपूर्ण होता है.. निर्देशन, मंच सज्जा, सगीत, प्रकाश व्यवस्था, लेखन और अभिनय आदि आदि...किसी भी अंग का मह्त्व कम नहीं होता... परंतु नाटक का आर्थिक ढांचा बडा कमजोर है। इसलिये नाटक की स्थिति को हम दयनीय कहते है। यहां आने वाले लोग यहां रह कर भूखे मरने की स्थिती में पहुंच सकते हैं, ऐसा डर सताता है। इसी लिये यह मंच आपनी प्रसिद्धी खो रहा है। आज कितने लोग हैं हम में से जो नाटक देखने जाते है? 

मेंने मेरे सानिध्य में आये साथियों के साथ मिलकर नाटक देखने के कई कार्यक्रम बनाये उन्हें मंडीहाउस ले जाकर नाटक दिखाये। नाटक देखने से पहले उनकी राय जो थी बाद में वह बिल्कुल बदल जाती है। वास्तव में एक फिल्म से कहीं ज्यादा मनोरंजन और कहीं अधिक ज्ञान एक नाटक में मिलता है। बस लोगों में विश्वास ही नहीं है कि नाटक भी देखने चाहिये या नहीं। दिल्ली में मंडी हाउस मे लगभग रोजाना नाटक होते है.. यदि आप वास्तव में नाटक को गहरे से समझना चाहते है तो मेरा निवेदन है कि नाटक देखिये एक बार आपकी धारणा बदल जायेगी। फिल्में देखना छोड देंगे आप.. एक एक नाटक (मैं स्तरीय नाटकों की बात कर रहा हूं) आपको ऐसे विचित्र अनुभव से गुजारेगा कि आप स्वंय को कुछ देर के लिये भूल जायेंगे... 

नाटक का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है उसका हास्य भाग। नाटक में विशेष रूप से एक पात्र ऐसा रखने की परंपरा है कि जिसमें वह पात्र लोगों के मनोरंजन का पात्र बनता है। वह हंसाता है, वह कहानी का हिस्सा भी हो सकता है और नही भी, परंतु कहानी से बाहर ना जाते हुए नाटक को मनोरंजन और बांधने का कामकरता है.... 
नाटक वास्तव में मनोरंजन की विचित्र सी दुनिया है, जहां बहुत तामझाम के नाटक भी है, तो बिल्कुल साधे नाटक भी है। दरअसल नाटक अपनेँ आर्थिक ढांचे को पनपा नहीं सके, बिके नहीं.. सौदे बाजी नही हो सकी। वास्तव में कला को इसी लिये तो अनमोल कहा जाता है... मेरे गुरू जी से एक पत्रकार ने पूछा आप अपने नाटकों पर फिल्में क्यों नही बनाते तो उन्होंने कहा कि नाटक मेरे ह्र्दय से निकला है... यदि फिल्म वाले इस पर ज्यों का त्यों फिल्म बनाना चाहें तो मुझे कोई ऐतराज नही लेकिन बिना लडकी नचाए उनकी फिल्म नहीं बनेगी और ऐसा करते ही मेरा नाटक मर जायेगा.. और मैं भूखा मर सकता हूं पर अपनी संतती का खून नहीं देख सकता..." वास्तव में नाटक सृजन है, जीवन है; और कला का कभी कोई मोल नहीं होता इसी लिये नाटक चाहकर भी व्यव्साय नहीं हो सकता... पर नाटक को समृद्ध तो होना ही पडेगा और यह तब होगा जब हम और आप थियेटर में जाकर नाटक का टिकिट खरीद कर नाटक देखेंगे। जब हम थियेटर मे जाएंगे तो अच्छे नाटक स्वयं पैदा होगें ऐसा मेरा विश्वास है। 

11 comments:

  1. 'iss artical ko pdh kr ek bhut pura song yaad a gya...
    'jindgee ek natak hai, hum natak mey kaam krtyen hain, parda uthye hee, parda girtey hee subko salam krtyen hain..'
    khair ye to huee jindgee kee baat jo ek natak se kum nahee, magar ye artical bhee kuch kum interetsing nahe tha, accha lga'

    regards

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  2. नाटक के विषय मैं काफी विस्तार से चर्चा की है. पढ़ कर अच्छा लगा.

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  3. नाटक पर इतनी अच्छी जानकारी उपल्बध कराने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद

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  4. योगेश जी,

    बहुत सही कहा आपने नाटक की पटकथा अभिनेता के लिये ही लिखी जाती है और एक सक्षम अभिनेता की यही खासियत है कि वह उस पात्र को जींवन्त कर देता है और दर्शकों को बांध लेता है... हास्य निश्चय ही दर्शकों को बांधे रखता है.. निर्देशन व रंगमंच सज्जा भी महत्वपूर्ण भाग निभाते हैं.. सुरुचिपूर्ण लेख के लिये आपका आभार

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  5. मित्र योगेश जी

    ".. और मैं भूखा मर सकता हूं पर अपनी संतती का खून नहीं देख सकता..." वास्तव में नाटक सृजन है, जीवन है; और कला का कभी कोई मोल नहीं होता इसी लिये नाटक चाहकर भी व्यव्साय नहीं हो सकता..."

    बचपन से ही तिल तिल करके उत्तर भारत में मंचन की लगभग सभी विधाओं को लुप्तप्राय होते हुए देखता जा रहा हूँ ..... कामना करता हूँ कि यह पंक्तियाँ हमारे आज के मंच से दूर जाते हुए समाज और नई पीढ़ी का मर्म को छू सकें ..... यही इस लेखमाला की सार्थकता होगी

    शुभकामना

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  6. नाटक पर बहुत उत्तम जानकारी। योगेश जी इस स्तंभ की हमेशा प्रतीक्षा रहती है।

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  7. पंकज सक्सेना11 अक्तूबर 2008 को 7:24 am

    नाटक पर बहुत कम जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध है, इस दिशा में योगेश जी का काम सराह नीय है।

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  8. योगेश जी आपने अपने गुरुजी को उद्धरित तो किया किंतु उनका नाम नहीं बताया। तस्वीरों के कलाकारों का परिचय मिलता तो और अच्छा लगता। आलेख अच्छा है।

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  9. नाटक पर आपकी पिछली कडी और प्रस्तुत कडी बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत हुई हैं। इस बात पर मेरी भी सहमति है कि प्रस्तुत चित्रों का परिचय भी मिलता तो और अच्छा होता।

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  10. 'वास्तव में नाटक सृजन है, जीवन है; और कला का कभी कोई मोल नहीं होता इसी लिये नाटक चाहकर भी व्यव्साय नहीं हो सकता... पर नाटक को समृद्ध तो होना ही पडेगा'
    असहमत होने का कारण नही।नाट्य -सृजन समृद्ध हो,इस विषय पर हम कथनी-करनी से एक हों तो बहुत अच्छा।
    हाँ,मंडी हाउस के अथवा अन्यान्य विभिन्न रंगमंच तन-मन मे जिस ऊर्जा को को सिंचित करते हैं ,उस अनुभव को मेरा रंग भीगा मन शायद बयान न कर पाए।
    किसी नाट्य प्रस्तुति के बारे मे सोच भी बनाया जा सकता है।

    प्रवीण पंडित

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  11. चित्रों के हर नुक्‍कड़ पर
    मिले जानकारी तो पूरी
    होगी नाटक यात्रा हमारी।

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