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राम!
तूने किया था कभी
शिलावत हो गयी
अहिल्या का उद्दार
मात्र चरण-स्पर्श से

राम!
शिला बन गयी है
आज भी अहिल्या
न्यूनाधिक,
उन्हीं कारणों से
जो हैं विद्यमान
सनातन से अब तक
जस के तस

राम!
करोगे इस शिला का उद्दार
हो तैय्यार,
लेकिन, ना लगाना
अपने चरण
यह होगा इस शिला का मरण
खडी हो जायेगी यह शिला
स्वयं भी
लड जायेगी यह शिला
स्वयं भी

राम!
आ सकते हो इस राह,
तो आओ
और, दो शिला के साहस को
सम्पूर्णता
गरिमा को मान्यता
नहीं, उसे मुक्ति नहीं
चाहिए सहयोग
पीडा का उत्सर्ग कर
पुनः स्मित का प्रबल संयोग
आशीर्वचन नहीं,
दो स्पंदन
सांत्वना का
चरण-रज नहीं,
दो अवलंबन ,
भावना का

दोगे राम?



17 comments:

  1. शिला बन गयी है
    आज भी अहिल्या
    न्यूनाधिक,
    उन्हीं कारणों से
    जो हैं विद्यमान
    सनातन से अब तक
    जस के तस

    बडा सवाल उठाती अच्छी कविता के लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. राम!
    आ सकते हो इस राह,
    तो आओ
    और, दो शिला के साहस को
    सम्पूर्णता
    गरिमा को मान्यता
    नहीं, उसे मुक्ति नहीं
    चाहिए सहयोग
    पीडा का उत्सर्ग कर
    पुनः स्मित का प्रबल संयोग
    आशीर्वचन नहीं,
    दो स्पंदन
    सांत्वना का
    चरण-रज नहीं,
    दो अवलंबन ,
    भावना का

    दोगे राम?

    कविता सशक्त और सार्थक है, जितना पुराना संदर्भ है उतनी ही समसामयिक है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पंकज सक्सेना17 अक्तूबर 2008 को 1:47 pm

    नि:शब्द हूँ, बहुत प्रभावी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. दो स्पंदन
    सांत्वना का
    चरण-रज नहीं,
    दो अवलंबन ,
    भावना का

    दोगे राम?

    बहुत प्रभावशाली रचना है। कहीं कहीं थोडी क्लिष्टता आ जाती है, परंतु मिला जुला कर अच्छी रचना है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आ सकते हो इस राह,
    तो आओ
    और, दो शिला के साहस को
    सम्पूर्णता
    गरिमा को मान्यता
    नहीं, उसे मुक्ति नहीं
    चाहिए सहयोग
    पीडा का उत्सर्ग कर
    पुनः स्मित का प्रबल संयोग
    आशीर्वचन नहीं,
    दो स्पंदन
    सांत्वना का
    चरण-रज नहीं,
    दो अवलंबन ,
    भावना का
    बहुत सुंदर लिखा है प्रवीण जी. सस्नेह.

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रवीण जी की यह कविता दिल को छूती है बहुत सजता से बहुत कहा है आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सशक्त प्रभावी कविता के लिये आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. अतीत को प्रबावी ढंग से आपकी कविता वर्तमान से जोडती है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आदरणीय प्रवीण जी,

    रामायण का यह प्रसंग हमेशा तुलसी दास की आँखों से ही देखा है,यह नया आयाम है।

    "लेकिन, ना लगाना
    अपने चरण
    यह होगा इस शिला का मरण
    खडी हो जायेगी यह शिला
    स्वयं भी
    लड जायेगी यह शिला
    स्वयं भी"

    और यह दृष्टिकोण कि:दो स्पंदन
    सांत्वना का
    चरण-रज नहीं,
    दो अवलंबन ,
    भावना का

    कविता आपके प्रश्न के बाद संपूर्ण होती है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  10. राम!
    आ सकते हो इस राह,
    तो आओ
    और, दो शिला के साहस को
    सम्पूर्णता
    गरिमा को मान्यता
    नहीं, उसे मुक्ति नहीं
    चाहिए सहयोग
    पीडा का उत्सर्ग कर
    पुनः स्मित का प्रबल संयोग
    आशीर्वचन नहीं,
    दो स्पंदन
    सांत्वना का
    चरण-रज नहीं,
    दो अवलंबन ,
    भावना का

    दोगे राम?


    भावविभोर मुग्ध कर गयीं आपकी पंक्तियाँ .एकदम सत्य कहा है आपने.इससे अधिक और क्या कहा जा सकता था.नारी की अभिलाषा ,उसके जीवन की पूरी गाथा को आपने इन सिमित शब्दों में समेट विवेचित कर दिया.

    उत्तर देंहटाएं
  11. राम!
    आ सकते हो इस राह,
    तो आओ
    और, दो शिला के साहस को
    सम्पूर्णता
    गरिमा को मान्यता .......

    सुंदर ..... प्रवीण जी!
    मुग्धभाव बस अनुभव सा गुजर गया ..

    उत्तर देंहटाएं
  12. ना लगाना
    अपने चरण
    यह होगा इस शिला का मरण
    खडी हो जायेगी यह शिला
    स्वयं भी




    आओ
    और, दो शिला के साहस को
    सम्पूर्णता
    गरिमा को मान्यता



    सदियो से त्रसित स्त्री को जिस दृष्टिकोण की आवश्यकता है वो आपकी रचना में देखने को मिला...काश ! ऐसा ही हो......मात्र देह ना मानकर उसके मन को महत्व दिया जाये.....

    बहुत सार-गर्भित रचना

    स-स्नेह
    गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  13. राम!
    करोगे इस शिला का उद्दार
    हो तैय्यार,
    लेकिन, ना लगाना
    अपने चरण
    यह होगा इस शिला का मरण
    खडी हो जायेगी यह शिला
    स्वयं भी
    लड जायेगी यह शिला
    स्वयं भी

    bahut achha laga purane ahilya ki kahani ko kavita main padna

    aur uska badalta hua aaj ka roop bhi dekha bhaut achha laga

    उत्तर देंहटाएं
  14. यह कविता स्त्रियों की दशा को देखने का पुरुष -नज़रिया है।स्त्रियाँ भाग्यवादी बनकर क्या करेंगी? कोई राम नहीं आयेगा सांत्वना देने,स्पंदन कराने और अवलंबन देने। उसको वह आत्मसंबल इसी पृथ्वी से ग्रहण करना होगा और कर भी रही है। कविता की अंतिम पंक्ति ही ”दोगे राम?” ही संपूर्ण कविता के गुप्त रहस्य का भेदन करती है वर्ना कविता मात्र उपदेशात्मक होकर रह गयी होती। कविता की लय रचना को जीवंत बनाती है,पर कवि ने खतरे जरुर उठाये हैं।-सुशील कुमार।

    उत्तर देंहटाएं
  15. Ye Kavita aapki hai kya???

    Please bataiye........

    उत्तर देंहटाएं
  16. अनोनिमस? आप आपने परिचय को उजागर करें,तब उत्तर दूंगा।
    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं

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