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इतनी रात को भला किसको नींद नही आ रही है, मोबाईल की घंटी बजने पर रागिनी झल्लाती हुई उठी, घड़ी देखा तो २ बज रहे थे। पहले तो सोचा कि छोड़ ही दे, खुद ही फोन करने वाला समझ जायेगा कि ये वक्त सोने का है ना कि फोन पर गप्प मारने का। पर लगातार आ रही घंटी की आवाज सोने भी नही दे रही थी इसलिए उठना ही पड़ा| देखा बुआ जी का फोन है; बुआ जी का नाम देखकर ही अन्दाजा हो गया कि जरूर रात खराब होने वाली है|

"प्रणाम बुआ जी" कैसी हैं?"

"बुआ जी की बच्ची, मेरी माँ का देखभाल नहीं कर सकती थी तो उन्हें अपने साथ ले क्यों गयी? भैया तो बड़ी शान से कह रहे थे कि ले जाऊँगा तो अच्छे से सेवा हो जायेगी। आखिर "मेरा" भी हक बनता है, पर ये सेवा की तुम लोगों ने कि‍ माँ को हार्ट अटैक आ गया"

"पर बुआ जी, दादी तो वहीं से बीमार आयीं थी। हाँ, यहां आकर अटैक आ गया, पर हमने तरफ से अपनी पूरी कोशिश कि दी वो ठीक हो जायें और वो ठीक होकर ही यहां से वापस लौटी हैं। अगर अभी भी कोई परेशानी हो तो हम आकर उन्हें अपने साथ ले आते हैं। उनके इलाज का पूरा ख्याल रखेंगे"

"बड़ी आयी, इलाज कराने वाली, मैं नहीं जानती कि ये सब तेरी कारस्तांनी है, तूने ही उनकी देखभाल नहीं कि इसलिये उनको अटैक आया। माँ ने मुझे सब कुछ बता दिया है।" बुआ जी चिल्ला ही पड़ीं

"ह्म्म, दादी कहाँ हैं ? वो आसपास हों तो आराम से बोलना, डॉक्टर ने कहा है कि अभी तेज आवाज या झगड़ा उनको नुकसान कर सकता है"

"बस बस, इतना दिखाने की जरूरत नहीं है, माँ साथ मे ही हैं, उनसे पूछकर ही फोन किया है तुझको। माँ रो-रोकर बता रही हैं कि कैसे तूने इनका जीना हराम किया हुआ था और भैया से तू इनकी सही बात भी नहीं होने देती थी, सब तेरे कारण हुआ है। आज तो भैया को मैं सब सच्ची सच्ची बात बताकर रहूँगी कि आखिर माँ की ऐसी हालत कैसे हुई"

"हाँ, बेटी, अभी फोन लगा मोनू को, वहां तो मैं कुछ बता नहीं सकी क्योंकि जाते ही इन दोनों ने मिलकर मुझे मारने की तैयारी कर ली थी। दोनों माँ-बेटी को अच्छा सबक सिखाना है, फोन रख और मोनू को लगा" 

बुआ जी को तो रागिनी जानती थी, इसलिये अब तक जो कुछ हो रहा था, उससे अच्छे की आशा करना व्यर्थ था। वैसे दादी से भी इसी की आशा थी। पर इस बार कहीं उसे ऐसा लगा था कि शायद इतनी सेवा के बाद दादी कुछ पिघली हों। पर यहाँ जो हुआ वो तो असहनीय हो गया। अब ये इल्जाम भी लगा कि हार्ट अटैक रागिनी के कारण आया, माँ बेटी ने मिलकर मारने की तैयारी की थी... रागिनी कुछ देर तक सुन्न खड़ी रही। 

कमरे में अब घुटन सी महसूस होने लगी, उसे बीता एक एक पल याद आने लगा कि कैसे सारा परिवार दादी की तीमारदारी में लगा हुआ था। दादी की बीमारी ने पूरे घर को जकड़ लिया था, किसी को याद नहीं रहा कि उनकी अपनी भी एक जिन्दगी है। बदले में कुछ मिलेगा इसकी आशा नहीं थी... पर बदले में ये मिलेगा... इतना भी नहीं सोचा था| कमरे से निकलकर वो बालकनी मे आ गयी। शायद बाहर की हवा घुटन को थोड़ा कम कर दे। पर हवा में भी घुटन महसूस हो रही है.. ताजगी का अहसास नहीं हुआ।

दूसरे कमरे से आवाज आ रही थी। मन को यकीन करते देर ना लगा कि पापा जी और बुआ जी की बात हो रही है। वो अंदर से सिहर गयी, फिर यकीन हुआ कि पापा जी तो यहीं पर थे, उन्होंने देखा था कि क्या हुआ है। इसलिये भले वो बुआ जी को कुछ ना बोलें पर कम से कम रागिनी को सांत्वना देने जरूर आयेंगे कि जाने दो किसी के कहने से थोड़ी ना कुछ होता है। अब वो इंतजार करने लगी कि पापा जी आयेंगे.... 

वैसे तो लोग कहते हैं इंतजार के पल लम्बे होते हैं, पर रागिनी के लिये इंतजार का पल छोटा ही रहा, पापा जी ने काफी तेजी से दरवाजा खोला, साथ में मम्मी भी थीं। रागिनी तक उनको पहुँचने मे बिल्कुल देर नहीं लगी| रागिनी अभी उठी ही थी कि उनको देखकर कि‍ पापा जी ने उसको एक तमाचा जड़ दिया... वो कुछ बोलती उसके पहले ही एक तमाचा ममा का भी मिल गया|....| दो जबरदस्त तमाचे पाकर अब कुछ बोलने की स्थिति‍ भी नहीं रही थी... और फायदा भी नहीं था सफाई देने का।

रागिनी वहीं रह गयी| उठकर ना कमरे में जा सकी , ना कुर्सी पर बैठ सकी| आखिर क्यों हुआ ऐसा... कि मम्मी पापा दोनों ने ही ... आखिर क्यों...? आखिर क्यों...?

सुबह हुई तो ममा पापा जी की तीखी डांट ने ही तन्द्रा भंग की ... उठेगी भी या अब तक तेरा "वो" तुझे बालकनी के बाहर दिख रहा है... इसी चाल चलन के कारण माँ को जो आघात मिला था कि वो बीमार पड़ीं थी... अब क्या क्या करेगी ? किस किस को.... 

आगे रागिनी कुछ सुन ही ना सकी| ममा पापा जी बोलते रह गये... पर रागिनी के कानों तक कोई शब्द नहीं टकराये|....|


*****


"हा हा, माँ रागिनी का क्या हुआ होगा?"

"तू खुद ही अंदाज लगा ले"

"जो भी हुआ हो, अब रागिनी पर भैया कभी भरोसा करने से रहे यानी की अब सारी दौलत पर हमारा ही हक होगा"

"ठीक कहती है बहना, बहुत सही समय पर माँ भी बीमार पड़ी थी, और बहुत अच्छे ढ़ंग से वक्त का फायदा उठाया हमने"


ठहाकों से कमरा गूंज उठा ....


*****

18 comments:

  1. गरिमा जी,
    आपको साहित्य शिल्पी पर देख अच्छा लगा.. बहुत ही शिक्षाप्रद कहानी.... बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. गरिमा जी
    नमस्कार
    आपकी कहानी "आघात"
    पढ़कर ऐसा लगा जैसे ये
    घतना अभी यहीं कहीँ
    पड़ोस में घती हो.
    मानसिक आघात और
    पारिवारिक कलह
    का अच्छा दृश्य
    प्रस्तुत किया गया है

    गरिमा जी आपको
    बहुत बहुत बधाई.

    -विजय तिवारी " किसलय "
    जबलपुर
    hindisahityasangam.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. पंकज सक्सेना14 अक्तूबर 2008 को 3:09 pm

    पारिवारिक कलह की पृष्ठभूमि में अच्छी कहानी है। अंत बेहतर हो सकता था।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी कहानी है। गरिमा जी नें आज के समय का आम संदर्न्ह उठाया है। बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. गरिमा जी,
    नमस्कार...
    साहित्य शिल्पी पर आपका स्वागत है...

    आपने अपनी रचना में समाज का सही रूप दिखाया है.. हर चेहरे पर एक मुखोटा है.. किस का ऐतवार किजे...

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. परिवार का एक रूप यह भी है.बहुत सुंदर ढंग से आपने चित्रित किया,भले मन बड़ा तिक्त हो गया पढ़कर.पर यही तो कथा की सार्थकता है.बधाई..

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  8. फिल्‍मी पटकथा के
    एक लघु दृश्‍य का
    आभास देता हुआ
    जीवंत चित्रण।

    कहानी के अंत में
    पूरे दृश्‍य ने
    होश फाख्‍ता कर दिये।

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  9. बहुत अच्छी शिक्षाप्रद कहानी


    गरिमा जी,

    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  10. एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैँ लोग....
    झटका देती कहानी के लिए गरिमा जी को बहुत-बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  11. सर्वप्रथम तो डॉ. गरिमा तिवारी जी का साहित्य शिल्पी पर हार्दिक अभिनंदन। कहानी इतनी सरलता से कही गयी है कि पाठक के पास इसे समझने के लिये कई दृष्टिकोण मिल जाते हैं। वह इससे खुद को जोडता है और मनोभावों में डूबता उतरता है। निस्संदेह प्रशंसनीय...

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  12. एक अच्छी कहानी की बधाई स्वीकारें।

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  13. प्रस्तुति लघु-प्रभाव अंतहीन
    कथा रुचिकर-यथार्थ असह्य
    चरित्र काल्पनिक -सद अफ़सोस,इर्दगिर्द के हैं-मेरे अपने समाज के।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं

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