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मुंशी प्रेमचंद का नाम हिन्दी साहित्य से बरायनाम संपर्क रखने वाले किसी व्यक्ति के लिये भी अपरिचित नहीं हो सकता. अपनी कहानियों व उपन्यासों में तत्कालीन भारतीय जीवन का बेलाग चित्रण करने वाले इस अप्रतिम कथाकार की लेखनी ने कई पीढ़ियों को संवेदित किया है. हिन्दी के अब तक के सर्वश्रेष्ठ कथाकार माने जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई, १८८० को वाराणसी के समीप स्थित एक छोटे से गाँव ’लमही’ में हुआ था. इनके पिता मुंशी अज़ायब लाल डाकखाने में कार्यरत थे और माता आनन्दी एक साधारण घरेलू महिला थीं. इनके बचपन का नाम धनपतराय था.

प्रेमचंद जी का आरंभिक जीवन सुखद नहीं रहा. जब ये सिर्फ ७ वर्ष के थे तो इनकी माँ का देहान्त हो गया. पिता ने दूसरी शादी कर ली. विमाता के कटु व्यवहार ने इन्हें मौन और एकांतप्रेमी बना दिया. अभी वे महज़ १६-१७ साल के ही हुये थे कि पिता भी चल बसे और पूरे परिवार का दायित्व किशोर धनपतराय पर आ पड़ा.
इससे पूर्व गोरखपुर के मिशन स्कूल से आठवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर लमही लौटते ही उनका विवाह पड़ोस के गाँव की एक लड़की से कर दिया गया था. उस समय उनकी आयु बमुश्किल १५ वर्ष रही होगी. परंतु यह शादी सफल नहीं हो सकी और जब १८९९ में अपने परिवार के पालन पोषण के लिये प्रेमचंद ने गाँव छोड़ा तो यह लड़की अपने माता-पिता के पास चली गई.
१८९९ में एक मिशन स्कूल में अध्यापक की नौकरी से शुरुआत करने वाले प्रेमचंद, शीघ्र ही अपने स्वाध्याय और लगन के बल पर कानपुर में स्कूल डिप्टी सब-इंस्पेक्टर बना कर भेज दिये गये. यहीं पर पहली बार उर्दू साप्ताहिक ’आवाज़-ए-खल्क़’ में उनका पहला उपन्यास ’नवाबराय’ के नाम से सिलसिलेवार छपा.

१९१० तक आते-आते नवाबराय उर्दू के अच्छे रचनाकारों में गिने जाने लगे थे. इसी समय उनका पहला कहानी-संग्रह ’सोज़-ए-वतन’ अंग्रेज़ी सरकार ने गैरकानूनी घोषित कर ज़ब्त कर लिया. इस घटना के बाद से ही उन्होंने ’प्रेमचन्द’ के उपनाम से लिखना शुरू किया जो बाद में उनकी वास्तविक पहचान बन गया.

इस दौरान १९०६ में उन्होंने एक बाल-विधवा ’शिवरानी देवी’ से दूसरा विवाह कर लिया था जो कि उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी बात थी. उनके तीन बच्चे हुये जिनमें से अमृत राय आगे चलकर प्रख्यात साहित्यकार बने. १९२१ में गाँधी जी के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और आजीवन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़कर साहित्य-सेवा करते रहे. १९३६ में लखनऊ में हुई प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक के वे अध्यक्ष थे.

अंतिम समय तक प्रेमचंद ने अभावों का जीवन जिया. अपने आखिरी दिनों में वे बहुत बीमार थे परंतु अपने इलाज़ के पैसे भी परिवार से छिपा कर ’सरस्वती’ नामक अपनी प्रैस को चलाने पर खर्च करते रहे. इसी कारण महज़ ५५ वर्ष की अवस्था में ८ अक्टूबर, १९३६ को गोदान, कर्मभूमि, कफ़न, पूस की रात, ईदगाह जैसी सशक्त और संवेदनशील रचनाओं का यह महान लेखक चल बसा.

मुंशी जी के साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता साधारण भाषा में बड़ी से बड़ी बात को भी सहजता से कह देना है. कहानी कहने का उनका एक अलग अंदाज़ है जो उन्हें सीधे पाठक के ह्रदय से जोड़ता है. प्रेमचंद हिन्दी की कहानी विधा को कल्पना–लोक से वास्तविकता के धरातल पर लाने वाले पहले सशक्त कथाकार हैं. समाज के कमज़ोर व उपेक्षित वर्ग के साथ उनकी सदैव सहानुभूति रही परंतु यह कोरी आदर्शवादी सहानुभूति नहीं है. उनकी कहानियों के पात्र हमारे आस-पास के जीवन से ही लिये गये जीवित चरित्र हैं जिनकी अपनी विशेषतायें हैं तो कमज़ोरियाँ भी हैं. मानव-चरित्र के लगभग हर पहलू को प्रेमचंद की पैनी नज़रों ने पकड़ा है और उसे अपने ह्रदय की पूरी सहानुभूति देकर वे पाठकों के सम्मुख लाते हैं.

प्रेम चंद के प्रसिद्ध उपन्यास हैं – सेवा सदन, प्रेमाश्रम, रंग भूमि, निर्मला, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि। इनके प्रसिद्ध नाटक हैं - कर्बला, संग्राम और प्रेम की बेदी। इनकी कहानियाँ मानसरोवर नाम के आठ भागों में संकलित हैं। इन्होंने माधुरी, हंस, जागरण जैसी पत्रिकाओं का भी संपादन किया है। प्रेमचंद के साहित्य का मुख्य स्वर है – राष्ट्रीय जागरण एवं समाज सुधार। आपने साहित्य में प्रेमचंद नें किसानिं की दशा, नारियों की वेदना, और वर्ण व्यवस्था की कुरीतियों का मार्मिक चित्रण किया है। उनकी भाषा सजीव, मुहावरेदार और बोलचाल के निकट है।

कुछ लोग प्रेमचंद जी की कहानियों में प्रयुक्त कुछ जातिसूचक शब्दों और वाक्यों के आधार पर उन्हें दलित-विरोधी कह कर लाँछित करने का प्रयास करते रहे हैं, परंतु यदि इन स्थलों को हम एक बार भी खुले दिमाग से पढ़ें तो यह सब बातें कपोल कल्पना से अधिक कुछ भी सिद्ध नहीं होती. प्रेमचंद पर कई बार आदर्शवादी होने के ठप्पा भी लगता रहा है पर तत्कालीन समय और परिस्थितियों को देखते हुये प्रेमचंद का यह आदर्शवाद उनकी कमी नहीं वरन उनकी साहित्यिक व सामाजिक समझ का ही प्रतीक लगता है.

आज प्रेमचंद जी की पुण्यतिथि के अवसर पर समस्त साहित्यशिल्पी समूह की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित है.

14 comments:

  1. "कुछ तो है बात जो तहरीरों में तासीर नहीं,
    झूठे फ़नकार नहीं हैं, तो कलम झूठे हैं।"

    कलम का वो सिपाही ना झूठा फ़नकार था, ना उसकी कलम झूठी थी, शायद इसीलिए सौ साल बाद भी उसकी तहरीरों की तासीर सीधे नस में उतर जाती है।

    कलम के उस सिपाही को याद करने और करवाने के लिए आपको असंख्य धन्यवाद।

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  2. प्रेमचंद को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर साहित्य शिल्पी मंच नें साहित्य के प्रति अपनी कार्य किये जाने की गंभीरता का परिचय दिया है। प्रेमचंद के बिना हिन्दी क्या? लेकिन इस भुलक्कड देश में अजय जी और साहित्य शिल्पी से उम्मीद जगी है। हमें भाषा या साहित्य को जिन्दा रखना है तो अपने साहित्यकारों के सम्मान व यादों को जीवित रखना होगा।

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  3. नंदन जी के साथ समहति जताते हुए प्रेमचंद पर इस रचना के प्रस्तुतिकरण का आभार।

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  4. प्रेमचंद के बिना हिन्दी साहित्य के विकास की कल्पना भी असंभव है। जन जन तक हिन्दी को जन की भाषा में पहुँचाने का जैसा काम मुंशी जी ने किया वैसे ही प्रयास की आज आवश्यकता है।

    मुंशी जी के सामने आज हम नत मस्तक हैं।

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  5. सीधी, सरल, सहज, रोजमर्रा की बोलचाल की भाषा में रचे, कहे गए साहित्य की अगर बात करें तो मुंशी प्रेमचँद का कोई सानी नही. उनकी रचनाएँ कालातीत हैं.

    साहित्य शिल्पी की ये विशेष प्रस्तुति बधाई की पात्र है.

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  6. प्रेमचंद पराधीन भारत में सन 1936 में ही दिवंगत हो गये। मैंने उनके सभी प्रमुख उपन्यास और कहानियाँ पढी़ हैं। सामंतवाद और समाज के जर्जर सोच के मुखर विरोध के रुप में उनकी समस्त रचना को लक्षित किया जा सकता है। आज भी भारत से बाहर लगभग 350 विश्वविद्यालयों में प्रेमचंद को पढ़ा जाता है और शोध किया जाता है। वे न मात्र हमारी जाति,परंपरा और साहित्य के गौरव है बल्कि आधुनिक भारतीय हिंदी साहित्य के गद्य-काल पर उनकी रचनाशीलता का आतंक पचास से अस्सी के दशकों तक तीव्रतर अनुभव किया गया है और आज भी उनके कहानी-उपन्यासों के यथार्थवादी मूल्य जीवंत और ग्राह्य बने हुए हैं । उनकी पुण्य तिथि पर उन्हें याद कर ’साहित्य शिल्पी’ ने उनका मान बढ़ाया है। मेरी ओर से राजीव रंजन प्रसाद जी और अजय यादव जी को आभार।-सुशील कुमार(sk.dumka@gmail.com)

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  7. प्रेम चंद को उनकी पुण्यतिथि पर याद करना सुखद रहा। एक अच्छे आलेख के लिये बधाई।

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  8. प्रेमचंद ग्राम जीवन के चतुर चितेरे थे | उनकी रेंज बूढी काकी से नमक का दारोगा तक थी जो की उन्हें एक विशिष्ट और कल्पनाशील कहानीकार बनाता है |
    उन्हें यद् करने के लिए धन्यवाद | आलेख की भाषा प्रेमचंद जी की ही तरह सहज और सरल रही | :-)

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  9. अजय जी,

    सच तो यही है कि प्रेम चंद पर कुछ भी और कितना भी लिखा जाना सूरज को दीपक दिखाने जितना ही है, फिर भी आपने बखूबी गागर में सागर भरा है। बधाई..


    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  10. अजय जी
    प्रेमचंद जी के विषय मैं इतना सब पढ़कर अच्छा लगा. प्रेम चंद जी हिन्दी साहित्य के श्रृंगार हैं.अपने साहित्य के मध्यम से वे हमेशा हमारे बीच रहेंगे. उस महान आत्मा को मेरा नमन. अजय की को बधाई.

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  11. or kya kahu apne muje bhi lekhan ki or kafi aakarshit kar diya hai
    aap prernadayak hai

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  12. प्रेमचंद जी मेरे प्रिय लेखक हैं. उनका लिखा बार बार पढ़ने के बाद भी नया सा लगता है और फ़िर पढ़ने का मन करता है शायद उनके लेखन की मौलिकता का ही यह प्रभाव है. प्रेमचंद जी पर जानकारी प्रद लेख लिखने के लिए आपका आभार.

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  13. "अजय जी,

    सच तो यही है कि प्रेम चंद पर कुछ भी और कितना भी लिखा जाना सूरज को दीपक दिखाने जितना ही है, फिर भी आपने बखूबी गागर में सागर भरा है। बधाई..
    कुछ तो है बात जो तहरीरों में तासीर नहीं,
    झूठे फ़नकार नहीं हैं, तो कलम झूठे हैं।"

    कलम का वो सिपाही ना झूठा फ़नकार था, ना उसकी कलम झूठी थी, शायद इसीलिए सौ साल बाद भी उसकी तहरीरों की तासीर सीधे नस में उतर जाती है।

    कलम के उस सिपाही को याद करने और करवाने के लिए आपको असंख्य धन्यवाद।प्रेमचंद को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर साहित्य शिल्पी मंच नें साहित्य के प्रति अपनी कार्य किये जाने की गंभीरता का परिचय दिया है। प्रेमचंद के बिना हिन्दी क्या? लेकिन इस भुलक्कड देश में अजय जी और साहित्य शिल्पी से उम्मीद जगी है। हमें भाषा या साहित्य को जिन्दा रखना है तो अपने साहित्यकारों के सम्मान व यादों को जीवित रखना होगा।

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