........साहित्य शिल्पी एक पूर्ण वेबसाईट में परिवर्तित हो चूका है। अब हमारी रचनाये यहाँ पढ़े... - www.sahityashilpi.in तथा कृपया हमें अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझावों से अवश्य अवगत करायें जिससे हम आवश्यक सुधार कर सकें.....

गुरुवार, ९ अक्तूबर २००८

पतंग की डोर [कविता] – सुनीता चोटिया ‘शानू’

Photobucket

एक डोर से बँधी मैं,
पतंग बन गई
दूर-बहुत-दूर...
आकाश की ऊँचाइयों को नापने,
सपनों की दुनिया में,
उड़ती रही...
इस ओर कभी उस ओर
कभी डगमगाई कभी सम्भली
फ़िर उड़ी
एक नई आशा के साथ,
इस बार पार कर ही लूँगी
वृहत् आकाश
पा ही लूँगी मेरा सपना
मगर तभी,
झटका सा लगा...
एक अन्जानी आशंका,
मुड़कर देखा
वो डोर जिससे बंधी थी
वो डोर जो मजबूत थी
बिलकुल मेरे
उसूलों
मेरे दायरों की तरह
फ़िर सोचा
तोड़ दूँ इस डोर को
आख़िर कब तक
बंधी रहूँगी
इन बेड़ियों में
जो उड़ने से रोकती हैं

कि सहसा
एक आह सुनी
डोर तोड़ कर गिरी
एक कटी पतंग की
जो अपना संतुलन खो बैठी
लूट रहे थे हज़ारों हाथ
कभी इधर, कभी उधर
अचानक
नोच लिया उसको
सभी क्रूर हाथों ने

तभी सुनी एक कराह
काश! डोर से बंधी होती
किसी सम्मानित हाथों में
पूरा न सही
होता मेरा भी अपना आकाश
और मैं लौट गई
चरखी में लिपट गई
डोर के साथ

21 comments:

डा. फीरोज़ अहमद २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत खूब .बधाई

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत हीं गूढ बात कही गई है। कुछ हीं लोग इस सच्चाई को जान पाते हैं।
कविता बेहद अच्छी लगी। बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

.....

एक नई आशा के साथ,
इस बार पार कर ही लूँगी
वृहत् आकाश
पा ही लूँगी मेरा सपना
........

शुभकामना

श्रीकांत पाराशर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

Jindgi ke halaton ko aapne dor aur patang ke madhyam se bahut sundar dhang se vyakt kiya hai.Kahin par bhi kavita apne marg se nahin bhatki, sandesh bhi diya aur sabdon ka sanyojan bhi utkrist.

नीरज गोस्वामी २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत सधे हुए शब्दों में अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं आपने अपनी रचना में...बहुत अरसे बाद आप को पढने का मौका मिला...आप बहुत अच्छा लिखती हैं...निसंदेह...
नीरज

शोभा २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

इस ओर कभी उस ओर
कभी डगमगाई कभी सम्भली
फ़िर उड़ी
एक नई आशा के साथ,
इस बार पार कर ही लूँगी
वृहत् आकाश
पा ही लूँगी मेरा सपना
मगर तभी,
झटका सा लगा...
एक अन्जानी आशंका,
मुड़कर देखा
वो डोर जिससे बंधी थी
वो डोर जो मजबूत थी
सुनीता जी,
आपकी कविता ने नारी मून की अनेक शंकाओं और सपनो को अभिव्यक्ति दी है. बधाई.

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

सुंदर कल्पनात्मक भाव की रचना..आशाओं और दिल की कामनाओं का संगम है. बधाई

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

एक सच अभिव्यक्त हुआ है आपके शब्दों में। बहुत बहुत बधाई।

mukhtalif २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

shanu g.
nari man ki bhawnao ki behatrin abhivyakti ki hai aapne. bahut bahut badhai.
. MUKHTALIF.

रावण दिन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

दशहरे पर
कविता
पन्‍द्रह अगस्‍त की।

रावण लपेट
लिया मैंने
वाह क्‍या लिपटन है।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत अच्छी रचना। बधाई।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

Very nive poem, a new thought has been presented. This is why "jaha na pahuche ravi vaha pahuche kavi"

-Alok Kataria

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

अभी तक जितनी भी आपकी कवितायें पढीं हैं उनमें सबसे अलग और बेहतरीन। पतंग के साथ स्त्री संदर्भों को जोड कर कविता को बेहद स्तरीय बना दिया है आपनें।

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

सुनीता जी,

आपकी यह कविता मन को छू लेने वाली है। नारी की अभिव्यक्ति नारी की कलम जितनी सशक्त्तता से कर सकती है वह उदाहरण आपकी यह रचना है। कविता के अंत में एक प्रश्न भी छुपा हुआ है जिसका समाज कभी उत्तर नहीं देगा...बहुत अच्छी रचना।

***राजीव रंजन प्रसाद

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

काश! डोर से बंधी होती
किसी सम्मानित हाथों में
पूरा न सही
होता मेरा भी अपना आकाश
और मैं लौट गई
चरखी में लिपट गई
डोर के साथ

वेदनापूर्ण अभिव्यक्ति। सुन्दर अति सुन्दर।

yogesh samdarshi २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

फ़िर सोचा
तोड़ दूँ इस डोर को
आख़िर कब तक
बंधी रहूँगी
इन बेड़ियों में
जो उड़ने से रोकती हैं
कि सहसा
एक आह सुनी
डोर तोड़ कर गिरी
एक कटी पतंग की
जो अपना संतुलन खो बैठी
लूट रहे थे हज़ारों हाथ
कभी इधर, कभी उधर
अचानक
नोच लिया उसको
सभी क्रूर हाथों ने
तभी सुनी एक कराह
काश! डोर से बंधी होती
किसी सम्मानित हाथों में
पूरा न सही
बहुत खूब अभिव्यक्ति है... सांकेतिक भाषा में आपने भटकन की तरफ इशारा किया बहुत अच्छे शब्दों मे आपने राह दिक्खाने का प्रयास किया आप अपनी कविता मे अपनी बात बहुत सधे हुए शब्दों में प्रेषित करा पाई आपको बधाई

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत ही अच्छी कविता सुनिता जी... बधाई

swati prakash garg २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

सुनीता जी,
अपने सपनों और आकांक्षाओं को पूरा करने की इच्छा के साथ साथ अपनी जड़ों से जुड़ा रहना भी बहुत जरूरी है, ऐसा संदेश देती हुई आपकी कविता बहुत अच्छी लगी.

बधाई स्वीकारें.

विपुल २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

सोचने को विवश करती रचना! सुनीता जी..बहुत अच्छा लगा पढ़कर ,,,

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

द्वंद्व और दुविधा, विस्तार और सीमा,उड़ान और बंधन और कल्पना और यथार्थ ।
बहुत सुंदर रचना।

प्रवीण पंडित

HEY PRABHU YEH TERA PATH २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

सुनीताजी चोटिया ‘शानू’

नमस्कार।

आपके द्वारा रचित, कविता के कुछ शब्द मेरे मन को छु गये जैसे:<<<
"एक डोर से बँधी मैं, पतंग बन गई, दूर-बहुत-दूर...

आकाश की ऊँचाइयों को नापने, सपनों की दुनिया में, उड़ती रही...'

आप ने अपने आप को एक पात्र मे बान्ध कर, नारी कि सघर्ष व्यथा का जिस मार्मिक ढग से प्रतुत किया, उससे लगता है, आप लिखते

समय विषय के मुल चरित्र मे खो जाति हो, इस बात से मै प्रभावित हु। क्यो कि आज कल के युवा गुणि लेखाकार, कविताकार ब्लोगाकार, लिखते लिखते मुल भाषा विषय के दर्द से भटक कर अपनी व्यक्तिगत स्वभाव कि झलक दिखा जाते है।

"पा ही लूँगी मेरा सपना,मगर तभी,मगर तभी,बिलकुल मेरे उसूलों
तोड़ दूँ इस डोर को,आख़िर कब तक,बंधी रहूँगी,
इन बेड़ियों में,
जो उड़ने मैं लौट गई,चरखी में लिपट गई॥॥"

आपने जिस तरह नारी कि मर्यादा कि डोर को कमजोरी न समझने कि हिदायत अपनी कविता के माध्यम से जग को दी, आपको सलाम॥ आपको हार्दिक बधाई और मगल भावना॥ एवम हमेशा इसी तरह सरल भाषा का उपयोग अपनी नई कविताओ मे भी करे। साहित्यक भाषा आम पब्लिक को हिन्दी से दुर भगाती है।

आपका अपना

महावीर बी सेमलानी "भारती"

मुबई

16 oct 2008
mahaveer_b@yahoo.com

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
संस्मरण:-
वीडियो:-
बाल साहित्य:-
पुस्तक चर्चा:-
अनुवाद:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP