कुछ मुक्तक [कविता] - आलोक शंकर

हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"
*****
चाहतों को कोई आशियां न मिला
मदीने में भी गये, खुदा न मिला
ढूँढ़ते हम रह गये सारे जहान में
एक भी सुकून का दुकाँ न मिला
*****
थी बड़ी ही देर चुप्पी, अब ज़रा आवाज़ हो
अँधेरों के इस शहर में सुबह का आगाज़ हो
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।
*****
राम नही बसते धरती के मंदिर और शिवालो में
या चन्दन टीका करके बस भोग लगाने वालो में
वे मर्यादा की प्रधानता का प्रतीक हैं , संबल है
उन हृदयों में राम बसें ,जो प्रेम भाव से विह्वल हैं










15 comments:
सभी बहुत बढिया मुक्तक है।बधाई।
i liked all of them but the 3rd one is the best.
Alok Kataria
हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।
अच्छे मुक्तक हैं। दूसरा अपेक्षाकृत कमजोर है।
राम नही बसते धरती के मंदिर और शिवालो में
या चन्दन टीका करके बस भोग लगाने वालो में
वे मर्यादा की प्रधानता का प्रतीक हैं , संबल है
उन हृदयों में राम बसें ,जो प्रेम भाव से विह्वल
सभी एक से बढ कर एक।
आलोक जी के आलोक से परिचित कराते हुए मुक्तक हैं, सभी श्रेष्ठ।
आलोक जी
हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"
यह आत्मविश्वास से भरपूर युवा को उसकी उर्जा से तादात्म्य स्थापित कराने वाला उत्प्रेरक है
बहुत बढ़िया..... बधाई
अच्छे मुक्तक हैं आलोक जी। बधाई।
हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"
थी बड़ी ही देर चुप्पी, अब ज़रा आवाज़ हो
अँधेरों के इस शहर में सुबह का आगाज़ हो
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।
प्रभावी मुक्तक हैं।
अच्छे मुक्तक हैं।
भाव अति-उत्तम!!!
बस एक जगह लिंग-दोष है-
सुकून का दुकाँ न मिला
दुकाँ स्त्रीलिंग है.......ध्यान देंगे।
सशक्त भाव पक्ष लिये मुक्तक.. बधाई
कवि के बावलेपन की अनुभूति हुई।
संभवतः चरम पर पहुंचने के लिये बावला हो जाना ही पड़ेगा।
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।
वाह वाह -क्या कहने।
प्रवीण पंडित
आलोक शंकर अद्वतिय प्रतिभा के कवि हैं, ये सारे मुक्तक इस सत्य के गवाह हैं।
***राजीव रंजन प्रसाद
मुक्तक नहीं
सूक्तियां कहिये
जीवन की
युक्तियां कहिये
पानी की
तरह बहिये
दिमाग से
लगाये रहिये।
आलोक जी भाव पक्ष तो सशक्त है पर काला पक्ष पर निस्संदेह और काम हो सकता था...
हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"
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चाहतों को कोई आशियां न मिला
मदीने में भी गये, खुदा न मिला
ढूँढ़ते हम रह गये सारे जहान में
एक भी सुकून का दुकाँ न मिला
*****
थी बड़ी ही देर चुप्पी, अब ज़रा आवाज़ हो
अँधेरों के इस शहर में सुबह का आगाज़ हो
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।
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राम नही बसते धरती के मंदिर और शिवालो में
या चन्दन टीका करके बस भोग लगाने वालो में
वे मर्यादा की प्रधानता का प्रतीक हैं , संबल है
उन हृदयों में राम बसें ,जो प्रेम भाव से विह्वल हैं
kya jinda lekhani hain
sir apki manna padega
dil se salam
sahiya ki garima barkarar rakhti hain apki rachna sach
ahbdo ki karistani lajawab
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