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रविवार, १२ अक्तूबर २००८

कुछ मुक्तक [कविता] - आलोक शंकर

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हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"

*****

चाहतों को कोई आशियां न मिला
मदीने में भी गये, खुदा न मिला
ढूँढ़ते हम रह गये सारे जहान में
एक भी सुकून का दुकाँ न मिला

*****

थी बड़ी ही देर चुप्पी, अब ज़रा आवाज़ हो
अँधेरों के इस शहर में सुबह का आगाज़ हो
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।

*****

राम नही बसते धरती के मंदिर और शिवालो में
या चन्दन टीका करके बस भोग लगाने वालो में
वे मर्यादा की प्रधानता का प्रतीक हैं , संबल है
उन हृदयों में राम बसें ,जो प्रेम भाव से विह्वल हैं

15 comments:

परमजीत बाली २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

सभी बहुत बढिया मुक्तक है।बधाई।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

i liked all of them but the 3rd one is the best.

Alok Kataria

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है

कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।

अच्छे मुक्तक हैं। दूसरा अपेक्षाकृत कमजोर है।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

राम नही बसते धरती के मंदिर और शिवालो में
या चन्दन टीका करके बस भोग लगाने वालो में
वे मर्यादा की प्रधानता का प्रतीक हैं , संबल है
उन हृदयों में राम बसें ,जो प्रेम भाव से विह्वल

सभी एक से बढ कर एक।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

आलोक जी के आलोक से परिचित कराते हुए मुक्तक हैं, सभी श्रेष्ठ।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

आलोक जी

हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"

यह आत्मविश्वास से भरपूर युवा को उसकी उर्जा से तादात्म्य स्थापित कराने वाला उत्प्रेरक है

बहुत बढ़िया..... बधाई

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

अच्छे मुक्तक हैं आलोक जी। बधाई।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"


थी बड़ी ही देर चुप्पी, अब ज़रा आवाज़ हो
अँधेरों के इस शहर में सुबह का आगाज़ हो
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।

प्रभावी मुक्तक हैं।

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

अच्छे मुक्तक हैं।
भाव अति-उत्तम!!!

बस एक जगह लिंग-दोष है-
सुकून का दुकाँ न मिला

दुकाँ स्त्रीलिंग है.......ध्यान देंगे।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

सशक्त भाव पक्ष लिये मुक्तक.. बधाई

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

कवि के बावलेपन की अनुभूति हुई।
संभवतः चरम पर पहुंचने के लिये बावला हो जाना ही पड़ेगा।
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।
वाह वाह -क्या कहने।

प्रवीण पंडित

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

आलोक शंकर अद्वतिय प्रतिभा के कवि हैं, ये सारे मुक्तक इस सत्य के गवाह हैं।

***राजीव रंजन प्रसाद

अविनाश वाचस्पति २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

मुक्‍तक नहीं
सूक्तियां कहिये
जीवन की
युक्तियां कहिये
पानी की
तरह बहिये
दिमाग से
लगाये रहिये।

विपुल २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

आलोक जी भाव पक्ष तो सशक्त है पर काला पक्ष पर निस्संदेह और काम हो सकता था...

aman 'bas aman' २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

हैं चकित सारे सितारे, हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"

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चाहतों को कोई आशियां न मिला
मदीने में भी गये, खुदा न मिला
ढूँढ़ते हम रह गये सारे जहान में
एक भी सुकून का दुकाँ न मिला

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कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
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kya jinda lekhani hain
sir apki manna padega
dil se salam
sahiya ki garima barkarar rakhti hain apki rachna sach
ahbdo ki karistani lajawab

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