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उन सब ने खंडित कर डाला जिन पर था विश्वास मियां
क्या अपनों कोधर के चाटे क्या अपनों की आस मियां

इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना
बड़ी घिनौनी लगती है रे आदम की बू-बास मियां

रोज-रोज का खून-खराबा रोज-रोज की दहशत से
दिन पर दिन घटता जाता है जीवन का उल्लास मियां

कैकेयी की माया से बच जाता दशरथ अगर कहीं
मुमकिन था के टल ही जाता राम को तब बनवास मियां

किसी काम में कोई अड़चन भूले से भी नहीं हुई
अब से अफसर को डाली है हरे नोट की घास मियां

लाज़िम नहीं है तेरे-मेरे कहने से ही काम बने
अंधों की दुनिया में कान ही होते हैं खास मियां

कहने हैं तो कहो मौदगिल नये-नये अशआर सदा
वरना छोड़ो क्यों करते हो शब्दों से सहवास मियां

19 comments:

  1. इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना
    बड़ी घिनौनी लगती है रे आदम की बू-बास मियां
    एक बार फ़िर .....लाजवाब .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. मौदगिल साहब की एक और बेबाक प्रस्तुति | सीधे शब्दों में दो टूक बात कही |
    " किसी काम में कोई अड़चन भूले से भी नहीं हुई
    अब से अफसर को डाली है हरे नोट की घास मियां"
    ये शेर जोरदार रहा | मकता भी एक विशेष चोट करता है और पाठक को एक मुस्कान के साथ सोचता हुआ छोड़ जाता है |

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  3. बेहद माक़ूल बात कही. मैने भी ऐसा ही कुछ कहने की कोशिश की है अपनी एक आज़ाद नज़्म 'कॉंग्रेस के राज्य में नेहरू का कबूतर' में. कभी उधर तशरीफ़ लाएं तो अपनी राय दें , मेहरबानी होगी.

    उत्तर देंहटाएं
  4. लाज़िम नहीं है तेरे-मेरे कहने से ही काम बने
    अंधों की दुनिया में कान ही होते हैं खास मियां

    कहने हैं तो कहो मौदगिल नये-नये अशआर सदा
    वरना छोड़ो क्यों करते हो शब्दों से सहवास मियां
    लाजवाब .....

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  5. Maudgil jee,aapkee gazal achchhee
    lagee hai.Kayee ashaar lajawaab
    hain lekin ye misra"Andhon kee
    dunia mein kaan hee hote hain khas
    miyan"vazan se gir gayaa hai."Hote
    hain khas mian"mein do maatraaon
    kee kamee hai.Sambhav hai ki do
    maatraaon kaa koee shabd type karne
    se chhoot gayaa ho.

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  6. बढ़िया है योगेन्द्र भाई ... अच्छे शेर ... अच्छा लगा पढ़ कर.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी गज़ल है।

    इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना
    बड़ी घिनौनी लगती है रे आदम की बू-बास मियां

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  8. मोदगिल भाई की शायरी में ये ही तो खूबी है की वो बड़ी सहजता से आज के जलते सवालों पर कारीगरी से शेर कह जाते हैं. उनकी कोई ग़ज़ल आप पढ़ें आज के समाज का आईना है...हम तो भाई उनके इस फन के कायल हैं...बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...लाजवाब...हाँ गुरुवर प्राण जी बात पर गौर फरमाएं कोई न कोई लफ्ज़ छूट गया है मिसरे में...बहुत क़यामत की नजर रखते हैं वो..
    नीरज

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  9. intresting, specially "अपनों कोधर के चाटे क्या अपनों की आस मियां"

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  10. लाज़िम नहीं है तेरे-मेरे कहने से ही काम बने
    अंधों की दुनिया में कान ही होते हैं खास मियां

    कहने हैं तो कहो मौदगिल नये-नये अशआर सदा
    वरना छोड़ो क्यों करते हो शब्दों से सहवास मियां
    bahut sundar likha hai yoginder ji. badhayi sweekaren.

    उत्तर देंहटाएं
  11. आदरणीय मौदगिल जी की ग़ज़लें हर बार एक नये रंग में दीख पडती हैं, हर बार एक नये अंदाज में। आपकी लेखनी पैनी है और भावों के कलात्मक प्रस्तुतिकरण में आपकी पकड जबरदस्त। सारी ग़ज़ल उद्धरित की जा सकती है, ये शेर खास पसंद आये:

    उन सब ने खंडित कर डाला जिन पर था विश्वास मियां
    क्या अपनों कोधर के चाटे क्या अपनों की आस मियां

    रोज-रोज का खून-खराबा रोज-रोज की दहशत से
    दिन पर दिन घटता जाता है जीवन का उल्लास मियां

    कहने हैं तो कहो मौदगिल नये-नये अशआर सदा
    वरना छोड़ो क्यों करते हो शब्दों से सहवास मियां

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  12. बेशक...
    यह शेर इस तरह था...
    'लाज़िम नहीं है तेरे-मेरे कहने से ही काम बने,
    अंधों की इस दुनिया में काने, ही होते हैं खास मियां.
    प्राण साहब
    आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

    लेकिन इसमें राजीव रंजन व मित्रों का कोई दोष नहीं
    इन्होंनें तो केवल 'को धर' के बीच में स्पेस नहीं दिया
    'क्या अपनों को धर के चाटें क्या अपनों की आस मियां..'

    प्राण जी, आप कभी मेरे इस ब्लाग yogindermoudgil.blogspot.com
    par जरूर दर्शन दें
    मुझे प्रसन्नता होगी

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  13. राजीव जी मैंने में sent mail चैक कर लिया था
    आप निश्चिंत रहें
    गलती मेरी ही थी
    मुझे खेद है

    उत्तर देंहटाएं
  14. बेबाक सोच और समाज का सच बडे सही अँदाज़ मेँ लिखने वाले मौदगिल साहब ने क्या खूब लिखा है !!
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  15. सुंदर एवं बेबाक चित्रण

    उत्तर देंहटाएं
  16. क्या बात है मियां, नपे तुले अंदाज़ मे क्या क्या कह दिया ।
    इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना
    बड़ी घिनौनी लगती है रे आदम की बू-बास मियां
    फिर से पढ़ता हूं एक बार गज़ल ।
    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  17. आपकी रचना सहज सहल शब्दों में इतनी गहरी बात कह जाती है की दिल में पैठ कर जाती है..

    उत्तर देंहटाएं
  18. लाज़िम नहीं है तेरे-मेरे कहने से ही काम बने
    अंधों की दुनिया में कान ही होते हैं खास मियां

    बहुत अच्छी ग़ज़ल। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  19. योगेन्द्र जी,
    एक और बहुत ही अच्छी रचना के लिये बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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