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घर की बोझ नहीं होती हैं बेटियाँ
बल्कि ढोती हैं घर का सारा बोझ

वे हैं
तो सलामत हैं
आपके कुर्ते के सारे बटन
बची है उसकी धवलता

उनके होने से ही
चलते हैं आपके हाथ
और आपकी आँखें ढूँढ लेती हैं
अपनी गुम हो गयी कलम

घड़ी हो या छड़ी
चश्मा हो या कि अखबार
या कि किताबें कोट और जूते
सब कुछ होता है यथावत
बेतरतीव बिखरी नहीं होती है चीज़ें
खाली नहीं रहता कभी
सिरहाने तिपाई पर रखा गिलास

वे होती हैं तो
फैला नहीं पाती हैं मकड़ियाँ जालें
तस्वीरों पर जम नहीं पाती धूल
कभी मुरझाते नहीं गमले के फूल

उनके होने पर
समय से पहले ही आने लगती है
त्योहारों के आने की आहट

वे हैं तो समय पर मिल जाती है चाय
समय से दवाईयाँ
और समय पर पहुँच जाते हैं आप दफ़्तर

उनके होने से ही
ताजा बनी रहती है घर की हवा
बचा रहता है मन का हरापन

*****

23 comments:

  1. पंकज सक्सेना20 अक्तूबर 2008 को 1:10 pm

    गुदगुदाती हुई कविता है। पिताजी बहन को ले कर यही सब कुछ कहते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. हृदयस्पर्शी कविता। सच कहा आपने -

    उनके होने से ही
    ताजा बनी रहती है घर की हवा
    बचा रहता है मन का हरापन

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेटियाँ होती हैं तितलियाँ कि उनसे घर बागीचा हो जाता है। कविता नें हरा कर दिया।

    घर की बोझ नहीं होती हैं बेटियाँ
    बल्कि ढोती हैं घर का सारा बोझ

    यह भी सच है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वे होती हैं तो
    फैला नहीं पाती हैं मकड़ियाँ जालें
    तस्वीरों पर जम नहीं पाती धूल
    कभी मुरझाते नहीं गमले के फूल

    उनके होने पर
    समय से पहले ही आने लगती है
    त्योहारों के आने की आहट
    ....
    हृदयस्पर्शी कविता। सच कहा आपने -

    उत्तर देंहटाएं
  5. घड़ी हो या छड़ी
    चश्मा हो या कि अखबार
    या कि किताबें कोट और जूते
    सब कुछ होता है यथावत
    बेतरतीव बिखरी नहीं होती है चीज़ें
    खाली नहीं रहता कभी
    सिरहाने तिपाई पर रखा गिलास
    अशोक की,
    आपका लिखा एक एक शब्द सच है. मैंने बिल्कुल अनुभव किया हुआ है. पढ़कर दिल अभिभूत हो गया. एक सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह ! बहुत ही सुंदर भावपूर्ण मर्मस्पर्शी कविता है.एकदम सत्य कहा आपने.बेटियाँ जीवन को सुंदर बनाती हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  7. एक दम सही कहा
    सब कुछ तो इन्‍हीं से है
    बोझ समझने की गुस्‍ताखी ही क्‍यों करते हो।
    बहुत सुंदर रचना है
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह !

    सुंदर अभिव्यक्ति के लिए

    बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेटियों के बारे में बिल्कुल सही फरमाया है आपने।

    जब से एक बेटी का बाप बना हूँ, सच में जिंदगी में बहुत सारे रंग भर गये हैं।

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  11. परिवेश का दवाब कवि अशोक सिंह को लिखने के लिये मज़बूर करता है।समकालीन यथार्थ पर सार्थक हस्तक्षेप करती उनकी यह कविता ’बेटियाँ’ मानवीय रागात्मकता के आंतरिक हेतुओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील और अनुभूतिपरक है।कवि अपने समय के जीवन-प्रवाह के निकट जाकर उसके सामाजिक अंतर्सबंधों की गहराई में इतना धँसता है कि भावनिबद्ध रुढ़ियाँ कपूर बनकर उड़ जाती हैं और मानवीय रिश्तों में एक तरह की नवीन उर्जा का तत्काल आभास दे जाती है।उपर्युक्त दृष्टि से ’बटियाँ’ कविता काफी सफल हुई है।है।बधाई अशोक जी को और आभार ’साहित्य-शिल्पी’ का कि इतनी भावपूर्ण कविता को आगे लायी।-सुशील कुमार,दुमका से।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बिल्कुल सच कहा आपने, अशोक जी! आभार सुंदर रचना का!

    उत्तर देंहटाएं
  13. बिल्कुल सत्य है, बेटियों से ही घर में रौनक रहती है. बहुत अच्छी

    उत्तर देंहटाएं
  14. सहमत हूँ आपकी कविता में अभिव्यक्त संवेदनाओं से। बहुत अच्छी रचना के लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  15. उनके होने से ही
    ताजा बनी रहती है घर की हवा
    बचा रहता है मन का हरापन

    अच्ची कविता है।

    उत्तर देंहटाएं
  16. अशोक जी,

    आपने साफ़ आईने की तरह सच्चाई को अपनी रचना में उतार लिया है..अगर कन्या दान की मजबूरी न होती तो कोई भी अपने दिल के टुकडे को खुद से जुदा न करता... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  17. अशोक जी

    कविता वही जो मन में रह जाये। एक एक शब्द गहरे उतरता है। एक सफल कविता के लिये बधाई स्वीकारें।


    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  18. मन हरा भरा हो गया ।
    बेटियों द्वारा बख़्शी यह हरियाली हमेशा तरो- ताज़ा रहे।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  19. बड़ी उम्दा बात बड़े ही सरल शब्दों में कही गयी | बिल्कुल बेटियों की ही तरह मासूम रचना | पढ़ कर ऐसा लगा जैसे बारिश के बाद सवेरे सवेरे किसी ने कोई झाड़ ज़ोर से हिला दिया हो और बहुत सी बूँदें एक साथ गिर पडी हो | सुंदर |
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  20. हृदयस्पर्शी कविता के लिए
    बहुत-बहुत बधाई

    हर पँक्ति लाजवाब
    .


    "बचीं तो 'कल्पना' बन कर उड़ेंगी

    अजन्मी बेटियाँ भी अम्बरों तक."


    द्विजेन्द्र द्विज
    www.dwjindradwij.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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