हुआ यूँ, कि हम अलग हो गए,
कुछ ख़ास बदला नहीं,
सूरज, वही, कुछ,
पांच सवा पांच बजे,सवेरे,
ठिठुरता, हाथ तापता,
घर घर डोला,
पंछी भी शाम को,
उसी ढब में,
घूमते घामते घर आ ही गए |

ना तुमने
कॉफी की जूठी प्याली पर,
चम्मच से कोई नाम उकेरा,
और ना मैंने ही ,
सवेरे से शाम तलक़,
युकेलिप्टस के सायो संग ,
कदमताल किया ...

तुम अब भी वैसे ही,
अपने घर, सोफे पर बिछी,
चैनल बदला करती हो,
और मैं अब भी,
सड़क किनारे , चाय की दुकानों पर,
अपनी शामें खर्च करता हूँ ....

बदला कुछ ख़ास नहीं है लेकिन,
कभी इस दो फर्लांग लम्बी सड़क पर,
कोई एक जोड़ा भूरी आँखें, ग़र,
देख लेता हूँ,
तो बस यूँ लगता है,
कि जैसे कुछ रख कर कहीं,
भूल गया हूँ |

15 comments:

  1. कविता सहज उठती है और अपने क्लाईमेक्स पर पहुँच कर "बेहतरीन" हो जारी है:


    बदला कुछ ख़ास नहीं है लेकिन,
    कभी इस दो फर्लांग लम्बी सड़क पर,
    कोई एक जोड़ा भूरी आँखें, ग़र,
    देख लेता हूँ,
    तो बस यूँ लगता है,
    कि जैसे कुछ रख कर कहीं,
    भूल गया हूँ |

    बधाई।


    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. तुम अब भी वैसे ही,
    अपने घर, सोफे पर बिछी,
    चैनल बदला करती हो,
    और मैं अब भी,
    सड़क किनारे , चाय की दुकानों पर,
    अपनी शामें खर्च करता हूँ ....

    बदला कुछ ख़ास नहीं है लेकिन,
    कभी इस दो फर्लांग लम्बी सड़क पर,
    कोई एक जोड़ा भूरी आँखें, ग़र,
    देख लेता हूँ,
    तो बस यूँ लगता है,
    कि जैसे कुछ रख कर कहीं,
    भूल गया हूँ |

    बहुत अच्छे। दिल को छू लेने वाली कविता, बेहतरीन क्लाईमेक्स और उम्दा अंत।

    बधाई स्वीकारें दिव्यांशु जी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर कविता... बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस कविता को पढ कर मैने जो महसूस किया वह है

    "बीत लम्हें किसी जाल से कम नहीं
    और तेरी यादें
    गहरे ताल से
    कम नहीं"

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह! बहुत खूब!

    पहला पैराग्राफ़ कुछ कमजोर लगा था, लेकिन धीरे-धीरे आपने जो गति पकड़ी ...माशा-अल्लाह!

    बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुधियों के महल बहुत सुदृढ
    नींव पर बने होते हैं... जो
    आसानी से नहीं ढहते...

    बधाई....

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर दिव्यांशु! ऐसे ही लिखते रहें!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बदला कुछ ख़ास नहीं है लेकिन,
    कभी इस दो फर्लांग लम्बी सड़क पर,
    कोई एक जोड़ा भूरी आँखें, ग़र,
    देख लेता हूँ,
    तो बस यूँ लगता है,
    कि जैसे कुछ रख कर कहीं,
    भूल गया हूँ ।

    रचना अत्यंत निकट से छूती है अहसास को।यूक्लिपटस के साए तले क़दम ताल और शामें सड़क के किनारे खर्च करने का अंदाज़ जीवंत है। अततः, कुछरखकर कहीं भूल जाना कुछ भी भूलने नहीं देता।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  9. बदला कुछ ख़ास नहीं है लेकिन,
    कभी इस दो फर्लांग लम्बी सड़क पर,
    कोई एक जोड़ा भूरी आँखें, ग़र,
    देख लेता हूँ,
    तो बस यूँ लगता है,
    कि जैसे कुछ रख कर कहीं,
    भूल गया हूँ |
    वाह! बहुत सुंदर लिखा है. बहुत सरलता से गंभीर बात कह दी.

    उत्तर देंहटाएं
  10. bhai divyanshu aapki ye rachna aapke jeevan ke bahut nikat prateet hoti hai aati sundar manodasha ka ati sundar shabd chitra ukera gaya hai hardik badhai aise hi likhen

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget