चार सौ बीसी करी थी
जेब तब मेरी भरी थी

जिस्म तो जिंदा खड़ा था
रूह बस मेरी मरी थी

फ़न ही उसका " फन "था यारो
उसमें ये जादूगरी थी

ख्वाब दे कर उड़ गयी वो
प्यार वाली जो परी थी

दर्द से मैं रो रहा था
लोग समझे मसखरी थी

17 comments:

  1. छोटी बहर में खूबसूरत गजल कही है। बधाई।

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  2. बहुत अच्छी गज़ल है खास तौर पर मुहावरा "चार सौ बीसी" का सुन्दर प्रयोग।

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  3. फ़न ही उसका " फन "था यारो
    उसमें ये जादूगरी थी

    ख्वाब दे कर उड़ गयी वो
    प्यार वाली जो परी थी
    दीपक जी
    अच्छा लिखा है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut bahut sundar likha hai.lajawaab rachna hai.muhawre ka prayog adbhut hai.

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  5. सच्चाई से रुबरू कराती आपकी गज़ल बहुत बढिय लगी

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  6. दीपक जी,
    छोटी कटारी घाव करे गंभीर .. कम शब्दों में बहुत कह दिया आपने.. बहुत पसंद आयी आप की यह रचना.

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  7. दर्द से मैं रो रहा था
    लोग समझे मसखरी थी


    खूबसूरत गजल ....

    दीपक जी
    बधाई।

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  8. वा‍ह क्‍या आठ सौ चालीसी है
    गजल में भी चार सौ बीसी है

    भरी हुई हवा से खाली शीशी है
    खिली देखा सबकी बत्‍तीसी है

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  9. rachna gazal kahi jaani chahiye ya nahi, usi mein sandeh hai.
    bhaav achche hain, lekin achche se sampreshit nahi kiya gaya hai.

    Is par thoda sa aur kaam kiya jaata (rachna ko baher mein rakhe jaane ki koshish ki jaati aur achhe kaafiye chue jaate) to aur badhiya hota.

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  10. बहर तो अपनी जगह है दीपक जी!मेरा सोचना है की भाव पक्ष तगड़ा हो तो काम आसानी से चल सकता है!दुष्यंत कुमार जी को देखिए| कई बार नियम-कायदॉ को ताक पर रख कर ऐसी बात कह गये कि अमर हो गयी..
    आपकी ग़ज़ल के कुछ शेर अच्छे बन पड़े हैं|बहर के बारे में तो नही कहूँगा पर आप थोड़ा और वजन ला सकते थे!बहरहाल.. बहुत अच्छी रचना

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  11. दीपक जी! आपकी अब तक पढ़ी कविताओं व गज़लों के सामने यह सचमुच कुछ हल्की लगी. आपसे और बेहतर की आशा आपके पाठक करते हैं.

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  12. छोटे मीटर मे बड़ी जादूगरी।
    एक खूबसूरत गज़ल-एक असरदार बतकही।

    प्रवीण पंडित

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