किस उलझन में उलझा आजा [बाल - साहित्य] - सुषमा गर्ग

चन्दा देखे धरती पे धरती पे लाखों चुनमुन हैं चुनमुन प्यारे प्यारे हैं सारे जग से न्यारे हैं एक दिन चाँद के मन में आयी उसने माँ को बात ...

भारत महान है! [कविता] - विपुल शुक्ला

भारत महान है! हम हंसते हैं पश्चिम पर सीता और सावित्री पर नाज़ है हमें हमारी हीरोइन को कोई विदेशी चूमे तो हल्ला मचाते हैं ! यह हमारा अ...

डॉ. कृष्ण कुमार (यू.के.) का मुम्बई में सार्वजनिक अभिनन्दन [साहित्य समाचार] - देवमणि पाण्डेय

बर्मिंघम ( यू . के .) से पधारे प्रतिष्ठित कवि एवं हिन्दी सेवी डॉ . कृष्ण कुमार के मुम्बई आगमन पर कवयित्री माया गोविन्द के ...

कबाड़ [लघुकथा] - सुभाष नीरव

बेटे को तीन कमरों का फ्लैट आवंटित हुआ था। मजदूरों के संग मजदूर बने किशन बाबू खुशी-खुशी सामान को ट्रक से उतरवा रहे थे। सारी उम्र किराये के ...

पुरू [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

घना है कुहासा भोर है कि साँझ डूब गया है सब कुछ इस तरह तमस के जाले से छूटने को मारे हैं जितने हाथ पाँव और फंस गया हूँ बुरी तरह… वक...

जाने कौन डगर ठहरेंगे [कविता] - डॉ. कुमार विश्वास

कुछ छोटे सपनो के बदले, बड़ी नींद का सौदा करने, निकल पडे हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे वही प्यास के अनगढ़ मोती, वही धूप की सुर्...

व्यथा-ब्लैकिए की [व्यंग्य] - राजीव तनेजा

मैँ आप से...हाँ!..आप से...आप सभी से पूछना चाहता हूँ कि...क्या ऊपर उठना या...उठने की चाह रखना गलत है? क्या उन्नति के ख्वाब देखना...और उन्हे...

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अंतरजाल पर पहली बार , साहित्य शिल्पी प्रस्तुत करता है नाटक - राई-द स्टोन। अभियान, जगदलपुर की इस प्रस्तुति का महत्व इस मायने में भी बढ जाता...

ज़बाँ मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी [ग़ज़ल] - सतपाल 'ख्याल'

मैं शायर हूँ ज़बाँ मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी कि मैंने शौक़ से बोली कभी उर्दू कभी हिंदी न अपनों ने कभी चाहा यही तकलीफ़ दोनों की हैं बेबस...

वैक्यूम [लघुकथा] - सूरज प्रकाश

21वीं शताब्दी के आगमन के उपलक्ष्य में हमारे कार्यालय ने भी अपना योगदान दिया और इस योजना की पहली किस्त के रूप में सफाई के लिए एक वैक्यूम क्...

मीठा-सा अक्स [ग़ज़ल] – विश्वदीपक तनहा

ना इस कदर उघारो तुम हुस्न का हुनर, कब इश्क बेईमान हो जाए, क्या खबर ! कभी अपने गलीचे के पत्थरों को देखना, दब-दब के मोम हो पड़े हैं सारे ...

चर्चा जारी रहने दो [गज़ल] - योगेन्द्र मौदगिल

विजयघोष के सन्नारों की चर्चा जारी रहने दो अपने-अपने अधिकारों की चर्चा जारी रहने दो वरना तुमको खा जायेंगे ये दहशत के सौदागर बात-बात में...

बम [कहानी] - राजीव रंजन प्रसाद

उसे भूख लग आयी थी..और जब भूख लगी होती है, तो ज़िन्दा होता है सिर्फ पेट। रोज़ रोज़ यह देश जाने कितने ज़िन्दा पेटों वाले मुर्दे ढोता है और आहिस्...

युति [कविता] - लावण्या शाह

जैसी नदिया की धारा ढूँढे अपना, किनारा, जैसे तूफ़ानी सागर मे, माँझी, पाये किनारा, जैसे बरखा की बदली, जैसे फ़ूलों पे तितली, सलोने पिया, ...

जन्मशताब्दी वर्ष में एक क्रान्तिकारी महिला: दुर्गा भाभी [विशेष आलेख] - आकांक्षा यादव

वर्ष 1927 का दौर। साइमन कमीशन का विरोध करने पर लाहौर में प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले शेरे-पंजाब लाला लाजपत राय पर पुलिस ने निर्ममतापूर्...

सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री [हास्य-व्यंग्य] - के के यादव

मोहन बाबू हमारे पड़ोसी ही नहीं अभिन्न मित्र भी हैं। कहने को तो वे सरकारी विभाग में क्लर्क हैं पर सामान्यता क्लर्क की जो इमेज होती है, उससे क...

चंदन की लकड़ी से तुम्हें बनाया है [कविता] - देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

चुन चुन कर नग किस शिल्पी ने तुम्हें सजाया है। शायद चंदन की लकड़ी से तुम्हें बनाया है। हवा बसंती ठहर गयी है तुम्हारे होठों पर, या...

मैं-तुम [क्षणिकायें] - आलोक शंकर

हम दोनों ही बड़ा बनना चाहते थे- तुम्हें उनकी नजरों में बड़ा दिखना था, मुझे मेरी नजरों में । ----- दोनों को ईश्वर नहीं मिला , तु...

अंतिम निर्णय [कहानी] - ज़ाकिर अली ’रजनीश’

‘‘देखिए जरीना जी, आप एक बार फिर इस वैक्सीन (एक्स क्रोमोसोम डिजेनेरेटिंग फैक्टर आफ ह्यूमन) के बारे में सोचिए।’’ प्रभाकरन ने स्वयं पर गम्भीर...

’अमर उजाला’ में साहित्य शिल्पी [विशेष]

हमारे लिये यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि साहित्य शिल्पी पर प्रकाशित माननीय आकांक्षा यादव जी के आलेख (खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी) को ...

शादी और क्षणिकायें [कविता] - पवन कुमार 'चंदन'

शादी-1 करने को हाथ पीले बाबुल का भाग्य कैसा देता दहेज़ वर को लेकर उधार पैसा वह कर्ज मे दबेगा ये नोट हैं लुटाते खुलती है रोज़ बोतल ...

सफर में [लघुकथा] - सुभाष नीरव

“अबे, कहाँ घुसा आ रहा है !” सिर से पांव तक गंदे भिखारीनुमा आदमी से अपने कपड़े बचाता हुआ वह लगभग चीख-सा पड़ा। उस आदमी की दशा देखकर मारे घि...

भारतीय संस्कृति संसद में बच्चन के मधुकाव्य पर अभिनव आयोजन [साहित्य समाचार] - प्रकाश चंडालिया

कोलकाता। हरिवंश राय बच्चन के जन्मशती समारोह के अन्तर्गत संसद परिवार की ओर से आयोजित संगीतमय कार्यक्रम बच्चन का मधुकाव्य शहर के काव्यानुरागी...

छोटी सी बिन्दिया और क्षणिकायें [कविता] - महावीर शर्मा

दुल्हन अलसाये नयनों में निंदिया, भावों के झुरमुट मचलाए घूंघट से मुख को जब खोला, आंखों का अंजन इतराए फूल पर जैसे शबनम चमके, दुल्हन के ...

आज तुम्हारी आई याद [स्वर शिल्पी की प्रस्तुति] गीत - महेंद्र भटनागर

यादों का मानव-जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वास्तविक घटना के वर्षों बाद भी उसकी याद अपना असर दिखाती रहती है। जीवन-पथ में मानव बार-ब...

शरद सुहावन, मधु मन भावन [कविता] - लावण्या शाह

चाँद उग़ आया पूनम का ! शरद ऋतु के स्वच्छ गगन पर, चाँद उग़ आया पूनम का ! सरस युगल सारस - सारसी का, तैर रहा, झिलमिल जल पर ! खेत खलिहानो...

पुस्तकालय

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आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
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