बेटा पढ लिख कर गया, बन गया वो इंसान.
देख उजडती फसल को, रोता रहा किसान.

सारी उम्र चलाया हल, हर दिन जोते खेत.
बूढा हल चालक हुआ, सूने हो गए खेत.

दो बेटे थे खेलते इस आंगन की छांव.
अब नहीं आते यहां नन्हें नन्हें पांव.

बुढिया चूल्हा फूंकती सेक रही थी घाव.
अबके छुट्टी आएंगे बच्चे उसके गांव.

बडा बनाने के लिये क्यों भेजा स्कूल.
बूढा बैठा खेत पर कोसे अपनी भूल.

खेत बेच कर शहर में ले गया बेटा धन.
बूढे बूढी का इस घर में लगता नहीं है मन.

जब शहर वाले फ्लैट में गये थे बापू राव.
हर दिन उनको वहां मिले ताजे ताजे घाव.

आज पार्क में राव जी की आंखें गयी छलक.
देख नीम के पेड को झपकी नही पलक.

25 comments:

  1. शहरीकरण की कुछ तो कीमत चुकानी पड़ेगी....

    अच्छी कविता

    उत्तर देंहटाएं
  2. वो गांव की

    हलचल थी

    यह शहर की

    चलचल है

    जो चलती

    पलपल है

    हंसते हैं

    फंसते हैं

    हम सब

    दलदल है

    दलदल है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वास्त्विकता व दिल के मर्म को संप्रेशित करती रचना... पढ कर आंख भर आई... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. आप को रचनाओ को पढ़ कर लगता है की साहित्य का गाँव की ऑर रुझान मरा नही है .... हर कविता में गाँव से शहर आ जाने की मजबूरी और उस की टीस साफ़ नज़र आती है | ऑर वही टीस आप के लेखन की आत्मा है | हम अपना गाँव घर आँगन छोड़ कर निकल तो पढ़ते हैं उन्नति के लिए पर समझ नही पाते कि अपने पीछे क्या छोडे जा रहे हैं |

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  6. गाँव और ग्रामीण परिवेश को आप बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत करते हैं। आपकी रचनाओं में बात तो है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. kya khoob likha hai
    muja aa gaya
    sachmuch aatme prasann ho gayi
    aisi rachna har dil k kone tak jaati hai
    bahut-bahut shukriya

    उत्तर देंहटाएं
  8. समदर्शी में कभी प्रेमचंद दिखते हैं तो कभी फणीश्वर्। गहरा लिखते हो भाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत अच्छी कविता है योगेश जी। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बेटा पढ लिख कर गया, बन गया वो इंसान.
    देख उजडती फसल को, रोता रहा किसान

    बुढिया चूल्हा फूंकती सेक रही थी घाव.
    अबके छुट्टी आएंगे बच्चे उसके गांव.

    आज पार्क में राव जी की आंखें गयी छलक.
    देख नीम के पेड को झपकी नही पलक.

    संवेदित कर दिया आपने। गंभीर् लेखन।

    उत्तर देंहटाएं
  11. हकीकत बयाँ कर दी आपने .मर्मस्पर्शी ,धीर ,गंभीर कविता . दर्द के लिए साधुबाद

    उत्तर देंहटाएं
  12. योगेश जी,
    आप सही मायनों मे एक रचनाधर्मी हैं, कविता वही जो मिट्टी की खुशबू से पगी हो। छूटते गाँव, खेत, खलिहानों और खोते हुए आदमी बखूबी आपकी संवेदनाओ भरे शब्द से किसी को भी बेध सकते हैं।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  13. ग्रामीण परिवेश को
    बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत करते हैं।


    अच्छी कविता
    आभार।

    योगेश जी!
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  14. ग्रामीण परिवेश को
    बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत करते हैं।


    अच्छी कविता
    आभार।

    योगेश जी!
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  15. योगेश जी,
    आपकी मार्मिक रचना मन को छूने के साथ साथ निदा फाज़ली जी के दोहों की याद दिला गई.
    बहुत बढ़िया कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  16. kavita main kisanaur vridh dono ka dard jhalak raha hai
    meenakshi prakash

    उत्तर देंहटाएं
  17. राजनीति के अंधे समझें कैसे कष्ट किसानों का -वीं. पी.सिंह

    बुरे हाल मे साथ न छोड़ें,देंगे साथ किसानों का !
    गांव-गांव में पैदल जाकर,जानें दर्द किसानों का !

    जुड़ा हमारा जीवन गहरा ,भोजन के रखवालों से !
    किसी हाल में साथ न छोड़ें,देंगे साथ किसानों का

    इन्द्र देव की पूजा करके, भूख मिटायें मानव की
    राजनीति के अंधे समझें, कैसे कष्ट किसानों का !

    यदि आभारी नहीं रहेंगे,मेहनत कश इंसानो के
    मूल्य समझ पायेगे कैसे,इन बिखरे अरमानों का !

    आओ किसानों के संग बैठे,दुःख और दर्द समझने को
    सारा देश समझना चाहे, कष्ट कीमती जानों का !

    उत्तर देंहटाएं
  18. राजनीति के अंधे समझें कैसे कष्ट किसानों का -वीं. पी.सिंह

    बुरे हाल मे साथ न छोड़ें,देंगे साथ किसानों का !
    गांव-गांव में पैदल जाकर,जानें दर्द किसानों का !

    जुड़ा हमारा जीवन गहरा ,भोजन के रखवालों से !
    किसी हाल में साथ न छोड़ें,देंगे साथ किसानों का

    इन्द्र देव की पूजा करके, भूख मिटायें मानव की
    राजनीति के अंधे समझें, कैसे कष्ट किसानों का !

    यदि आभारी नहीं रहेंगे,मेहनत कश इंसानो के
    मूल्य समझ पायेगे कैसे,इन बिखरे अरमानों का !

    आओ किसानों के संग बैठे,दुःख और दर्द समझने को
    सारा देश समझना चाहे, कष्ट कीमती जानों का !

    उत्तर देंहटाएं
  19. स्वदेशी खेती किसानो को लिए सोशल मीडिया से लेकर खेतो तक काम कर रही है.. आप सब से अनुरोध है आप भी किसी ना किसी तरह किसानो की मदद करें

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत ही अच्छी कविता दिल को छु गयी

    उत्तर देंहटाएं
  21. जिनके अनाज के भंडार हैं
    पर खाने को दाना नहीं
    जिनके आँगन में दुग्ध बहे
    पर उसने कभी चखा नहीं

    मेहतन ही उसकी ताकत हैं
    फिर भी वो आज भिखारी हैं
    अनाज का हैं वो दाता
    फिर भी सोता भूखा हैं

    वह मेहनत की ही खाता हैं
    पर पृकृति का गुलाम हैं
    आस लगाये वो आसमान निहारे
    लेकिन भाग्य में उसके शाम हैं

    साहूकार ने रही सही
    सांसे भी उससे छीन ली
    सियासी और कालाबजारी ने
    उसकी जिन्दगी दूभर करी

    फिर भी वो उठता हैं
    मेहनत करते जाता हैं
    एक दिन आएगा फिर से
    जब किसान ही लहरायेगा
    कब तक रूठेगी तू पृथ्वी
    तुझे वो मेहनत से ही मनायेगा

    उत्तर देंहटाएं
  22. मुझे सोचने को मजबूर कर दिया

    उत्तर देंहटाएं

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