जरा ठहरो ... कहकर मैं रिक्शा से नीचे उतरा। सामने की दुकान पर जाकर डिप्लोमेट की एक बोतल खरीदी, उसे कोट की भीतरी जेब में ठूँसा और वापस रिक्शा पर आ बैठा। मेरे बैठते ही रिक्शा फिर धीमे-धीमे आगे बढ़ा। रिक्शावाले का रिक्शा खींचने का अंदाज देख लग रहा था, जैसे वह बीमार हो। अकेली सवारी भी उससे खिंच नहीं पा रही थी। मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी। मैंने सोचा, खरामा-खरामा ही सही, जब तक मैं घर पहुँचूँगा, वर्मा और गुप्ता पहुँच चुके होंगे।
परसों रात कुलकर्णी  के घर तो मजा ही नहीं आया। अच्छा हुआ, आज मेहता और नारंग को नहीं बुंलाया। साले पीकर ड्रामा खड़ा कर देते हैं।... मेहता तो दो पैग में ही टुल्ल हो जाता है और शुरू कर देता है अपनी रामायण। और नारंग ?... उसे तो होश ही नहीं रहता, कहाँ बैठा है, कहाँ नहीं।... अक्सर उसे घर तक भी छोड़कर आना पड़ता है।
अरे-अरे, क्या कर रहा है ? एकाएक मैं चिल्लाया, रिक्शा चला रहा है या सो रहा है ?... अभी पेल दिया होता ठेले में।...
रिक्शेवाले ने नीचे उतरकर रिक्शा ठीक किया और फिर चुपचाप खींचने लगा। मैं फिर बैठा-बैठा सोचने लगा- गुप्ता भी अजीब आदमी है। पीछे ही पड़ गया, वर्मा के सामने। पे-डे को सोमेश के घर पर रही। पता भी है उसे, एक कमरे का मकान है मेरा। बीवी-बच्चे हैं, बूढ़े माँ-बाप हैं। छोटी-सी जगह में पीना-पिलाना।... उसे भी हाँकरनी ही पड़ी, वर्मा के आगे। पत्नी को समझा दिया था सुबह ही- वर्मा अपना बॉस है।.. आगे प्रमोशन भी लेना है उससे।... कभी-कभार से क्या जाता है अपना।... पर, माँ-बाऊजी की चारपाइयाँ खुले बरामदे में करनी होंगी। बच्चे भी उन्हीं के पास डालने होंगे। कई बार सोचा, एक तिरपाल ही लाकर डाल दे, बरामदे में। ठंडी हवा से कुछ तो बचाव होगा। पर जुगाड़ ही नहीं बन पाया आज तक।
सहसा, मुझे याद आया- सुबह  बाऊजी ने खाँसी का सीरप लाने को कहा था। रोज रात भर खाँसते रहते हैं। उनकी खाँसी से अपनी नींद भी खराब होती है। पर सौ का पत्ता... चलो, कह दूँगा-दुकानें बन्द हो गयी थीं।
एकाएक रिक्शा किसी से टकराकर उलटा और मैं जमीन पर जा गिरा। कुछेक पल तो मालूम ही नहीं पड़ा कि क्या हुआ !... थोड़ी देर बाद मैं उठा तो घुटना दर्द से चीख उठा। मुझे रिक्शेवाले पर बेहद गुस्सा आया। परन्तु मैंने पाया कि वह खड़ा होने की कोशिश में गिर-गिर पड़ रहा था। मैंने सोचा शायद उसे अधिक चोट लगी है।... मैं आगे बढ़कर उसे सहारा देने लगा तो शराब की तीखी गन्ध मेरे नथुनों में जबरन घुस गयी। वह नशे में  धुत्त था।
मैं उसे मारने-पीटने लगा। इकट्ठे हो आये लोगों के बीच-बचाव करने पर मैं चिल्लाने लगा, शराब पी रखी है हरामी ने।.. अभी पहुँचा देता ऊपर।... साला शराबी !... कोई पैसे-वैसे नहीं दूँगा तुझे।... जा, चला जा यहाँ से... नहीं तो सारा नशा हिरन कर दूँगा।...शराबी कहीं का !
वह चुपचाप उलटे हुए रिक्शा को देख रहा था जिसका अगला पहिया टक्कर लगने से तिरछा हो गया था। मैंने जलती आँखों से उसकी ओर देखा और फिर पैदल ही घर की ओर चल दिया।
रास्ते में कोट की भीतरी जेब को टटोला। मैं खुश था- बोतल सही-सलामत थी।

17 comments:

  1. पंकज सक्सेना8 नवंबर 2008 को 9:46 am

    विरोधाभास का सुन्दर प्रस्तुतिकरण।

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  2. अच्छी कहानी है सुभाष जी, बधाई।

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  3. very nice short story.

    Alok Kataria

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  4. अच्छी लघुकथा है, अपनी बात कह पाने में पूर्णत: सफल।

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  5. आम मनोविज्ञान का सुन्दर प्रस्तुतिकरण। अच्छी कहानी।

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  6. प्रस्तुतिकरण में शायद और सुधार हो सकता था सुभाष जी.. बहुत अच्छा प्रयास !

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  7. बहुत बहुत सधी रचना.सीधे मन तक पहुँचती है.बहुत बहुत सुंदर.

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  8. मानव मन को उकेरती लघुकथा।
    अच्छी रचना।

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  9. achchi tarah se vyakhya ki hai aajkal ke padhe likhe insaan ki soch ki

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  10. नीरव भाई, आप बहुत कुछ कह गये हैं
    इस छोटी सी कहानी में जवाब नही है आपका
    सलाम पेश करता हूँ
    अल्लाह करे ज़ोरे कलम और जियादा

    चाँद शुक्ला हदियाबादी डेनमार्क

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  11. देर से टिप्पणी के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ नीरव जी, बहुत अच्छी लघुकथा है।

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  12. जिनके घर शीशे के होते हैँ...वहीं दूसरों के घरों पर पत्त्थर फैंका करते हैँ....


    अच्छी कहानी...

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  13. सुभाष नीरव जी,

    बहुत बेहतरीन कहानी। दो दृश्य और दोनों ही बेहतरीन .. आदमी की आंतरिक नग्नता को उधेड कर दिखाया है आपने। आदमी और आदमी के बीच के अंतर को बखूबी रेखांकित करती है आपकी कहानी। बधाई स्वीकारें।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  14. सुन्दर अभिव्यक्ति..
    सचमुच दूसरे की आंख में तिनका नजर आ जाता है और अपनी आंख में शहतीर को भी नजर अंदाज कर दिया जाता है.

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  15. बहुत प्रभावी, बहुत अच्छी कहानी।
    स्वयं के नंगे पन पर तो व्यक्ति गांधारी-व्रत रख लेता है ।

    प्रवीण पंडित

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  16. अपनी लघुकथा "अपना अपना नशा" पर पाठकों की इतनी सारी प्रतिक्रियाएं देखकर मन प्रसन्न हुआ। मैं सभी टिप्पणीकारों का दिल से शुक्र्गुजार हूँ कि उन्होंने मेरी लघुकथा को न केवल पढ़ा बल्कि अपने विचारों से मुझे अवगत भी कराया।

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