कोर्नवाल, इंगलैण्ड :
अक्तूबर के महीने में प्रातः काल प्राची की दिशा में घुमड़ते बादलों के पीछे छिपे हुए सूर्य की किरणें बाहर निकलने का असफल प्रयास कर रहीं थी और उस पर वर्षा की भारी बौछारें शीत लहर को दक्षिण की ओर धकेले जा रही थीं। इस देश में अनिश्चित मौसम ना जाने कब, किस समय और कहां लोगों के जीवन की दैनिक दिनचर्या में बाधक बन ललकार कर सामने आ जाये! ऐसे ही दिन की भयानक रात में ४७ वर्षीय कारखाने में वैल्डिंग का काम करने वाला स्टीव ओकॉनर सारी रात अपने बिस्तर पर करवटें बदल बदल कर कभी नींद और खुली आंखों में समझौता करता रहा, तो कभी आत्म-हत्या की योजना बनाता रहा और ऐसे ही सुबह हो गई। प्रातः हर दिन की तरह उठा, अपने सैंडविच बनाए और थैले में रख लिये। बाहर आकर कार स्टार्ट की और फैक्टरी की ओर रवाना हो गया।

यहां के अनिश्चित मौसम की तरह,  मन की भटकन लिये हुए कार पार्क करके गाड़ी में ही बैठा रहा। स्टीयरिंग के मध्य में आंखें गाड़े हुए सोचता रहा। कुछ देर बाद कार फिर चला दी। काम पर ना जाकर दिशाहीन, उद्देश्यहीन कार को घुमाता रहा। उसे यह भी भान न था कि वह कहां जा रहा था। मस्तिष्क में कुछ चेतना का आभास हुआ तो देखा वह "पोर्टरीथ" के स्थान में था। गाड़ी रोक दी और बाहर आगया।...। वहीं समुद्र के किनारे पर ५० फुट ऊंची चट्टान पर चढ़ कर चोटी से घण्टों समुद्र की लहरों में अपनी मृत्यु के नाच का काल्पनिक दृश्य देखता रहा। घंटों की यह दीर्घ अवधि ऐसी लग रही थी जैसे कुछ ही क्षण बीते हों। उसी समय उसने देखा कि एक समुद्री रक्षक (सी रेस्क्यू) हैलीकॉप्टर उसके ऊपर चारों ओर घूम रहा था। स्टीव ने बनावटी मुस्कुराहट के साथ हाथ हिलाया जिससे हैलीकॉप्टर के चालक को निश्चय हो गया कि स्टीव किसी विपत्ति में नहीं है। हैलिकॉप्टर उसी घरघराहट के साथ उड़ता हुआ दूर चला गया। उसके मस्तिष्क का संतुलन जैसे लौट आया हो। एक विचित्र विचार ने उसके मन को झंझोड़ सा दिया। "ये लोग आत्म-हत्या या अन्य कारणों से डूबते हुओं को बचाने के प्रयास में स्वयं के जीवन को ख़तरों और जोखम में डालने के लिये तैयार हो जाते हैं।" बस इसी विचार ने उसके जीवन और मृत्यु के बीच का फ़ासला बढ़ा दिया। लौट कर कार में बैठ कर कुछ देर पिछले दिनों की यादों में से कुछ खोजता रहा! वापस घर आ गया।

स्टीव 'बार्नस्टेपल' में 'होबर्ट फूड प्रेप्रेशन' नामक कम्पनी में वैल्डर कार्य-रत, 'वर्किंग ट्रेड यूनियन' का सदस्य जो सदैव सत्य कहने और अपने साथियों के अधिकारों की मांग के लिये निर्भीक होकर आगे रहता था। इसी निडरता के कारण एक दिन २० वर्ष की नौकरी से हाथ धोना पड़ा। उसके पश्चात एक के बाद एक विपदाओं ने उसके जीवन के सारे सुख छीन लिये। उसका घर छिन गया, पत्नि ने साथ छोड़ दिया और एक बार आत्म-हत्या से बाल बाल बचा। मस्तिष्क का संतुलन अधिक बिगड़ने लगा तो डाक्टरों और मनोचिकित्सकों का सहारा लेना पड़ा। जांच से पता लगा कि वह बाल्यावस्था से ही "मेनिक अवसाद" (मेनिक डिप्रैशन) मनोरोगमें ग्रस्त था। उस समय वह आयरलैंड में टिपरेरी नगर के निकट खेतों पर काम करता था। विडंबना यह थी कि कभी भी इस रोग की जांच नहीं हुई।                                                           

मेनिक अवसाद एक मानसिक रोग है। साधारणतयः व्यक्तियों की चित्तवृत्तियां और मूड का संतुलन एक विषुवत रेखा के द्वि-ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। मस्तिष्क में कुछ ऐसे रसायनिक पदार्थ होते हैं जो इस संतुलन को बनाए रखते हैं। यदि यह संतुलन बिगड़ जाए तो रोगी की चित्तवृत्तियों में बिना किसी कारण के ही परिवर्तन होने लगते हैं। मनुष्य के जीवन में उच्चतम और निम्नतम अनुभव होते ही रहते हैं, किंतु कुछ ही समय में स्थिति सामान्य हो जाती है। लेकिन द्वि-ध्रुवीय क्रम-भंग (बाई पोलर डिसआर्डर) के रोगी का मस्तिष्क कभी उच्चतम तो कभी निम्नतम अनुभवों में ऐसा जकड़ जाता है कि दीर्घ काल तक फंसा रहता है और उन्माद की स्थिति तक आ जाती है। कभी हताश हो जाता है, हीनता की भावना उसे दबा लेती है, उखड़ी नींद, जीवन के हर पहलू में निराशावादी भावनाएं, निरंतर थकान, आनंद और हर्ष तो जैसे उसके शब्दकोष  से ही निकल गये हों। स्टीव कहता था कि जब तुम इस प्रकार के अवसाद के निम्नतम अनुभव की जकड़ में होते हो तो विचारधारा आत्महत्या की प्रवृत्ति की ओर झुक जाती है किसी भी काम में दिल नहीं लगता। यह अवस्था बहुत समय तक चलती रहती है। किंतु, दूसरी ओर, यदि रोगी उच्चतम अनुभवों की स्थिति में हो तो  खयालों में हवाई किले बनाना शुरू कर देता है और एक सनक और उन्माद की स्थिति में पहुंच जाता है। एक अनोखी ऊर्जा उसके शरीर में आजाती है। उसकी प्रसन्नता, हर्ष और आनंद की सीमा नहीं रहती। इस सनक की हालत में उसे कोई भी कार्य असंभव नहीं लगता। किसी भी असाधारण कार्य करने को उद्यत हो जाता है। ऐसी ही अनिश्चित विकट परिस्थितियों में अग्निपथ पर चलते हुए अपने जीवन और मरण का खेल खेलता रहता है। विडम्बना यह थी कि यदि किसी का पैर टूट जाता है तो कम कम यह सामने तो दिखाई देता है। चिकित्सा हो जायेगी। लेकिन मेनिक अवसाद जैसे मानसिक  रोग की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। यह दिखाई भी नहीं देती पर जीवन के हर पहलू पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता रहता है, रोगी को आभास तक नहीं होता। यदि इस गति को रोका ना जाए और चिकित्सा ना की जाए तो इसके भीषण परिणाम हो सकते हैं। स्टीव इस गति को रोक ना सका और परिणामस्वरूप मति-भ्रम, हास्यास्पद अभिलाषाओं की व्यर्थ योजनाएं बनाना,  ऋण में फंस जाना और फिर गहरे अवसाद में  डूब गया। स्टीव के मूड  दवा और नियमानुसार मनोवैज्ञानिकों के सहारे किसी सीमा तक नियंत्रित हो गए। किंतु उसने यह भी अनुभव किया कि मनुष्य जब किसी खेल, हॉबी, व्यायाम या किसी रुचिकर कार्य में संलग्न ना हो तो केवल दवाईयों से इस रोग का उपचार नहीं हो पाता। व्यायाम से एड्रीनलीन हारमोंस का स्राव नियंत्रण में रहता है और मन भी स्थिर होने लगता है।

स्टीव के लिये यह स्वयं-उपचार एक चौदह वर्षीय अरबी घोड़े के रूप में मिला जिसे उसने "कोलीना" का नाम दिया। स्वास्थ्य को लौटाने के लिये कितनी ही रुचिकर हाबी हैं पर उसे दूर दूर तक घुड़सवारी द्वारा नगर नगर घूम कर आनंद प्राप्त करने की राह रास आई। उसका बचपन खेतों में व्यतीत हुआ था। खेतों के पशुओं में वह घुलमिल गया था। उसे वे उसके परिवार के सदस्य और मित्र से लगते थे, ऐसे मित्र जो हर समय उसकी बातें सुनते थे पर उसकी भर्त्सना या आलोचना नहीं करते थे। जब से ही उसे घोड़ों और घुड़सवारी में विशेष रुचि हो गई थी।  


जब उसे इस मनोरोग से उपचार द्वारा कुछ थोड़ी सी राहत मिली तो उसने अपने घोड़े "कोलीना" के साथ दक्षिणी स्पेन से मध्य-युगीन तीर्थ स्थानों के रास्तों से गुजरते हुए पुर्तगाल, पायरेनीस और पश्चिमी फ्रांस होते हुए इंग्लैंड में पैंजेंस तक की दो हज़ार मील की यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की। इस घुड़-यात्रा से उसे अपनी मानसिक स्थिति में बहुत लाभ हुआ। चार मास की यात्रा में "कोलीना" और उसमें प्रगाढ़ मित्रता हो गई थी। यात्रा के मध्य जो लोग मिले, उनका भी बड़ा उदारपूर्वक व्यवहार रहा। यह योजना बड़ी सफल रही। रास्ते में भिन्न-भिन्न देशों में कितने ही लोगों के दिल और घरों के द्वार सत्कार के लिये खुले रहे। स्टीव का मानवता के प्रति एक नया विश्वास उत्पन्न हो गया। जब भी लोग उसे घोड़े पर देखते तो उन्हें अन्य सैलानियों से भिन्न लगता था। दूसरे लोगों को भी सड़कों पर देखा है जो कि पूरे विश्व तक का चक्कर लगाते हैं किंतु वे या तो मोटर-साइकल, बाइसिकल या फिर कार आदि द्वारा ही दिखाई देते हैं। पाश्चात्य देशों में घोड़े पर एक लम्बी यात्रा अपने आप में ही एक नयापन और विचित्रता लिये हुए है।   

"कोलीना" को यदि कोई व्यक्ति जानवर की संज्ञा देता है तो उसे अच्छा नहीं लगता। कह देता है कि यदि यह जानवर ही है तो अगले जन्म में मुझे जानवर का ही शरीर मिले। कम से कम किसी का वास्तविक मित्र तो बन सकूंगा।  

स्टीव के विवाह-विच्छेद के कानूनी-निर्णय में उसे तीन हज़ार पौंड मिले। उस राशि में से कुछ तो अपने इलाज में और शेष राशि लोगों में "मेनिक अवसाद"- बाई-पोलर डिसॉर्डर- रोग के भीषण परिणाम के महत्व के प्रति जागरुकता लाने के लिये विभिन्न साधनों पर खर्च कर दी। स्टीव ओकॉनर के लिये 'कोर्नवॉल' के समुद्रीय तटवर्ती क्षेत्रों में विचरते हुए प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेने का अनुभव उसकी चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया। एक मानसिक तृप्ति सी मिलती थी, विघ्नित मनःस्थिति में शांति और स्थिरता सी आजाती है। उन प्राकृतिक वनों, समुद्री तटों के समीप उठती हुई तरंगो का स्वर्गीय दृष्य देखने के लिये 'कोलीना' के साथ सवारी और हवाखोरी के लिये जाना एक नियम बन गया।

अब उसने अपने घोड़े "कोलीना" के साथ चार सप्ताह के लिये एक्समोर, डार्टमोर, बॉडमोर आदि प्रकृतिक स्थानों में विचरण करने की योजना बनाई है। इन स्थानों में आबादी नहीं होती, बस प्रकृति का ही वास अधिक होता है। घोड़े को सहलाते हुए कभी-कभी उसकी आंखें नम हो जातीं हैं और वह अनायास कहने लगता है, "कोलीना! यदि तू ना होता तो ना जाने क्या होता!" 
***** 

19 comments:

  1. हृदय को छू लेने वाली कथा..हार्दिक बधाई. कई बार पढ़ना होगा थाह लेने के लिए.

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  2. Nature and animals are best treatment of dipression. Liked the content. Thanks.

    Alok Kataria

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  3. अकेलेपन और अवसादग्रस्त बहुत से लोगों के लिये आपकी कहानी प्रेरणा व उर्जा की तरह होगी। बधाई।

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  4. "इन स्थानों में आबादी नहीं होती, बस प्रकृति का ही वास अधिक होता है। घोड़े को सहलाते हुए कभी-कभी उसकी आंखें नम हो जातीं हैं और वह अनायास कहने लगता है, "कोलीना! यदि तू ना होता तो ना जाने क्या होता!"..

    बेहद प्रभावी।

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  5. आदरणीय महावीर जी का साहित्य शिल्पी पर हार्दिक अभिनंदन।

    स्टीव की मनोदशा के परोक्ष में आपने अवसाद से जूझ रहे लोगों के लिये समाधान भी दे दिया है। एक मनोवैज्ञानिक समाधान।

    पूरा प्रसंग जिस शिल्प में गढा हुआ है वह हम जैसे नव-सिखियों के लिये उदाहरण है।

    आभार।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  6. प्रभावी, बहुत अच्छा लेख।

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  7. सुबह सुबह एक अच्छा आलेख दिन बना देता है, महावीर की के आलेख में वही सुन्दरता है। बहुत उर्जा मिली इसे पढ कर।

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  8. "ये लोग आत्म-हत्या या अन्य कारणों से डूबते हुओं को बचाने के प्रयास में स्वयं के जीवन को ख़तरों और जोखम में डालने के लिये तैयार हो जाते हैं।" बस इसी विचार ने उसके जीवन और मृत्यु के बीच का फ़ासला बढ़ा दिया।
    " very good artical to read about, very well said, that second thought in friction of second at this moment can bring back the mental balance and can change the dcesion..." i am impressed with above words.."

    regards

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  9. महावीर जी, साहित्य शिल्पी पर आपको देखकर बहुत अच्छा लगा। बहुत ही अच्छी कहानी बहुत बहुत बधाई

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  10. पंकज सक्सेना10 नवंबर 2008 को 12:05 pm

    गहरा चिंतन है आलेख में। इसे केवल कहानी या प्रसंग कहना अनुचित होगा।

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  11. महावीर जी
    साहित्य शिल्पी पर आपके प्रसंग से रू बरू होकर पाया कि अकेलापन अपने आप में कितना नीरस होता है. अंतरमन से गहराइयों में उतर के समझने की जुस्तजू में अपने आप को आइने के सामने पाया. ये तजुर्बों की नींव पर रक्खे लेख, आलेख व कहानियाँ राहें रौशन करने के लिये कारगर रहती हैं. आप शब्द शिल्पी है, अनुभवों को तराशना आप के बस में है.हृदय को छू लेने वाली कथा को पडने का अवसर मिला जिसके लिये आपको साधुवाद
    देवी नागरानी

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  12. बहुत प्रभावी लेख....

    आभार....


    महावीर जी,
    हार्दिक बधाई....

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  13. Ek sashakt rachna.Bar-bar padhne ko
    jee karta hai.Mahavir jee kushal
    kavi hee nahin,kushal kahanikar bhee hain.Mujhe hamesha inkee har
    rachna pathniy lagee hai.Sahitya-
    Shilpi par inkee rachna ko padhkar
    sukhad lagaa hai.

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  14. यह समाज के लिए बहुत उपयोगी आलेख है।बधाई।

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  15. उत्प्रेरक रचना | जीवन और लेखन दोनों में ही प्रेरणा मिलती है इसे पढ़ कर |

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  16. शिल्पी साहित्य की टीम का बहुत बहुत धन्यवाद जिन्होंने इस सुंदर पन्ने पर इस आलेख को
    स्थान दिया और साथ ही पाठकों को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने आज के व्यस्त जीवन में भी मूल्यवान क्षण निकाल कर अपने विचार टिप्पणी में दिए।
    महावीर शर्मा

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  17. इस सुन्दर मर्म-स्पर्शी रचना के लिए आभार.
    इस रचना को पढ़ने के लिए बार-बार यहाँ आना पड़ेगा मुझे.

    लेखक और संपादक दोनों को बधाई.


    द्विजेन्द्र द्विज

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  18. सशक्त साहित्य की यही पहचान है कि वो हमेँ कथा के कथानक व पात्रोँ के साथ जोड देने मेँ सफल हो -
    आदरणीय महावीरजी के लिखे से
    यही एहसास
    हर बार हुआ है -
    एक गँभीर और बहुत कम लिखे हुए
    विषय पर
    बहुत सरल शब्दोँ मेँ लिखा ये आलेख बहुत पसँद आया -
    सादर, स -स्नेह,
    - लावण्या

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  19. बहुत ही बढ़िया ..
    अक्तूबर के महीने में प्रातः काल प्राची की दिशा में घुमड़ते बादलों के पीछे छिपे हुए सूर्य की किरणें बाहर निकलने का असफल प्रयास कर रहीं थी और उस पर वर्षा की भारी बौछारें शीत लहर को दक्षिण की ओर धकेले जा रही थीं।
    ये शब्द किसी बेहद अनुभवी कलम से ही आ सकते हैं |

    आपकी कलम से निकली हर कहानी हर कविता संग्रहणीय है..
    "कोलीना" को यदि कोई व्यक्ति जानवर की संज्ञा देता है तो उसे अच्छा नहीं लगता। कह देता है कि यदि यह जानवर ही है तो अगले जन्म में मुझे जानवर का ही शरीर मिले। कम से कम किसी का वास्तविक मित्र तो बन सकूंगा।
    एक उम्दा लेख के लिए हार्दिक बधाई ..
    आशा है आगे भी साहित्य शिल्पी में आपकी रचनाओं को पढने का सौभाग्य मिलेगा

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