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Wednesday, November 19, 2008

खूब लड़ी मरदानी, अरे झांसी वारी रानी [जयंति पर विशेष] - आकांक्षा यादव

स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय राष्ट्रीयता को दीर्घावधि विदेशी शाषन और सत्ता की कुटिल-उपनिवेशवादी नीतियों के चलते परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पड़ा था और जब इसके क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई तब जनमानस उद्वेलित हो उठा था। अपनी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए क्रान्ति यज्ञ की बलिवेदी पर अनेक राष्ट्रभक्तों ने तन-मन-जीवन अर्पित कर दिया था। 

क्रान्ति की ज्वाला सिर्फ पुरुषों को ही नहीं आकृष्ट करती बल्कि वीरांगनाओं को भी उसी आवेग से आकृष्ट करती है। भारत में सदैव से नारी को श्रद्धा की देवी माना गया है, पर यही नारी जरूरत पड़ने पर चंडी बनने से परहेज नहीं करती। ’स्त्रियों की दुनिया घर के भीतर है, शाषन-सूत्र का सहज स्वामी तो पुरूष ही है‘ अथवा ‘“शाषन व समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं‘ जैसी तमाम पुरूषवादी स्थापनाओं को ध्वस्त करती इन वीरांगनाओं के बिना स्वाधीनता की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिये। 1857 की क्रान्ति में जहाँ रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, बेगम जीनत महल, रानी अवन्तीबाई, रानी राजेश्वरी देवी, झलकारी बाई, ऊदा देवी, अजीजनबाई जैसी वीरांगनाओं ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिये, वहीं 1857 के बाद अनवरत चले स्वाधीनता आन्दोलन में भी नारियों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इन वीरांगनाओं में से अधिकतर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी रजवाड़े में पैदा नहीं हुईं बल्कि अपनी योग्यता की बदौलत उच्चतर मुकाम तक पहुँचीं। 

1857 की क्रान्ति की अनुगूँज में जिस वीरांगना का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, वह झांसी में क्रान्ति का नेतृत्व करने वाली रानी लक्ष्मीबाई हैं। 19 नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत तांबे व भगीरथी बाई की पुत्री रूप मे लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था, पर प्यार से लोग उन्हें मनु कहकर पुकारते थें। काशी में रानी लक्ष्मीबाई के जन्म पर प्रथम वीरांगना रानी चेनम्मा को याद करना लाजिमी है। 1824 में कित्तूर (कर्नाटक) की रानी चेनम्मा ने अंगेजों को मार भगाने के लिए ’फिरंगियों भारत छोड़ो’ की ध्वनि गुंजित की थी और रणचण्डी का रूप धर कर अपने अदम्य साहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह पूरी न हो सकी थी। यह संयोग ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के 6 साल बाद काशी में ही लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ। 

बचपन में ही लक्ष्मीबाई अपने पिता के साथ बिठूर आ गईं। वस्तुत: 1818 में तृतीय मराठा युद्ध में अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय की पराजय के पश्चात उनको 8 लाख रूपये की वार्षिक पेंशन मुकर्रर कर बिठूर भेज दिया गया। पेशवा बाजीराव द्वितीय के साथ उनके सरदार मोरोपंत तांबे भी अपनी पुत्री लक्ष्मीबाई के साथ बिठूर आ गये। लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहब के साथ कानपुर के बिठूर में ही बीता। लक्ष्मीबाई की शादी झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुई। 1853 में अपने पति राजा गंगाधर राव की मौत के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी का शासन सँभाला पर अंग्रेजों ने उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शाषक मानने से इन्कार कर दिया। अंग्रेजी सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई को पांच हजार रूपये मासिक पेंशन लेने को कहा पर महारानी ने इसे लेने से मना कर दिया। पर बाद में उन्होंने इसे लेना स्वीकार किया तो अंग्रेजी हुकूमत ने यह शर्त जोड़ दी कि उन्हें अपने स्वर्गीय पति के कर्ज़ को भी इसी पेंशन से अदा करना पड़ेगा, अन्यथा यह पेंशन नहीं मिलेगी। इतना सुनते ही महारानी का स्वाभिमान ललकार उठा और अंग्रेजी हुकूमत को उन्होंने संदेश भिजवाया कि जब मेरे पति का उत्तराधिकारी न मुझे माना गया और न ही मेरे पुत्र को, तो फिर इस कर्ज़ के उत्तराधिकारी हम कैसे हो सकते हैं। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को स्पष्टतया बता दिया कि कर्ज़ अदा करने की बारी अब अंग्रेजों की है न कि भारतीयों की। इसके बाद घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर देने की तैयारी आरंभ कर दी और उद्घोषणा की कि- ‘‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।” 

रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलायें शामिल थीं। उन्होंने महिलाओं की एक अलग ही टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ नाम से बनायी थी। इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाई ने कसम उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊँगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। चूँकि उसका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई को घिरते देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं घायल सिहंनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गई। रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे को कमर में बाँध घोड़े पर सवार किले से बाहर निकल गई और कालपी पहुँची, जहाँ तात्या टोपे के साथ मिलकर ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लिया।............ अन्तत: 18 जून 1858 को भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की इस अद्भुत वीरांगना ने अन्तिम सांस ली पर अंग्रेजों को अपने पराक्रम का लोहा मनवा दिया। तभी तो उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा - ‘‘यहाँ वह औरत सोयी हुयी है, जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी।”
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इतिहास अपनी गाथा खुद कहता है। सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोकमानस के कंठ में, गीतों और किवदंतियों इत्यादि के माध्यम से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। वैसे भी इतिहास की वही लिपिबद्धता सार्थक और शास्वत होती है जो बीते हुये कल को उपलब्ध साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यथावत प्रस्तुत करती है। बुंदेलखण्ड की वादियों में आज भी दूर-दूर तक लोक -लय सुनाई देती है- खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी/पुरजन पुरजन तोपें लगा दईं, गोला चलाए असमानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी/सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी......छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी। माना जाता है कि इसी से प्रेरित होकर ‘झाँसी की रानी’ नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चौहान ने 1857 की उनकी वीरता का बखान किया हैं- चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी / बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी / खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
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31 टिप्पणियाँ:

राजीव तनेजा November 19, 2008 7:30 AM  

जानकारी से भरपूर बढिया आलेख.....

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` November 19, 2008 8:09 AM  

झाँसी की शूरवीर रानी लक्ष्मी बाई को शत शत नमन -
आकाँक्षा जी ने सच्ची श्रध्धाँजलि देकर हमेँ सुभद्रा कुमारी चौहान जी को भी याद करने का मौका दिया है
इस लेख के लिये आपको बधाई
- लावण्या

बेनामी November 19, 2008 8:13 AM  

khoob ladi mardani. Perfect Prose.

Alok Kataria

Shambhu Choudhary November 19, 2008 8:45 AM  

सुन्दर लेख के लिये बधाई

अल्पना वर्मा November 19, 2008 9:24 AM  

शूरवीर रानी लक्ष्मी बाई को शत शत नमन .
बढिया लेख.

Suresh Chandra Gupta November 19, 2008 9:41 AM  

इस अत्यन्त सुंदर लेख के लिए धन्यवाद. झांसी की रानी को शर-शत नमन.

अभिषेक सागर November 19, 2008 10:07 AM  

बहुत अच्चे आलेख के लिये हर्दिक बधाई।

Natkhat November 19, 2008 11:18 AM  

baht badhiyan, padhakar dil khush ho gayaa.janakari se bharpoor
jitendra Yadav

Vijay Kumar Sappatti November 19, 2008 11:24 AM  

aaj rani lakshmibai ke janamdin ke awsar par ye sabse achi prastuti hai. poora lekh padkar wo josh ,wo ladai aankho ke saamane aa gayi..
sach mein wo din kaise honge ,wo shoorveer kaise honge....
mera un sab sahidon ko sat sat baar naman.

bahut bahut badhai.

regards

vijay

शोभा November 19, 2008 5:04 PM  

आकांक्षा जी,
बहुत सारगर्भित जानकारी दी है। बधाई स्वीकारें।

Rashmi Singh November 19, 2008 7:21 PM  

रानी लक्ष्मीबाई के योगदान के बहाने आधुनिक दौर में नारी-सशक्तीकरण को धार देता यह आलेख बेहद संजीदगी से लिखा और प्रस्तुत किया गया है.....आकांक्षा जी को कोटि-कोटि बधाई !!

mauryark November 19, 2008 7:25 PM  

आज के दिन इस अनुपम प्रस्तुति के लिए आकांक्षा जी को साधुवाद.

Dr. Brajesh Swaroop November 19, 2008 7:40 PM  

यहाँ वह औरत सोयी हुयी है, जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी...यह कथन रानी लक्ष्मीबाई की वीरता को दर्शाता है. उन्हें आपने याद किया.यह आपकी तत्परता और सजगता को दर्शाता है. आकांक्षा जी की लेखनी में दम है.

rsmyadav November 19, 2008 7:44 PM  

रानी लक्ष्मीबाई को अनुपम श्रधांजलि. ऐसी वीर नारियाँ ही भारत की अस्मिता की परिचायक बनती हैं.

kkyadav_ssp November 19, 2008 7:48 PM  

आकांक्षा जी की सुन्दर लेखनी से एक और अतिसुन्दर एवं सारगर्भित प्रस्तुति.

kkyadav November 19, 2008 7:52 PM  

बुंदेलखण्ड की वादियों में आज भी दूर-दूर तक लोक -लय सुनाई देती है- खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी/पुरजन पुरजन तोपें लगा दईं, गोला चलाए असमानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी/सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी......छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी। माना जाता है कि इसी से प्रेरित होकर ‘झाँसी की रानी’ नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चौहान ने 1857 की उनकी वीरता का बखान किया हैं*****************इसी बहाने एक रहस्य से पर्दा तो उठा. वाकई लोक चेतना में अमर शहीदों को जिस तरह याद किया गया है, स्तुत्य है.

महावीर November 19, 2008 11:07 PM  

इस सुंदर एवं सारगर्भित प्रस्तुति के लिए बधाई। अमर शहीदों को शत् शत् नमन।

रितु रंजन November 20, 2008 12:00 AM  

आकांक्षा जी,

आज के दिवस पर महारानी लक्षमी बाई को याद करना अच्छा लगा। आपके आलेखों की प्रशंसा करनी होगी बहुत अच्छी तरह आप प्रस्तुत करती हैं।

नंदन November 20, 2008 12:47 AM  

मर्दानी को खूब याद किया आपने, अच्छा आलेख है।

अजय यादव November 20, 2008 8:02 AM  

रानी लक्ष्मीबाई कोश्रद्धांजलि देता आपका आलेख बहुत सुंदर और प्रभावी लगा. नमन उस अद्भुत वीरांगना को!

विजयराज चौहान "गजब" November 20, 2008 10:55 AM  

AAj ish desh ko kai or jhansi vali rananio ki jaroorat hae.
Achchhi rachna ke liye badhai!

mauryark November 20, 2008 11:01 AM  

Amar Ujala akhbar men aj blog ke kone men Akanksha ji ke is lekh ko padhkar achha laga.

Dr. Brajesh Swaroop November 20, 2008 11:07 AM  

आज के अमर उजाला में सम्पादकीय पृष्ठ पर ब्लॉग कोना में यह अदभुत लेख फिर से पढना रोचक लगा. वाकई आकांक्षा यादव जी का यह लेख अलग हटकर है, फिर से बधाई स्वीकारें.

Rashmi Singh November 20, 2008 11:11 AM  

आकांक्षा जी और सहित्यशिल्पी को बधाई कि रानी लक्ष्मीबाई पर लिखे इस लेख को लीडिंग हिंदी समाचार पत्र अमर उजाला में आज ब्लॉग कोना में प्रस्तुत किया गया है.

मोहिन्दर कुमार November 20, 2008 11:50 AM  

आकांक्षा जी को सुन्दर सारगर्भित लेख के लिये तथा समाचार पत्र में प्रकाशन के लिये बधाई.

kkyadav November 20, 2008 12:28 PM  

क्या बात है....साहित्य शिल्पी की चर्चा चारों तरफ है, कम समय में अच्छा नाम कमाया इस पत्रिका ने. फिर अमर उजाला और अन्य अख़बार क्यों न इसकी चर्चा करें?

Dr. Sujit Kumar Bajpayee November 20, 2008 12:58 PM  

आपके इतने प्रभावी लेख एवं अमर उजाला जैसे समाचार पत्र में उसके प्रकाशन पर आपको हार्दिक बधाई। कृपया उत्तम कार्य करना ज़ारी रखें|

राजीव रंजन प्रसाद November 20, 2008 5:47 PM  

आकांक्षा जी,

आपका आलेख बहुत प्रशंसनीय है। राष्ट्रीय समाचार पत्र में आपकी इस रचना के माध्यम से साहित्य शिल्पी को जो स्थान मिला है इसके लिये आभार। अच्छे रचनाकार ही किसी मंच के उत्थान के कारण होते हैं।


***राजीव रंजन प्रसाद

गीता पंडित (शमा) November 20, 2008 8:25 PM  

सारगर्भित आलेख के लिये

आकाँक्षा जी,
आपको बधाई

praveen pandit November 21, 2008 1:03 PM  

खूब लड़ी मरदानी--

और क्या खूब लिखा आपने।
समय पर दिया जला दिया।

प्रवीण पंडित

Ram Shiv Murti Yadav November 22, 2008 6:37 PM  

Adbhut...Sahitya Shilpi aur Akanksha ji ko badhai.Bas yun hi kadam badhate rahen, karvan judta jayega !!

जूलाई-2009 में अब तक प्रकाशित...

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