चुन चुन कर नग
किस शिल्पी ने
तुम्हें सजाया है।
शायद
चंदन की लकड़ी से
तुम्हें बनाया है।

हवा बसंती
ठहर गयी है
तुम्हारे होठों पर,
या फिर
सावन की मस्ती ने
तुम्हें बुलाया है ?

गंगा में अर्पित पुष्पों सा
है मेरा जीवन,
श्रृध्दा ने ले
रंग सुनहरा
रुप बनाया है।

शीशे जैसे मन में दिखते
पावन कुछ बंधन,
या फिर बादल ने घूँघट में
चाँद छिपाया है।

*****

8 comments:

  1. शब्द भाव का संगम ऐसा मुझको भाया है।
    ऐसा लगता आपने मेरा दर्द बताया है।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. सरल शब्द...बढिया भाव....सुन्दर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन रचना है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. शीशे जैसे मन में दिखते
    पावन कुछ बंधन,
    या फिर बादल ने घूँघट में
    चाँद छिपाया है।
    waah! bahut sundar likha hai. badhayi sweekaren.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सहज बोल हैं किंतु मधुर मृदु।
    पढ़ने के बाद अच्छा अच्छा महसूस होता रहा।
    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर सहज शब्दों में मन की गहरी बात कह गये आप इस रचना के माध्यम से.. बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया भाई ...

    शब्द जी उठे है आपकी कविता में , और मौसम के रंग छा गए है मेरे मन पर......

    बहुत बहुत बधाई


    विजय

    उत्तर देंहटाएं

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