शादी-1

करने को हाथ पीले
बाबुल का भाग्य कैसा
देता दहेज़ वर को
लेकर उधार पैसा
वह कर्ज मे दबेगा
ये नोट हैं लुटाते
खुलती है रोज़ बोतल
लब जाम से लगाते
देखिये सब पैसे की
बरबादी हो रही है
लोग कहते है
शादी हो रही है

शादी-2

आब तक स्वछंद चिड़िया
आज़ाद इस गगन मे
उड़ चली उधर ही
जहां चाह आई मन में
बंध गई है उसकी
उड़ानों की सीमा
एक अदद प्राणी से
बंधकर है
अब तो जीना
ख़तम आज इसकी
आजादी हो रही है
लोग कहते है
शादी हो रही है

*****

21 comments:

  1. पंकज सक्सेना21 नवंबर 2008 को 1:18 pm

    पवन जी, बहुत अच्छी लगीं क्षणिकायें। खुसरो को प्रस्तुत करने के लिये भी साहित्य शिल्पी का धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. शादी के ये रंग भी हैं, आपकी कविता का धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ख़तम आज इसकी
    आजादी हो रही है
    लोग कहते है
    शादी हो रही है

    :)

    अच्छी लगी रचनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपके दृष्टिकोण की प्रशंसा करनी होगी। अच्छी क्षणिकाओं की बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. शादी पर आपकी दोनों ही रचनायें अच्छी बन पडी हैं। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. शादी की तो बरबादी

    कर दी चंदन जी

    चुनाव का वंदन

    कब करोगे कविता

    के नंदन जी।

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  7. वाह बहुत बढ़िया लिखा है।

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  8. बहुत अच्छी कवितायें हैं। बधाई।

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  9. बहुत सुंदर क्षणिकाएं हैं। पवन जी आपको बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  10. उर्दू में शाद का मतलब खुश होता है और उस से ही शादी शब्द आया है ..पर वाकई कुछ कुरीतियों के चलते शादी में लोग ख़ास "शाद " नहीं हो पाते ...शादी में होने वाले फिजूलखर्च को भी हाशिये पर लिया है आपने ..हाँ पर दूसरी कविता में आज़ादी की बात पढ़ कर, सभी कुंवारे डर गए होंगे ..:-) .. शादी से जुड़े कुछ आशावादी पहलू भी कविताओ में निकल कर आयें तो और मज़ा हो |बहरहाल सुंदर रचनाएँ...बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  11. देखिये सब पैसे की
    बरबादी हो रही है
    लोग कहते है
    शादी हो रही है
    सुंदर रचनाएँ...बधाई

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  12. अब मैं क्या कहूँ ...

    पंक्तियों के माध्यम से बहुत अच्छे चित्र !!

    बधाई

    विजय

    उत्तर देंहटाएं
  13. बेहद गंभीर मुद्दे को उठाया है आपने। शादी का अब यही रंग रह गया है, जो बेहद चिंतनीय है।

    रचना अच्छी लगी।

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  14. बीस तारीख़ को मैं पवन कुमार चंदन जी के ही घर में था। उनके लैपटॉप पर उनकी कुछ बेहतरीन कवितायें भी पढ़ी और ’कलमदंश’ जन-मार्च 2006 का अंक भी उनसे माँग कर रख लिया क्योंकि वह अंक पवन कु.’चंदन’ के कृतित्व पर ही केन्द्रित है। पर ’शादी’ की क्षणिकाओं पर उन्होंने कोई चर्चा नहीं की। शायद भूल गये हो!पर उनसे मिलकर यह पता चला कि वे बहुत अच्छे इंसान भी हैं,कवि तो हैं ही। शादी की बरबादी का रंग उन पर तब भी चढ़ा ही था क्योंकि वे अपने किसी रिश्तेदार के बारात-घर की व्यवस्था में चिंतामग्न थे! कहना यही चाहता हूँ कि कविता या व्यंग्य जो भी हो, कोई भी रचना उनसे गुज़र कर उनको मथकर ही पाठकों तक आती है और इस वज़ह से खा़स बन जाती है।-सुशील कुमार।

    उत्तर देंहटाएं
  15. बीस तारीख़ को मैं पवन कुमार चंदन जी के ही घर में था। उनके लैपटॉप पर उनकी कुछ बेहतरीन कवितायें भी पढ़ी और ’कलमदंश’ जन-मार्च 2006 का अंक भी उनसे माँग कर रख लिया क्योंकि वह अंक पवन कु.’चंदन’ के कृतित्व पर ही केन्द्रित है। पर ’शादी’ की क्षणिकाओं पर उन्होंने कोई चर्चा नहीं की। शायद भूल गये हो!पर उनसे मिलकर यह पता चला कि वे बहुत अच्छे इंसान भी हैं,कवि तो हैं ही। शादी की बरबादी का रंग उन पर तब भी चढ़ा ही था क्योंकि वे अपने किसी रिश्तेदार के बारात-घर की व्यवस्था में चिंतामग्न थे! कहना यही चाहता हूँ कि कविता या व्यंग्य जो भी हो, कोई भी रचना उनसे गुज़र कर उनको मथकर ही पाठकों तक आती है और इस वज़ह से खा़स बन जाती है।-सुशील कुमार।

    उत्तर देंहटाएं
  16. डरा रहे हैं आप ।
    किंतु , निश्चय ही, इस कोण से नावाक़िफ़ नहीं रहा जा सकता।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं

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