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हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है
तू है पैसा, तू ख़ुदा, तेरी वफ़ादारी है।

नंगापन भी तो यहां फ़न की तरह बिकता है
अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।

कट गया दिन तो मेरा भीड़ में जैसे तैसे
लेकिन अब चांद बिना रात बहुत भारी है।

गौर से देख जरा बीज से अंकुर फ़ूटा
ये खुदा है ये उसी की ही खलक सारी है।

छोड़ दो जिद न करो हार चुके हो अब तुम
अब कोई दांव न खेलो तो समझदारी है।

24 comments:

  1. सुन्दर ख्यालात समेटे गजल..

    नंगापन भी तो यहां फ़न की तरह बिकता है
    अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।

    आज की सच्चाई यही है.

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  2. पंकज सक्सेना10 नवंबर 2008 को 1:17 pm

    नंगापन भी तो यहां फ़न की तरह बिकता है
    अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।

    गौर से देख जरा बीज से अंकुर फ़ूटा
    ये खुदा है ये उसी की ही खलक सारी है।

    बहुत खूब।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन गज़ल, बहुत बधाई।

    नंगापन भी तो यहां फ़न की तरह बिकता है
    अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. छोड़ दो जिद न करो हार चुके हो अब तुम
    अब कोई दांव न खेलो तो समझदारी है।

    हर शेर उम्दा है, बहुत बढिया। लिखते रहें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. Very nice, keep writing.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी गज़ल है सतपाल जी, हर शेर अच्छा बन पडा है। बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह ! बहुत बहुत सुंदर ग़ज़ल......हरेक शेर लाजवाब........

    उत्तर देंहटाएं
  8. एक दम कड़क ग़ज़ल कही सतपाल जी | दो चार शेर और हो जाते तो और मज़ा होता | :-)

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है सतपाल साहेब।
    हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है
    तू है पैसा, तू ख़ुदा, तेरी वफ़ादारी है।
    नंगापन भी तो यहां फ़न की तरह बिकता है
    अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।
    वाह! क्या बात है!

    उत्तर देंहटाएं
  10. गौर से देख जरा बीज से अंकुर फ़ूटा
    ये खुदा है ये उसी की ही खलक सारी है।

    बहुत खूब।

    छोड़ दो जिद न करो हार चुके हो अब तुम
    अब कोई दांव न खेलो तो समझदारी है।

    वाह......

    उत्तर देंहटाएं
  11. bahut shukria sahitya shilpi team ka mujhe dubara mauka dene ka aur sab ka shukrgujar hooN ki sab ne saraha.
    aapka
    khyaal

    उत्तर देंहटाएं
  12. गौर से देख जरा बीज से अंकुर फ़ूटा
    ये खुदा है ये उसी की ही खलक सारी है।

    छोड़ दो जिद न करो हार चुके हो अब तुम
    अब कोई दांव न खेलो तो समझदारी है।
    बहुत अच्छा लिखा है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. Bahut hee achchhee gazal hai
    Satpal jee.Sabhee ashaar mein
    aapne jadoo bikhera hai.dheron
    badhaaeean.

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  14. सतपाल जी

    जवाब नहीं आपकी गज़लों का, पहली और महत्वपूर्ण बात कि आप शिल्प को पकड कर चलते हैं। लेकिन असल कविता तो कथ्य है जिसपर आपकी गहरी पकड भी है। हर एक शेर बेहतरीन। प्राण साहब जैसे विद्वतजनों की प्रशंसा आपको मिल चुकी है अत: मेरे कहने को कहाँ रह जाता है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  15. बेहतरीन गज़ल। अंतर्वस्तु यथार्थ के अत्यंत सन्निकट-
    नंगापन भी तो यहां फ़न की तरह बिकता है
    अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।
    -सुशील कुमार।

    उत्तर देंहटाएं
  16. सतपाल जी आप की ग़ज़ल पढ़ कर आनंद आ गया...बहुत असर दार शेर हैं आपके...जिस ग़ज़ल की प्राण शर्माजी और महावीर जी ने प्रशंशा कर दी हो वो ग़ज़ल तो कमाल की होगी ही...
    लिखते रहें और हमें ऐसे ही खुश करते रहें...आमीन.
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  17. सतपाल जी, जब इतने सारे लोग तारीफ़ कर चुके हैं तो मेरे कहने को कुछ रह ही कहाँ जाता है. बधाई स्वीकारें!

    उत्तर देंहटाएं
  18. बढिया गज़ल है । कुछ शेर बेहतरीन हैं जैसे कि
    नंगापन भी तो यहां फ़न की तरह बिकता है
    अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।

    बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  19. हर शेर अपने आप मे बेमिसाल ।
    भई वाह ! बेहतरीन गज़ल ।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  20. ख्याल ने खूबसूरत ग़ज़ल कही है
    ग़ज़ल में लहज़ा है नाज़ुक ख़याली है
    नया अंदाज़ है और फ़िक्र भी
    अल्लाह करे ज़ोरे कलम और ज़ियादा ----

    चाँद शुक्ला हदियाबादी
    डेनमार्क

    उत्तर देंहटाएं
  21. शब्द खो गये पास थे जो टिप्पणियों में
    चुरा कर लिख दूँ तो भी इमानदारी है...

    सचमुच लगता है शब्द सारे ऊपर की टिप्पणीयों ने चुरा लिये हैं मगर लिखना ही होगा कि,..बहुत सुन्दर गज़ल के लिये आपको बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  22. एक बार फ़िर सबका तहे-दिल से शुक्रिया.
    आपका ख्याल.

    उत्तर देंहटाएं

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