अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..

मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
कांपते है , जब मैं
उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..

तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है
जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था ,
मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …

तेरे जिस्म का एहसास मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है
मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में ,
पर तेरी मुस्कराहट ,
जाने कैसे बहती चली आती है ,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …..

कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
या तो तू यहाँ आजा ,
या मुझे वहां बुला ले......

मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........

21 comments:

  1. कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
    कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
    कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
    या तो तू यहाँ आजा ,
    या मुझे वहां बुला ले......

    मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........

    प्रशंसनीय रचना है। बहुत बधाई विजय जी। आपकी भावों व शब्दों पर गहरी पकड है। साहित्य शिल्पी पर स्वागत।

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  2. अक्सर तेरा साया
    एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
    और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..

    मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
    और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …

    पर तेरी मुस्कराहट ,
    जाने कैसे बहती चली आती है ,
    न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …..

    बहुत प्रभावी उपमाओं के साथ कविता बहुत अच्छी बन पडी है। बधाई।

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  3. वही कविता है जो सीधे मन पर प्रभाव छोडे। नारी पात्र को केन्द्र में रख कर लिखना निश्चित ही कठिन रहा होगा..आप सफल हुए हैं।

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  4. "या तो तू यहाँ आजा ,
    या मुझे वहां बुला ले......"
    उम्दा अंत .. और अंत क्या शुरुआत है ये तो .. :-) सूफी विचारधारा द्रष्टिगोचर होती है |
    "मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
    कांपते है".. कंपकंपाहट को दिल से हाथ तक बहुत सरल शब्दों में पहुंचाया जो अब हमारे दिलो में भी है .. :-)

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  5. पंकज सक्सेना17 नवंबर 2008 को 2:42 pm

    कई बार पढा और कई बार पढूँगा। एसी कविताये6 कम जी पढने को मिल पाती हैं।

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  6. बहुत अच्छी कविता है, अशोक कुमार पाण्डेय जी की निजी राय पर भी बात नहीं हो सकती चूंकि टिप्पणी कारण-विहीन है, काश वे विस्तार से स्वस्थ समालोचना करते। कविता प्रवाहित होती है, कविता अनेकों उत्कृष्ट बिम्ब हैं और सबसे बडी बात इसका अंत...बहुत बधाई विजय जी।

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  7. पुरानी यादे ताजा कराने वाली कविता है। गहरी रचना।

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  8. तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है
    जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था ,
    मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
    और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …
    waah! bahut badhiya. aanand aa gaya.

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  9. Nice poem, Deep thoughts.

    Alok Kataria

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  10. vistaar se vivechana karna to chahta hun lekin muze lagta hai net uske liye sahi jagah nahi.khair muze is kavita me kuch bhi saarthak nahi fikhta ek vyarth saa pralaap..prem bhi prem nahi hai.ek ajeeb se adhyatmik jhol me shabdon ko yahan vahan tank diya gaya hai.kuch is tarah ki aurat ki paramparik chavi ko bas defend kiya gaya hai vahi chavi jo bas prem ke naam par tasue bahati rahti hai..tere bin mai adhoori vali..jo mulatah stree virodhi hai.
    nothing personal, kavi ko meri dher saari subhkaamnaayen..lekin jo kavitaa apne yug ke jan ki awaaj nahi hoti vah antatah ek kharab kavita hi hoti hai...

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  11. विजय कुमार जी,

    आपकी कविता बहुत अच्छी व गहरी है। आध्यात्म का संपुट भी है व बिम्बों की कलात्मकता के साथ शब्दों का मनोहारी तानाबाना है।
    ------------------------------

    अशोक कुमार पाण्डेय जी,

    किसी भी रचना पर समालोचना एक स्वस्थ परंपरा है लेकिन कविता को किसी भाव विशेष के दायरे में बाँधा जाना भी सही नहीं। किसने कहा कि कविता लिखी जाती है, यही एक मात्र विधा है जो अवतरित होती है।

    कविता पर आपका दृष्टिकोण स्वागत योग्य है लेकिन केवल आपके निजी विचार से कोई कथ्य खारिज नही हो जाता।

    केवल "युग की आवाज ही कविता है" यह परिभाषा उचित नहीं जान पडती। आपसे सकारात्मक दृष्टिकोण की अपेक्षा रखते हुए आपके कविता पर विचार साहित्य शिल्पी sahityashilpi@gmail.com पर आमंत्रित है। इस पर एक व्यापक चर्चा ही विद्वतजनों से करवायी जानी चाहिये।
    इसका आयोजन मंच पर शीघ्र किया जायेगा।

    आप साहित्य शिल्पी पर आये व अपने विचार प्रस्तुत किये इसका आभार। अन्य रचनाओं पर भी अपने विचार प्रस्तुत करते रहें।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  12. bhai mai nahi janata tha ki net par bhi sampadak fatve fete hain.na mere niji vichaar se koi khariz ho sakta hai na aapke fatve se koi sthapit.
    in manchon ko sampadkeeya tanashasahi se bacha ke rakhen to sabka bhala hoga.sahitya ke pathak prashanshaa hi nahi karte aur ek acchaa lekhak khud ko aalochanaon ke liye khula rakhta hai.lekin sampadak ka aisa hastakshep maine aajtak kahin nahi dekhaa...

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  13. प्रभावी रचना.....सुन्दर प्रस्तुति....

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  14. मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........
    विजय जी ने भी दरवाज़े खुले छोड़ दिये हैं । मैं समझता हूं कि हर एक विचार के स्वागत मे वो स्वयं भी तत्पर हैं ।
    बहुत से बिंब बहुत आकर्षक हैं रचना मे।

    प्रवीण पंडित

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  15. दोस्तों,

    पहले तो मैं आप सब के प्यार के लिए आप का धन्यवाद् करता हूँ .....

    कल मेरा जन्मदिन था , और मैं शुक्रगुजार हूँ "साहित्य शिल्पी " की team का ,जिन्होंने ,मेरे जन्मदिन का सबसे बड़ा तोहफा मुझे दिया ... बहुत आभारी हूँ मैं उनका ..मैं तहे दिल से "साहित्य शिल्पी " टीम का शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे ये मौका और ये मंच दिया...

    मैं अपने मन के लिए लिखता हूँ ,और मुझ पर ये खुदा कि मेहर है कि मेरी नज्मों में आप सब को अपना अक्स ,अपने जज़्बात , अपनी छवि नज़र आती है .

    मैं करीब १५-२० सालों से लिख रहा हूँ , पर कभी, कहीं पर publish नही किया . मेरी नज्मों की तारीफ , श्री हिमांशु जोशी, श्रीमती अमृता प्रीतम ,इत्यादि ने किया है पर मेरे career के demands ने मेरे लेखन पर एक बंदिश बनाये रखी , और अब जब मैं थोड़ा अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हुआ हूँ , तो blogging और publishing etc. में दिलचस्पी ले रहा हूँ . और इसी सिलसिले का नाम है "साहित्य शिल्पी " पर मेरी ये कविता.....

    मैंने श्री अशोक कुमार पांडेय के comments पढ़े ,और मुझे बहुत दुःख हुआ. अशोक जी मैं इस सन्दर्भ में कुछ कहना चाहता हूँ. मेरी ये कविता " सिलवटों की सिहरन " मेरी सबसे अच्छी love poems में से एक है . और ईश्वर के आशीर्वाद से ये सबको पसंद आई है . आपको क्यों पसंद नही आई ,मैं नही जान सका . इस नज़्म में प्यार है ,मिलन है , विरह है ,यादें है ,बंदिशे है , खुदा का डर है , मोहब्बत की खुशबु है , सपने है ,ज़िन्दगी है और एक spiritual sufism का undertone है . आश्चार्य है की आपको इन सब में से कुछ भी नज़र नही आया .
    अशोक जी , कविता में बहना चाहिए ,न की उसमें मीन- मेख निकलना. इस दुनिया में बहुत से problems है और उसमे अगर मैं कुछ ख्वाब बुनता हूँ तो उसमे negativity नही देखनी चाहिए .

    उम्मीद है की आप इस कविता के जज्बातों को समझेंगे . धन्यवाद्.

    मेरे दोस्तों , आप सभी का मेरे blog पर स्वागत है , जब भी आप सब का जी चाहे की सपनो की दुनिया में जाया जाएँ , या अपनों की दुनिया में जाया जाए तो click करिए : www.poemsofvijay.blogspot.com , वहां मैं और मेरी नज्में आपका स्वागत करेंगी .

    जय हिंद
    आप सबका
    विजय कुमार,
    Hyderabad.
    M : 09849746500
    E : vksappatti@rediffmail.com और vksappatti@gmail.com
    B : www.poemsofvijay.blogspot.com

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  16. सुन्दर प्रस्तुति... प्यार के अहसास पीडा और इन्तजार को समेटे हुये

    उत्तर देंहटाएं
  17. अक्सर तेरा साया
    एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
    और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..बहुत सुन्दर रचना
    http://athaah.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

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