जैसी नदिया की धारा
ढूँढे अपना, किनारा,
जैसे तूफ़ानी सागर मे,
माँझी, पाये किनारा,
जैसे बरखा की बदली,
जैसे फ़ूलों पे तितली,
सलोने पिया, मोरे
सांवरिया,
वैसे मगन, मै और तुम

लिपटी जैसे बेला की
बेल,
ऊँचे घने पीपल को घेर,
जैसे तारों भरी रात,
चमक रही चंदा के साथ,
मेरे आंगन मे चाँदनी,
करे चमेली से ये बात,
सलोने पिया, मोरे
सांवरिया

18 comments:

  1. लिपटी जैसे बेला की
    बेल,
    ऊँचे घने पीपल को घेर,
    जैसे तारों भरी रात,
    चमक रही चंदा के साथ,
    मेरे आंगन मे चाँदनी,
    करे चमेली से ये बात,
    सलोने पिया, मोरे
    सांवरिया
    सुन्दर अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. UPMAAON SE BHAREE EK SUNDER RACHNA.
    LAVANYA JEE AAPKO MUBBARAK.

    उत्तर देंहटाएं
  3. "जैसी नदिया की धारा
    ढूँढे अपना, किनारा,"
    नदिया की धारा को हमेशा सागर को खोजते ही सुना था.. नयी उपमा की नयी कविता ले कर आयी आप..जब नदिया अपना किनारा खोजने चली हो ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप सभी का धन्यवाद
    कविता को पसँद करने के लिये -
    स स्नेह सादर,
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं
  5. जैसे बरखा की बदली,
    जैसे फ़ूलों पे तितली,
    कितने सुंदर शब्द चुन कर पिरोये हैं आपने अपनी इस रचना में...वाह...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  6. भावपूर्ण, उत्तम उपमाओं का प्रयोग और सुंदर शब्द चयन - पढ़ कर आनंद आ गया। बधाई हो।

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रेम भाव से परिपूर्ण सुन्दर कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  8. पंकज सक्सेना25 नवंबर 2008 को 8:18 am

    उपमानों का जवाब नहीं। बहुत अच्छी कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आज के समय में आपकी कविता को पढना सु:खद है। एसा स्तर और प्रस्तुतिकरण अब कहाँ, एसी कविता अब नहीं रची जातीं।

    उत्तर देंहटाएं
  10. भावप्रधान-शब्दसौन्दर्य से भरी रचना। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  11. ऊँचे घने पीपल को घेर,
    जैसे तारों भरी रात,
    चमक रही चंदा के साथ,
    मेरे आंगन मे चाँदनी,
    करे चमेली से ये बात,
    सलोने पिया, मोरे
    सांवरिया

    बहुत अच्छी रचना है लावण्या जी।

    उत्तर देंहटाएं
  12. सुंदर रचना।
    रचना के सारे शब्द मुझे समझ आए बस "युति" को छोड़कर। कृप्या इसका अर्थ बताएँगीं!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  13. सुकोमल भाव --सुंदर बिंब ।
    रचना दूर तक बहा कर के गयी।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं

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