साथी हो तो साथ दो

सुख के साथी तुम, तो दुख का कौन?

हँसी में तुम तो गम में कौन?

मेरे तो तुम्ही सब कुछ

गीता और रामायण भी तुम

अगला जन्म भी तुम

शब्द भी तुम

अर्थ भी तुम

सवाल भी जवाब भी तुम

भागो, किंतु जाओगे कहाँ

तुम्हारे भीतर की आँखें जो मेरी है

करेंगी पीछा तुम्हारा

भटकते रहोगे तुम

खुशी की चाह में

परबत/दरिया और मरुथल


पर मत भूलो कि कडी धूप में

तुम्हारे लिये पानी की पहली बूँद

फिर मैं ही हूँ।

20 comments:

  1. Ek marmik kavita.Sunder shabd aur
    sunder abhivyakti.Badhaaee.

    उत्तर देंहटाएं
  2. plz check posting format.
    Nice poem.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी कविता है, आपने अंत कासुन्दर निर्वाह किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पर मत भूलो कि कडी धूप में
    तुम्हारे लिये पानी की पहली बूँद
    फिर मैं ही हूँ।

    बहुत अच्छी कविता के लिये बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खूब ऋतु जी ... संवेदनशील रचना.. जो अपने को सही तरीके से संप्रेषित कर पाई !

    उत्तर देंहटाएं
  6. पर मत भूलो कि कडी धूप में


    तुम्हारे लिये पानी की पहली बूँद


    फिर मैं ही हूँ।


    bhai wah ritu g
    badhai........

    उत्तर देंहटाएं
  7. abhivyaktiyon ka sunder prastutikaran

    subhmangalam
    brijesh sharma

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुँदर कविता लिखी आपने रितुजी
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं
  9. स्त्रीत्व का भारतीय संदर्भ। एक सुन्दर कविता। और भी गुंजाईश थी अभिव्यक्ति की.. फिर भी कविता का अंत शेष कविता की अपूर्णता को भर जाती है। रितु। धन्यवाद।-सुशील कुमार।

    उत्तर देंहटाएं
  10. पर मत भूलो कि कडी धूप में
    तुम्हारे लिये पानी की पहली बूँद
    फिर मैं ही हूँ।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति, बधाई।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  11. सहज सहल शब्दों में गूढ अर्थ लिये कविता... बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  12. भागो, किंतु जाओगे कहाँ
    तुम्हारे भीतर की आँखें जो मेरी है
    करेंगी पीछा तुम्हारा
    निश्चय ही बहुत सुंदर रचना,भावपूर्ण व प्रभावपूर्ण।


    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  13. रितु जी,
    बहुत ही अच्छी कविता....

    उत्तर देंहटाएं

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