इन्टरनेट ने सचमुच इस दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। कला साहित्य और संस्कृति से जुड़े पाठकों व रचनाकारों के लिए संयुक्त अरब अमीरात के शारजाह नगर में बसी पूर्णिमा वर्मन कोई नया नाम नही है।
२७ जून १९५५ के दिन पीलीभीत (उत्तर प्रदेश) की मनोरम घाटियों में इस रचनाकार का अवतरण हुआ। संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर व संस्कृत साहित्य पर शोध व पत्रकारिता एंव वेब डिजाईनिंग में डिप्लोमा प्राप्त कर पूर्णिमा जी पिछले ढाई दशकों से लेखन, संपादन, स्वतन्त्र पत्रकारिता, अध्यापन, ग्राफ़िक-डिजाईनिंग और जाल प्रकाशन में जुटी हुई हैं। अंतर्जाल पर ’अभिव्यक्ति’ और ’अनुभूति’ जाल पत्रिकाओं के संपादन का भार पूर्णिमा जी के काँधे पर है।

११ सतिम्बर २००८ को नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबीटेट सेंटर में जो कि दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था, जिन में सर्वश्री पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर, अरविंद कुमार, राहुल देव, वी के मल्होत्रा, प्रेम जनमेजय, बालेन्दु दाधीच, जैनेन्द्र कर्दम, मनोहर पुरी, विजेन्द्र विज, वर्तिका नंदा, डॉ जगदीश व्योम, राजीव कुमार, आशीष भटनागर, अविनाश वाचस्पति, राजीव तनेजा, सुशील कुमार, पुष्कर पुष्प, उमाशंकर मिश्र, पायल शर्मा इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं; पूर्णिमा वर्मन जी को जयजयवंती सम्मान से सम्मानति किया गया। जयजयवंती – हिन्दी संगोष्ठी; हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी के पावन उद्देश्य को लेकर पिछले एक वर्ष से सफलतापूर्वक चलाई जा रही है और हिन्दी के विविध पहलुओं के विकास के लिए उल्लेखनीय कार्य कर रही है।

आईये इन से कुछ बातचीत करें व इन्हें और नजदीक से जानें।

साहित्य शिल्पी: पूर्णिमा जी, आपके दो चिट्ठे भी हैं ’चोंच में आकाश’ व ’धूप बारिश’। आपने यह चिट्ठे कब बनाए और क्या आप इन पर नियमित लिख रही हैं?
पूर्णिमा वर्मन: जब कभी समय होता है, बहुत से काम करने को मन होता है। ऐसे ही किसी समय में ’धूप बारिश’ 2006 में बना था। सोचा था, इसमें दैनिक डायरी कविता में लिखूँगी। किसी दिन नहीं लिखा तो भी कोई बात नहीं पर रोज़ लिखी हुई कविताएँ इकट्ठी होती रहेंगी, खोएँगी नहीं। ’चोंच में आकाश’ इधर-उधर बिखरे गीतों को समेटने के लिए शुरू किया था पर वह भी काम अधूरा छूट गया। बहुत से काम बीच में शुरू होते रहते है और पुराने रुक जाते हैं। नियमित तो ’अभिव्यक्ति’ ’अनुभूति’ के सिवा कुछ नहीं है।

साहित्य शिल्पी: पूर्णिमा जी, मनुष्य को जो कुछ भी प्राप्त होता है; वह वंशानुगत, ईश्वरीय, रूचि से अथवा सामाजकि होता है। आपको लेखन किस से धरोहर के रूप में मिला?
पूर्णिमा वर्मन:मेरे विचार से सभी कुछ है थोड़ा थोड़ा।

साहित्य शिल्पी: क्या आप अपनी पहली-पहली रचना के बारे में कुछ बता पायेंगी?
पूर्णिमा वर्मन: पहली कविता कब लिखी वह तो ठीक से याद नहीं; पर जो सबसे पुरानी कविता मेरे पास सुरक्षित है वह 1966की है। हम उन दिनों पेंसिल से लिखा करते थे। स्याही भरने वाली कलम काफ़ी विशेष वस्तु मानी जाती थी। उस साल जन्मदिन पर पहली बार पिताजी ने ऐसी एक कलम उपहार में दी थी। इस कलम के खो जाने पर यह कविता लिखी गई थी।

साहित्य शिल्पी: श्रेष्ठ लेखन के लिए स्वयं लेखक का एक पाठक होना बहुत आवश्यक है; यह सभी जानते व मानते हैं। आप किस तरह का साहित्य पढ़ना पसंद करती हैं? आपके प्रिय लेखकों व उनकी रचनाओं के नाम जिन्होंने आप पर छाप छोड़ी?
पूर्णिमा वर्मन: अभी भी कविताएँ पढ़ना ज्यादा पसंद है। अलग-अलग भाषाओं की कविताओं के अनुवाद पसंद आते हैं। खासतौर पर प्रकृति से संबंधित और जीवन से संबंधित कविताएँ; पर जो कुछ मिल जाए पढ़ना अच्छा लगता है, विशेष रूप से भारतीय साहित्य पर आधारति कागज़ पर छपने वाली पत्रिकाएँ वागर्थ, ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम जो समकालीन भारतीय साहित्य के विषय में जानकारी देती हैं।

साहित्य शिल्पी: पत्रकारिता और लेखन-संपादन में से आपको कौन सा चेलेंजिंग लगता है?
पूर्णिमा वर्मन: चैलेंजिंग की दृष्टि से कोई काम नहीं करती हूँ, बस जो सुख शांति देता है वह करती हूँ। स्पर्धा वाला सरदर्द नहीं चाहिए। मेरा सब कुछ काम अमन-चैन का है।

साहित्य शिल्पी: आपने अपनी जाल पत्रिकाओं पर आम लेखकों और स्थापित लेखकों दोनों को स्थान दिया है,इसका कारण व आम रचनाकारों से आपकी क्या अपेक्षायें हैं?
पूर्णिमा वर्मन: कारण तो यही है कि दुनिया के सामने साहित्य का संतुलति क्रम पहुँचाया जा सके। अपेक्षा यह है कि नए कंप्यूटर-कर्मी हिन्दी से जुड़ें और पुराने साहित्यकार कंप्यूटर से; तभी तो दोनों पीढि़यों का सामंजस्य बनेगा और दोनों एक दूसरे से सीखेंगे।

साहित्य शिल्पी: आम रचनाकार द्वारा लिखी गयी कोई रचना जो आप तक पहुँची और आपके मन को बहुत भा गयी हो?
पूर्णिमा वर्मन: बहुत सी है मैंने जो कुछ पत्रिका में रखा है, सब कुछ मुझे पसंद आने के बाद ही रखा है। नए लेखकों में प्रत्यक्षा, इला प्रसाद और तरुण भटनागर की कहानियाँ बहुत अच्छी हैं। कविताओं में भी कुछ लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं।

साहित्य शिल्पी: साहित्य तथा भाषा दोनों का गूढ़ सम्बन्ध है...आप प्रकाश डालें, भाषा की समृद्धि के लिए क्या किया जाना आवश्यक है?
पूर्णिमा वर्मन: साहित्य, संगीत, कला के अतिरिक्त भाषा को जीवन से जोड़ना ज़रूरी है। शिक्षा से जोड़ना ज़रूरी है और उच्च शिक्षा से भी। इसके अभाव में भाषा के बोली बन जाने और फिर लुप्त हो जाने के खतरे बढ़ते हैं।

साहित्य शिल्पी: आपकी कोई कृति जो आपके मन के बहुत करीब हो?
पूर्णिमा वर्मन: शायद इतना नहीं लिखा है मैंने।

साहित्य शिल्पी:आप किन विषयों पर लिखना अधिक पसंद करती हैं?
पूर्णिमा वर्मन:व्यंजन विधियों से कविताओं तक जो भी मन को भा जाए या जिसकी भी ज़रूरत हो।

साहित्य शिल्पी: जाल पत्रिकाओं की स्थापना का विचार आप के मन में कब और कैसे आया? आरम्भ में आपको किन किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
पूर्णिमा वर्मन: मैंने अपना पहला जालघर 1996 में बनाया था। तब मुझे मालूम नहीं था कि वेब पर हिन्दी कैसे लिखते हैं। 1998 में सुशा का पता चला। उसके बाद एक वेब पत्रिका में लगभग साल भर तक काम किया उसी समय लगा कि जब तक पत्रिका की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथ में न हो, उसको स्तरीय नहीं बनाया जा सकता। इसी विचार ने अपनी पत्रिकाएँ बनाने को प्रेरित किया|

साहित्य शिल्पी: साहित्य की सेवा करते हुए आपको कई लोगों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ होगा, कुछ नाम जिन का आप ज़िक्र करना चाहेंगी|
पूर्णिमा वर्मन: मेरे सहयोगी प्रो. अश्वनि गाँधी और दीपिका जोशी जो बिलकुल अपरिचित थे और जिनके साथ मुलाकात भी पत्रिका शुरू होने के बाद हुई। आज के प्रख्यात कवि मंगलेश डबराल और बीबीसी की रजनी कौल जिन्होंने मेरे प्रारंभिक लेखन को सुधारा, उसे सही दिशा प्रदान की और निरंतर प्रकाशित-प्रसारित कर के मुझे पहचान दी..इनसे मैं आज तक कभी मिली नहीं हूँ।

साहित्य शिल्पी: २४ घंटों में से कितने घंटे लेखन व संपादन के काम को समर्पित रहते हैं व इसके साथ घर का तालमेल आप केसे बिठाती हैं?
पूर्णिमा वर्मन: कोई नियम तो नहीं है, सब कुछ साथ-साथ चलता रहता है।

साहित्य शिल्पी: भारी भरकम प्रश्नों के बाद कुछ हलके-फुल्के प्रश्न; क्या आप वतन की हवाओं की कमी महसूस करती हैं? पूर्णिमा वर्मन: हाँ ज़रूर, मौसम और हवा तो खास हैं उत्तर भारत के। साल में ऐसी 6 ऋतुओं वाली धरती और कहीं नहीं।

साहित्य शिल्पी: यदि ईश्वर साक्षात आपके सामने आ कर कोई वरदान मांगने को कहे तो आप क्या मांगेंगी?
पूर्णिमा वर्मन:हिन्दी बोलने वाले सम्मान के साथ जी सकें और डॉक्टर इंजीनयिर या व्यापार की ऊँची पढ़ाई के लिए उन्हें विदेशी भाषा सीखने में समय न बरबाद करना पड़े।

साहित्य शिल्पी
: आपकी कोई अधूरी इच्छा ?
पूर्णिमा वर्मन: फिलहाल तो यही तमन्ना है कि 2009 के अंत तक हिन्दी विकिपीडिया में एक लाख हिन्दी लेख हो जाएँ। इस समय 21 से 22 हज़ार के बीच हैं; हमें शायद 200-250 पन्ने रोज़ की ज़रूरत है।

साहित्य शिल्पी:कोई संकल्प जिसे आप दोहराना चाहें ?
पूर्णिमा वर्मन:राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के यही शब्द, "मुट्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।"

साहित्य शिल्पी: आपकी कोई विशेष उपलब्धि जिसे आप हमारे पाठकों के साथ बाँटना चाहेंगी ?
पूर्णिमा वर्मन: देश-विदेश में फैले उन तमाम लोगों का अपार स्नेह जो अभिव्यक्ति और अनुभूति के लिए मुफ्त काम करते हैं।

साहित्य शिल्पी: अंत में हमारे पाठकों और साहित्य शिल्पी के लिए आपकी तरफ़ से कोई संदेश?
पूर्णिमा वर्मन: पत्रिका से पाठकों का विकास होता है और पाठकों से पत्रिका का – इसलिए आपसी तालमेल और संवाद बनाए रखें।

साहित्य शिल्पी: पूर्णिमा जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने अपनी व्यस्त दिनचर्या में से हमारे लिये समय निकाला, आशा है कि भविष्य में भी आपका स्नेह हमें प्राप्त होता रहेगा|

24 comments:

  1. जयजयवंती सम्मान mil ne par bahut bahut badhayee.
    Poornima ji ke baare mein jaan kar achcha laga...
    -antrjaal par un ki ptrika Abhivyakti se hi unka parichay mila tha---un sey milne ki tamNna hamesha rahi hai kyunki wo bhi UAE mein hi hain-lekin abhi tak to sambhav nahin ho paya-

    --un ke athak parishram ka hi parinaam hai ki 'Anubhuti' aur 'abhivyakti 'patrika sab se lok priya hindi web-patrika hain.

    -abhaar sahit

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  2. पूर्णिमा जी,आपको ब्लॉग पे देखा,जुलाइ मैं दुबई मैं हिन्दी साहित्य सम्मलेन मैं आपसे मुलाक़ात हुई थी,ताना-बाना मैं आपका हार्दिक स्वागत है

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. पूर्णिमा जी को और नज़दीक से जान कर अच्छा लगा | सहित्यशिल्पी समूह को धन्यवाद एवं बधाई |

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  5. बधाई आपको पूर्णिमा जी...

    साक्षात्कार पढकर अच्छा लगा.....हिंदी-जगत में आपके विशेष योगदान के लियें...

    आभार...

    स-स्नेह

    गीता पण्डित

    उत्तर देंहटाएं
  6. पूर्णिमा जी की असल बातचीत तो वह है जो प्रति सप्‍ताह वे अभिव्‍यक्ति में कलम गही नहिं हाथ के जरिए व्‍यक्‍त करती हैं। बिना पूछे ही सहज, सरल जानकारी क्‍या उनसे की गई बातचीत से किसी मायने में कम है। मेरी चाहना है कि यह क्रम सतत प्रवाहमान रहे।
    उनसे जयजयवंती सम्‍मान समारोह के अवसर पर हुई मुलाकातें और बातचीत मेरे जीवन की अविस्‍मरणीय निधि हैं।

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  7. poornimaji ka interview padha,sahee mayne men unka karya mahtavpoorn hai ,apko bahut badhee !

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  8. पूर्णिमा जी को जयजयवंती सम्मान के लिए बधाई।
    साक्षातकार बहुत अच्छा लगा। पू्र्णिमा जी ने बड़ी सुन्दरता से उत्तर दिए हैं जिससे उनके बारे में और भी अधिक जानने का अवसर मिला। साहित्यशिल्पी टीम को धन्यवाद।

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  9. पूर्णिमाजी को जयजयवँती सम्मान के लिये बहुत बधाई व शुभकामनाएँ -साक्षात्कार बहुत अच्छा लगा

    - लावण्या

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  10. जयजयवंती सम्मान के लिए बहुत बहुत बधाईया। पर्व त्योहारो पर आपकी कविताए बहुत सुन्दर लगती है।

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  11. साक्षात्कार की विशेषता यह होती है कि वह कई ऐसी चीजों को भी हमारे सामने ला देता है, जो बहुत सामान्य सी चीजें समझकर दबी रह जाती हैं किन्तु होती महत्वपूर्ण हैं। इस लिहाज से भी पूर्णिमा जी का साक्षात्कार अच्छा रहा। अक्सर उनसे चैट होने के बावजूद बहुत ही ऐसी चीजें थीं, जो पहली बार मालूम हुईं। शुक्रिया इस प्रस्तुति के लिए।

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  12. purnima ji,s work for wikipedia is appreciable.

    Alok Kataria

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  13. पूर्णिमा जी से परिचित हो कर बहुत अच्छा लगा। आपको सम्मान की बधाई।

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  14. पूर्णिमा वर्मन जी का साक्षात्कार साहित्य शिल्पी पर पढ कर अच्छा लगा। बधाई साहित्य शिल्पी को इस प्रस्तुति के लिये।

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  15. अच्छा लगा पूर्णिमा जी का साक्षात्कार पढना। धन्यवाद साहित्य शिल्पी।

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  16. साक्षात्कार में दम नहीं है इतनी बड़ी सम्पादिका से अच्छे सवाल नहीं किये गये.अच्छी पत्रिका और अच्छे मैटर से पाठकों का विकास होता है .कमेंट तो लोग करते रहते है.उनमें कुछ दोस्त होते है और कुछ छपने के लिए ...

    उत्तर देंहटाएं
  17. नए कंप्यूटर-कर्मी हिन्दी से जुड़ें और पुराने साहित्यकार कंप्यूटर से....... भाषा को उच्च शिक्षा से जोड़ना ज़रूरी है...... हिन्दी बोलने वाले सम्मान के साथ जी सकें और डॉक्टर इंजीनयिर या व्यापार की ऊँची पढ़ाई के लिए उन्हें विदेशी भाषा सीखने में समय न बरबाद करना पड़े...... आपसी तालमेल और संवाद बनाए रखें..... हिन्दी के विकास के लिए यह बातें बहुत महत्वपुर्ण है। मै नेपाल से हुं और पुर्णिमा जी का फैन हुं।

    उत्तर देंहटाएं
  18. पूर्णिमा जी के बारे में और जानकर अच्छा लगा

    उत्तर देंहटाएं
  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  20. शगुफ़्ता जी,

    आपका आभार कि आप ने साहित्य शिल्पी पर पदापर्ण किया. आपकी टिप्पणी पढी..बहुत अच्छा लगता अगर आप ने यह सुझाया होता कि क्या क्या प्रशन और श्रीमति पूर्णिमा वर्मन जी से पूछे जा सकते थे.. हम निश्चय ही उनसे अनुरोध कर उन प्रशनों के उत्तर भी पाठकों तक पहुंचाते.. और यही टिप्पणी की सार्थकता भी है...कटाक्ष के लिये की गई टिप्पणी से न तो पाठकों का न ही रचनाकार का कुछ भला हो सकता है.

    मोहिन्दर कुमार
    साहित्य शिल्पी के लिये

    उत्तर देंहटाएं
  21. गुणी जनों की जितनी संगत मिले, कम है ।
    सम्मान-प्राप्ति के लिये मेरी बधाई।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  22. प्रिय मित्र
    हिन्दी साहित्य निकेतन देश की ऐसी साहित्यिक संस्था है, जो सन्दर्भ ग्रंथों के प्रकाशन
    में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इस संस्था की और से अब तक दो खंडों में 'साहित्यकार सन्दर्भ कोश' तथा चार खंडों में 'हिन्दी शोध सन्दर्भ' प्रकाशित हुये हैं.
    अब संस्था ने 'साहित्यकार सन्दर्भ कोश' का तीसरा भाग प्रकाशित करने की योजना बनाई है.
    इसमें सभी साहित्यकारों के परिचय उनके चित्रों के साथ प्रकाशित किये जायेंगे.
    आपसे आग्रह है कि आप अपना विस्तृत परिचय और अपना फोटो यथाशीघ्र हमारे पास भेजें. परिचय विवरण इस प्रकार रहेगा-
    नाम
    जन्मतिथि
    जन्मस्थान
    शिक्षा
    वर्तमान कार्य
    विधायें
    प्रकाशित साहित्य
    पुरस्कार सम्मान
    पता
    फोन
    ईमेल

    डा. गिरिराज शरण अग्रवाल
    संपादक : साहित्यकार सन्दर्भ कोश
    16 साहित्य विहार, बिजनौर, 246701 उत्तर प्रदेश

    उत्तर देंहटाएं
  23. पूर्णिमा जी!
    आपने संस्कृत साहित्य में शोध किस विषय में किया? क्या वह अंतर्जाल पर उपलब्ध है?
    संस्कृत छंदों विशेषकर त्रिपदिक छंदों यथा गायत्री, ककुप आदि तथा अनुष्टुप के रचना विधान की जानकारी दे सकें तो अनुग्रह होगा.
    विकिपीडिया में गद्य-पद्य दोनों की रचनाएं भेजी जा सकती हैं क्या? रचना भेजने की प्रक्रिया क्या है? अनूदित साहित्य भी अनूदित साहित्य भी उपयुक्त होगा या नहीं?
    sanjivsalil.blogspot.com / divyanarmada.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  24. purnima ji se pahele thora sa parichay tha .....
    yaha unke bare mein perker aur bahut achcha laga.....

    sukrriya

    उत्तर देंहटाएं

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