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मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये ।

उमड़-घुमड़ घनघोर - घटाएँ,
जब भी नील-गगन में छायें
बिजली की ले दीप्त ध्वजाएं,
दिग - दिगांतर में फहराएँ,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये ।

यूँ सारा सुनसान - सदन ये,
पर घन की आवाज सघन ये,
नित बादल घिर मुझे डराएं,
पी का संदेसा नहीं लाएं ,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये ।

प्रथम दामिनी बाहर चमके,
दूसरी अंतर्मन में दमके,
जलती बुझतीं अभिलाषाएँ,
दिप-दिपा उडगन सी जायें,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये ।

18 comments:

  1. गीता जी,

    बहुत ही अच्छी कविता... बधाई स्वीकारें

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रथम दामिनी बाहर चमके,
    दूसरी अंतर्मन में दमके,
    जलती बुझतीं अभिलाषाएँ,
    दिप-दिपा उडगन सी जायें,

    मन मेरा आली ! डर जाये,
    मेरे पिया अभी ना आये ।

    अंतर्मन को अभिव्यक्त करती एसी रचनायें कम ही पढने को मिलती हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. विरही मन की बेमिसाल अभिव्यक्ति। सालों बाद एसी रचना पढी।

    उत्तर देंहटाएं
  4. Geeta jee,
    Aapke geet mein sunder
    bhavabhivyakti hai.Aapkee ye
    panktian main kaee baar gungunaa
    chukaa hoon-----
    Pratham damini bahar chamke
    Doosree antarman mein damke
    Jaltee-bujhtee abhilaashaayen
    Dip-dipaa udgan see gaayen
    Achchhe geet ke liye
    aapko dheron badhaaeean.

    उत्तर देंहटाएं
  5. Nicely written song. Thanks.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रथम दामिनी बाहर चमके,
    दूसरी अंतर्मन में दमके,
    जलती बुझतीं अभिलाषाएँ,
    दिप-दिपा उडगन सी जायें,
    वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. पंकज सक्सेना11 नवंबर 2008 को 5:24 pm

    प्रत्येक पद प्रशंसनीय है। अन्य पाठकों की तरह मैं भी सहमत हूँ कि इस प्रजाति के गीत अब विलुप्त से हो गये हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. गीता जी,

    यह नया रंग दिखा आपकी कविता में। इतना सुन्दर शब्द संयोजन है जैसे कोई तराशी हुई मूर्ति, इतनी भाव प्रवणता है मानों कोई निर्झर।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. भावानुकूल शब्दों का चुनाव, उच्चकोटि का शब्द-विधान, काव्य-सौष्ठव और सरसता
    से भरी इस सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  10. पुरानी शैली का एक सुंदर विरह-गीत! बधाई स्वीकारें!

    उत्तर देंहटाएं
  11. विरह अग्नि को दर्शाती आपकी कविता अच्छी लगी....

    उत्तर देंहटाएं
  12. प्रथम दामिनी बाहर चमके,
    दूसरी अंतर्मन में दमके,
    जलती बुझतीं अभिलाषाएँ,
    दिप-दिपा उडगन सी जायें,

    great work
    regards
    do vist my blog

    उत्तर देंहटाएं
  13. विरह की अनूठी अभिव्यक्ति। निश्चय ही इस अप्रतिम सांचे की गीत रचनाएं कठिनाई से दिखाई देती हैं। शब्द मात्र शब्द न रहकर स्वयं भाव बन गये हैं।

    अच्छी रचना पढ़वाने के लिये आभार ।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  14. भावपूर्ण रचना..प्रतिक्षारत प्रेयसी के मन के उदगार अपने प्रिय (पिया) के प्रति

    उत्तर देंहटाएं

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