नाटक यानि कि अभिनय की अपनी दुनिया. इस दुनिया में जो लोग अपना जीवन लगाते है, वह बिरले होते है. अपनी कला के बल पर दूसरो को शिक्षा ओर समझ देने का प्रयास करते है. मैने पहले के अपने आलेखों में बताया कि थियेटर क्या है और उसकी क्या भूमिका है. आज हम बात करेंगे नाटक के एक रूप की जिसको लोग नुक्कड़ नाटक या स्ट्रीट प्ले के नाम से जानते है. नुक्कड़ नाटक भारतेंदु हरिश्चंद्र के जमाने में लोगों के सामने आया था. आजादी-पूर्व के समय में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बनाने के लिये कलाकार गली गली नाटक और झांकियों के माध्यम से नाटक खेला करते थे. आजादी की लड़ाई में इस नाटक विधा ने बहुत काम किया था. उसके बा्द इप्टा नाम की संस्था नें नुक्कड़ नाटक को जनता का नाटक कहा और इसे एक अभियान के रूप में लोकप्रिय किया. 
नुक्कड़ नाटक मूलत: जनसमस्याओं पर आधारित होते है. इन नाटकों मे वह बात प्रभावी ढंग से कही जाती है जिसे हम जनता को समझाना चाह्ते है. नुक्कड़ नाटक मे मैसेज यानि संदेश मुख्य होता है. वेशभूषा और चरित्रों का कोई खास महत्त्व नही होता. जितने भी कलाकार होते हैं, सब एक बार मंच पर उतरते है और नाटक के अंत तक मंच पर ही रहते है. इस तरह के नाटक में कलाकार मूल रूप से काव्य और संवाद के माध्यम से कहानी को मंच पर प्रस्तुत करते है. दृश्य मूल रूप से कोरस गान के साथ बदलने का रिवाज है. नुक्कड़ नाटक बहुत जोर शोर से बार बार समस्या और उसके कारण की तरफ जनता का ध्यान आकर्शित करते है. नुक्कड़ नाटक के माध्यम से जन समस्याओं के समाधान और उसके निदान के लिये लोगों मे चेतना फैलाने का काम किया जाता है. हालाँकि नुक्कड़ नाटक साहित्य से परे नही है; इन मे लोक-साहित्य होता है, लोक-कला का समावेश होता है. परंतु रूप-सज्जा, सामग्री और वस्त्र-सज्जा गौण हो जाती है. 
भारत मे नुक्कड़ नाटको को कुछ हद तक पहचान दिलाने वालों मे शफदर हाशमी का नाम आता है. वह जन चेतना के नाटक खेला करते थे, सरकार की नीतियो का विरोध और जनता की समस्या को उजागर करने वाले विषयों के नाटक हाशमी खेला करते थे. ऐसे ही एक नाटक को खेलते वक्त उनकी ह्त्या हुई. १ जनवरी को झंडापुर (साहिबाबाद, उत्तर प्रदेश) मे एक नुक्कड़ नाटक के मंचन के समय उन पर हमला हुआ और उस हादसे मे उनकी जान गई. आज भी उनकी याद में प्रत्येक वर्ष जन नाटक मंच वहां नुक्कड़ नाटक खेलता है. 
नुक्कड़ नाटक का स्वभाव हाशमी के समय तक विद्रोह और तीखा ही होता था. जन समर्थन और सरकार के विरोध का स्वर लिये हुए, लेकिन आज बाजार के साथ नुक्कड़ नाटकों में भी परिवर्तन हो गया है. आज नुक्कड़ नाटक प्राइवेट कंपनियो के प्रचार के लिये भी किये कराये जाने लगे है. गैर सरकारी संस्थान सरकारी योजनाओ के प्रचार के लिये कलाकारों को पेमेंट दे कर नुक्कड़ नाटक कराने लगी है. 
मूल रूप से नुक्कड़ नाटक दिल की बात जनता से कहने का जरिया हुआ करते थे. 
यह नाटक लोगों मे नारे देते थे... 

सौ में सत्तर आदमी आज जब नासाद है
दिल पर रख कर हाथ कहिये देश क्या आजाद है... 
कोठियों से देश की औकात को मत आँकिये 
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है

जैसे शब्दो को कोरस के रूप मे गाकर लोगों मे जोश और हालात के प्रति रोश पैदा करने काम नुक्कड़ नाटक किया करते थे. नुक्कड़ नाटक आज भी बदलाव की बात सोचने और देश दुनिया को बदलने का ख्वाब देखने वालों के लिये एक हथियार की तरह है. 
नुक्कड़ नाटक वास्तव मे लोगो के बींच खडे हो कर हिम्मत से सच बोलने की ताकत रखने वाले कलाकारों का काम हुआ करता था... आज भी जनता को ऐसे लोगों का स्वागत करने की दरकार है...

8 comments:

  1. नुक्कड़ नाटक बदलाव का अनोखा औजार है।

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  2. नुक्कड़ नाटक और उसके विषय में इस विशिष्ट जानकारी के लिए योगेश जी का आभार.

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  3. नुक्कड नाटक अपने सीमित कलेवर और तमाम तामझाम के बिना बेह्तर उद्देश्य को सम्प्रेषित करता है इसमे कोइ सन्देह नहीं

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  4. पंकज सक्सेना3 नवंबर 2008 को 11:27 am

    नुक्कड नाटक भी है और नहीं भी। एक आंदोलन, एक जागृति एक अभियान सभी कुछ है नुक्कड।

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  5. योगेश जी,

    आपकी यह प्रस्तुति बहुत अच्छी बन पडी है, थोडी संक्षिप्त जानकारी है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  6. नुक्कड नाटक इसके इतिहास और वर्तमान में इसके ह्रास के कारणों पर अधिक विस्तार से चर्चा की आवश्यकता है। लेख अच्छा है।

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  7. नुक्कड नाटक को एक औजार की तरह प्रयोग करने की आवश्यकता है तभी समाज में चेतना आयेगी.
    जानकारी से परिपूर्ण लेख के लिये आभार

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  8. योगेशजी नमस्ते,
    बदलाव समय की माँग है और नुक्कड़ नाटक ऐसा माध्यम है जो बहुत कुछ खुलकर परोस सकता है।
    नुक्कड़ नाटकों के बारे में लिखा आपका ये लेख अच्छा लगा,बधाई।
    मेरा अटलाँटा, अमेरिका में 'धूप छाँव' नामक एक हिन्दी नाट्य समूह है। आपके लेख से नयी जानकारी मिली। पिछले भारत प्रवास के दौरान अरविन्द गौड़ के कुछ नुक्कड़ नाटक देखे बढ़िया लगे।
    जहाँ तक मुझे याद है'सफदर हाशमी' के नाम में 'श' की जगह 'स' था। ऐसे ही सोचा बता दूँ हो सकता है ये टँकण की गलती हो।
    शुभकामनाओं के साथ
    सन्ध्या भगत

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