साहित्य से जुड़े कई गूढ़ प्रश्नों में एक यह भी है कि कविता किन तत्वों से महान बनती है। प्रश्न गंभीर ही नहीं, मतभिन्नतायुक्त भी है क्योंकि यह विषय जितना काव्य-तत्व से संबद्ध है उतना ही उसके सौंदर्य-पक्ष और रचना-प्रक्रिया से। सामान्यतया हम उन कविताओं को अच्छी कहते हैं जिनका सरोकार जन से हो, जो जीवन के पक्ष में खड़ी हो और ऐसे कारकों का विरोध करती हो जो लोक, संस्कृति और मानवीयता का तिरस्कार करती है। इस संबंध में जाने-माने लोकधर्मी समालोचक डा. जीवन सिंह का विचार है कि "कविता महान बनती है अपनी तात्विकता से। जीवन-तत्वों की खोज में वह जितनी गंभीर, व्यापक, सहज और अनुभव-समृद्ध होगी,वह उतनी ही महान होगी। उसका दायरा जितना संकुचित और रुढ़िपोषक होगा,वह उतनी ही सीमित,हल्की और संकीर्ण होगी। वही कवि महानता की ओर गया है जो प्रचलित रुढ़ियों से टकराता हुआ इस संसार-सागर से वास्तविकता और सत्य के मोती ढूंढकर लाता हो और अपनी पैठ आभिजात्य से साधारण जीवन में बनाता हो,जिसमें लोकरक्षण और लोकरंजन की संतुलित शक्ति एक साथ हो,जो अपने ज़मीन का पता देती हो और अपने समय की संस्कृति को रुपायित करने के केंद्र में हो।"

डा. जीवन सिंह के उक्त विचार को केंद्र में रखकर यदि रीतिकालीन कवियों के कविता-कर्म की परीक्षा करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके अपने सीमित सरोकार और लोक-तत्व की अनदेखी के कारण कविता में कला- वैशिष्ट्य के उत्कर्ष के बावजूद इन कवियों को नकार दिया गया और अब इनकी कृतियां मात्र इतिहास की वस्तु बनकर रह गयी हैं,क्योंकि काव्यधारा के विकास की कहानी निरंतर कला के पराजय और जीवन के विजय की कहानी रही है। यही साहित्येतिहास का मूल भी है। जीवन की पलायनवादी प्रेरणाओं से एकात्मीकरण के कारण छायावादी कवियों में भी बाद में काव्य के व्यंजनाशक्ति क्षीण पड़ गयी जिस कारण यह काव्य-धारा पतनोन्मुख हो गयी।

अतएव समय के साथ काव्य के प्रतिमान बदलते रहे हैं क्योंकि युग-प्रवृत्तियों का ही सदैव काव्य- प्रवृत्तियों में आत्मसातीकरण हुआ है जिसमें जीवन ही प्रमुख विषय रहा है। इसके बरअक्स जो कविताएं जीवन और जन के बेहतरी के लिये काम नहीं करती,वे कालक्रम में भुला दी गयीं। जीवन-तत्व के इसी खोज में उद्धत होने के कारण छायावाद के ढ़लान पर कई काव्य-प्रवृतियां दृष्टिगोचर हुईं जैसे- नई कविता,अकविता,सपाटबयानी,प्रयोगवाद, भूखी पीढी की कविताएं इत्यादि,पर सब-की-सब आगे चलकर मुक्तछंद की भावधाराओं में समाहित हो गयी क्योंकि आज जीवन में सामंजस्य से अधिक द्वंद्व ही है जो मुक्त-छंद में ही सर्वाधिक समर्थ ढंग से मुखर हुई है। यह भी कि,परिवेश की वास्तविकता कवि को गहरी चुनौती देते हैं जिससे कवि के हृदय में तनाव का वातावरण सिरजता है।यह तनाव ही कविता के रुप और वस्तु दोनों की संरचना में बदलाव के लिये कवि को बेचैन करता है। इसलिये कवि एक ओर जहां तत्व के लिये संघर्ष करता है वहीं दूसरी ओर अपनी अभिव्यक्ति को समर्थ बनाने के लिये भी। इस संघर्ष में वह जितना सफल हो पाता है,उसी अनुपात में उसकी रचना समाजोपयोगी और महान बन पाती है।

कवि के इस शब्दकर्म पर हमारे समय के प्रतिबद्ध कवि-समालोचक मुक्तिबोध का विचार अत्यंत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है।उन्होंने सृजन-प्रक्रिया को तीन चरणों में बांटकर इसको समझाया है। कवि जब किसी बाहरी वस्तु या विचार के संपर्क में आता है तो उसके मन में विचार की तरंगे उठने लगती हैं और कल्पना का कार्य प्रारंभ हो जाता है,और बोधपक्ष यानी ज्ञानवृत्ति सक्रिय हो उठती है। मुक्तिबोध ने इस उदघाटन-क्षण को काव्य-कला का प्रथम-क्षण माना है। इसके अनंतर, उसके अंत:करण में पूर्व से संचित ज्ञान और जीवन-मूल्यों के अनुभव से उस तत्व का समागम और प्रतिक्रिया होता है। इसे सोखकर वह अंतस्तत्व जीवन के मार्मिक पक्ष से न्यस्त हो जाता है और एक संश्लिष्ट जीवन-बिंब-माला को उपस्थित कर देता है। इसे मुक्तिबोध ने कला का दूसरा क्षण माना है जिसमें हम अपनी अभिव्यक्ति के लिए छटपटाने लगते हैं। इस छटपटाहट को जब हम शब्द,रंग तथा स्वर में अभिव्यक्त करने लगते हैं तब कला का तीसरा क्षण शुरु हो जाता है। कला का यह क्षण दीर्घ होता है। इस क्षण में अभिव्यक्ति के स्तर तक आते-आते हमारे मनोमय तत्व-रुप बदलने लगते हैं। चूंकि भाषा हमारी सामाजिक संपदा है,अत:यह जहां रूप-तत्वों को घटाने-बढ़ाने का कार्य करती है और नवीन तत्व-रुप को मिला भी देती है वहीं नवीन शब्द-संयोग,नवीन अर्थवत्ता, नई भंगिमाएं और व्यंजनाएं भी प्रकट हो जाती हैं। यही वह समय है जब तत्व के अनुरूप कवि भाषा भी सिरजता है। समय और व्यवस्था की आंतरिक पेचीदगियों और सत्य की गहराई से टटोल के कारण इसीलिये भाषा कहीं- कहीं जटिल और वक्र भी हो जाती है।यह स्वाभाविक है। ऐसी कविताओं से आसानी की मांग करना उचित नहीं क्योंकि कविता का भी अपना काव्यशास्त्रीय अनुशासन होता है जिसको जाने-समझे बिना कविता का आसानी से समझ में आने की बात बेमानी लगती है। किन्तु कलात्मक प्रदर्शन के खयाल से जान-बूझकर दुरुह और जटिल बनायी गयी कविता निंदनीय है क्योंकि इससे लोक और जीवन का पक्ष क्षीण हो जाता है।

सृजन की उपर्युक्त प्रक्रिया से जो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं वह यह है कि जिस कविता में ये तीनों क्षण पूर्ण नहीं होते अथवा उनमें शिथिलता आ जाती है वह कविता चूक जाती है और उनमें निखार नहीं आ पाता। सृजन के दूसरे क्षण में कवि यदि अपने वस्तुगत आत्मभाव को देखकर आत्मग्रस्तता का शिकार हो जाता है और अपने जीवन के अर्जित अनुभवों और मूल्यों को रचना में प्रतिबिंबित नहीं कर पाता है तो उसका दूसरा क्षण निरर्थ हो जाता है,अथवा जिन कवियों के पास सीमित जीवनानुभव है उनका इंद्रिय-बोध संवेगात्मक नहीं होने के कारण दूसरे क्षण से शीघ्र ही मुक्ति पा लेते हैं और उनके काव्य-तत्व में संवेदना का यथोचित सम्मिलन नहीं हो पाता। फलत: कविता नीरस हो जाती है। अत: मुक्तिबोध आगाह करते हैं कि "मनोमय तत्व के संवेदना-पुंजों को प्राप्त करना कवि का आद्य- प्राथमिक-कर्तव्य है। सच तो यह है कि सृजन- प्रक्रिया में कवि निराला जीवन जीता है। उसे उस जीवन को ईमानदारी से ,आग्रह्पूर्वक और ध्यानलीन होकर जीना चाहिए। नहीं तो बीच- बीच में सांस उखड़ जायगी,और उसके फलस्वरुप काव्य में खोंट पैदा होगी। "सृजन -प्रक्रिया के दूसरे क्षण से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण बात है उन जीवन- मूल्यों और जीवन-दृष्टियों का मनस्तत्व के साथ संगम होना। प्रश्न उठता है कि वे जीवनादर्श किसके हैं,जो कि स्वाभाविक प्रश्न है। वह सौंदर्य-प्रतिमान किस वर्ग के सौदर्याभिरुचि ने उत्पन्न किया है? उसका औचित्य, उसकी सीमाएं क्या है? आदि,आदि। ये प्रश्न हमें समाजशास्त्रीय आलोचना और चिंतन की ओर ले जाते हैं।

यहां उपर्युक्त प्रश्नों के आलोक में उन वर्गीय रुढ़िवादी काव्य-रुचियों को भी समझ लेना होगा जो अच्छी रचनाओं को भी एक सिरे से खारिज़ कर देते हैं। तथाकथित आधुनिकतावादी संस्कारों में पगी और महानगरीय जीवन-शैली से प्रसूत एकांगी समालोचना-परंपरा माटी के गंध से पूरित और जनपदीय झाड़- झांखड़ से सने पूरे काव्य-संसार की ही अनदेखी करती है,हिंदी प्रदेश के श्रमशील श्वांसों में धड़कते जीवन के वैविध्य और गली-कूचों की धूल-धुसरित मिट्टी के बदरंग तस्वीर जिनमें खरा-पवित्र जनपदीय चरित्रों का वास है,को दरकिनारकर सिर्फ़ नागर जीवन के कृत्रिम,दोहरे-कुत्सित चरित्रों को ही अपना वर्ण्य-विषय बनाकर आलोचना का स्वरुप निर्धारित करती है। इस आतंक से जो कवि बच नहीं पाते या जो इनका ही साथ देते हैं उनकी रचनाओं में युगबोध की सत्यान्वेषी प्रवृतियां गोचर नहीं होती। उनसे हम कालजयी रचना की कभी उम्मीद नहीं कर सकते। अपने वर्गीय सामंती सोच और जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि के कारण इनके महारथियों ने अब तक जनपद के कवियों में अविश्वास,अरुचि और वैराग्य ही प्रकट किया है। जहाँ-जहाँ भी ऐसे कलावादी विचारक-कवि मौजूद हैं, आज पृथक गुट का सृजनकर सहित्य में गुटबाजी को जन्म दे रहे हैं। ये शब्दों के संसार में रहकर शब्दों से खेलते हैं, जनपद की सच्चाइयों से इनका दूर का भी वास्ता नहीं। सुविधाओं की लालच इन्हें महानगरों में खींच लाता है,न कभी ये सामाजिक संचेतना और जनसरोकार के कवि-लेखक रहे। बाजारवाद के कारण आज यह सेंसर (रोक) अत्याधिक सक्रिय है जिससे मानव जीवन की मूल संवेदना यानी लोक-संवेदना को कुंठित हो जाने का खतरा है क्योंकि उसे पूरी वाणी नहीं मिल पा रही है। जो कोई उस पर लिख रहा है उसे उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। एक लंबे अरसे तक बाबा नागर्जुन,केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध और त्रिलोचन की उपेक्षा की गयी है। मुक्तिबोध के जीवनकाल में तो उनका एक भी काव्य-संग्रह नहीं निकल पाया। आज भी वरिष्ठ कवि विजेंद्र जनपद और गांव-गिरांव का मह्त्वपूर्ण साहित्य रच रहे हैं पर उस अनुपात में उनकी सराहना नहीं हुई हैं। अशोक सिंह जो जनपद में काफी अच्छा लिख रहे हैं, और भी दर्जनों ऐसे कवि-लेखक हैं जो साहित्य के सेंसर,उपेक्षा और खंडित आलोचना के शिकार हैं। फ़िर भी प्रतिबद्ध कवि सृजन के दूसरे क्षण में इस तरह के सेंसर की बिना परवाह किये एकीभाव से लगातार अब सृजनरत तक है।

देश-काल पर कभी किसी का एकाधिकार नहीं रहता। जब ऐसा होता है तो इस तरह के सृजन के समानांतर एक दूसरी आलोचना-परंपरा जन्म लेती है, और ले चुकी है। डा. जीवन सिंह,चंद्रबलि सिंह, रेवती रमण, एकान्त श्रीवास्तव, विजेन्द्र,रमाकांत शर्मा इत्यादि आज अनेक ऐसे सशक्त हस्ताक्षर हैं जिन्होंने उस आलोचना-परंपरा की मजबूत नींव डाल दी है और वह दूर-दराज,जनपद के कवियों की रचनाओं का सच्चा गुणानुवाद कर रही है जिससे आशा की जानी चाहिए कि उपेक्षित कवियों-अनुवादकों के साथ सही न्याय हो सकेगा। अत: इससे भयभीत होने की जरुरत नहीं। मुक्तिबोध ने तो इसके विषय में पहले ही विशद चर्चा कर दी है और जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि के आसन्न खतरे का संकेत भी दे दिया है। वे कहते है कि "जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि एक विशेष शैली को दूसरे शैली के विरुद्ध स्थापित करती है। गीत का नई कविता से कोई विरोध नहीं है।...किंतु जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि जबर्दस्ती का विरोध पैदा करा देगी। वह स्वयं अपनी धारा का विकास भी कुंठित करेगी,साथ ही पूरे साहित्य का भी। नई कविता के विभिन्न कवियों की अपनी-अपनी शैलियां हैं। इन शैलियों का विकास अनवरत है। आगे चलकर जब वे प्रौढतर होंगी,नई कविता विशेष रुप से ज्योतिर्मान होकर सामने आयेंगी।महत्व की बात है कि नई कविता में स्वयं कई भाव-धाराएं हैं,एक भाव-धारा नहीं। इनमें से एक भाव-धारा में प्रगतिशील तत्व पर्याप्त है। उनकी समीक्षा होना बहुत-बहुत आवश्यक है। मेरा अपना मत है कि आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्व अधिकाधिक बढ़ते जायेंगे और वह उत्पीड़ित मानवता के समीपतर आयेंगी।" यह विचार मुक्तिबोध ने सहृदय पाठकों के समक्ष आज से लगभग पांच दशक पूर्व ही रखा था,पर आज कितना प्रासंगिक है,हम समझ सकते हैं!

उपर्युक्त विचार-विथियों को समेकित करते हुए हम कह सकते हैं कि कवि की संवेदन-क्षमता,कल्पना की संश्लेषण-शक्ति,बुद्धि की विश्लेषण-शक्ति और अभिव्यक्ति-सामर्थ्य की उंचाई से लोक के लिये लिखी गयी कविता जो पूंजी के मह्त्व को नकार कर मनुष्यता का संस्कृति रचती है और उत्पीड़ित मानवता के पक्ष में खड़ी है,महान कविता की श्रेणी में गिनती की जायेगी,की जा रही हैं। तभी तो एकांत श्रीवास्तव अपनी एक कविता में कहते हैं-
वे रास्ते महान हैं जो पत्थरों से भरे हैं
मगर जो हमें सूरजमुखी के खेतों तक ले जाते हैं
वह सांस महान है
जिसमें जनपद की महक है
वह हृदय खरबों गुना महान
जिसमें जनता के दु:ख हैं।

24 comments:

  1. It is a good column. Thanks.

    Alok Kataria

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  2. काव्य और उनके प्रतिमानों पर आपका आलेख संग्रहणीय है। प्रस्तुत करने का धन्यवाद।

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  3. किसी कविता को महान बनाने वाले मूल्यों की गहनता से पड़ताल करता आपका ये आलेख बहुत प्रभावी और प्रत्येक साहित्यकर्मी के लिये संग्रहणीय है. शायद इसके प्रकाश में कुछ तथाकथित साहित्यकार बेमतलब की शब्दों की उठापटक से इतर कुछ अच्छा और समाजोपयोगी लिख सकें!
    आलेख के लिये आभार!

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  4. आज कविता की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जिनको कविता के प्रमुख तत्वों (सूक्ष्म तत्वों को तो छोड़ ही दीजिये) की भी जानकारी नहीं है वे 'कविता' लिखकर अपने चमचों से उसे प्रचारित-प्रसारित करवाते हैं और 'वाह-वाह' कहलवाते हैं। कल ही एक ऐसे ही कवि की कविता पर जब मैने प्रतिकूल टिप्पणी कर दी तो उन्होने उस टिप्पणी को ही मार डाला।

    आपके इस लेख में उठाया गया यह प्रश्न बहुत ही महत्व रखता है।

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  5. आपने कहा कि "काव्य-प्रवृतियां दृष्टिगोचर हुईं जैसे- नई कविता,अकविता,सपाटबयानी,प्रयोगवाद, भूखी पीढी की कविताएं इत्यादि,पर सब-की-सब आगे चलकर मुक्तछंद की भावधाराओं में समाहित हो गयी क्योंकि आज जीवन में सामंजस्य से अधिक द्वंद्व ही है जो मुक्त-छंद में ही सर्वाधिक समर्थ ढंग से मुखर हुई है।" आपकी पूर्ववर्ती पंक्तियों से मैं एक विरोधाभास भी पाती हूँ। मुझे लगता है कविता जितनी आज आम जन से विमुख हुई है उतना पहले कभी नहीं थी चाहे रीति काल इतिहास हो गया हो या कि छायावाद अतीत। कृपया कारणों को समझाने का कष्ट करें। चूंकि आप जब त्रिलोचन, नागार्जुन या मुक्तिबोध का उद्धरण देते हैं तो भी अपनी ही बात काटते से प्रतीत होते हैं। कविता जो आम आदमी के लिये लिखी जाये और समीक्षको की समझ वाले बिम्बों में हो तो केवल बडी पत्रिकाओं में जीयेगी आपको एसा नहीं लगता। कविता एसे महान तो नहीं हो सकती? साहित्य की विद्यार्थी होने के नाते यह मेरा प्रश्न है कृपया इसे अपने आलेख प्रश्न उठाना न मानें।

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  6. कविता किन तत्वों से महान बनती है इसे बहुत अच्ची तरह बताया है आपने। सारगर्भित आलेख के लिये बधाई।

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  7. उत्कृष्ट आलेख .......... धन्यवाद।

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  8. बहुत प्रभावी आलेख ....


    < कविता जो आम आदमी के लिये लिखी जाये और
    -----------------------------------समीक्षको की समझ वाले बिम्बों में हो तो केवल
    ---------------------------------
    बडी पत्रिकाओं में जीयेगी >
    -----------------


    इसका अर्थ है...
    ..कविता सोच-समझकर लिखी जाये.....फिर ये क्या है..... ??



    वियोगी होगा पहला कवि
    आह से उपजा होगा गान,
    निकल कर आँखों से चुपचाप
    बही होगी कविता अनजान


    समझना चाह्ती हूँ.....सुशील कुमार जी......प्लीज...समझाइये....आभार...

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  9. बहुत अच्‍छा चल रहा है....जारी रखें....बधाई।

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  10. सुशील कुमार जी की बात पर चर्चा होनी चाहिये। कविता के जिन तत्वों की बात आप कहते हैं क्या उसके बिना कविता कोरी बकवास रह जाती है? क्या आप नहीं मानते कि मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित बहुत से कवि एवं कवि समूहों नें जनवाद के नाम पर जो कविता लिखी उससे कविता का कूडा हुआ है। कृपया कविता को शिल्प और भाव की दृष्टि में रख कर अपनी बात समझाने का यत्न करें।

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  11. कविता पर सुशील जी के विचार सुस्पष्ट हैं। कविता, अच्छी कविता, बुरी कविता, महान कविता..एक अंतर तो है ही।

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  12. सबसे बडी बात तो यह कि ब्लाग पर कविता पर गम्भीर बात हो रही है …इसके लिये सुशील जी और राजीव रन्जन जी को ढेर सारी बधाईयाँ !

    निधि जी का सवाल महत्वपूर्ण तो है लेकिन यह उस ग़लत समझदारी का हिस्सा है जिसके तहत मान लिया जाता है कि कविता वही जनता के लिये है जो आसानी से समझ में आये और लोकप्रियता का अर्थ है कि फ़िल्मी गीतो की तरह लोग उसे गुनगुनाये।
    दरअसल, आधुनिक कविता के पूरे परिदृश्य को समझे बिना ऐसा सरलीकरण बेहद घातक है। आज की कविता विरोध की कविता है…और इस रूप मे बॉद्धिक विमर्श मे जनता के पक्ष मे हिस्सेदारी। एक उदाहरण दूँ तो आर्थिक नीतियों की बहस मे जब हम शामिल होकर किसानो की आत्महत्या पर लिखते हुए नव उदारवादी अर्थशाष्त्रियो से टकराते है तो आँकडो और सिद्धान्तो से भरी वह पूरी बहस किसान नही समझता।लेकिन क्या तब हमारी पक्षधरता इससे तय होती है? फ़िर कविता से यह उम्मीद क्यो? आपको बताऊ कि एन्त्सेबर्गर की कविता एक शहीद क्रान्तिकारी सैनिक के झोले से मिली। आज वो कविता यहाँ पोस्ट की जाये तो शायद आपको वह दूरूह लगे। असल मे जब समज मे आन्दोलन चल रहे हो तो लोगो की चेतना का विस्तार होता है और कविता,साहित्य,सन्गीत और कला की नई अभिवक्तियो के रचयिता और पाठक/श्रोता भी सामने आते है, लेकिन विपर्यय के दॉर मे ये चीज़ें ठहर जाती हैं ।
    साथ ही,जनान्दोलनो और सीधे हस्तक्षेप की ज़िम्मेदारी जनगीत और लेख जैसी विधाओ की होती है। आप कभी मुक्तिबोध के नॉजवानो के लिये लिखे लेख को पढे उसकी भाषा बिल्कुल ज़ुदा है।
    मार्क्सवाद को गरियाने का कोई मॉका ना छोडने वाले लोग बतायेन्गे की भाजपाई निर्मल वर्मा,विद्यानिवास मिश्र या गोविन्द मिश्रा कितनी जन भाषा मे लिखते हैं ? कविता या साहित्य के ज़रूरी तत्वों में गहरी सम्वेदनात्मक अनूभूति और जनपक्षधरता शामिल है।विचारधारा दूध मे शक्कर की तरह होनी चाहिये,सिर्फ़ उसकी दुन्दुभि बजाने और नारा लगाने से कविता जनपक्षधर नही होती। ये सच है कि कई लोगो ने अतिउत्साह या मूर्खताओ से कविता को नष्ट किया है।
    पर सुशील जी,मुझे लगता है कि जनपद और गाँव से बाहर भी दुनिया,जन,द्वन्द्व,विरोधाभाष और कविता है।इस पर इतना ज़ोर कि इससे बाहर की कविता को जनपक्षधर ही ना मानना भी एक तरह का अतिवाद है।

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  13. अभी राजीव रंजन जी से बात-चीत के क्रम में पता चला कि कई लोग इस आलेख में विवेचित तथ्यों पर सवाल कर रहे हैं। मेरा खयाल है कि टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया एवं पूछे गये प्रश्नों का उत्तर दे ही दूँ।
    अतुल्य जी ,जिसे जो लिखना है या पुछना है,उन्हें स्वतन्त्रता है कि वे पूछें। उनके संशय का भी निराकरण हो जाये तो अच्छा ही होगा।
    अनुनाद सिंह जी,प्रायोजित लेखन टिकाऊ नहीं होता। कविता का अपना सौंदर्यशास्त्र है। जो मनमानी करेगा वह बहेगा। रीतिकाल के कवियों के साथ क्या हुआ? आप जानते हैं।
    निधि जी, कविता का पाठक तो हमेशा ही कम रहा है। आस्था और धार्मिक विषय-वस्तु की कविताओं को छोड़कर कविता कभी भी आम जन का कंठहार नहीं बनी। कविता का अपना अनुशासन भी है। सत्य के गहरे अन्वेषण के कारण कविता संश्लिष्ट भी हो सकती है क्योंकि उसमें भावबोध की जगह विचारबोध अधिक होते हैं। जैसे जीवन कभी जटिल है कभी सरल, वैसे कविता भी।

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  14. गीता पंडित क्या समझना चाहती हैं,यह समझ में नहीं आया।उन्होंने निधि जी के प्रश्न को दुहरा दिया,इसलिये इनके भी वही स्पष्टीकरण होंगे जो मैंने निधि जी के लिये लिखा है।आप दोनों जन से अनुरोध है कि आलेख को दुबारा पढा जाय।

    ‘दृष्टिकोण’ से जिस महानुभाव ने सवाल किया है उनसे कहना है कि आपको यदि मार्क्स से विरोध है तो उनको बाद दें पर क्या आप जन और लोक को भी कविता से अलग कर देंगे। जो कुड़ा रच रहे हैं वह भी तो कुड़ा ही हैं। उन्हें कवि का दर्जा तो प्राप्त हो सकता है पर साहित्यकार का नहीं। कवियों को आत्ममुग्धता से उपर उठकर जनपक्षधर होना होगा यदि वे चाहते हैं कि उनकी कविता का आम पाठक और वह बुद्धिजन हो जो मूल्य की बात करते हैं क्योंकि उसका समाजोपयोगी होना पहला और अंतिम शर्त है।

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  15. भाई अशोक जी ,अगर मैं गाँव और जनपद से बाहर की कविता का विरोध कर रहा हूँ तो क्या, कोई भू-कम्प थोड़े आ जायेगा!बहुत-से लोग हैं जो सिर्फ़ नागर-बोध की और विशिष्ट विषयों पर कवितायें रच रहे हैं पर वह लोक का प्रतिनिधित्व नहीं करती। आप अपनी कविता में क्यों जन को लेकर चल रहे हैं? आप जन और अभिजन में अंतर और खाई को समझिये। जन maas है और अभिजन elite वर्ग। हालकि वह भी आदमी ही है। पर कितने हैं वे पूरी जनसंख्या का? गाँव और जनपद में भी तो सभ्रांत वर्ग है। जो द्वंद्व और विरोधाभास जन में है वह एलिट में नहीं। वहाँ भोगवादी जीवन की व्यथा है जिसे द्वंद्व कहना ठीक नहीं। वहाँ जीवन की न तो खुशबू है, न संघर्ष का भाव। वहाँ का विरोधाभास तो सरपल्स पूँजी की वज़ह से है जिसे शोषण कए बलबूते इकठ्ठा किया गया है।

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  16. बस इतना जोड दू कि मेरा जन गाव मे भी है, जनपद मे भी और बम्बई जैसे महानगर मे भी। भोगवादी व्यथा से मेरा भी लेना देना नही लेकिन जीवन के उस पहलू को,प्रेम और शरीर से जुडे सन्त्रास को मै कविता मे निषिद्ध नही मानता। बस सवाल पक्षधरता का है।
    इस जटिल समय मे नागार्जुन आदि से प्रेरणा लेना तो सही है पर विषय के स्तर पर कविता को ऑर आगे जाना होगा।

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  17. अब मान लीजिये कोई धनाढ्य परिवार है। वहाँ स्त्री है एक। उसी पहनावे और बोलचाल के साथ जो ईलीट लोगो का माना जाता है। और परिवार के भीतर उसका मानसिक और शारीरिक शोषण है। तो क्या वह भी एक तरह का उत्पीडन नही?

    अरे भाई वर्ग इस बात से तय नही होते कि आपके पास कितना पैसा है। बल्कि तय होते है मिल्कियत पर। 50 हज़ार कमाने वाला कर्मचारी भी सर्वहारा का हिस्सा है। उसका भी शोषण होता है। रूप बदल जाते हैं पर प्रक्रिया वही होती है। इसको समझे बिना जनपदवादी हो जाना भी एक पेटिबुर्ज़ुआ प्रव्रिति है। शोषण जहाँ भी है उसका विरोध होना चाहिये। परिवार में , यॉन सन्दर्भों में ,खेत में ,फ़ैक्ट्री मे …कही भी।

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  18. अशोक जी आपका तर्क कविता को जंजीरों में बाँधता है। आप अपने नजरिये को चिल्ला चिल्ला कर सिद्ध करना चाह रहे हैं। सवाल बहुत छोटा सा पूछा गया है कि सर्वहारा और बेचारा से अलग बात करने वाकी कविता क्यों कविता नहीं? मुक्तिबोध को जिंदा रखने वाली एक लोबी है वरना आम कत्तई नहीं जानता कि वो लिख क्या गये? आप कविता को वाद-विशेष से जोडने वाले लोगों में प्रतीत होते हैं शायद आपसे पूर्वाग्रहविहीन उत्तर की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती। सुशील जी अभी आपने उत्तर नें भी संतुष्ट नहीं किया है। कविता को वाद की क्यों जरूरत है? अशोक जी की तरह भाजपा-वामपंथी साँचे में नहीं बल्क कविता और उसकी परिभाषा में निहित आपका उत्तर चाहता हूँ।

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  19. भाई जब मै दूसरे उदाहरण से समझा रहा हू तो वही बात कर रहा हू। रही बात विचारधारा की तो बिना विचार के तुतक तुतक तूतिया की तुकबन्दी हो सकती है, कविता नही। वाम हो,दक्षिण या मध्यमार्गी- हर कविता मे विचार तो होता ही है। हमारी एक विचारधारा है तो है…उससे कविता का होन न होन साबित नही होता हाँ पक्षधरता साबित होती है। मैने पहले भी लिखा कि विचार दूध मे शक्कर की तरह आने चाहिये ना कि दुन्दुभि की तरह्। कविता होने के लिये ज़रूरी है गहरी सम्वेदना और बिम्बात्मक प्रस्तुति की क्षमता। सर्वहारा बेचारा नही होता। रही बात मुक्तिबोध की तो भैया एक कवि बताओ उस दॉर का तार सप्तक का या गलेबाज ही सही जिसको आम जनता जानती हो? आम जनता मिर्ज़ा गालिब को भी नही जानती,अग्येय को को भी नही तो क्या किया जाये? लाफ़्टर चैलन्ज वाली तुकबन्दी की जाये? आम जनता है क्या बला? अरे कविता का रचयिता ही नही पाठक होने के लिये भी एक कविह्रिदय और सम्वेदनात्मक अनूभुति की ज़रूरत होती है। आप लोग क्यो चनाचोर गरम लिखवाना चहते है क्या? प्रेम कविता हो,प्रक्रुति पर हो या किसी भी विषय पर उसक एक विशिष्ट पाठक होता है। आप शास्त्रीय सन्गीत को तो वादमुक्त मानते है ना-- फ़िर क्या आमजन उसे समझता है? अरे कला लो समझने और उसके अनुशीलन के लिये एक विशेष मानसिक बुनावट की ज़रूरत होति है।यह बाज़ार मे हिट होने के फ़ार्मुले पर नही लिखी जाती। कविता आम जनता के पक्ष या विपक्ष मे होती है आम जनता के लिये नही होती। उसका पाठक अलग होता है।

    जब आप कविता की परिभाषा की बात करते है तो यह क्या है? यह भी तो एक तरह का सीमांकन है ना-और ज़रूरी भी क्योन्कि इसके बिना तो अराजकता फ़ैलेगी। लाफ़्टर चैलन्ज और एस एम एस कविता कहे जायेन्गे। तो हम कहे तो ज़न्ज़ीर-आप कहे तो परिभाषा ; यह कहाँ का न्याय है हूज़ूर?

    चिल्लाने की ज़रूरत बहरो को सुनाने के लिये पडती है। मै बस ज़ोर देकर कह रहा हु।दो लाइन मे लिखता तो कहते स्पष्ट नही हुआ।

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  20. गीता जी की बात बेहद महत्वपूर्ण थी।
    कि सम्वेदना के अतिरेक मे जो कविता खुद ब खुद निकल जाये उसका क्या?
    अक्सर ऐसे मे बडी कविता पैदा होति है। पर आप देखिये उस पहली कविता मे जो आह है वह क्यो है? कवि का सम्वेदनशील मन एक निर्दोष क्रॉन्च ले वध से आहत हुआ।इसे ही दूध मे शक्कर की तरह मिली विचारधारा कह रहा हू मै।जिसका कोई नाम हो ज़रूरी नही।यह है पक्षधरता-कवि शिकारी के पक्ष मे हो हि नही सकता। और जो लिखा वह श्लोक था-एक अकवि उस तरह लिख नही पाता-यह है कविता की चॉहद्दी। कथ्य और शिल्प के पारस्परिक सम्वहन का यह बेहत्रीन उदाहरण है।

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  21. ‘दृष्टिकोण’ वाले महानुभाव बात का बतंगड़ बना रहे हैं। एक ओर तो वे कविता को उसकी सीमा में बाँध रहे हैं,परिभाषा चाहते हैं भाव और शिल्प को लेकर। और.. अगर उनके मन -मुताबिक बात कह दूँ तो फिर वह साहित्य के दायरे से बाहर चली जायेगी। वे क्या यह नहीं जानते कि कविता ज़मीन से जुड़ी वस्तु है। कोई मना थोड़े कर रहा है कि आपको अमूक रीति और ढंग में ही कविता रचनी है। वैसे आपको अधिक जानना है तो मेरा एक आलेख पढ़ें। यहाँ लिंक दे रहा हूँ- कविता और रूपवाद।
    http://www.srijangatha.com/2008-09/nov/mulyankan-shusil%20kumar.htm

    आपने मुक्तिबोध के बारे में कहा कि ‘मुक्तिबोध को जिंदा रखने वाली एक लोबी है वरना आम कत्तई नहीं जानता कि वो लिख क्या गये?’ आपको मुक्तिबोध नहीं समझ में आ रहा तो इसका मतलब यह थोड़े है कि वह निकृष्ट चीज़ है। जिस मुक्तिबोध की एक भी पुस्तक उनके जीवनकाल में अर्थाभाव में नहीं छपी और सारा जीवन फिर भी लिखते रहे,उनके बारे में आप ‘लॉबी’ की बात करते है! यह लॉबी सचमुच यदि होता तो क्या वे अपनी रचना उनसे नहीं छपवाते?
    अगर आप लोक और सर्वहारा से अलग कविता में विश्वास करते हैं तो करें। जब समय उसको उचित ठहराय्रेगा तभी सर्वमान्य होगी। आप श्री अशोक पाण्डेय के शब्दों में ‘तुतक तुतक तुतिया’ या होली का सा रा रा रा या लाफ्टर चैलेंज वाली कविता रचते रहिये या फिर रूपवादी रूझानों से प्रेरित कविता, रीतिकालीन चारण कवियों की तरह। मेरे लिये तो लोक ही मेरे इन्द्रियबोध का आधार है अपनी कविता में। मैं कविता को जन से अलग नहीं मानता। गीता जी और अशोक जी से सहमत हूं कि संवेदना के अतिरेक से कविता जन्मती है पर कवि को अपनी सौंदर्य-दृष्टि से उसको अनुशासित करना होता है,तब जाकर वह कविता बन पाती है वर्ना संवेदना की कोख़ से हर बार कविता नहीं जन्मती।हां, बिना संवेदना के अतिरेक से कविता भी पैदा नहीं होती।

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  22. यह सवाल अब उठने लगा है कि कविता किसके लिये लिखी जाती है? अच्छी चर्चा है। बहुत सीखा।

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  23. रचना जी का सवाल अच्छा है कि कविता किसके लिये लिखी जाती है। देखिये कविता का प्रथम और चरम उद्देश्य तो स्व का सुख ही है।आपने धूमिल की कवितायें पढ़ी होंगी। मैं कुछ पक्तियां यहां दे रहा हूं उनकी।
    धूमिल-'कविता क्या है ?
    कोई पहनावा है ?
    कुर्ता- पाजामा है ?'
    ना, भाई ना,
    कविता-
    शब्दों की अदालत में
    मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का
    हलफ़नामा है ।'
    'क्या यह व्यक्तित्व बनाने की
    चरित्र चमकाने की --
    खाने-कमाने की--
    चीज़ है ?'
    'ना, भाई ना,
    कविता
    भाषा में
    आदमी होने की तमीज़ है।' तो बात वही है।
    कविता जनता का साहित्य है पर अभी जनता इतनी प्रबुद्ध नहीं हुयी है कि उनका अर्थ पूरा समझ ले पर इसका मतलब यह भी नहीं कि हम जनता को समझने के लिये प्रेरित न करें।समझेगी जनता भी अप्र कुछ समय लगेगा। अब्राहम लिंकन के शब्दों में-‘जनता का है और जनता के लिये है" लोकतन्त्र की तरह पर समय लगेगा।

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