जब मैंने कविता में होश संभाला तो कविवर त्रिलोचन इस दुनिया से विदा हो चुके थे। नागार्जुन और शमशेर के बाद आधुनिक हिंदी कविता के त्रयी के अंतिम स्तंभ बाबा त्रिलोचन के सांसों की डोर गत 9 दिसम्बर,2007 को गाजियाबाद में टूट गयी। उनके बाद कविता में आधुनिकता और परंपरा का ऐसा अद्भूत समागम और कहां पाऊंगा?

त्रिलोचन भारतीय लोकचित्त के सबसे बड़े कवि हैं। कविता-कर्म उनके लिये तप के बराबर था जिसके लिए वे कोई भी जोखिम उठाने को तैयार थे। अपनी साधारण लगने वाली कविताओं में उन्होंने जिस काव्य-मूल्य की सृष्टि की, वह आज के काव्य-परिदृश्य में एक उल्लेखनीय और युगांतरकारी घटना मानी जा रही है जिसका ठीक -ठीक पहचाना जाना हिंदी काव्यालोचना परंपरा के लिये एक गहरी चुनौती है। 

कविवर त्रिलोचन के काव्यलोक से जुड़ा अहम् सवाल यह है कि उनकी कविता का जनमानस में देर तक टिकने और आकर्षण की वज़ह क्या है। इस कारण की जाँच-बिच उनके काव्यविवेक और उसमें अंतर्निहित रुप और वस्तु को बिना समझे नहीं किया जा सकता।

उनकी सोच में प्रगाढ़ पार्थिवता थी जो उनके लोकसंस्कारी स्वभाव के कारण उनकी कविताओं में स्वत: लक्षित होता है। वे गाँव के कृषक-संस्कार के काफ़ी करीब थे जो उन्हें चिरानीपट्टी गाँव और काशी में मिला था। चिरानीपट्टी ने उनको लोक की समझ दी और काशी ने काव्य- चिंतन की। उनका लोक जिन तत्वों से बना है, उसमें बडी़-बडी़ बातों के लिये जगह नहीं। इसलिये त्रिलोचन बातूनी कवि नहीं थे। बिना लाग-लपेट के सीधे अपनी बात कहने में विश्वास करते थे, इसलिये कविता के बाहर भी निकल आना चाहते थे अर्थात् कला के बंधन में नहीं फँसते थे। वे वस्तु के निकटतम स्थानापन्न, बल्कि वही हो जाना चाहते थे। जैसे जहां जिस रुप में देखा, हू-ब-हू वैसा ही रच दिया। अपनी ओर से जोड़-तोड़ से परहेज बरतते थे। यही लोक का स्वभाव भी है,यानि खरा, पवित्र। यहां भावना प्रधान होती है, न कि कला। वैसे भी रीतिकाल के बाद साहित्य में जीवन का सतत विकास और कला का पराभव ही दृष्टिगत हुआ है। कहने का अर्थ है कि वे हृदय से लिखते थे,बल्कि यूं कहें कि कविता को अपना हृदय ही दे देना चाहते थे। कलम की दिमागी कसरत नहीं करते थे। उन्होंने खुद कहा है-

मुझे वह रुप नहीं मिला है जिससे कोई
सुंदर कहलाता है,
हृदय मिला
जिससे मनुष्यता का निर्मल कमल खिला है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने वाल्मिकि के काव्य-सौष्ठव का उल्लेख करते हुए कहीं कहा है कि"किस सूक्ष्मता के साथ कवि कुलगुरू ने ऐसे प्राकृतिक व्यापारों का निरीक्षण किया है,जिनको बिना किसी अनूठी उक्ति के गिना देना ही कल्पना का परिष्कार और भाव का संचार करने के लिये बहुत है।" इसी परिप्रेक्ष्य में त्रिलोचन की काव्यकला भी देखनी-परखनी चाहिए। कविता में कला का सायास यत्न कभी उन्होंने नहीं किया, इसलिये उक्तियों की वक्रता, गूढ़ता और अनूठेपन का सहारा भी नहीं लिया। प्रकृति, लोक और जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण ही स्वयं त्रिलोचन की कविता को कला का रुपाकार देते हैं। ऐसा, विरल कवियों में लक्षित होता है और इसे कलाहीन कला और जीवन की कला (an artless art for life) की संज्ञा दी जा सकती है।

अभिव्यक्ति की इस कला में उनकी भाषिक संरचना का भी कम योग नहीं है। भाषा के प्रति त्रिलोचन आरम्भ (1950-51) से ही सजग थे। उनकी भाषा सबसे अलग, अनूठी और कला की ही तरह सरल है जिसका ठेठ देशज जातीय रुप ही उसकी पहचान है और महानता भी। बोली, भाषा के साथ यहां इतने रचे-बसे हैं कि इसका संश्लेषण इतने व्यापक रुप में किसी अन्य कवि की रचना में गोचर नहीं होता। तद्भव-तत्सम का यह संश्लिष्ट रचाव बडे़ विस्मयपूर्ण ढंग से उनकी कविता में खुरदुरे और क्लासिक चीजों का मेल कराती है जो अकल्पनीय है। अपनी भाषा के इस प्रकृत गुण को त्रिलोचन ने सदैव बनाए रखा। तत्सम शब्दावलियों में भी उनकी भाषिक संरचना उतनी ही महत्वपूर्ण है।

त्रिलोचन की कविताओं में अभिव्यक्ति की सहजता (simplicity of expression) भी इतनी अन्यतम है कि वह नये काव्य-सौंदर्य का सृजन करती है जिसका पाठक के मन पर दीर्घ और गहरा प्रभाव पड़ता है। यह सहजता मात्र लोक की बानगी के कारण नहीं है, अपितु भाषा की तरलता, हृदय-तत्व के समावेशीकरण और कवि की स्वयं की प्रकृति और "प्रयत्नहीन कला" (effortless art) के हुनर का परिणाम है जो मात्र त्रिलोचन के यहां विपुलता के साथ देखा जा सकता है। इसलिये यह अद्भुत है, एकल है और इसका विशेष महत्व है।

त्रिलोचन किसान-लोक के ज्यादा करीब हैं जिसमें भारत की आत्मा बसती है, इसलिये जीवन के प्रति निष्कवच खुलापन त्रिलोचन को आधुनिकता और लोकधर्मिता के वृहत्तर दायरे में लेकर चलती है। यहां जीवन से गहरा लगाव,जन के साथ तादात्म्यता और संघर्ष में तपकर निखरते जीवन के प्रति विराट निष्ठाबोध ही सच्चे अर्थों में त्रिलोचन को आधुनिक बनाता है। यह आधुनिकता न तो आयातित है, न अंधविश्वास या स्वांग भर। इस आधुनिकता का भारतीय संदर्भ है। यह भी नोट करने योग्य है कि यह आधुनिकता रुढियों, वर्जनाओं और जर्जर परंपराओं के विरोध में खड़ी तो है पर अपना निष्कर्ष नहीं देती। दूसरे शब्दों में, यहां अंतरंग अनुभवों का सादा बयान है जिसमें व्यवस्था के प्रति अराजक विद्रोही स्वर नहीं है। ऐसे अनुभवों को त्रिलोचन बिना अलंकार, बिंब, प्रतीक, जैसे काव्य उपादानों के कविता में रखते है पर लोक की अटूट सन्निबद्धता के चलते कविता दमकने लगती है-

उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूँगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूँगी
मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे.
('चंपा काले -काले अच्छर नहीं चीन्हती' से)

कितना सादा,किंतु अर्थपूर्ण बयान है!

त्रिलोचन की कविता ही उदाहरण है कि उन्होंने जीवन की पाठशाला में ही काव्य की दीक्षा ली है जो अपने लोक से उन्हें मिली है। इसी रास्ते चलकर कविता को एक चेतन मन और स्पंदित समाज की अभिव्यक्ति का आकार प्रदान कर पाये हैं। विकास का अर्थ उनके लिये जीवन में ही है, उससे बाहर नहीं। जीवनेतर प्रगति व्यर्थ है, मिथ्या है उनके लिये!-

जीवन में ही प्रगति भरी है, अलग नहीं है।
जो बाहर है वस्तु तत्व से दूर कहीं है ।

त्रिलोचन इस तरह भावों की गहराई के कवि हैं, वे उसका नाटक नहीं करते। वे दुख-दर्दों की हाला पीकर और भी उर्जावान होकर काव्य-सृजन करते हैं। यह उनके दृढ व्यक्तित्व को इगित करता है। आज मानवता के ह्रास का एक बड़ा कारण चरित्र का दोहरापन है और कई बार तो चरित्र के विचलन को ही आधुनिकता का पर्याय मान लिया जाता है क्योंकि सरप्लस पूंजी ने मानव के सबंधों को सिर्फ़ धन -संबंधों में ही बदलने का कार्य किया है और सुख की झूठी परिभाषा की है। परंतु उनके चरित्र का ठोसपन और एकनिष्ठता वस्तुत: आधुनिकता का भारतीय संदर्भ है जिसकी जड़ें हमारी परंपरा और संस्कृति में है जो वे अपने पारंपरिक ज्ञान और संस्कार से लेते हैं । यही कारण है कि इनके प्राण-तत्व के रुप में तुलसी और निराला उनके आदर्श हैं जिनकी गुरुता उन्होंने स्वीकारी है हॉलाकि दोनों अलग-अलग काल और परिस्थितियों के कवि हैं परंतु त्रिलोचन के अंतस में समाकर एकरस हो गये हैं। अत: उनकी परंपरा किताबी नहीं वरन् संस्कार-जन्य और व्यावहारिक है। कविता के बीज भी उनके बाल्य-मन में लोकगीतों (चीरानीपट्टी में गाये जाने वाले गीत यथा; चौताल,उलारा आदि) से ही फलीभूत हुए। इसलिये वे अपनी ज़मीन को कभी नहीं भूलते। पर यह भी गौ़र करने के लायक है कि वे उदार विकसित जीवन के पक्ष में हैं यानि नवाचारी जीवनोन्मुख गतिविधि के हिमायती हैं। उसके लिये अपने मन के द्वार बंद नहीं रखते।

त्रिलोचन की कविताओं में आकर्षण का एक और कारण है, उनकी कविताओं में बड़ी मात्रा में लोक-चित्रों और प्रकृति का समुपस्थित होना। वे अपने आस-पास की प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं, उनकी बारीक गतिविधियों का अवगाहन करते हैं और सादी भाषा की लड़ियों में पिरोकर कविता की सुन्दर माला रच देते हैं। इस प्रकार प्रकृति के व्यापारों से न्यस्त होकर उनकी कविता में कला का स्वत: प्रस्फूटन हो जाता है अथवा कहें कि, वे कला के लिये कविता नहीं करते थे। इसलिये उनकी कविता में वक्रता और गूढ़ता की जगह आत्मीयता और सरलता का बोध होता है। यही उनका कलावाद है-

"पवन शान्त नहीं है"-
आज पवन शांत नहीं है श्यामा
देखो शांत खड़े उन आमों को
हिलाए दे रहा है
उस नीम को
झकझोर रहा है
और देखो तो
तुम्हारी कभी साड़ी खींचता है
कभी ब्लाउज़
कभी बाल
धूल को उड़ाता है
बग़ीचों और खेतों के
सूखे तृण-पात नहीं छोड़ता है
कितना अधीर है
तुम्हारे वस्त्र बार बार खींचता है
और तुम्हें बार बार आग्रह से
छूता है
यौवन का ऎसा ही प्रभाव है
सभी को यह उद्वेलित करता है
आओ ज़रा देर और घूमें फिरें
पवन आज उद्धत है
वृक्ष-लता-तृण-वीरुध नाचते हैं
चौपाए कुलेल करते हैं
और चिड़ियाँ बोलती हैं।

इस संदर्भ में त्रिलोचन की कविता को देखने से यह पता चलता है कि उनकी कविता उस लोक-हृदय का पता देती है जिसमें बाजार में जिसके लिये जगह नहीं। अत: बाजार से बेजा़र होते इस लोक-समय में उनकी कविताओं का महत्व और बढ़ जाता है जो बाजार के विपरीत, मानव की मूल संवेदना को जगाने में समर्थ है क्योंकि दुनियाभर में संप्रति चल रहे लूट-खसोट, छल-छद्म, हिंसा, दंभ, अहंकार, प्रदर्शन ,अन्याय और उत्पीड़न से अलग वह एक प्रेममय, विलक्षण संसार की रचना करता है जिसमें सच्चाई को प्रतिष्ठित करने की और आदमी को झूठ से अलगाने की शब्दों की ताक़त है।

अत: वरिष्ठ कवि और समालोचक विजेंद्र जी ('कृतिओर' के सम्पादक) की यह उक्ति हमें स्वीकारने में तनिक भी संकोच नहीं कि "त्रिलोचन मनीषी भी हैं। तपस्वी भी। कविता उनके अत्यंत दायित्वशील जीवन का पर्याय है। उन्होंने कविता का मान रखने के लिये हर बड़ा जोखिम उठाकर हमारे लिये एक अनुकरणीय प्रतिमान रचा है। ऐसे कवि ही अपनी जाति के गौरव होते हैं। आनेवाली पीढियां उनसे प्रेरणा लेती हैं। ऐसी कविता हमारे लिये हर समय ज्योति-स्तंभ का कार्य करती है। त्रिलोचन जैसे कवि अपने समय का भेदन कर उसे इस प्रकार अतिक्रमित करते हैं जो हमें भविष्य के कवि भी लग सकें।" इसलिये त्रिलोचन के शब्दकर्म की पुनर्पुन: समीक्षा और प्रतिष्ठा वर्तमान समय की माँग भी है।

31 comments:

  1. त्रिलोचन के कवित्व पर संग्रहणीय आलेख है। सुशील कुमार जी नें पूरे शोध के साथ प्रस्तुत किया है।

    त्रिलोचन जी की पुण्यतिथि पर उन्हे साहित्य शिल्पी द्वारा याद करना अच्छा लगा।

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  2. हिन्दी-हिन्दु-हिदुस्तान9 दिसंबर 2008 को 9:10 am

    सुशील कुमार नें पूरी विवेचना और मर्म के साथ त्रिलोचन को प्रस्तुत किया है "त्रिलोचन इस तरह भावों की गहराई के कवि हैं, वे उसका नाटक नहीं करते। वे दुख-दर्दों की हाला पीकर और भी उर्जावान होकर काव्य-सृजन करते हैं। यह उनके दृढ व्यक्तित्व को इगित करता है। आज मानवता के ह्रास का एक बड़ा कारण चरित्र का दोहरापन है और कई बार तो चरित्र के विचलन को ही आधुनिकता का पर्याय मान लिया जाता है क्योंकि सरप्लस पूंजी ने मानव के सबंधों को सिर्फ़ धन -संबंधों में ही बदलने का कार्य किया है और सुख की झूठी परिभाषा की है। परंतु उनके चरित्र का ठोसपन और एकनिष्ठता वस्तुत: आधुनिकता का भारतीय संदर्भ है जिसकी जड़ें हमारी परंपरा और संस्कृति में है जो वे अपने पारंपरिक ज्ञान और संस्कार से लेते हैं । यही कारण है कि इनके प्राण-तत्व के रुप में तुलसी और निराला उनके आदर्श हैं जिनकी गुरुता उन्होंने स्वीकारी है हॉलाकि दोनों अलग-अलग काल और परिस्थितियों के कवि हैं परंतु त्रिलोचन के अंतस में समाकर एकरस हो गये हैं।"

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  3. आपने त्रिलोचन के कवि व्यक्तित्व को समेटने की कोशिश तो की है लेकिन काफ़ी आधी अधूरी और बिखरी बिखरी सी … दरअसल त्रिलोचन की सादगी बडी धोखदेह है और गहन विवेचना की माग करती है। उनका कवि रूप कितने अन्तर्विरोधो से निर्मित है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि वे एक तरफ़ ग्रामीण जीवन कि कविता लिख रहे थे तो दूसरी तरफ़ सानेट जैसे 'विदेशी' छन्द का प्रयोग कर रहे थे।
    हिन्दी की दिक्कत यह है कि हम अपने कवियों को केवल श्वेत-श्याम मे देख्ने के आदी है…असलियत शायद धूसर होती है।

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  4. हाँ , साहित्य शिल्पी और सुशील जी को त्रिलोचन जैसे आदमक़द कवि के पुनर्पाठ के प्रयास के लिये बधाई तो देनी ही होगी।

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  5. इस ज्ञानवर्धक आलेख के लिए सुशील जी को आभार ।
    बाबा के अनेक संस्‍मरणों, यादों में मुझे एक बात बार बार याद आता है कि वे अपने स्‍मृतिकोश में हिन्‍दी के विभिन्‍न भाषा व बोलियों के शव्‍दों को बसाने के साथ साथ कविताओं में उनके प्रयोग पर व अर्थ पर गहन विमर्श भी करते थे इसी संबंध में छत्‍तीसगढी शव्‍दों के प्रति उनकी उत्‍सुकता मुझे विभोर करती थी ।

    नमन, बाबा त्रिलोचन, मेरे जनपद के कवि हो तुम ।

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  6. मैं अशोक कुमार पाण्डेय जी को यह स्पष्ट करना चाह्ता हूँ कि बाबा त्रिलोचन ने‘सॉनेट’ को हु-ब-हु ग्रहण नहीं किया बल्कि उसका कविता में उसका एक भारतीय देशज रूप विकसित किया। हम उन सभी चीजों को स्वीकारते हैं जिनकी नियति हमारे देश की संघर्षशील जनता से जुड़ी है। मार्क्स तो अपने देश में नहीं हुये ,फिर जनवादी -प्रगतिशील धारा के कवि-लेखक क्यों उनसे प्रेरणा लेकर अपनी माटी में उसका साक्षात्कार करते हैं?त्रिलोचन को नकारने वाले आज खुद हाशिये पर जा रहे हैं। नामवर जी को देख लीजिये। कहते तो हैं कि प्रखर मार्क्सवादी समीक्षक हैं पर जनवाद की आड़ में पर रूपवाद का पक्ष लेते हैं।पाण्डेय जी को अगर असलियत देखनी है तो आज शहरों में कृत्रिम जीवन जी रहे,जनता से कटकर नागर बोध की किताबी कविता लिख रहे कवियों को देखना चाहिये। उनको मालूम चल जायेगा कि वहाँ कितना अंतर्विरोध है।
    बहुत धन्यवाद सुशील कुमार जी को कि इतनी गहरी जानकारी उन्होंने त्रिलोचन जी की पुण्य तिथि पर दी।-अशोक सिंह,जनमत शोध संस्थान,दुमका।

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  7. अशोक कुमार पाण्डेय जी, नमस्कार।
    त्रिलोचन जी को लेकर हिंदी साहित्य में कोई विवाद नहीं। अब नामवर सिंह जी भी स्वीकार चुके हैं कि वे इस युग के बड़े कवि हैं। नाज़िम हिक़मत, पॉब्ला नेरूदा,इत्यादि भी तो अपने देश के नहीं हैं। फिर उनको क्यों हम पढ़ते हैं और उनके काव्य सौष्ठव से सीख भी लेते हैं? क्योंकि उनका संघर्ष अपने देश यानि भारत की जनता के संघर्ष से एकमेक है। मैने इस देश के कई बड़े आलोचकों से त्रिलोचन बाबा के काव्य-विवेक को लेकर बातें की है पर किसी ने आज तक उनके चरित्र और लेखन में अंतर्विरोध को रेखांकित नहीं किया। उनकी उपेक्षा का मूल कारण उनके कवि का सदैव जनपद-पक्षधर बना रहना रहा जो नगरों-महानगरों के कथित रूप से सभ्य लेखकों को दोयम दर्जे की बात लगी और अखरती भी रही। जिन विदेशी विधाओं से अपने लोक और अपनी संस्कृति ,साथ ही दूर-दराज जनपदों में रहने वाली जनता की बात को कहने में बल मिले, क्या उसका भारतीय रूप अगर कोई रचता है तो उसका त्याज्य कर देना चाहिये? तब तो इस काल में बैठ कर भी तुलसीदास की रामचरितमानस सरीखी चौपाईयाँ रचनी होगी या कबीर से दोहे लिखने होंगे हालाकि वे बड़े,बहुत कवि थे भक्तिकाल के। पर आज क्या उन विधाओं में रचना संभव नहीं है? कवि को हमेशा समकालीक और विचार से प्रगतिशील, साथ ही नम्र और उदार भी होना पड़ता है । तभी वह टिक पाता है। अंतर्विरोध तो तभी कहा जायेगा तब कवि लिखे कुछ और जीये कुछ। क्या इस तरह का अंतर्विरोध त्रिलोचन के कवि-व्यक्तित्व के संबंध में कभी लक्षित हुआ है? अगर हुआ है तो सविस्तार लिखें ताकि पाठक भी जान पायें।
    नगर में भी भूखा-दुखा,गरीब बहुतायत में वास करते हैं। यानि कि वहाँ भी जनपद होता है जिसे सरप्लस पूँजी ने लोगों के शोषण के बल पर खड़ा किया है। कितने कवि उनकी जिंदगी पर लिख रहे हैं? लोक का मतलब फ़ोक(folk) नहीं, जन (mass)है। हमें बारीकी से हर बात समझनी होगी।
    *** सुशील कुमार।

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  8. पंकज सक्सेना9 दिसंबर 2008 को 1:43 pm

    आलेख के साथ साथ त्रिलोचन के कृतित्व पर चल रही सार्थक बहस से प्रभावित हुआ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. ग्अहरी अंतर्दृष्टि के साथ लिखा गया आलेख है। अशोक जी की टिप्पणी नें एक स्वस्थ बहस को जन्म दिया है। अन्य विद्वानों के भी इस संदर्भ में विचार जान कर अच्छा लगेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुशील कुमार जी हमारे दुमका के ही चर्चित कवि-लेखक हैं। त्रिलोचन जी पर उनका यह आलेख त्रिलोचन जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर गहराई से प्रकाश डालता है और हमें उनकी कालजयी कविताऒं को पढ़ने की प्ररणा भी देता है ।

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  11. एक सारगर्भित आलेख के लिए धन्यवाद। बाबा त्रिलोचन पर इतना सुन्दर आलेख मैने पहले कभी नहीं पढा। कुमार साहब आपने काफ़ी मेहनत कर यह आलेख लिखा है। निश्चित ही यह बाबा के पुन्यतिथि पर एक श्रधासुमन है।....
    पुनः धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  12. त्रिलोचन जी पर जानकारी पूर्ण विस्तृत लेख और रचनाएँ पढ़वाने के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  13. अरे भाई किस कम्बख्त ने त्रिलोचन को कम महत्वपूर्ण कवि कहा।
    मेरा बस यह कहना है कि त्रिलोचन के जटिल कवि व्यक्तित्व पर जिस विस्तार से चर्चा की ज़रूरत है वह इस आलेख से पूरी नही होती।
    मेरा सानेट से काहेका विरोध्…। साहित्य मे देशी विदेशी क कोई भेद नही होता। मै बस उस द्वैत और अन्तर्विरोध क ज़िक्र करना चाहता था जिसके तहत वह ठेठ देसज बिम्बो को सानेट जैसी विदेशी या कहे गैर पारम्परिक विधा मे पेश करने की हिम्मत कर पाते है। यह परम्परा मे गहरे पैठ कर ग्लोबल होने क बडा उदाहरण है।
    यह समकालीनता और साथ ही उससे मुठ्भेड है जिसे करने के लिये जिगरा चाहिये।
    हाँ लेकिन इसके क्या खतरे है यह भी जानना होगा…इससे मुक्त हो पाना आसान नही॥

    वैसे बडे आलोचको ने क्या कहा यह ज़िक्र गैरज़रूरी है।
    अशोक भाई गाँव मेरे लिये अन्जान क्षेत्र नही न जीवन मे न रचना मे।

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  14. वैसे गाँव मे रहने भर से न कोई जनकवि हो जाता है न शहर मे रहने से कोई कलवादी और कृत्रिम। जन गावो मे भी है और शहर मे भी…जन्शत्रु भी। सवाल यह है कि कवि साथ किसके खडा है। वैसे त्रिलोचन का भी बाद का पूरा जीवन शहरो मे हि बीता

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  15. बाबा त्रिलोचन जी क बारे में पढ कर अच्छा लगा... सुशील जी ने बहुत अच्छा लिखा है. बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  16. trilochan ji per www.janadesh.in per sahitya vale calam me unka aakhiri interview aur sansmaran padha tha bad me font badal jane se kai sabd pure nahi aaye per abhi bhi vah rochak lekh hai.

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  17. साहित्य शिल्पी द्वारा .....त्रिलोचन जी की पुण्यतिथि पर उन्हे याद करना अच्छा लगा....


    एक सुन्दर आलेख के लिए
    सुशील जी,
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  18. कवि सुशील ने कलम चलाई

    बाबा त्रिलोचन पर नहीं

    कवि त्रिलोचन पर

    बहुत बहुत बधाई सुशील भाई।


    पर क्‍या आप यह भी जानते हैं

    कि उन्‍होंने कहानियां भी लिखी थीं

    यदि नहीं तो जानिये यह भी
    कि उनके कहानी संग्रह का नाम

    देशकाल था और पढि़ए, संग्रह की एक कहानी

    नीचे दिए गए लिंक पर जाकर -
    त्रिलोचन की कहानी - सोलह आने

    http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2007/solah_aane/solah_aane1.htm

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  19. KAVI TRILOCHAN KE KRITITV AUR
    VYAKTITV KE BAARE MEIN ANEK LEKH
    PADHEN HAIN.SHUSHIL KUMAR KA LEKH
    BONUS KEE TARAH HAI.ASHOK KUMAR
    PANDEY KEE TIPPANI BHEE VICHAARNIY
    HAI.

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  20. बाबा त्रिलोचन के बारे में इतनी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सुशील जी को कोटि-कोटि धन्यवाद। इस आलेख की सबसे बड़ी खासियत मुझे यह लगी कि शब्दों का चुनाव बड़ी हीं सावधानी से किया गया है।
    बाबा को पुण्यतिथि पर नमन!!!

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  21. आपकी यह प्रस्तुति संग्रहणीय
    और वन्दनीय है.....साधुवाद !
    ========================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

    उत्तर देंहटाएं
  22. पूरे आलेख की समग्रता और तथ्यपरकता की तो प्रशंसा करनी ही होगी, शीर्षक बहुत सोच कर रखा गया है जो एक वाक्य में त्रिलोचन को साकार कर रहा है।

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  23. कविवर त्रिलोचन के कृतित्व का परिचय और उनके संदर्भ में कुछ मित्रों की आलोचनात्मक टिप्पणियाँ पढ़ कर अच्छा लगा. एक स्वस्थ आलोचना सदैव कवि और पाठक दोनों के लिये हितकर ही होती है.
    सुशील कुमार जी त्रिलोचन जी पर बहुत अच्छा आलेख लिखा है परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि उन जैसे व्यक्तित्व को इतने कम शब्दों में पूरी तरह समेट पाना असंभव ही है. अपने रचनाकारों ही नहीं अपितु सभी प्रसिद्ध व्यक्तियों को केवल श्वेत-श्याम में देखने की आदत पाये जाने से मैं भी सहमत हूँ.
    भाई अशोक कुमार जी के त्रिलोचन जी के इस पक्ष पर भी विस्तृत विचार यदि साहित्यशिल्पी के माध्यम से यदि मिल सकें तो शायद हम सबके लिये त्रिलोचन जी को समझने में और सहायता हो सकेगी.

    उत्तर देंहटाएं
  24. भाई श्री अजय यादव जी, वस्तुत: यह आलेख संपादक आदरणीय श्री कमल नयन पाण्डेय जी के अनुरोध पर मेरे द्वारा वृहत रूप में सुलतान,उ.प्र. की प्रतिष्ठित पत्रिका‘युग तेवर’के आगामी त्रिलोचन विशेषांक(सम्भावित पृष्ठों की संख्या ढ़ाई सौ से उपर) के लिये ‘लोक जीवन के अन्यतम चितेरे’ शीर्षक से लिखी गयी है जो इस माह के अंत तक विमोचित होगी। यहाँ तो वेब पत्रिका के पृष्ठों को दृष्टिपथ में रखते हुये त्रिलोचन जी के श्रद्धांजलि- स्वरूप आलेख को संक्षिप्त कर दिया गया है। जिन महानुभावों को उनके विषय में समग्रता से मालूमात करनी हो उन्हें उस विशेषांक से और उसमें जो मेरे आलेख हैं,उससे गुज़रना होगा।सधन्यवाद
    *** सुशील कुमार।

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  25. आपका आलेख संपूर्ण है और वेब पत्रिका की सीमाओं में बेहतरीन है।

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  26. त्रिलोचा पर जानकारीपूर्ण व बेहतरीन आलेख है।

    उत्तर देंहटाएं
  27. aadarneey susheel jee aapka aalekh padhaa aur padhne ke baad badi sukhad anubhuti hui aur jigyaasa jaagi aapke "Yug tevar" me Chhape trilochan par vistrit aalekh ko padhne ki..wah mujhe kaise mil sakti hai..?? main filhaal Trilochan par shodh kar rahaa hoon BHU se evam is vishay par aapki sahayata kaa aakankashi hoon...

    उत्तर देंहटाएं
  28. सारगर्भित और जनकवि त्रिलोचन के महत्त्व को शिद्दत से रेखांकित करता हुआ आलेख। सुशील कुमार जी ..कोटिशः बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  29. सारगर्भित और जनकवि त्रिलोचन के महत्त्व को शिद्दत से रेखांकित करता हुआ आलेख। सुशील कुमार जी ..कोटिशः बधाई

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साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
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