'युग पुरूष' ….
तातश्री !
भीष्म पितामह ...!!
यही नाम ...
मान देकर ,
बंदी बना दिया
युग ने....

कालजयी अपराजेय..
ब्रह्मचारी .... अक्षुणयुवा ...
पिता ... पितामह ...
सिहासन रक्षक
जीवन के पथ पर ...
कंटकों से बेखबर ...
निडर ..
किन्तु... फांसा गया
बस कुटिलता की चाल से
बस.....

ढूँढता मैं ,
हा ! हा .. !! हतभागी
वेदना से पूर्ण
अंग अंग छिद्रित
पुकारता हूँ ..
चिरंतन प्रिय अर्जुन

याचन...
तीक्ष्ण शर संधान की ..
अभिशप्त ..
'इच्छामृत्युवर' से
विवश हूँ देखने
निर्निमेष...
'युग महाभारत' ...
हठज्वाल से ..
धधकती मानवता की
त्राहि त्राहि ..पुकार
गंगेऽ..... गंगेऽऽ ....
माँ लो मुझे
आगोश अपने में
छिपा लो शिशु सा
शरण दो ...

अतुल सी जलराशि कुंतल में
स्नेह दो
माँ आज फ़िर से
उद्धार कर दो
धर्म की केंचुल लपेटे
इस अधर्मित राह से

अन्याय से... आतंक से
'युग पुरूष' को
अब पार कर दो

15 comments:

  1. अन्याय से... आतंक से
    'युग पुरूष' को
    अब पार कर दो

    आज भी समसामयिक है यह संदर्भ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. kavita bhramita karte hai. Kis desh kal aur vishy ko udbhodhit karte hai nahe samajh aata - Dinesh Acharya, Jabalpur.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर रचना . महाभारत कथा की याद दिला दी आपने .

    बधाई.

    विजय
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. ढूँढता मैं ,
    हा ! हा .. !! हतभागी
    वेदना से पूर्ण
    अंग अंग छिद्रित
    पुकारता हूँ ..
    चिरंतन प्रिय अर्जुन
    "waah, ati sunder"

    regards

    उत्तर देंहटाएं
  5. परीक्षाओं का कोई अंत नहीं होता। बहुत अच्छी और वर्तमान समय के अनुकूल कविता है। श्रीकांत जी की रचनाओं की विशेषताओं से युक्त..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. KAANT JEE,MUJHE AAPKEE
    KAVYABHIVYAKTI ACHCHHEE
    LAGEE HAI.SHABDON KA
    SANYOJAN BAHUT SUNDER HAI.

    उत्तर देंहटाएं
  7. भाव और भाषा दोनों ही दृष्टि से
    अति-उत्तम......

    बधाई...श्रीकांत जी.....

    उत्तर देंहटाएं
  8. इतिहास को एक बार फ़िर से जीवत करती कविता ..सच कहा आपने कई बार सिर्फ़ शब्दों के घिर कर आदमी बेबस हो जाता है ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. सद्य सोये राष्ट्र की मनोदशा और युग पुरूष की परिकल्पना .... आप संभवतः आम नागरिक की पीड़ा और उससे उपजी हताशा अभिव्यक्त कर रहे हैं.. इस कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति वाले देश में किसी भी दृढ़ संकल्प की आशा व्यर्थ ही कर रहे हैं

    एक अच्छी रचना के लिए धन्यवाद और नव वर्ष की मंगलकामना

    अमिता 'नीर'

    उत्तर देंहटाएं
  10. kavita ki sundarta usske shabdo se hoti hai .......is kavita ke kavi ne shabdo ka chayan bahut sundarta aur kathinta se kiya hai....main is kavita ke kavi ko hardik badhaiya deti hu.......taki ve apne iss path par aage badhe....
    Ekta

    उत्तर देंहटाएं
  11. ढूँढता मैं ,
    हा ! हा .. !! हतभागी
    वेदना से पूर्ण
    अंग अंग छिद्रित
    पुकारता हूँ ..
    चिरंतन प्रिय अर्जुन

    -बहुत अच्छी कविता है,

    -आपको और आपके परिवार को भी नववर्ष की ढेरों शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  12. धन्यवाद आप सब सुधी पाठकों का
    ...नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं. इसी आशा के साथ की इस बार आतंकवाद के प्रति हमारे राजनीतिक नेतृत्व की दृढ़ता इस बार सच्ची सिद्ध हो

    उत्तर देंहटाएं
  13. शब्द संयोजन व भाव संयोजन अपने आप मे नितांत अनूठे।महाभारत का प्रत्येक चरित्र यों तो विशिष्ट है ।भीष्म चरित्र की प्रत्येक सतह निरंतर पढ़ी जा सकती है।

    आपका भाषा -सौष्ठव अनुपम है भ्राता !
    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं

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