आधुनिक हिंदी साहित्य को श्रद्धेय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिन प्रमुख भागों में विभक्त किया है, उनमें "द्विवेदी युग" काव्य-भाषा के रूप में खड़ी बोली हिंदी के उदय और प्रसार का युग है। इसका नामकरण आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर "द्विवेदी युग" किया जाना ही साहित्य के क्षेत्र में उनके सम्मान का जीवंत प्रमाण है।

मैथिलीशरण गुप्त जैसे महान कवि के गुरु माने जाने वाले आचार्य द्विवेदी का जन्म दौलतपुर गाँव (जिला रायबरेली, उत्तर प्रदेश) में १८६४ में हुआ। पिता श्री रामसहाय द्विवेदी ब्रिटिश सेना में थे। कमज़ोर आर्थिक स्थिति के कारण इनकी शिक्षा-दीक्षा समुचित रूप से न हो सकी। हिंदी,संस्कृत और अंग्रेज़ी का घर पर ही अध्ययन करने के पश्चात उन्होंने पहले कुछ समय टेलीग्राफ विभाग में और फिर जी.आर.पी. में नौकरी की। इस दौरान उन्होंने गुजराती, मराठी आदि प्रादेशिक भाषाओं का भी अध्ययन किया। १८८० से झाँसी में रेलवे की नौकरी करते हुये वे एक साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध होने लगे।

१९०३ में रेलवे की नौकरी से त्यागपत्र देकर वे साहित्यिक पत्रिका 'सरस्वती' के संपादन में लग गये और १९२० तक इसके संपादक रहे। उनके कार्यकाल के दौरान 'सरस्वती' सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली पत्रिका के रूप में उभरी। 'सरस्वती' का संपादन करते हुये वे निरंतर हिंदी में लिखने के लिये रचनाकारों को प्रोत्साहित और उनकी भाषा को परिमार्जित करते रहे। उनके प्रयास का ही परिणाम था कि धीरे-धीरे हिंदी एक साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज, अवधी आदि का स्थान लेने लगी।

भाषा के अतिरिक्त वे साहित्य में नये नये विषयों का समावेश करने और साहित्य को आम जन के अधिकाधिक निकट लाने के पक्षधर थे। इस संदर्भ में अपने एक लेख में वे कहते हैं, "कविता का विषय मनोरंजक और उपदेशजनक होना चाहिये। यमुना के किनारे केलि-कौतूहल का अद्भुत-अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबन्ध लिखने की अब कोई आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के 'गतागत' की पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथी पर्यंत पशु; भिक्षुक से लेकर राजा पर्यंत मनुष्य; बिन्दु से लेकर समुद्र पर्यंत जल; अनन्त आकाश; अनन्त पृथ्वी; अनन्त पर्वत - सभी पर कविता हो सकती है; सभी से उपदेश मिल सकता है और सभी के वर्णन से मनोरंजन हो सकता है।"

आचार्य के रचनाकर्म का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। उन्होंने काव्य-मंजूषा, कविताकलाप, सुमन आदि काव्य -संग्रह; कुमार संभव, मेघदूत, वेकन विचार, विचार-रत्नावली आदि अनुवाद; नाट्यशास्त्र, रसज्ञ-रंजन, हिंदी नवरत्न, कालिदास की निरंकुशता, साहित्य संदर्भ आदि आलोचना ग्रंथ तथा अनेकानेक विषयों पर सौ से भी अधिक निबंध प्रकाशित कराये।

उनकी साहित्य सेवा को देखते हुये १९३१ में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें 'आचार्य' और हिंदी साहित्य सम्मेलन ने 'वाचस्पति' की उपाधि से सम्मानित किया। १९३८ में हिन्दी साहित्य की इस महान विभूति का देहान्त हो गया। आज आपकी पुण्यतिथि के अवसर पर साहित्यशिल्पी परिवार आपको नमन करता है।

9 comments:

  1. महावीर प्रसाद द्विवेदी को स्मरण करने का धन्यवाद। अच्छा आलेख है।

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  2. भाषा के अतिरिक्त वे साहित्य में नये नये विषयों का समावेश करने और साहित्य को आम जन के अधिकाधिक निकट लाने के पक्षधर थे। इस संदर्भ में अपने एक लेख में वे कहते हैं, "कविता का विषय मनोरंजक और उपदेशजनक होना चाहिये। यमुना के किनारे केलि-कौतूहल का अद्भुत-अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबन्ध लिखने की अब कोई आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के 'गतागत' की पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथी पर्यंत पशु; भिक्षुक से लेकर राजा पर्यंत मनुष्य; बिन्दु से लेकर समुद्र पर्यंत जल; अनन्त आकाश; अनन्त पृथ्वी; अनन्त पर्वत - सभी पर कविता हो सकती है; सभी से उपदेश मिल सकता है और सभी के वर्णन से मनोरंजन हो सकता है।"

    अच्छा लिखा है आपने। अच्छा विन्दु उद्धरित किया है।

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  3. द्विवेदी जी को पुण्यतिथि पर नमन।

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  4. द्विवेदी जी को पुण्यतिथि पर नमन।

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  5. आधुनिक हिंदी साहित्य की नींव रखने वाले साहित्य-पुरोधा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी को शत-शत प्रणाम।

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  6. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी को शत-शत प्रणाम.स्मरण करने का धन्यवाद.

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  7. आलेख अच्छा है।

    धन्यवाद।

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  8. मातृभाषा की अतुलनीय सेवा करने वाले संत को मेरा प्रणाम |

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  9. साहित्य के स्तंभों का स्मरण अपने आप में एक सुखद अहसास है.. द्विवेदी जी को उनकी पुण्यतिथि पर नमन. और अजय जी को इस लेख के लिये आभार.

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