बिखरे हुये लम्हों की लडी बना ली है
जब चाहे गले मे डाल ली जब चाहे उतार दी
झील का सारा पानी उतर आया आँखों में
न जाने कितनी गागर खाली हैं
तैरता था उसमें तिनका कोई
जो यूँ ही आँखों छलक गया कभी
हौले से उतरूँ सैलाब की रवानियों में
कि मेरी गागर अभी खाली है
इन ज़ुल्फों में न जाने कहाँ
सूरज की लालिमा खोती गयी
और घटायें बन कर फिर
झील में बरसने लगी
किनारे बैठे सोचती रही
और शाम ढलती रही

11 comments:

  1. बिखरे हुये लम्हों की लडी बना ली है
    जब चाहे गले मे डाल ली जब चाहे उतार दी
    झील का सारा पानी उतर आया आँखों में
    न जाने कितनी गागर खाली हैं

    सरल शब्द...बढिया भाव....अति उत्तम

    उत्तर देंहटाएं
  2. पंकज सक्सेना14 दिसंबर 2008 को 9:11 am

    हर दो पंक्ति नये बिम्ब के साथ अपनी बात कहती है। बहुत अच्छी कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  3. झील का सारा पानी उतर आया आँखों में
    न जाने कितनी गागर खाली हैं
    तैरता था उसमें तिनका कोई
    जो यूँ ही आँखों छलक गया कभी

    वाह वाह!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी कविता है अनुपमा जी, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. ्भाषा और शब्दो क चुनाव आकर्षित करता है…प्रभावित भी

    उत्तर देंहटाएं
  6. अच्छी रचना है... अर्थ काफी गहरे और बहुआयामी हो सकते हैं कविता के एक एक पंक्ति मानों विस्तार से व्याख्या की मांग करती है....

    उत्तर देंहटाएं
  7. ‘एक शाम’ कविता तो शाम को ही पोस्ट होनी चाहिये थी। सुबह-सुबह कैसे लग गयी ?अशोक कुमार पाण्डेय जरा मुझे भी बताने का कष्ट करेंगे कि कौन सी भाषा,कौन से शब्द पर वे लट्टु हैं ?

    उत्तर देंहटाएं
  8. किनारे बैठे सोचती रही
    और शाम ढलती रही
    great sense
    regards

    उत्तर देंहटाएं
  9. रचना में लय बद्धता की कमी अखरती है.. भाव गहरे होते हुये भी खाली पन सा महसूस होता है.. थोडे से प्रयास से इस कविता को प्रभावी बनाया जा सकता था.

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget