दिल के कोरे कागज पर
खींचकर कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें
जब देखती हूँ...
बन जाती है तस्वीर तुम्हारी

और लगता है कागज़ का वह टुकड़ा
कह रहा हो मुझसे
मै तो बसा हूँ दिल में तुम्हारे
क्यों कागज पर उतारा है?
देखो बेरहम दुनियाँ जला न दे
देखो कहीं हवा उड़ा न दे
और घबरा कर मै समेट लेती हूँ
वो तस्वीर तुम्हारी....

जब सुबह का सूरज
अपनी रौशनी फ़ैलाये
मेरी खिड़की से झाँकता है
मुझे नजर आते हो तुम
अपनी इन्द्र-धनुषी बाँहे फ़ैलाये
और मेरे चेहरे से छूती
तुम्हारी बाँहे
जगा देती है मुझे
तुम्हारे अहसास के साथ

सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी
एक कविता बन गई है
और मै एक कलम
जो हर वक्त
तुम्हारे प्यार की स्याही से
बनाती है तस्वीर तुम्हारी...।

10 comments:

  1. मै तो बसा हूँ दिल में तुम्हारे
    क्यों कागज पर उतारा है?

    very nice

    उत्तर देंहटाएं
  2. सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी
    एक कविता बन गई है
    और मै एक कलम
    जो हर वक्त
    तुम्हारे प्यार की स्याही से
    बनाती है तस्वीर तुम्हारी...।
    प्रभावित किया आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी
    एक कविता बन गई है

    बस इतना ही पूरी कविता है। बहुत अच्छे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. मन को छू लेने वाली कविता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर मनोभाव समेटे कविता...
    कितना अच्छा हो अगर कागज की लकीरें...हाथ की लकीरों से मेल खा जायें और किस्मत की लकीरें चमक उठें

    उत्तर देंहटाएं
  6. दिल में हो तुम...

    आँखों में तुम....

    बोलो तुम्हें कैसे चाहूँ...


    प्रभावी रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  7. itna acchi kavita ,aur kitna bhaavpoorn hai ..
    सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी
    एक कविता बन गई है
    और मै एक कलम
    जो हर वक्त
    तुम्हारे प्यार की स्याही से
    बनाती है तस्वीर तुम्हारी...।
    wah wah , kya baat hai .

    bahut badhai

    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

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