सुमित्रानंदन पंत – जीवन एवं रचना संसार [पुण्यतिथि पर विशेष] – राजीव रंजन प्रसाद

छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में एक, सुमित्रानंदन पंत का साहित्य को योगदान अविस्मरणीय है। आपका जन्म 20 मई 1900 को अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी ग्राम में हुआ। आप स्वीकार करते हैं कि जन्म-भूमि के नैसर्गिक सौन्दर्य नें ही आपके भीतर के कवि को बाहर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यही कारण है कि छायावाद की वृहत्रयी में सम्मिलित रह आपनें हिन्दी कविता को इतने सुन्दर प्रकृति चित्र प्रदान किये हैं कि आपको हिन्दी का ‘वर्डस्वर्थ’ कहा जाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के अलावा शैली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों की कृतियों नें भी आपको प्रभावित किया है।

संघर्षपूर्ण जीवन की परिणति होता है एक भावुक मन और शायद इसी तरह अंजान कविता बही आती है। जन्म के केवल छ: घंटे बाद ही आपकी माता का देहावसान हो गया। आप सात भाई-बहने में सबसे छोटे थे तथा आपका नाम गुसाई दत्त रखा गया था आपको यह नाम प्रिय नहीं था अत: आपने बाद में अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। आपका आरंभिक लालन-पालन आपकी दादी नें किया। 1918 में आप काशी आ गये तथा क्वींस कॉलेज में अध्ययन करने लगे। 1921 में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के आह्वाहन पर आपने कॉलेज छोड दिया और घर पर रह कर ही हिन्दी, संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे। सन 1926-27 में आपकी पहली पुस्तक ‘पल्लव’ नाम से प्रकाशित हुई। कुछ समय पश्चात आप अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये और इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड तथा उनकी विचारधारा के प्रभाव में आये। 1938 में आपनें ‘रूपाभ” नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के सान्निध्य में आप प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। आप 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुडे रहे व मुख्य-प्रोड्यूसर के पद पर कार्य किया। आपकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की आपकी रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है। 28 दिसंबर 1977 को आपका देहावसान हिन्दी जगत को साहित्य को अपूर्णीय क्षति था।

“वीणा” तथा “पल्लव” में संकलित आपके छोटे गीत हमें विराट व्यापक सौंदर्य तथा तप:पूत पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक आप प्रगतिशील विचारधारा से जुडते प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक आपकी काव्ययात्रा निस्संदेह प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है।
आपकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुखपडाव हैं – प्रथम में आप छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से चलित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। 

आपकी रचनाओं की कुछ बानगी प्रस्तुत है। प्रकृति की गूढता को आप सहजता से कह जाते हैं:- 
शशिकिरणों से उतर उतर कर भू पर कामरूप नभचर 
चूम नवल कलियों का मृदुमुख सिखा रहे थे मुस्काना

प्रकृति के माध्यम से मानव के उन्नत भविष्य की कामना करते हुए पंत लिखते हैं:- 
धरती का आँगन इठलाता
शस्य श्यामला भू का यौवन
अंतरिक्ष का हृदय लुभाता!

जौ गेहूँ की स्वर्णिम बाली 
भू का अंचल वैभवशाली 
इस अंचल से चिर अनादि से 
अंतरंग मानव का नाता..

किसानों की दशा पर ‘वे आँखें’ कविता की कुछ पंक्तियाँ –
अंधकार की गुहा सरीखी, उन आँखों से डरता है मन,
भरा दूर तक उनमें दारुण, दैन्य दु:ख का नीरव रोदन

भौतिक बंधनों से पहले आध्यात्मिक बंधनों को तोडने की बात करते हुए आप लिखते हैं –
आओ, अपने मन को टोवें! 
व्यर्थ देह के सँग मन की भी 
निर्धनता का बोझ न ढोवें

आपका भाषा पर पूर्णाधिकार था। उपमाओं की लडी प्रस्तुत करने में आपका कोई सानी नहीं। आपने हिन्दी काव्य को एक सशक्त भाषा प्रदान की, छंदों का परिष्कार किया तथा खडी बोली की काव्यशक्ति को संवर्धित, पुष्ट तथा परिष्कृत किया। आपका संपूर्ण कृतीत्व हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। आपकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं – वीणा, ग्रंथी, पल्लव, गुंजन, युगांत, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, उत्तरा, कला और बूढा चाँद, चिदंबरा तथा लोकायतन। काव्य के अलावा आपनें आलोचना, कहानी, आत्मकथा आदि गद्य विधाओं में भी रचनायें कीं। आपको पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी , सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे सम्मानों से अलंकृत किया गया है। आज आपकी पुण्यतिथि पर आपको कोटिश: नमन।

15 टिप्पणियाँ:

  1. बेनामी says

    Nice article on Pant. Thanks.

    Alok Kataria


    दृष्टिकोण says

    साहित्य शिल्पी को गंभीर साहित्यिक कार्य करने की शुभकामनायें। नेट पर वीकीपीडिया पर पंत जी के संक्षिप्त जीवन परिचय के अलावा कुछ संक्षिप्त आलेख यत्र तत्र मिलते हैं एवं एक आलेख सृजन गाथा पर। जीवन व रचनाओं पर अच्छी सामग्री प्रस्तुत की गयी है। नेट पर सुमित्रानंदन पंत पर सामग्री उपलब्ध कराने वाले सभी मंचों के साथ साथ साहित्य शिल्पी को धन्यवाद। अच्छे लेख के लिये राजीव जी बधाई।


    नंदन says

    पंत की रचनाधर्मिता और उनके जीवन पर आलेख अच्छा है। सुमित्रानंदन पंत जी को पुण्यतिथि पर नमन।


    रितु रंजन says

    सुमित्रानंदन पंत जी को पुण्यतिथि पर नमन.


    अभिषेक सागर says

    बहुत अच्छा लेख है। सुमित्रानंदन पंत की पुण्यतिथि पर पुण्य स्मरण।


    निधि says

    संपूर्ण लेख है। अच्छा लगा पंत की के विसःअय में जानना। उन्हे पुण्यतिथि पर याद करना सुखद है। हमें अपने माननीय रचनाकारों को सम्मान देना ही चाहिये।


    बेनामी says

    CHHAYAVAADEE KAVION MEIN PRAMUKH
    SUMITRANANDAN KEE KYA BAAT!JAB
    BHEE KAVITA KEE BAAT CHALTEE HAI
    TO UNKEE YE PANKTIAN APNE AAP
    ADHRON PAR AA JAATEE HAIN----
    VIYOGEE HOGAA PAHLA KAVI
    AAH SE UPJAA HOGAA GAAN
    NIKAL KAR AANKHON SE CHUPCHAAP
    BAHEE HOGEE KAVITA ANJAAN
    JAESE SUKOMAL SUMITRANANDAN PANT
    JEE THE VAESE HEE SUKOMAL UNKEE
    BHASHA AUR UNKE BHAAV THE.
    LEKH BAHUT HEE BADIA HAI.DO BAARPADH CHUKA HOON.RAJIV JEE KO
    BADHAAEE.


    PRAN SHARMA says

    UPARLIKHIT PANKIAN MEREE HAIN


    अशोक कुमार पाण्डेय says

    नीरव सन्ध्या मे प्रशान्त
    डूबा है सारा ग्राम्य प्रान्त
    पत्तों के आनत अधरो पर
    सो गया निखिल वन का मर्मर
    ज्यों वीणा के तारों मे स्वर।

    पन्त जी को मेरी भी श्रद्धाँजलि


    hempandey says

    पंतजी की एक कविता के कुछ अंश, जो मुझे अच्छे लगे :

    मुझको लिखता देख, हाथ से कलम छीन कर
    मेरी पोती ने टेढ़ी मेढ़ी रेखाएं
    कागज़ पर कुछ खींच,मोड़ अपनी प्रिय ग्रीवा,
    देखा मेरी ओर,दर्प से स्फीत दृष्टि से!..........
    .............................................................
    ...............................................................
    सहसा मेरा
    ध्यान गया अपने ऊपर!............कुछ सीधे टेढे
    आख्रर कागज पर लिख,उनको गीत छंद कह,
    मैं भी संभवतः सर्वज्ञं समझता हूँ अब
    अपने को, गौरव से फूला! क्या मनुष्य में
    शाश्वत शैशव कहीं छिपा रहता, अंतस की
    भाव-मूक गोपन खोहों में?
    कितना थोड़ा
    मनुज जान पाता आजीवन विद्यार्जन कर !
    सदा अगम्य रहेगा ज्ञान, मनुज अबोध शिशु!
    पोती की विस्मित चितवन में सत्य था महत् !


    लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` says

    आदरणीय पँत जी मेरे लिये दादाजी रहे हैँ - उनका यही चित्र नेट पर उपलब्ध है और उनपर लिखे अन्य जानकारीपूर्ण आलेखोँ की आवश्यकता है ताकि हिन्दी छायावाद युग के अभूतपूर्व कवि की कालजयी रचनाओँ से हिन्दी पढनेवाले रुबरु हो पायेँ -
    राजीव भाई का प्रयास सही दिशा मेँ रखा सराहनीय कदम है जिसके लिये उन्हेँ साधुवाद !
    - लावण्या


    पंकज सक्सेना says

    सुमित्रानंदन पंत पर बहुत अच्छा आलेख है। पुण्यतिथि पर नमन।


    praveen pandit says

    प्रकृति के सुकुमार कवि पर राजीव जी का सुंदर आलेख बहुत ही अच्छा लगा।
    साहित्य- शिल्पी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट रूप ले ,यही कामना।
    प्रवीण पंडित


    Vijay Kumar Sappatti says

    Rajeev ji ,

    aapne pant ji par ye lekh likh kar hum sahitya premiyon par badi krupa ki hai .. pant ji rachnaayen kaaljayi hai .. unko mera naman..

    aur aapko aur sahityashilpi ki team ko meri der saari badhai ..

    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/


    बेनामी says

    dheek hi hai badhiya toh kya kahen !!!!!!!!!!!!!


एक टिप्पणी भेजें

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

© सर्वाधिकार सुरक्षित

"साहित्य शिल्पी" में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। प्रकाशित रचनाओं के विचारों से "साहित्य शिल्पी" का सहमत होना आवश्यक नहीं है।
इसके द्वारा संचालित Blogger.