जैसा कि मैं पहले जिक्र कर चुका हूं कि नाटक विधा सामूहिक कला है. इसे कविता लेखन या पेंटिंग जैसी कलाओं की तरह साध पाना नामुम्किन होता है. नाटक करने के लिये आपको समूह की आवश्यकता होती है. यदि आपने एक बार मन में तय भी कर लिया कि नाटक करेंगे तो काफी नहीं होता इसके लिये नाटक के पात्रों की आवश्यकता पडेगी, फिर नाटक के अभ्यास के लिये स्थान की प्रतिदिन समय की भी जरूरत पडेगी. और किसी तरह यह सब जुट भी गया तो सब नियमित रूप से समय पर अभ्यास के लिये पहुंच ही जायेंगे यह अपने आप मे बडी समस्या है... बिना पैसे के नाट्य ग्रुपों का तो यही हाल है. या तो नाटक की कास्ट जुट ही नही पाती जुटती है तो रिहर्सल पर लोग पहुंचते ही नहीं. इसी समस्या को ध्यान में रख कर मेरे गुरूजी ने कुछ द्विपात्रीय नाटक लिखे थे, और मंचित भी किये... यदि एक भी जिज्ञासू उन्हें मिल गया तो एक पात्र खुद और एक उससे तैयार करा कर गुरू जी नाटक को पोषते रहे थे... स्वर्गीय ललित मोहन थपल्याल जी ऐसे नाट्य सधकों में शायद अकेले ही सुमार हों जिन्होंने अपने घर को नाट्क का साधना स्थल बना दिया हो... साहिबाबाद जैसे स्थान पर अपने मकान का प्रथम तल एक लघु आडिटोरियम ही बनवा डाला और निरंतर वहा नाटय गतिविधियों को जारी रखा... अपने अंतिम समय तक वह इस क्षेत्र में नाटक जैसी विधा को पोषते रही.. राजेंद्र नगर में रहने वाले साहित्यकार और कला संस्क्रति में रुचि रखने वाले सभी आम जन गुरू जी के स्थाई दर्शक थे... नाटक के आयोजन की बाकायदा चिट्ठी उन दर्शकों को जाती थी और देखते देखते कई दर्शक गुरू जी के शिष्य बन कर कुशल अभिनेता बन गये थे... ऐसे नाट्य साधक थपल्याल जी का एक द्वियपात्रीय नाटक आपके सामने आज पेश है... आप पढिये और जानिये कि नाट्क कितनी गहरी बात कम से कम पात्रो के माध्यम से भी कह सकता है... (एक निवेदन है, कि यदि कोई पाठक इस नाटक को पढ कर इसे मंचित करना चाहे तो इसके लिये के अनुमति के लिये पत्र अवश्य लिख दें. अनुमति के लिये पता है - साधना संस्कृति प्रतिष्ठान, १०/९७, राजेंद्र नगर -३, साहिबाबाद, गाजियाबाद)


कयामत आ रही है
लेखक : स्वर्गीय ललित मोहन थपल्याल

पात्र : डंडेवाला व अच्छन
(पीछे की ओर एक बड़ी सी स्याह चट्टान जो धुंधले नीले आसमान की रोशनी में छायाचित्र सी दिखाई दे रही है। आगे खाली जमीन और दाहिनी ओर एक झाड़ी। जब परदा खुलता है जमीन पर ऊकडूं बैठा एक आदमी ध्यान से झाड़ी के अंदर कोई चीज देख रहा है। बाईं ओर से घुंघरू-बंधे डंडे को पटकते हुए डंडेवाला आता है।)

डंडेवाला : बचो, बचो 'कयामत आ रही है'। होशियार! ख़बरदार! कयामत आ रही है। (डण्डा बजाता है) ए आदमी! इधर आओ। (कोई जवाब नहीं मिलता) ए आदमी! सुनते नहीं हो?
अच्छन: (पलट कर) क्या मुझसे कह रहे हैं?

डंडेवाला : और नहीं तो किससे कहूंगा? तुम्हारे मेर अलावा और कोई है यहां?
अच्छन: और तो कोई नहीं है।

डंडेवाला : तो फिर ? तुमसे बात नहीं करूंगा तो इन पेड़ों से करूंगा? इन चट्टानों से करूंगा? मैं बुला रहा हूं और तुम अपनी ही धुन में मस्त हो। यह क्या बत्तमीजी है?
अच्छन: बत्तमीजी करने का मेरा कतई इरादा नहीं था हुजूर। मैं आपको पहचानता नहीं, इसलिए सोचा आपको मुझसे क्या काम हो सकता है।

डंडेवाला : नहीं पहचानते? अंधे हो क्या? मुझे अपने सामने खड़ा नहीं देख रहे हो?
अच्छन: देख तो रहा हूं मगर.. ..

डंडेवाला : क्या देख रहे हो, बयान करो
अच्छन: आप कोई नायाब हस्ती हैं। फकीरी आपका लिबास है, लंबा लबादा पहने हैं। कमर पे रस्सी लपेटे हैं। डण्डा हाथ में है, जिसमें घुंघरू बंधे हैं। चेहरे पर रोब, आंखों में चमक है। उम्र का पता नहीं चलता।

डंडेवाला : अब भी नहीं समझे?
अच्छन: (झिझकते हुए) कुछ कुछ समझ तो गया, शायद आप कोई बहुत बड़े.. ..

डंडेवाला : बस इतना जानना काफी है। तुम कौन हो?
अच्छन: कोई खास नहीं, एक मामूली आदमी।

डंडेवाला : ठीक है। मामूली होना अच्छा है। नाम क्या है?
अच्छन: अच्छन।

डंडेवाला : अच्छन! याने कि आप सबसे अच्छे हैं?
अच्छन: जी नहीं, मतलब यह है कि सबसे अच्छे रहते हैं, बुराई से बचे रहते हैं, इसी से नाम चल पड़ा अच्छन। वैसे मां बाप ने लम्बा चौडा नाम दिया है। बताऊं?

डंडेवाला : जरूरत नहीं।
अच्छन: ठीक है, तो मैं चलूं फिर। (जाने लगता है।)

डंडेवाला : ठहरो जी, बिना इजाकात कैसे जा रहे हो? पहले मेर सवालों का जवाब दो।
अच्छन: (वापस आ कर) पूछिए। वैसे सवालों के जवाब मुझे आते नहीं।

डंडेवाला : ये बताओ कुछ ही देर पहले तुम झाड़ी के अंदर क्या ढूंढ रहे थे?
अच्छन: यह सवाल तो आसान है। ढूंढ कुछ नहीं रहा था, हुजूर एक फूल खिल रहा था, वही देख रहा था।

डंडेवाला : फूल का खिलना देख रहे थे! तुम्हें और कुछ काम नहीं है?
अच्छन: काम तो भतेर हैं, पर सुबह के वक्त मुझे यही सब अच्छा लगता है।

डंडेवाला : अच्छा लगता है! आप कहां के नवाब हैं? सुबह का वक्त बहुत कीमती होता हैं। उसे काम में लगाने के बजाय यों गंवाते हो?
अच्छन: नहीं हुजूर गंवाता नहीं हूं, सुबह की सैर तंदुरस्ती के लिए.. .. ..

डंडेवाला: तन्दुरुस्ती के लिए? तुम्हारी उम्र क्या है?
अच्छन: ठीक से तो हिसाब रखा नहीं साहब, होगी यही ४५ साल, ५० साल।

डंडेवाला : ५० कुछ कम है? और कितना जीना चाहते हो?
अच्छन: यह अपने हाथ में कहां है साहब?

डंडेवाला : तो किसके हाथ में है?
अच्छन: सब मालिक के हाथ में हैं। जैसी उसकी मर्जी होगी।

डंडेवाला : (नफरत से) मालिक की मर्जी! मुझे मालूम है मालिक की मर्जी़। जानना चाहते हो?
अच्छन: जी हां, जानना तो चाहता हूं।

डंडेवाला : तो सुनो। होशो हवास काबू में रख के, कलेजा थाम के सुनो। बहुत जल्द कयामत आ रही है।
अच्छन: (दिलचस्पी से) कौन आ रही है?

डंडेवाला : कयामत, बेवकूफ आदमी, कयामत। दस दिन के अंदर सब कुछ खत्म हो जायेगा।
अच्छन: ( न समझता हुआ) सब कुछ?

डंडेवाला : सब कुछ। दस दिन के अंदर जो भी देख रहे हो सब तहस नहस हो जायेगा। नदियों में खून के सैलाब आयेंगे, पहाड़ आग उगलेंगे, हवा बंद हो जायेगी, इंसान, जानवर परिन्दे घुट घुट कर दम तोड़ देंगे। उसके बाद आयगा बारिश का दौर जो कभी रुकने का नाम न लेगा। समन्दर में तूफान उठेंगे और जमीन का चप्पा चप्पा पानी से ढक जायगा।

अच्छन: यह तो बड़ी मुसीबत है। कोई बचने की सूरत बतलाइए।

डण्डेवाला : (जोर देकर) बचने की कोई सूरत नहीं है। तुम्हारा आखिरी वक्क्त आन पहुंचा।
अच्छन: आन पहुंचा? अभी तो मुझे बहुत से काम करने बाकी है।

डंडेवाला : आप हैं किस खेत की मूली? तुम्हारे काम खत्म होने तक कयामत रुकी रहेगी?
अच्छन: नहीं नही मेर लिये वह क्यों रुकने लगी?

डंडेवाला : तब फिर क्या करोगे?
अच्छन: कुछ नहीं। जब कुछ कर ही नहीं सकते तो चैन से बैठा जाय। देखें कयामत क्या गुल खिलाती है।

डंडेवाला : काहिल आदमी ! ऐसे नहीं बैठा जाता हाथ पर हाथ धरे। मैं बचा सकता हूं तुमको लेकिन तुम्हारी मदद से।
अच्छन: मेरी मदद से? मैं भी इस लायक हूं?

डंडेवाला : बशर्ते कि तुम काहिली छोड़ दो, आंखें मूंदकर मेर पीछे चलो और जो मैं बताऊं वही करो।
अच्छन: लेकिन जो आप बतलायेंगे, मैं कर पाऊंगा?

डंडेवाला : क्यों नहीं कर पाओगे? तुम्हें रोना, चिल्लाना, सर पीटना नहीं आता?
अच्छन: खूब आता है। सारी उमर रोया चिल्लाया हूं, कई बार सर पीट चुका हूं।

डंडेवाला : नतीजा क्या निकला?
अच्छन: कुछ नहीं। जैसी हालत थी वैसी ही रही।

डंडेवाला : वैसी नहीं रहेगी जब मेरे इशारे पर रोओगे, चिल्लाओगे, मरोगे, मारोगे।
अच्छन: रोना-चिल्लाना तो मैं जानता हूं, पर मरूंगा, मारूंगा कैसे?

डंडेवाला : हमलावर बनकर। मैं बनाऊंगा हमलावर तुम्हें। तुम चीते की चाल से मार करोगे, बंदूक की आवाज में बोलोगे।
अच्छन: कैसे?

डंडेवाला : एक हाथ में तुम्हार होगा हथगोला। (उसकी मुठ्ठी बंद कर के ऊपर उठाता है।) दूसरे में बंदूक (दूसरे हाथ को बंदूकिये के अन्दाज में मोडता है।) और कमर में बंधी होगी.. .. ..
अच्छन: रोटी और प्याज।

डंडेवाला : नहीं, बेवकूफ आदमी। कमर में बंधी होंगी कारतूस की पेटी। क्या बंदूक बिना गोली के चलेगी?
अच्छन: मगर गोली चलाऊंगा किस पर?

डंडेवाला : यह भी कोई पूछने की बात है? दुश्मन पर।
अच्छन: मेरा तो कोई दुश्मन ही नहीं है।

डंडेवाला : कदम कदम पर दुश्मन हैं तुम्हारे, लेकिन तुम नासमझ हो इसलिये उन्हें नहीं पहचानते। मैं पहचनवा दूंगा तुम्हें।
अच्छन: मगर इस सबसे फायदा क्या होगा?

डंडेवाला : फायदा? तुम दुनिया को बदल दोगे, राज करोगे।
अच्छन: राज करूंगा? मैं?

डंडेवाला : राज मैं करूंगा, पर नाम तुम्हारा रहेगा। एक ही बात है।
अच्छन: और कयामत?

डंडेवाला : कयामत फिर नहीं आयेगी। उसे काबू कर लेंगे हम।
अच्छन: और अगर उससे पहले मैं खुद ही गोली का शिकार हो गया तो?

डंडेवाला : अरे भई, समाज के लिये, कौम के लिये, देश के लिये जान देनी भी पड़े तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है?
अच्छन: तनख्वाह क्या मिलेगी?

डंडेवाला : तुम्हें तनख्वाह की जरूरत ही नहीं रहेगी, बेकूफ आदमी!
अच्छन: और .. .. .. दाल रोटी?

डंडेवाला : दाल रोटी! अरे दुनिया की दौलत तुम्हारे कदमो में होंगी, बड़े बड़े सेठ साहूकार, राजे-महाराजे, पूंजीपति थेलियां लिये खड़े होंगे तुम्हार सामने।
अच्छन: मेर सामने क्यों?

डंडेवाला : क्योंकि तुम्हार हाथ में बंदूक होगी, ताकत होगी। तुम जिसे जो हुक्म दोगे उसे मानना होगा। जो नहीं मानेगा उसकी गर्दन (गला काटने का इशारा करता है।)
अच्छन: नहीं साहब, आपका यह मरने मारने का रास्ता मुझे पसन्द नहीं है। लबड धबड जैसी भी चल रही है, जिंदगी ही ठीक है।

डंडेवाला : बहुतं ठस दिमाग आदमी हो। तुम्हारी समझ में बात आती ही नहीं।
अच्छन: आपकी बात भी तो अजीब है। कयामत आयेगी तो भुगत लेंगे। अभी से रोने-धोने जान देने क्यों बैठें?

डंडेवाला : समझने की कोशिश करो, बेवकूफ आदमी। कयामत आयेगी तो कोई नहीं बचेगा। सब खत्म हो जायेगा।
अच्छन: ऐसा भी तो मुमकिन है कयामत आय और दरवाजे पर दस्तक देकर निकल जाय। या फिर वह आय और उसका सैलाब हमें बहाकर किसी नये टापू में पहुंचा दे। या कयामत आय और उसके साथ ही एक नई, इससे बेहतर दुनिया आ जाय।

डंडेवाला : रंगीन सपने देखने वाला आदमी पागल होता है, पागल! समझे! काबू रखो अपने दिमाग पर। पकडो इसे। (कमर की रस्सी खेलकर उसका एक सिरा अच्छन को पकडाता है।)
अच्छन: क्या करूं इसका?

डंडेवाला : बस पकड़े रहो और घूम जाओ। जब तक मैं रुकने को न कहूं घूमते जाओ। (रस्सी अच्छन के चारों ओर लिपट जाती है।)
अच्छन: (घबराहट में) अरे, अरे मुझे बांध क्यों दिया? खोलो यह रस्सी।

डंडेवाला : इसलिये बांध दिया कि तुमको हर खतरे से बचाना मेरा फर्ज है।
अच्छन: किसने आपको यह फर्ज सौंपा? कहां के बादशाह हैं आप?

डंडेवाला : बादशाह ही हूं। ठीक से पहचानो मुझे। यह डण्डा और यह रस्सी ऊपर वाले ने दी है मुझे। इन्हीं की ताकत से मैं समाज को चलाता हूं। धर्म को कायम रखता हूं। इन्सान को गुमराह होने से बचाता हूं। शासक, मठाधीश, इमाम, राजनेता सब मेर ही रूप हैं।
अच्छन: मैं सचमुच बडा बेवकूफ हूं जो अब तक तुम्हें पहचान नहीं पाया। तुमने सदियों से मेरे दिमाग में भूसा और दिल में डर भर कर धर्म और देशभक्ति का झूठमूठ नाम लेकर, मुझे हथकड़ी-बेडियों में जकड़ रखा है।

डंडेवाला : सब तुम्हारे भले के लिये।
अच्छन: और मेरी भलाई उसी बात में है जिससे तुम्हारा मतबल हासिल होता है। अब मैं समझा तुम क्यों मुझे कयामत का डर दिखा रहे हो। कयामत नहीं क्रांति आ रही है।

डंडेवाला : नाम में क्या रखा है, बेवकूफ आदमी, लेकिन उसके खतर को तो समझो।
अच्छन: खतरा तुम्हारे लिये है, मेर लिये नहीं। तुम्हारे अधिकार छिनेंगे, तुम्हारी चालों का पर्दाफाश होगा, तुम्हारे अंधेरे तहखानों से चोरी का सोना बरामद होगा। मुझे मत लपेटो अपने साथ। छोडो मुझे। खोलो यह रस्सी। (अपने को छुड़ाने की कोशिश करता है।)

डंडेवाला : हिलो मत। तुम्हें गुमराह होने से बचाना मेरा फर्ज है।
अच्छन:और तुम्हारे खुदगर्ज इरादों और खूनी पंजों से खुद को बचाना मेरा फर्ज है।
(खींचतान में रस्सी टूट जाती है। दोनों गिर पड़ते हैं।)

अच्छन: (उठकर) मैंने तोड़ दी तुम्हारी रस्सी। अब हम तुम्हारी चाल में नहीं आयेंगे। हम जियेंगे, हम जीतेंगे।
(वह दांईं ओर से बाहर निकल जाता है। उसके स्वर में स्वर मिलाते हुए अनेक कंठों से आवाज आती है हम जियेंगे, हम जीतेंगे। आवाज तेज होती है। डंडेवाला इधर उधर देखते हुए घिसट घिसट कर पीछे हटता है। फिर उठ खड़ा होता है।)

डण्डेवाला : (उसकी सांस फूल रही है, आवाज में डर है।) कयामत आ रही है, बचाओ बचाओ कयामत आ रही है।

(डण्डेवाला डर से इधर उधर देखता हुआ भाग जाता है।)

12 comments:

  1. Reading a script was nice experience, thanks sahitya shilpi.

    Alok Kataria

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  2. अच्छा नाटक लगा। दोस्तों से बातकर के देखता हूँ कि क्या इसका नुक्कड किया जा सकता है।
    प्रस्तुति के लिये योगेश भाई का आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. द्वियपात्रीय नाटक का अच्छा उदाहरण आपने प्रस्तुत किया। ललित मोहन थपल्याल जी का यह नाटक प्रभावी है विशेष कर इसका आशावादी अंत।

    उत्तर देंहटाएं
  4. "अच्छन: (उठकर) मैंने तोड़ दी तुम्हारी रस्सी। अब हम तुम्हारी चाल में नहीं आयेंगे। हम जियेंगे, हम जीतेंगे।
    (वह दांईं ओर से बाहर निकल जाता है। उसके स्वर में स्वर मिलाते हुए अनेक कंठों से आवाज आती है हम जियेंगे, हम जीतेंगे। आवाज तेज होती है। डंडेवाला इधर उधर देखते हुए घिसट घिसट कर पीछे हटता है। फिर उठ खड़ा होता है।)

    डण्डेवाला : (उसकी सांस फूल रही है, आवाज में डर है।) कयामत आ रही है, बचाओ बचाओ कयामत आ रही है।"

    बहुत प्रभावित किया इस एकांकी नें। भाई अशोक कुमार पाण्डेय जी अगर नाटक करवायें तो उसे रिकॉर्ड भी कर के हमें दिखाने की भी कोशिश करें। साहित्य शिल्पी एक नाटक प्रस्तुत कर भी चुका है।

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  5. कसी हुई पटकथा....गज़ब की पकड़....
    कुल मिला के ...ज़बर्दस्त....
    बधाई स्वीकार करें

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति! आभार योगेश भाई, इसे हम तक पहु~ण्चाने का!

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  7. वास्तव में इसे नुक्कड में देखने का अलग ही अनुभव होगा। बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  8. पंकज सक्सेना14 दिसंबर 2008 को 9:14 am

    नाटक स्तंभ पर बहुत विविधता प्रस्तुत की है साहित शिल्पी नें। योगेश जी बधाई के पात्र हैं।

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  9. बहुत बढिया संवाद.. एक आम आदमी के मन के भाव बखूबी झलकते हैं.. एक साकारात्मक अंत लिये अंत तक बांधे रखने में सक्षम

    उत्तर देंहटाएं

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