आज की सुबह कुछ अलग सी थी या फ़िर मुझे ही एसा लग रहा था मालूम नही .पूरे घर में अजीब सा सन्नाटा था एसा कल से था जब से मैने अरुण से शादी की बात कही थी पापा ने तो मुझसे बात ही नही किया और माँ चिढ चिढ़ के बात कर रही है.

"माँ क्या मै अपने जीवन के लिए एक छोटा सा फैसला भी नही कर सकती"

"छोटा सा फैसला ?ये पूरे जीवन की बात है "

"पर माँ आप ही तो कहती थी अरुण अच्छा लड़का है"

"है अच्छा मै तो आज भी यही कहती हूँ, पर शादी के लिए नही ."

"क्यों माँ क्या शादी के लिए उपमाएं बदल जाती है? अरुण जो आप और पापा का प्यारा हुआ करता था उसको देखते ही स्नेह की दरिया बहती थी पर आज सब उल्टा क्यों हो गया गुस्से की लू क्यों चलने लगी बस इसी लिए की मै उस से प्यार करती हूँ शादी करना कहती हूँ"

"तुम चाहे जो समझो तुम्हारी शादी उससे नही हो सकती बस"

"माँ क्या मुझे कारण जानने का हक है या........................"

"मृदु सुनो जीवन सिर्फ़ प्यार पे नही चलता उस के लिए पैसे की भी जरूरत होती है अरुण से कोई शिकायत नही है पर एक तो वो टीचर है, ऊपर से हिन्दी का. आज के समय में कौन पढता है हिन्दी? हर कोई अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम में पढाता है, इंग्लिश में बोलने वाले की सभी इज्जत करते हैं.... चलो टीचर भी ठीक यदि इंग्लिश, मैथ या साइंस का होता तो मुझे कोई एतराज न होता. उन्हे तो ट्यूशन अच्छी मिल जाती है और अच्छी कमाई हो जाती है, पर हिन्दी कहाँ चलती है आज कल? और जो चलता है वही बिकता है। तो समझ लो हिन्दी के टीचर से तुम्हारी शादी नही हो सकती"

माँ उठ के चली गई मै सोचती रही अरुण का गुनाह टीचर होना नही हिन्दी का टीचर होना था।

15 comments:

  1. वैसे अब हालात बदल रहे हैं। हिन्दी की दशा में सुधार है। अच्छी लघुकथा।

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  2. बहुत बढ़िया लघुकथा के लिए धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही है इस समय जो बाज़ार मे बिके वह महत्वपुर्ण और जो ना बिके सब कूडा।
    अच्छा लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पंकज सक्सेना27 दिसंबर 2008 को 10:17 pm

    लघुकथा का भावपक्ष प्रबल है, शिल्प कसें।

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  5. कम शब्दों में भी आप अपनी बात गहरे तक पहुँचने में सफल रही हैं... बधाई..

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  6. " एक तो वो टीचर है,ऊपर से हिन्दी का......
    बहुत ही छू लेने वाली बात लगी........
    इस मुहल्ले में मैंने बोलना छोड़ दिया था ...पर ये पंक्तियाँ एक अलग ही दर्द बयान कर रही हैं.....
    सो लिखा .........
    गहरी बात कही है आपने...

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  7. आप सभी तहेदिल से धन्यवाद .आप के शब्दों से मै कृतार्थ हुई .आशा करती हूँ ये स्नेह बना रहेगा
    धन्यवाद
    सादर
    रचना

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  8. कड़वा सच...

    लेकिन समय ज़रूर बदलेगा...उम्मीद पे दुनिया कायम रह सकती है तो हम क्यों नहीं?....


    अच्छी कहानी

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  9. हिन्दी अब बाजार को भाने गली है, जल्द ही समय बदलेगा। आपकी कहानी के नायक के हीरो बन जाने के दिन करीब हैं।

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  10. स्थिति बेहतर चाहे जितनी हो गयी हो,किंतु इस सोच की समाज मे आज भी कमी नहीं ।
    चोट अच्छी है।

    प्रवीण पंडित

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  11. बहुत अच्छी लघुकथा...

    बधाई..

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  12. aapne is katha ke jariye ye sabit kiya hai ki ,hamaare apne hi desh mein ,hindi ki kaisi durdasha hai ..

    aapki katha , bahut acchi ban padi hai . aapko badhai .

    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

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