मैथिलीशरण गुप्त : एक परिचय [पुण्यतिथि पर विशेष] - अजय यादव


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के मार्गदर्शन में जिन कवियों ने ब्रज-भाषा के स्थान पर खड़ी बोली हिन्दी को अपनी काव्य-भाषा बनाकर उसकी क्षमता से विश्व को परिचित कराया, उनमें श्रद्धेय मैथिलीशरण गुप्त का नाम सबसे प्रमुख है। उनकी काव्य-प्रतिभा का सम्मान करते हुये साहित्य-जगत उन्हें राष्ट्रकवि के रूप में याद करता रहा है।


मैथिली जी का जन्म झाँसी के समीप चिरगाँव में 3 अगस्त, 1886 को हुआ। बचपन में स्कूल जाने में रूचि होने के कारण इनके पिता सेठ रामचरण गुप्त ने इनकी शिक्षा का प्रबंध घर पर ही किया था और इसी तरह उन्होंने संस्कृत, अंग्रेज़ी और बांग्ला का ज्ञान प्राप्त किया। काव्य-लेखन की शुरुआत उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में अपनी कवितायें प्रकाशित कर की। इन्हीं पत्रिकाओं में से एकसरस्वतीआचार्य द्विवेदी के संपादन में निकलती थी। युवक मैथिली ने आचार्य की प्रेरणा से खड़ी बोली में लिखना शुरू किया। 1910 में उनकी पहला प्रबंधकाव्यरंग में भंगप्रकाशित हुआ।भारत-भारतीके प्रकाशन के साथ ही वे एक लोकप्रिय कवि के रूप में स्थापित हो गये।

मैथिली जी की रूचि ऐतिहासिक और पौराणिक कथानकों पर आधारित प्रबंधकाव्य लिखने में अधिक थी और उन्होंने रामायण, महाभारत, बुद्ध-चरित आदि पर आधारित बड़ी सुंदर रचनायें लिखीं हैं। रामायण पर आधारितसाकेतशायद उनकी सबसे प्रसिद्ध और कालजयी कृति है। इसमें उन्होंने रामायण की कथा को तत्कालीन अयोध्या में बैठे किसी व्यक्ति की तरह वर्णित किया है। पर इसकी प्रसिद्धि का सबसे सशक्त आधार है; पूरे प्रबंधकाव्य के दो सर्गों में वर्णित लक्ष्मण-पत्नी उर्मिला का वियोग वर्णन। रामायण में उपेक्षित रह गई उर्मिला को गुप्त जी ने जैसे अपने हृदय का सारा स्नेह प्रदान कर दिया है। इसी प्रकारयशोधरामें गौतम बुद्ध के घर छोड़ने के बाद यशोधरा की अवस्था का बड़ा ही मार्मिक चित्रण गुप्त जी ने किया है। इन दोनों ही रचनाओं के वियोग वर्णन की खासियत यह है कि इसमें उर्मिला और यशोधरा के माध्यम से आधुनिक नारी-विमर्श को भी स्वर दिया गया है।

वेदने, तू भी भली बनी।
पाई मैंने आज तुझी में अपनी चाह घनी।
नई किरण छोडी है तूने, तू वह हीर-कनी,
सजग रहूँ मैं, साल हृदय में, प्रिय विशिख-अनी।
ठंडी होगी देह मेरी, रहे दृगम्बु सनी,
तू ही उष्ण उसे रखेगी मेरी तपन-मनी। (साकेत)

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते। (यशोधरा)

नारी-सशक्तिकरण के अलावा गुप्त जी की रचनाओं में भारतीय संस्कृति के उत्थान और जन-जागरण का स्वर प्रमुखत: ध्वनित होता है।भारत-भारतके अलावाकिसान’, ’आर्य’, ’मातृभूमिऔरजय भारतजैसी कविताओं में उनके देश और समाज के प्रति रुझान का स्पष्ट परिचय मिलता है। गुप्त जी की अन्य प्रसिद्ध कृतियाँ हैं - जयद्रथ-वध, पंचवटी, वैतालिक, काबा-कर्बला, द्वापर, कुणाल (काव्य), तिलोत्तमा और चंद्रहास (नाटक) इसके अतिरिक्त उन्होंने रुबाइयात उमर खैयाम और संस्कृत नाटकस्वप्नवासवद्त्ताका अनुवाद भी किया।

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है (आर्य)

मैथिली जी की भाषा निरंतर विकास की ओर अग्रसर होती दिखाई देती है. आरंभिक कविताओं में जहाँ कहीं-कहीं भाषा भावों के साथ तालमेल बिठा पाने के कारण रूखी जान पड़ती है, वहीं बाद मेंसाकेतजैसी रचनाओं में वे अत्यंत भावप्रवण भाषा का प्रयोग करते हैं जिसमें कुछ कुछ छायावाद की झलक भी मिलती है। शैली की दृष्टि से देखें तो मैथिली जी की कवितायें द्विवेदी युगीन अन्य कवियों की ही तरह कुछ इतिवृत्तात्मक प्रतीत होतीं हैं।

चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रहीं थीं जल थल में।
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी,
अवनि और अम्बर तल में।
पुलक प्रकट करती थी धरती,
हरित तृणों की नोकों से।
मानो झूम रहे हों तरु भी,
मन्द पवन के झोंकों से। (पंचवटी)

आज़ादी के बाद उन्हें मानद राज्यसभा सदस्य का पद प्रदान किया गया जिस पर वे 12 दिसंबर, 1964 को अपनी मृत्यु तक रहे। आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर साहित्यशिल्पी परिवार सारे साहित्य-प्रेमियों के साथ उन्हें श्रद्धांजलि देता है।

14 टिप्पणियाँ:

  1. सुशील कुमार says

    पुण्यतिथि पर मैथिली शरण गुप्त जी को याद करना अच्छा लगा। हम निचली कक्षाओं में उन्हें पढ़ते भी थे।


    आलोक शंकर says

    ’भारत-भारत’
    bharat - bharti

    हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
    आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
    भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
    फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
    संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
    उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
    yah udhdharan bhi bharat-bharti se hi hai.


    "अर्श" says

    इस महान हस्ती को मेरा नमन ... वाकई निचली कक्षावों हमने इस हिन्दी के स्तम्भ को पढ़ा है ....

    आभार
    अर्श


    निरन्तर - महेंद्र मिश्रा says

    गुप्त जी को याद करना अच्छा लगा.महान हस्ती को मेरा नमन ....


    मोहिन्दर कुमार says

    हिन्दी साहित्य मैथिलीशरण गुप्त जी के योगदान के लिए उनका हमेशा ऋणी रहेगा. इस महान आत्मा को उनकी पुण्यतिथि पर मेरा नमन


    लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` says

    आदरणीय दद्दा पर बेहद सुँदर लेख है
    - लावण्या

    http://antarman-antarman.blogspot.com/2006/10/

    See this link --


    बेनामी says

    Very Nice article, thanks for remembering Maithili Saharan Gupt.

    Alok Kataria


    रितु रंजन says

    महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य जगत के आधार स्तंभ हैं, उन्हे याद करता यह आलेख अच्छा लगा।


    नंदन says

    अजय जी को बधाई इस संग्रह करने योग्य आलेख के लिये। मैथिलीशरण गुप्त को इस प्रस्तुति के माध्यम से बहुत सार्थकता से स्मरण किया गया।


    गीता पंडित (शमा) says

    पुण्यतिथि पर....
    मैथिली शरण गुप्त जी को ....मेरा नमन ....
    ...गुप्त जी को याद करना अच्छा लगा....


    सुँदर लेख.....


    अभिषेक सागर says

    बहुत अच्छी प्रस्तुति अजय जी बधाई आपको।


    Akanksha says

    Maithilisharan Gupta ji par Ajay ji ne kafi karine se likha hai..badhai !!


    anant says

    punetithi par mithle sharn gupth gee ko aad krna acha laga ya miri priy kave hi mane asodra, sakith pada hiy miy hindi ka chatr hoo


    बेनामी says

    behad sundar rachna !! :P :P :)) ?"


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