आज वरिष्ठ लोकधर्मी कवि और चिंतक श्री विजेन्द्र जी के तिहत्तर की वय पूरी होने पर यह उनको याद करते हुये मुझे अपार हर्ष हो रहा है।मैंने आज उनसे दूरभाष पर उनका हाल-समाचार भी लिया।मैं उनके सम्मान में उनकी एक कविता यहाँ दे रहा हूँ जो मुझे बेहद पसंद है-
धारदार चित्कारें:-
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सुनता हूँ अग्नि की अनुगूँज तरंगमालाओं में
ज्वालाओं की लय
थिरकन कणों उपकरणों की
भीतर सोये ज्वालामुखी पता नहीं
कब जागें
मुझे अन्न चाहिये
छत और छाया भी
पथरीले मौन को भेदने वाला लोहा
मुझे दो
मेरा युग अंधा नहीं
मैंने ही आँखों पर पट्टियाँ बाँधी हैं
देखने से पहले रोएँ पहचानते हैं
ऋतुओं का बदलना
शब्दों की रगों में बहते ख़ून की आवाज़ सुनो
कुल्हाड़ी की तेज धार में दमकते हैं
भूख के चेहरे-
ब्रह्म का एक नाम अन्न भी है
ओ मेरे धातुक समय
मुझे सुनने दे
ज़मीन में दबे लोगों की उबलती चित्कारें-
ओह, कटीले तारों में मुझे कसता समय
इस्पात ढालते हाथों की मरोड़ों में
उभरते भविष्य के आयताकार मेहराब देखता हूँ
आसमान में जो अबाबिल गा रहा है
उसमें छिपा है धरती का त्रास भी
देखता हूँ इसी ऋतु में
गोरैया को घोंसला बनाते
पहाड़ों को तोड़कर ही
उधर जाना है
जिधर दीख रहे हैं घास के हरे तिनके
ओ टूटते नक्षत्र
बुझते राख होते उल्कापिंड
तुम धरती की मर्म पीड़ा से बेखबर हो
मनुष्य-हृदय
अब उन चट्टानों सा कठोर हो चुका है
जिन पर समुद्री लहरें 
सदियों से सिर पटक रही हैं
ज़िन्दा वृक्ष गिराये जा रहे हैं
ओ मेरे कवि-
समय की रगों में बहकर
आदमी की पीड़ा को जान
सुनता हूँ सड़क पर खड़े बच्चे का रुदन
उसके हाथ में बासी रोटी का टुकड़ा है
आँखों से झरते आँसू
बच्चे, मेरे प्यारे बच्चे
रोओ मत
फिलहाल बादल ने सूर्य ढक लिया है
वह उसे फाड़कर 
कल फिर उदय होगा
इस शहर की बाँहों में लपेटे अरावली की
श्रृखलायें भी
सूर्योदय को रोक नहीं पाती
यह अँधेरा क्षणिक है
पूर्व को हर रोज़ 
इसी उम्मीद से देखता हूँ
यह थोड़ा और उगे
तुम भी देखना-
उस पूर्व पर भरोसा करो
जहाँ से वह उगता है हर रोज़।
- [कवि विजेन्द्र]

अगर हिंदी कविता का आधुनिक इतिहास अद्यतन किया जायेगा तो कवि विजेन्द्र का नाम उनके काव्य-चिंतन और उनकी कविताओं को लेकर बड़ी शिद्दत से आयेगा। तिहत्तर के वय पार कर चुके कविवर विजेंद्र के लगभग चार दशकों से उपर के दीर्घ कालखंड में समाये कविकर्म और सौंदर्यदृष्टि को देखकर यह सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है कि हिन्दी-काव्याकाश में निराला और त्रिलोचन की परंपरा के एक अत्यंत दृष्टिसंपन्न कवि के रुप में उनका उगान हुआ है जो आज अन्यत्र विरल है, और जिसकी दीप्ति एक लंबे अरसे तक कवियों और उनके पाठकों को आलोकमान करेगी ।

उनकी कविताओं के पीछे उनकी काव्यमीमांसा का अपना ठोस सैद्धांतिक पक्ष है जिसकी जडे़ इस देश की लोक-परम्परा में हैं। यहाँ विचारणीय बात यह है कि उनके चिंतन में विचार एक कवि के निकष पर कसकर आते हैं जो हमारे कवियों, खासकर युवा कवियों का सही और सटीक मार्गदर्शन करता है।विजेंद्र जी का सौंदर्यचिंतन मूलत: मार्क्सवादी सौंदर्यचिंतन ही है, पर भारतीय भावभूमि पर एकदम निरखा-परखा हुआ। वे अपने सौंदर्यचिंतन के समर्थन में जो कुछ भी कहते हैं, उसे साथ-साथ अपनी परम्परा और जातीय साहित्यनिष्ठा से प्रमाणित भी करते चलते हैं। इसलिये उनका सोच बहुत साफ़ और बोधगम्य रहा है। वे अंग्रेजी भाषा सहित्य के विद्वान भी हैं और उन्हें पाश्चात्य सौंदर्य-शिल्प का सघन ज्ञान है । पर यहाँ वे उन्हीं विचारों का आश्रय लेते हैं या समर्थन करते हैं जिनका अपना भारतीय मूल्य जीवित रह सकता है। इसलिये कहा जा सकता है कि विजेंद्र एक संस्कारवान सर्जक-चिंतक हैं जिनके यहाँ सौंदर्यचिंता में विचार और उनकी कविता का स्वभाव सदैव एकमेक रहा है और जो किसी तृष्णा या लोभ में फँसकर अपने आसन से कभी च्युत नहीं हुए । उनके चिंतन में जो गहन पार्थिवता है उसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि उनका शब्दकर्म शुरु से ही जन का पक्षधर रहा है न कि अभिजन का। वे लोक और जन के प्रतिबद्ध रचनाकार रहे हैं। उनकी सौंदर्यदृष्टि में मार्क्सवादी सौंदर्यचिंतन लोक के सौंदर्यबोध के साथ इतना घुलमिलकर पाठक के समक्ष प्रस्तुत होता है कि ऐसा विरल संयोग विजेंद्र और उन जैसे कुछ ही कवियों के यहाँ ही विपुलता से गोचर होता है, जबकि बुर्जुआ सौंदर्यशास्त्री भाषा की बात भाषा से शुरु करके भाषा पर ही समाप्त कर देना चाहते हैं यानि जीवन. प्रकृति, समाज से वंचित करके विचार को यथास्थिति की हद तक ही रखना चाहते हैं जिससे उनका विरोध है। वे सौंदर्यशास्त्र में गहनता से जीवन. प्रकृति और समाज का संस्पर्श करते हैं। और सिर्फ़ संस्पर्श ही नहीं करते, उसके भीतर आत्यांतिक सहजता और निस्पृहता से प्रवेशकर सौंदर्य का खनिज भी ढूँढते हैं। साथ ही एक चित्रकार होने के कारण उनकी चित्रात्मक सोच-शैली का प्रभाव भी उनके पूरे साहित्य पर पड़ा है। उनके चित्रों की तुलना उनकी कविता से करने से यह सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है कि कि उनके सारे चित्र भी एक तरह से अनबोलती कविताएँ ही हैं जिसमें लिपिहीन सौंदर्य का झलक मिलता है, जहाँ कहें कि इसकी सौंदर्यशास्त्रीयता में उनकी कविता के सौंदर्य का ही प्रतिरुप भासित होता है। अतएव उनके सौंदर्यशास्त्र की अवधारणा का दायरा वृहत्तर और गहरा है जो उनकी सतत अध्ययनशीलता, निरंतर विकसित होती लोकपरक सौंदर्यदृष्टि और विचारप्रक्रिया की क्रमिक सुदृढता का परिणाम है।

'त्रास' (1966) से अपनी काव्ययात्रा आरंभ करने वाले इस मनीषी कवि की अब तक कुल तेरह कविता-पुस्तकें आ चुकी हैं । और गद्यकृति 'कविता और मेरा समय(2000) के बाद अब उनकी नई कृति 'सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता आयी है जो न सिर्फ़ कविता को गहराई से समझने का मर्म बतलाती है, बल्कि कविमन में आधुनिक भावबोध की लोकचेतना का संस्कार उत्पन्न करने का उपक्रम भी करती है जो मानसपटल पर देर तक टिककर हमें रचना से जीवन तक सर्वत्र, उत्कृष्टता और उसमें जो कुछ 'सु' है उसकी ओर मोड़ता है जिसमें लोकजीवन के सत्य-शिव-सुन्दर का प्रभूत माधुर्य भासित होता है। यहाँ पाश्चात्य जीवन शैली से उद्भूत बुर्जुआ सौंदर्य-दृष्टि नहीं, वरन एक भारतीय मन की ऑंख से देखा-परखा गया विरासत में मिला वह लोकसौंदर्य है जहाँ भारत की आत्मा शुरु से विराजती रही है पर उसको देखने-गुनने वालों को पिछडा़ और दकियानूस कहकर दुत्कारा गया है।

एक ऐसे जनविरोधी समय में जबकि, कुंठा-संत्रास-तनाव के वातावरण में मध्यमवर्गीय विचार से सृजित सौंदर्यशास्त्र के निकषों पर रची जा रही कविताएं दृश्य में देर तक नहीं ठहर पा रहीं और बाजारवाद की ऑंधी में बिखर जा रही हैं, विजेंद्र की सौंदर्यदृष्टि और उनकी कविताओं की अलग पहचान होनी स्वाभाविक ही है जो हमें तन्मयता से काव्यसौंदर्य के उन नये प्रतिमानों से जुडे़ सवालों की ओर ले चलते हैं जिसका अर्थपूर्ण अवगाहन उनकी पुस्तक 'सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता' में हुआ है जहाँ लोकजीवन के स्पंदन और आवेग को गहराई से महसूसने की बिलकुल चैतन्य नवदृष्टि प्राप्त होती है, हालॉकि लेखक ने बडे़ विनयभाव से स्पष्ट कर दिया है कि 'ये बातें न तो पूर्ण हैं, न निष्कर्षमूलक। यह सब एक तरह से स्वयं से संवाद है। कुछ जानने का प्रयास। कुछ खोजने की ललक। कुछ को फिर से जानने-समझने की कोशिश। पर यह लेखक का प्रांजल अहोभाव ही है। यानि कि उनकी कृतियाँ एक तरह से एक कवि का स्वयं से संवाद है जिसे कवि विजेंद्र के स्वयं के द्वारा सृजनप्रक्रिया में आत्मगत हुए अनुभवों से कविता के स्वभाव को परखने की एक सार्थक पहल भी कही जा सकती है।यहाँ मुख्य रुप से यह लक्ष्य किया जाना चाहिए कि अपनी परम्पराबोध के मौलिक, सूक्ष्म ज्ञान से ही विजेंद्र जी काव्य के नये सौंदर्य और प्रतिमान की खोज करते है, उसको दरकिनार कर पाश्चात्य काव्यसौंदर्य के चिंतन से नहीं।

हम जिस आलोचना-समय में जी रहे हैं,वहाँ हिंदी आलोचना के पास चिंतन की मौलिकता का अभाव है। नये मानक और प्रतिमान रचने के जोखिम उठाने का न तो साहस है हमारे आलोचकों के पास, न बुद्धि-वैभव और न परम्परागत ज्ञान ही। कुछ को छोड़कर, अधिकतर आलोचकों की स्थिति यह है कि वे अब तक न तो अपने जातीय साहित्य का अवगाहन कर पाये हैं, न पश्चिम को भारतीयता और लोक की कसौटी पर परख पाये हैं। सिर्फ़ भारतीय वाड़मय को एक खंडित मानसिकता से समझने का प्रयास किया गया है,जिस कारण उनके मन में लोक-वस्तु का सम्यक आत्म-साक्षात्कार नहीं हो पाया है। हाँ, उन लोगों ने हिंदी-मानस जरुर रचा है, समालोचना के समुचित विकास के लिए यह जरुरी है कि अपनी परंपरा को न सिर्फ़ समझा जाय,वरन उसे अपने संस्कृति-सूत्र से जोड़कर उससे सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन की ऐसी अवधारणा विकसित की जाय जो साहित्य और जन की समृद्धि के काम आ सके। साथ ही श्रम की भावभूमि पर जन और लोक की प्रतिष्ठा के लिये मार्क्सवाद के भारतीय संस्करण को विकसित किया जा सके और पश्चिम की उन अतियों की तीव्र निंदा भी,जो हमारे साहित्य को खोखला, वक्र और भावहीन बनाते हैं। ऐसे समय में विजेंद्र जी की कविताओं और सौंदर्यशास्त्र और उनकी भारतीय चित्त और कविता के सबंध में सूझ-समझ का बड़ा महत्व है,कारण कि उनके पास न सिर्फ़ परम्परा की सही और परिमार्जित विपुल समझ है, बल्कि उससे अपनी कविता को विकसित करने की व्यापक सोच-शैली और पश्चिम की उस सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणा की काट भी मौजूद है जिनको जाने बिना हम भारतीय चिंतन-क्षेत्र से अपह्रत होकर निरे कलावाद-रुपवाद की दुनिया में घसीटे चले जाते हैं जहाँ हमारी अपनी समृद्ध विरासत के खो जाने और समकालीनता के जड़ हो जाने का खतरा बराबर बना रहता है। पूरे पुस्तक में उनके काव्य-चिंतन और मीमांसा का पक्ष जितना सप्रमाण, ठोस,तार्किक, सहज और अर्थवान है उतना ही प्रगतिशील और वैज्ञानिक भी है। इससे भारतीय सौंदर्यचिंतन के विकास के नये क्षितिज तो खुले ही हैं, लोकधर्मी सौंदर्यशास्त्र को नई दशा-दिशा भी मिली है और विरासत में हस्तगत परम्परा का भाव समृद्ध हुआ है। साथ ही इसने भारतीय सौंदर्यशास्त्र में गहरे जड़ जमा रही निर्मूल मान्यताओं को झटका देकर उसमें सकारात्मक हस्तक्षेप भी किया है जिससे भविष्य में जनपदीय साहित्य और लोक-साहित्य के दिन बहुरने के प्रबल आसार नज़र आने लगे हैं। 

इसीलिए विजेंद्र अपने सौंदर्यचिंतन की उदात्तता के कारण हमें भविष्य के कवि भी लगते हैं। जो पाठक जयपुर से निकलने वाली लोकचेतना की बहुप्रतिष्ठित त्रैमासिक पत्रिका 'कृतिओर'को नियमित पढ़ते हैं, उन्हें मालूम होगा कि संपादकीय के बहाने विजेंद्र जी भारतीय सौंदर्यशास्त्र पर महत्वपूर्ण कार्य वर्षों से कितने मनोयोग से करते आ रहे हैं ! उनकी जयंती पर आज हम श्रद्धावनत होकर उनके दीर्घायु होने की कामना करते हैं ताकि हम उनकी प्रेरणा से अपनी रचना-संसार को समृद्ध करते रहें। 
***** 

15 comments:

  1. सुशील जी नें उस तरह से विजेन्द्र जी को याद किया है जिस प्रकार की जन्मदिवस पर शुभकामना के वे सकदार है। साहित्य शिल्पी को भी इस गंभीर प्रस्तुति का धन्यवाद।

    विनेन्द्र जी को 73वे जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें। इश्वर उन्हे लम्बी आयु प्रदान करे और उनकी साहित्य सेवा अनवरत जारी रहे।

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  2. धन्यवाद सुशील जी इस महत्वपूर्ण लेख के लिये। विजेन्द्र जी को जन्मदिवस की शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  3. Happy Birth Day VIjendra jee.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  4. कवि विजेन्द्र को जन्मदिवस की शुभकामनायें। बहुत अच्छा आलेख है, विजेन्द्र जी के जीवन व कार्यों पर।

    उत्तर देंहटाएं
  5. विजेन्द्र जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामना।

    उत्तर देंहटाएं
  6. पथरीले मौन को भेदने वाला लोहा
    मुझे दो
    मेरा युग अंधा नहीं
    मैंने ही आँखों पर पट्टियाँ बाँधी हैं
    ----
    यह अँधेरा क्षणिक है
    पूर्व को हर रोज़
    इसी उम्मीद से देखता हूँ
    यह थोड़ा और उगे
    तुम भी देखना-
    उस पूर्व पर भरोसा करो
    जहाँ से वह उगता है हर रोज़।
    ----
    सुशील कुमार जी को एवं साहित्य शिल्पी को धन्यवाद।

    विजेन्द्र जी की लम्बी उम्र व स्वास्थ्य की कामना के साथ उन्हे जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जन्म दिवस की शुभकामनायें विजेन्द्र जी।

    उत्तर देंहटाएं
  8. विजेन्द्र के चिंतन पर बहुत गंभीर आलेख है। मार्क्सवादी सोच और उसके भारतीयकरण या नजरिये से साहित्य की विवेचना का मैं पक्षधर तो नहीं लेकिन इस कारण विजेन्द्र जैसे साहित्यकारों के योगदान को गौण भी नहीं मानता अपितु वे उस प्रशंसा के व सम्मान के पात्र हैं जो उन्हे अब तक नहीं मिल सका है। जन्मदिवस पर बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  9. पंकज सक्सेना10 जनवरी 2009 को 1:26 pm

    विजेन्द्र जी से परिचित हो कर बहुत अच्छा लगा। सुशील जी अपने आलेखों में बहुत श्रम करते हैं और भाषा सुलझी हुई प्रयोग में लाते हैं। विजेन्द्र जी को शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  10. ''पूर्व पर भरोसा करो
    जहाँ से वह उगता है हर रोज़''

    सही कथन है

    भरोसा भ रो सा

    पूर्व पर ही हो सकता है

    उसे देखा है होते हुए

    जैसे जी तो सब रहे हैं जीते हुए



    भरो सा पश्चिम भी है

    जहां जाता है हर रोज

    फिर भी भरता नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  11. विजेन्‍द्रजी से परिचित करवाने के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद। आपने बहुत मेहनत कर इतना अच्‍छा आलेख लिखा , इसके लिए बहुत बहुत बधाई। विजेन्‍द्रजी को भी उनके जन्‍मदिन पर बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  12. आदरणीय सुशील कुमार जी का यह आलेख संग्रह कर रखने योग्य है। आपने जिस तरह विजेन्द्र जी के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया है, काश एसा आम हो। हम अगर अपने युग पुरुष, समाज को जगाने की चेष्टा में लगे कलमवीरों का समुचित सम्मान करेंगे तो ही एसी सामाजिक क्रांति संभव है जो कलम से आयेगी। आदरणीय विजेन्द्र जी की प्रस्तुत रचना इस बात की बानगी है कि कैसे सोच सुलगायी जा सकती है। कविता का एक एक शब्द पका हुआ है...नमन कोटि नमन विजेन्द्र जी।

    साहित्य शिल्पी परिवार की ओर से जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें। आप शतायु हों और माँ शारदा आपकी लेखनी के माध्यम से हम जैसे विद्यार्थियों का मार्ग प्रशस्त करती रहे।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  13. हमारी संस्कृति में बडों के जन्म दिन पर उनके पैरों में झुक कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है... आपने जिस सुन्दरता से कवि विजेन्द्र का परिच उनके कवित और व्यक्तित्व विवरण से दिया है वह वास्तव में कवि विजेंद्र के पैर छूने को प्रेरित किया जाता है.... आशीर्वाद वास्तव मे अंतर्संवेदना होती है... और उत्तम लोगों के संवेद्नाएं बडी काम आती है... आपका धन्यवाद और बाबा को सादर चरण स्पर्श.... आपको ईश्वर दीर्घ आयु दे और स्वास्थय भी... इसी कामना के साथ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. विजेन्द्र जी दीर्घायू हों और इसी तरह साहित्य की सेवा करते रहें...यही हमारी मंगल कामना है..
    सुशील जी का इस विशेष प्रस्तुति के लिये आभार

    उत्तर देंहटाएं

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