बर्फ फिर गिरने लगी थी, काम्या ने एक नजर पहाड़ों पर डाली। अब तक सारे ही पहाड़ सफेद हो चुके थे, पर अब बर्फ धीरे -धीरे नीचे उतर रही थी। घर की ऊपरी मंजिल में खिड़की के पास बैठी काम्या ने जलती हुई आग में दो लकड़ियाँ और डालीं और किताब पढ़ने लगी। यह एक खूबसूरत सी कॉटेज थी, जिसके दोनों तरफ बरामदे थे और लाल रंग की ढलवाँ छत थी। काम्या ने हाल ही में यह घर एक बुजुर्ग दंपति से खरीदा था, जो अपने बेटे के पास विदेश चले गए थे। हालांकि उसका काफी पैसा इसमें लग गया था, पर यह घर उसे पसंद था। इस खिड़की के पास बैठी वह अकसर पहाड़ों को देखा करती थी या फिर कोई किताब पढ़ा करती थी। जाने क्यों पूरे घर में सिर्फ यह कमरा उसे सबसे अपना और प्यारा लगता था। घर में बिजली थी, पर इस कमरे में वह हमेशा लैंप जलाती थी। ऊपर सलेट की छत और लैंप की रोशनी... जब चाहे तेज कर लो और जब चाहे इतना धीमा कर लो कि रोशनी एक दम जुगनूँ हो जाए। इसी कमरे में उसने अपनी लाइब्रेरी बना रखी थी, इसलिए उसका ज्यादातर वक्त यहीं गुजरता था।
लकड़ी की सीढ़ियों पर आहट हुई और एक हाथ कॉफी के कप के साथ ऊपर आया। गोमा की आदत है, वह पूरी सीढियाँ नहीं चढ़ती, बस तीन सीढियाँ चढ़कर उसके हाथ में कप थमा जाती है।
-गोमा, वे दोनों क्या कर रही हैं ?
-केक बना रही हैं। कह रही थीं कि कल आपकी बर्थ-डे है।
काम्या को हँसी आ गई... उसे याद भी नहीं था, पर उसकी सहेलियों को याद था। नया घर लेने के बाद उसने अपनी दोस्तों के साथ गैट-टु-गैदर करने की सोची थी और उन्हें बुला लिया था। हालांकि उन्हें मिले काफी वक्त गुजर गया था, पर फोटो और पत्रों से वे एक - दूसरे के संपर्क में थीं। केसर और कार्नेलिया सुबह आ गई थीं, शाम तक कालिंदी के आने का तय था।
शहर से दूर, भीड़ से अलग, इंटीरियर में यह काटेज उसने बहुत सोच-समज कर लिया था। यहाँ का सब कुछ बेहद खूबसूरत था। पहाड़ बहुत ऊँचे थे और मई-जून के महीने में भी बादल घिरे रहते थे। पहाड़ की काफी ऊँचाई पर एक मंदिर था जिसकी हवा में लहराती पताका यहाँ से दिखाई देती थी।
"यह गुणा माता का मंदिर है।" उसके पूछने पर गोमा ने बताया था।
"लोग वहाँ तक जाते कैसे हैं?"
"पहाड़ी रास्ता है। पैदल चले जाते हैं।"
देर तक इस बात पर सोचती रह गई थी। मनुष्य की आस्था उसे किसी भी ऊँचाई पर ले जा सकती है और यह मंदिर इसका प्रमाण था। शाम तक कालिंदी भी आ गई। अब वे चारों साथ थीं - काम्या, केसर, कालिंदी और कार्नेलिया। इनके ग्रुप को कालेज में फोर के’ज के नाम से पुकारा जाता था। वे शोखी में इतनी तेज थीं कि लड़के उन्हें फोर के’ज की जगह चार का पिंजरा कहते थे।
"सो फोर के’ज आर हेअर अगेन..." कालिंदी खिलखिलाई।
सबने मिलकर रात का डिनर तैयार किया। खाना खाने के बाद वे बेडरूम में आ गईं। गोमा उनके बिस्तर लगाकर घर जा चुकी थी। इस कमरे में हीटर की हल्की गर्माहट थी। रात के साढ़े दस बज रहे थे पर किसी की आँखों में नींद न थी।
"क्यों न हम स्पिन-बाटल गेम खेलें... घर में बीयर की बोतल होगी? कार्नेलिया ने चहक कर कहा।
"मैं बीयर पीती हूँ क्या?" काम्या ने आँखें तरेरीं।
"हर्ज़ ही क्या है... इतनी तो ठंडक पड़ती है यहाँ। फिर यह तो वैसे भी लेडीज ड्रिंक में आती है।" कहते हुये उसने मेज पर बिछा टेबल-क्लाथ हटा दिया।
"एक मिनट!" काम्या ने कहा। "जब मैंने यह घर खरीदा था तो एक बोतल देखी थी। मैंने फेंकी नहीं है। साथ ही एक और चीज मिली थी मुझे।" वह आलमारी खोल कर दोनों ही चीजें उठा लाई। उसके हाथ में चाँदी की एक कलात्मक संदूकची थी।
"यह चाँदी का बाक्स है..." कालिंदी ने ध्यान से देखते हुये कहा।
"मेरा ख्याल है कि इस घर के मालिकों को भी इसकी याद नहीं थी। यह आलमारी के एक कोने में छिपा हुआ सा था। मैंने भी इसे काफी दिनों बाद ही देखा।"
"खेल शुरू करते हैं... पर खेल की शर्त...?" कालिंदी के चेहरे पर शरारती मुस्कान थिरक गई।
"खेल की शर्त यह है कि जो भी बोतल के निशाने पर होगा, वह बिल्कुल ईमानदारी के साथ अपने प्यार के बारे में बतायेगा...।" केसर इतनी देर बाद बोली थी।
कागज की पर्चियों पर उन्होंने अपने नाम लिखे, तारीख डाली और तह करके वहीं एक तरफ रख दिये। यह एक अघोषित और बेहद निजी दस्तावेज़ था, जो इस बात का गवाह था कि उस रात उस कमरे में कितने ही राज़ खुलने थे और फिर वहीं उन्हें दफ़न भी हो जाना था।
"हमारी शर्त याद रखना, झूठ किसी का भी नहीं चलेगा। बड़े से बड़ा सच यहीं कहना है, प्यार का सच।" केसर मुस्कुराई।
"ज़रूरी नहीं है कि हर लड़की ने मोहब्बत की ही हो..." कालिंदी ने तर्क रखा।
"यस डियर... लड़कियाँ बिना प्यार किये जी ही नहीं सकतीं। प्यार उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा होता है। मेरा ख्याल है सब की ज़िंदगी का, वरना ज़िंदगी ही क्या...?"
खेल शुरू हुआ और बोतल का रुख सीधे केसर की ओर गया।
"या अल्लाह!" केसर का चेहरा ज़र्द था। उसकी आँखें बंद हो गईं। पहले चेहरे पर एक पीड़ा झलकी और फिर दृढ़-निश्चय का भाव आ गया। उसने आँखें खोल दीं... फिर धीरे से कहा, "मैं केसर; अपनी मोहब्बत के बारे में सच कहूँगी और सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगी। हम आज पूरे सात सालों बाद मिल रहे हैं। इसलिये प्यार की अदालत में, मैं वह सब कुछ कहूँगी जो मेरे साथ गुज़रा।"
"शहबाज़ की और मेरी अम्मी सगी बहनें थीं। अपनी मर्ज़ी से उन्होंने हमारी सगाई तय कर दी। मेरा कालेज छूटते ही सगाई हो गई।"
"वेरी सिंपल! इस कहानी में कोई दम नहीं..." कालिंदी ने साँस खींची।
"कहानी तो अब शुरू हुई है। सगाई के बाद मेरे और शहबाज़ के बीच नज़दीकियाँ बढ़ीं और तारों-फूलों की राह पर चलते हुये हम कब एक-दूसरे के बेहद करीब आ गये, पता ही नहीं चला। अचानक ही एक दिन मैंने पाया कि मैं प्रैगनेंट थी। मैं और शहबाज़ दोनों ही घबरा गये। उधर, जब तक हम कुछ कहते, दोनों बहनों ने लड़ाई कर ली और सगाई तोड़ दी। वे एक-दूसरे का मुँह भी देखने को तैयार न थीं। वक़्त काफी निकल गया था। अबार्शन हो नहीं सकता था। तय था कि उस बच्चे ने दुनिया में आना ही था।"
"फिर...?" तीनों ने एक साथ पूछा।
"इस समय में गर्ल्ज इंटर कालेज में लेक्चरर हूँ। मेरे साथ एक लड़की रुकैया है जो मुझे आपा कहती है। वह नहीं जानती कि मैं उसकी माँ हूँ...। वह क्या, कोई भी नहीं जानता।"
"और शहबाज़...?" काम्या ने आँखें उठाईं।
"वह महीने में एक बार आकर हमसे मिल जाता है। उसका कहना है कि वह मुझे तब घर ले जायेगा, जब उसकी माँ नहीं रहेगी...। यह अज़ीब सी बात है कि मैं बीवी हूँ, पर बीवी नहीं हूँ और एक प्यारी सी बच्ची की माँ हूँ, फिर भी माँ नहीं हूँ। मेरे पास रिश्ते तो हैं पर उनके नाम छिन गये हैं।"
वे सकते में थीं। सारे रिश्ते उलट-पलट गये थे। न उनके उलझाव से बचा जा सकता था; न उनसे बाहर ही निकला जा सकता था। अगली बार बोतल ने कालिंदी की ओर रुख कर लिया।
"तौबा! अब मेरी शामत आई..." वह हँस दी।
"फ़िक्र मत कर, तेरा राज़ इस कमरे से बाहर नहीं जायेगा..." कार्नेलिया होंठ दबा कर हँस दी।
"एक बड़े घर में मेरी शादी हुई है और मेरा एक बेटा भी है।"
"बेखौफ़ होकर बोल, कालिंदी! यहाँ तेरा कोई दुश्मन नहीं।" केसर ने उसे हिम्मत देने को उसके हाथ थाम लिये।
"मैंने कभी भी बड़े घर में शादी के ख़्वाब नहीं देखे। मेरे मन में एक बात ज़रूर थी कि जो भी मेरा पति हो, वह सच्चा इंसान हो। जब मैं हाईस्कूल में थी, तभी मेरी दोस्ती आकाशदीप से हो गई। वह अपने दादा-दादी के साथ रहता था। पिता मर चुके थे; पर माँ कहाँ थी, इसका कोई ज़िक्र ही नहीं करता था। मेरी और दीप की दोस्ती अधिक बढ़ी तो एक दिन माँ ने मुझे उसके घर जाने से मना किया।
उसी रात जब माँ पापा से बातें कर रही थीं, मुझे दीप की ज़िंदगी के बारे में सब कुछ पता चल गया। पिता के मरने के बाद उसके घर वालों ने दीप की माँ पर बेतरह ज़ुल्म ढाए और एक दिन उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दिया गया था। दरअसल वे उसका खर्चा नहीं उठाना चाहते थे। वे उससे वेश्यावृत्ति करवाना चाहते थे और वह करने को तैयार न थी। इसलिये उन्होंने दीप को छीन कर उसे दफा कर दिया था।"
"माई फुट..." कार्नेलिया भड़क उठी।
"जिस दिन दीप की ज़िंदगी का यह रहस्य पता चला, उसी दिन मुझे उससे प्यार हो गया। वह पढ़ने में बहुत अच्छा था और मैं चाहती थी कि उसकी मदद करूँ। मैं जब भी उसके घर जाती, उसकी किताबें सँभालती, कमरा ठीक करती और उसके पास बैठ उसे पढ़ता देखती रहती। वह गर्मियों की शाम थी... हम दोनों दरवाजे की चौखट के पास खड़े थे। दीप ने हौले से मेरा हाथ थामा था...”तू कालिंदी है न! पर जब हम शादी करेंगे तो मैं तेरा नाम नीलगंगा रखूँगा।’
’खूबसूरत नाम है। कहाँ मिला तुम्हें?’
’एक बस पर लिखा देखा था, नीलगंगा एक्सप्रेस!’ वह शरारत से हँसा था।
’तो मैं तुम्हें बस जैसी दिखाई देती हूँ....’ कहकर मैं उसे मारने दौड़ी थी कि तभी मेरे पापा ने उसे देख लिया था। इसके बाद ही दीप मुझसे छिन गया। हमारे सपने दिल में ही दफ़्न हो कर रह गये। मेरी शादी हुई... सब कुछ नार्मल ही था, पर हैरत तो मुझे तब हुई जब लवमेकिंग के वक़्त मैंने पति की जगह दीप का चेहरा देखा। वह वहाँ नहीं था, पर उसकी मौजूदगी थी। आज इतने साल गुज़र गये हैं... मैं उस चेहरे को हटा नहीं पाई हूँ... यह दोहरी ज़िंदगी मैं कई सालों से जी रही हूँ। एक ऐसा पति जो मुझे जी-जान से प्यार करता है, अगर उसे पता चले कि अंतरंग क्षणों में मेरे साथ वह नहीं, कोई और होता है तो..."
"सपने सिर्फ देखने के लिये नहीं होते, उन्हें सच कर लेना चाहिये। नहीं तो वे सारी ज़िंदगी का दर्द बन कर रह जाते हैं।" केसर ने धीरे से कहा।
"एक मिनट रुको, मैं काफी बना लाती हूँ।" कह कर काम्या किचन में चली गई। ठंड धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी, पर कमरे की गर्मी वैसी ही बरकरार थी। काफी और स्नैक्स के साथ खेल फिर शुरू हुआ। इस भार बोतल स्पिन हुई तो कार्नेलिया का नंबर आ गया।
"तो अब मेरा नंबर है...। फ्रेंड्स! मेरी कहानी बेहद सिंपल सी है, पर उसमें मेरा साहस भी है और एडवेंचर भी। यूनिवर्सिटी में मेरा दाखिला हुआ ही था कि उसी साल एक नाम सबकी ज़ुबान पर आ गया। डेरिक ने यूनिवर्सिटी में टाप किया था। वह इतना खूबसूरत, शालीन और गंभीर था कि उसे मैंने ही प्रपोज किया।"
"तुमने..." केसर हँस दी। "डेअरिंग यार! मैंने सोचा था कि यह काम सिर्फ लड़कों का है।"
"यह सब इतना आसान नहीं था। डेरिक ओरफनेज में रह कर पला-बढ़ा था... इटैलियन मिशनरी के अनाथालय में रहकर वह यूनिवर्सिटी का टापर बना और मेरा प्यार भी। डेरिक के पास माँ-बाप का नाम नहीं था। मेरे घर वाले इस शादी के लिये तैयार न थे, इसलिये मैंने कोर्ट में शादी कर ली। अब मेरा एक बेटा है, पर मेरा जी चाहता है कि मैं डेरिक जैसे एक दर्जन बच्चे पैदा करूँ और सबको अपना और डेरिक का नाम दूँ।"
"अरे, इस देश पर रहम कर! इतने बच्चे तो तेरा डेरिक भी नहीं पाल पायेगा।" केसर जोरों से हँस पड़ी।
"हमारी कहानियाँ खत्म हुईं। अब तुम्हारी बारी है, काम्या!" कहते हुये कालिंदी ने बोतल काम्या के हाथ में थमा दी।
"मेरी कहानी अरेबियन नाइट्स की कहानियों से कम नहीं... तुम लोगों ने हिम्मत की है, वही हिम्मत लेकर मैं भी कहूँगी क्योंकि हम सभी जानते हैं कि आज की बातें सिर्फ आज की रात यहाँ कही जाएंगी...।
कल को हम फिर अपनी पुरानी दुनिया में लौट जाएंगे। पर कुछ भी कहने से पहले मैं एक बात पूछना चाहूँगी। क्या तुम सभी मेरी तरह महसूस करती हो कि जिसे हम प्यार करते हैं, उसके बिना जीने का दिल नहीं करता?"
"ओफ कोर्स!" केसर ने कहा।
"पर अगर वही तुम्हें छोड़ कर चला जाए...?"
"ऐसा कैसे हो सकता है... और अगर ऐसा होता है तो वह प्यार कैसे हुआ?"
"मेरे साथ ऐसा ही हुआ है। मैंने अब तक शादी नहीं की, पर मैं ऐसा नहीं कह सकती कि मुझे कोई मिला ही नहीं। मुझे जब भी कोई अच्छा लगा, उससे मेरी दोस्ती गहरी हुई... कि वह मेरा हाथ छोड़ कर चला गया। इस तरह मेरी ज़िंदगी में तीन पुरुष आए। हर बार मैंने टूट कर प्यार किया और हर बार मेरे साथ ऐसे ही गुज़रा। आँसुओं से मेरा रिश्ता गहरा होता गया। इतना वक़्त गुज़र गया है, मैं न अपना पहला प्यार भूल पाई हूँ, न आखिरी!"
"यानी एक कहानी में तीन कहानियाँ..." कार्नेलिया चहकी।
"पहला प्यार मुझे एक गुंडे से हुआ।"
"गुंडे से...?" उनकी आँखों में आश्चर्य था।
"हाँ, लोग उसे गुंडा ही कहते थे। वह अक्सर चौराहों पर मारामारी किया करता था... उसके सफेद कपड़े ही उसकी पहचान थे। नाम राजकुमार था और था भी बेहद खूबसूरत! उसे देख कर मैं अक्सर सोचा करती थी कि यह ऐसे गलत काम क्यों करता है। लोग उससे खौफ़ काते थे... पर उसका नाम कभी किसी लड़की से नहीं जुड़ा। मैं तब हाईस्कूल में थी। स्कूल घर से काफी दूर था और जाड़ों में घर पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो जाता था। उस दिन भी मुझे बस देर से मिली थी। स्टाप पर उतर कर मैं थोड़ी दूर गई थी कि दीवार की आड़ से निकल कर दो बदमाशों ने मुझे पकड़ लिया। मेरे मुँह से घुटी-घुटी सी चीख निकली थी। उसी समय मैंने उसे आँधी की तरह आते देखा। उसे आता देख कर वे दोनों भाग गये। उसकी बाँहों के घेरे में सुबकती मैं और मुझे सांत्वना देते उसके हाथ...। वह सुरक्षित मुझे मेरे घर तक छोड़ गया। उसी एक लम्हे में मुझे उससे प्यार हो गया। वह अच्छे घर का लड़का था और पढ़ने में भी अच्छा था। अचानक ही उसका सलैक्शन बैंक में हो गया... और वह शहर से ही नहीं, मेरी ज़िंदगी से भी चला गया।"
"लौट कर उसने तेरे से बात नहीं की?"
"सवाल ही नहीं उठता था... मैंने ही उससे कहाँ कहा था कि मैं उससे प्यार करती हूँ। एक साल तक मैं उसके जाने का आघात नहीं भुला पाई... आज भी कहाँ भूली हूँ... किसी भी चौराहे से लगती किसी अँधेरी सड़क को देखती हूँ तो लगने लगता है कि किसी तरफ से आ कर वह खड़ा हो जायेगा।"
"ये तो ट्रेजेडी हो गई यार..." कालिंदी ने साँस भर कर कहा।
"उदयन जब मुझसे मिला, तब वह आजीविका के लिये संघर्ष कर रहा था। वह फर्स्टडिवीजनर था, पर तीन सालों से लगातार कोशिशें करने के बावज़ूद उसे कोई नौकरी नहीं मिली थी। घर से बेगैरत हुआ वह जब मरने की बातें करने लगा था, तभी उससे मेरी मुलाकात हुई। मैं हर रविवार जिला लाइब्रेरी जाती थी; वहीं मैंने उसे देखा था। हमारा रास्ता एक था, इसलिये हम कभी-कभी साथ ही लौटते थे।
धीरे-धीरे हम अच्छे दोस्त बन गये। मैं राज को भुला नहीं पाई थी; पर यह एकतरफा मोहब्बत थी, इसलिये इसका मर जाना स्वाभाविक भी था। राज मेरा हो सकता था पर हमें वक़्त ही नहीं मिला और अचानक ही सब कुछ खत्म हो गया। फिलहाल मैं उस समय यही चाहती थी कि उदयन अपनी परेशानी से बाहर निकल आए। जाड़ों का मौसम था। एक दिन लाइब्रेरी में हमें देर हो गई। अँधेरा कब उतर आया, पता ही नहीं चला। उस दिन वह मुझे घर छोड़ने चला आया। घर से एक मोड़ आगे, वह रुक गया था।
’काम्या! शायद जल्दी ही मुझे एक जगह नौकरी मिल जाएगी। तुम नहीं रहोगी तो मैं अकेला पड़ जाऊँगा। क्या तुम पूरी ज़िंदगी मेरे साथ रहना चाहोगी? मैं नुम्हारे माँ-पापा से बात करूँ?’
मैं उसका चेहरा देखती रह गई थी। बिना किसी अलंकारिक शब्दावली के उसने अपनी बात सामने रख दी थी। एक दम सीधा-सादा इंसान... जो आपकी ज़िंदगी सँभाल कर रखे और आपको प्यार भी करे!
’सोचूँगी...’ मैंने कहा था। राज की यादें अभी भी मेरे साथ थीं। इतनी जल्दी उसे भुला पाना मेरे लिये नामुमकिन था, पर मुझे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। एक ही महीने बाद उसकी नौकरी जियोलाजिकल डिपार्टमेंट में लग गई और उसी समय उसकी शादी एक एस.डी.एम. लड़की से तय हो गई।"
"और तुमने कुछ नहीं कहा...?" कालिंदी के स्वर में नाराज़गी थी।
"उसके घर वालों के लिये उदयन अब कमाऊ बेटा था। वे उसके लिये ऊँची नौकरी वाली बहू चाहते थे, सो उन्हें मिल गई। उदयन ने यह सूचना मुझे दी और सौरी बोल कर चला गया।"
"क्या अदा ठहरी... वाह!" केसर ने कहा।
"मै समझ चुकी थी कि मैं उसकी मंज़िल तक ले जाने वाली सड़क थी, मंज़िल नहीं। सब कुछ मेरी आँखों के सामने अँधेरी रात की तरह गुज़र गया। मुझे लग रहा था कि मैं एक ऐसी जगह खड़ी हूँ, जहाँ रोशनी का एक कतरा भी मेरे लिये नहीं था। मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही थी कि मेरे जीवन में आए लोगों की परेशानियाँ तो खत्म हो गईं पर उन्होंने मंज़िल तक पहुँचने के लिये मुझे सीढ़ी क्यों बनाया?"
"इसलिये कि तुम्हें मदर टेरेसा बनने का शौक जो चढ़ा है। किसने कहा है कि दुनिया की सारी दुखी आत्माओं की काउंसलिंग करती फिरो?" केसर ने चिढ़ कर कहा।
"मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई..." काम्या ने धीरे से खिड़की का पर्दा उठा दिया... बाहर पूरा चाँद हँस रहा था।
"यह कितना सुंदर है...! इसके चारों ओर दोहरा सतरंगी घेरा है। अपनी ज़िंदगी में ऐसा खूबसूरत चाँद मैंने पहले कभी नहीं देखा...." कार्नेलिया खिड़की से बाहर देखने लगी।
"यह हमारे बीच कहाँ से आ गया.... खिड़की बंद करो, नहीं तो यह हमारी कहानियों का गवाह बन जायेगा..." कहते हुए कालिंदी ने खिड़की बंद कर दी।
चारों हँस पड़ीं... प्यार की कहानियाँ... इतनी अज़ीबो-गरीब कि शायद समाज, उन्हें किसी हालत में स्वीकार न करता। पर कहानियाँ तो थीं। वह भी झूठी नहीं, एकदम सच्ची कहानियाँ!
"जिस दिन उदयन मेरी ज़िंदगी से गया, उस दिन पहली बार मुझे लगा जैसे मुझे छला गया हो। मैंने बाद में तय कर लिया कि अब इस तरह का कोई रिश्ता मेरी ज़िंदगी में नहीं आएगा, पर यह भी नहीं हो पाया।"
"आहा! अब यह तीसरा प्रेम-प्रसंग...!" केसर शरारत से आँखें बंद कर हँस दी।
"मैं सीरियस हूँ... हो सकता है कि मेरी तलाश ही पूरी न हुई हो... कोई इस लायक ही न हो, जो मेरी ज़िंदगी में हमेशा के लिये मेरा होता। उदयन के जाने के बाद काफी वक़्त गुज़र गया। हैरानी मुझे इस बात की थी कि उसने मुझे एक दोस्त के तौर पर याद करना भी ज़रूरी नहीं समझा। शायद उसकी ज़िंदगी में मेरी ज़रूरत खत्म हो चुकी थी।
तीसरी बार मेरे फोन ने कमाल कर दिखाया। मेरा प्रोफेशन ऐसा है, जिसमें हर समय मेरा फोन से वास्ता पड़ता है। सुनने वालों का कहना है कि फोन पर मेरी आवाज़ बेहद मासूम सी लगती है और आवाज़ की इसी मिठास पर वह मर मिटा।
कोणार्क एक जर्नलिस्ट था... बहुत बड़ा नाम था उसका, पर डिप्रेशन में रहता था। पत्नी से अलग हुये उसे चार साल हो चुके थे। हमारा बहुत कम परिचय था, पर अकेलेपन के क्षणों में वह अक्सर मुझे फोन कर लेता था। अकेलेपन ने हमें एक-दूसरे के करीब कर दिया। हमने मिल कर जाने कितने सपने देख डाले और जब उन सपनों को हम सच करने वाले थे, तभी उसकी पत्नी लौट आई।"
"क्यों भला... क्या उसके यार-दोस्तों ने किनारा कर लिया था?" कालिंदी ने सवालिया नज़र उठाई।
"नहीं! पैसों की मज़बूरी ने उसे यह समझौता करने पर विवश किया। कोणार्क की अच्छी कमाई थी, जब कि उसकी जर्नलिस्ट पत्नी अपना ही खर्चा नहीं पूरा कर पा रही थी। फिर बुढ़ापा काटने को कोई चारदिवारी भी तो चाहिये। पतंगे तो जवानी तक ही साथ देते हैं।"
"और कोणार्क ने उसे आने दिया?"
"कोणार्क उसे भी रखना चाहता था और मुझसे भी दोस्ती बनाये रखना चाहता था। मैंने इनकार कर दिया। हमारी आखिरी बातचीत बड़ी अज़ीब सी थी।
’तुमने ऐसा क्यों किया?’ मैंने पूछा था।
’वह अब भी मेरी पत्नी है। चार सालों से हम दोनों ही वंचित रहे हैं।’
’तो वंचितों की इस दुनिया में मेरा क्या काम?’ कह कर मैं खुद उसकी ज़िंदगी से निकल गई। हैरत मुझे इस बात पर है कि मेरा हर प्यार जैसे सुबह का सूरज था... रोशन लकीरों से हो कर गुज़रता हुआ और हर अलगाव जैसे किसी गहरी अँधेरी गुफा की उदास शाम जैसा। एक बात ज़रूर है कि जो मुझे छोड़कर चले गये, उनसे मुझे कभी नफ़रत नहीं हुई। प्यार होता ही इतना खूबसूरत है कि आप उससे नफ़रत नहीं कर सकते।"
"तुम्हें बुरा तो लगा होगा?" कालिंदी ने धीमे से कहा।
"नहीं, मैंने सोच लिया था कि प्यार जैसी चीज मेरी किस्मत में नहीं थी। अब यह मेरी बनाई हुई दुनिया है, जिसमें मैं रहती हूँ। यह घर मैंने इसलिये पसंद किया था क्योंकि यहाँ सूरज डूबता नहीं बल्कि ऐसा लगता है जैसे पहाड़ के पीछे गिर गया हो।अगले दिन फिर वह सामने वाले पहाड़ के पीछे से किसी शरारती बच्चे की तरह झाँकता हुआ ऊपर आ जाता है। वैसे, यह जगह एक निर्जन द्वीप की तरह ही है; पर मुझे पसंद है।"
"तो अब क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कोई नहीं आएगा? हो सकता है कोई चौथा पुरुष..." कार्नेलिया ने हँस कर कहा।
"मेरा ऐतबार ही खत्म हो गया। टूट जाने के लिये तीन हादसे काफी हैं।" काम्या की आँखे सजल थीं।
"ना... आँसू नहीं, आज तेरा जन्मदिन है।" केसर ने उसे बाँहों में समेट लिया।
मैंने कहीं एक कविता पढ़ी थी... मुझे अब तक याद है। आज की इस शाम के नाम..." कार्नेलिया ने कहा।
स्त्री इसलिये चरित्रवान होना चाहती थी
क्योंकि स्त्रियाँ चरित्रवान होतीं हैं
क्योंकि चरित्रवान होना स्त्री के लिये अनिवार्य है
स्त्री स्त्री थी, बार-बार भूल जाती थी
और प्यार कर बैठती थी

उनके चेहरों पर एक पीड़ा भरी मुस्कुराहट आ कर लौट गई। गेम खत्म हो चुका था... सबने उन पर्चियों पर फिर दस्तखत किये और संदूकची में बंद कर दिया। केक काटा गया... सबने काम्या को विश किया और अपनी तरफ से लाये उपहार उसे दिये। सोने से पहले, काम्या ने खिड़की खोली। चारों ने एक साथ बाहर झाँका। ऊँचे पहाड़ों पर जलती रोशनियाँ, तारों की तरह दमक रही थीं। वादी में गहरा अँधेरा था... चाँद चमक तो रहा था, पर उसकी रोशनी घाटियों की गहराई तक नहीं जा रही थी। काम्या ने एक नज़र हँसते हुये चाँद की तरफ डाली।
"गुड नाइट, दोस्त... अब तुम हमारे कमरे में भी आ सकते हो..." और वे चारों खिलखिला कर हँस पड़ीं। पता नहीं चाँद ने सुना या नहीं, पर उनकी हँसी की गूँज ज़रूर घाटी में उतर गई थी।

15 comments:

  1. एक कहानी में कई कहानियाँ...सभी एक दूसरे की पूरक...बहुत बढिया...

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  2. अभिभूत करती है कहानी। बहुत सी गंभीर कहानिया और बहुत स्पंदित करने वाला क्लाईमेक्स

    स्त्री इसलिये चरित्रवान होना चाहती थी
    क्योंकि स्त्रियाँ चरित्रवान होतीं हैं
    क्योंकि चरित्रवान होना स्त्री के लिये अनिवार्य है
    स्त्री स्त्री थी, बार-बार भूल जाती थी
    और प्यार कर बैठती थी

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  3. कहानी पुरुष की सुविधा भोगिता और भावनाओं से खिलवाड की प्रवृत्ति को उजागर करती है। नारी हमेशा विक्टिम रहे, पीडा अपने भीतर सजोये रहे और यू ही किसी दिन खेल खेल में मन हल्का करने की कोशिश करे? आपकी कहानी नें परेशान कर दिया।

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  4. स्त्री भावनायें सीपी में बंद ही रहती हैं, कहानीकार नें मोती निकाल कर प्रस्तुत किया है।

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  5. Liked the concept of story.

    Alok Kataria

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  6. राजीव जी
    प्रिया जी की एक कहानी में गुंथी कइ्र् कहानियां पढ़ कर अच्‍छा लगा।
    औरत को अपने होने और होने को सार्थक सिद्ध् करने के लिए क्‍या क्‍या नहीं करना पड़ता।
    मार्मिक कहानी
    लेखिका को बधाई

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  7. कहानी को मैं सशक्त कहूँगा। एक बार में ही पूरा पढ गया, आम तौर पर नेट में लम्बी रचना एक साथ पढना संभव नहीं हो पाता। इस कहानी की रोचकता और सस्पेंस के साथ साथ मैसेज सब कुछ प्रभावी है।

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  8. पंकज सक्सेना14 जनवरी 2009 को 12:02 pm

    प्रिया जी आपको पहली बार पढा और बार बार पढना चाहूँगा। बहुत अच्छी कहानी है।

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  9. सशक्त कहानी है। बहुत अच्छी। लेखिका को बधाई।

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  10. एक सुघड़ कहानी .. बाँध कर रखती है .. अंत में दी हुई कविता , कहानी के आब्जेक्ट को और साफ़ करती है .... साथ ही शब्दों के ज़रिये आप ने जो दृश्य खींचा है . काबिल ऐ तारीफ़ है ..पहाडी , काटेज , फर्नीचर सब साफ़ सामने नज़र आता है और साथ ही नज़र आती हैं चार लडकियां ... अक्सर यूँ होता है कि हम कोई किताब पढ़ते हुए जिस पन्ने पर छोड़ते हैं उस पन्ने का कोना हल्का सा मोड़ देते हैं.. .. याद दाश्त के लिए जिसे अंग्रेज़ी में dog-एअरिंग कहते हैं .... फ़िर से शुरू करने पर वो कोना सीधा तो हो जाता है पर निशाँ रह जाता है .. चारों लड़कियों का याद अतीत को याद करना , एक खेल के बहाने , उन्ही मुडे हुए कोने के निशानों को याद करना है ..इसी तर्ज़ पर निदा फाजली की एक नज़्म है .. जो ये कहानी समझ पाया इस नज़्म को भी पसंद करेगा ....गौर करें ...
    "हर लड़की के तकिये के नीचे ,
    एक तेज़ ब्लेड ,
    एक गोंद की शीशी ,
    और कुछ तसवीरें होती हैं ,

    रात में सोने से पहले ,
    वो तस्वीरों की खरस तराश कर के ,
    एक नयी तस्वीर बनाती है ,
    किसी का चेहरा ,
    किसी के जिस्म पर लगाती है ,
    और जब वो इस खेल से ऊब जाती है ,
    तो किसी भी ,
    गोश्त पोस्त के आदमी के साथ ,
    लिपट कर , सो जाती है .."
    शुक्रिया ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. priya aapki kahani padi to aankh sajal ho gayi
    bhavuk kahani
    bahut ghari baaten
    pyaar kar baithti hai kyuki wo bahut samvedansheel hoti hai
    unka fayada log utha lete hain

    bahut achhi kahani

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ही सशक्त मार्मिक कहानी है।

    उत्तर देंहटाएं
  13. चार नदियों का जल प्रिया जी ने एक गगरी मे भर दिया।
    और खास यह भी कि , एक गागर मे होने पर भी सबकी अपनी मिठास ज्यों की त्यों ।

    बहुत उम्दा कहानी। बिना रुकावट पढ़ी।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं

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