मैं दीवानों का वेश लिये फिरता हूँ
मैं मादकता नि:शेष लिये फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके लहराये,
मैं मस्ती का संदेश लिये फिरता हूँ।


यह मस्ती का संदेश लिये फिरने वाले हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद के एक संभ्रांत परिवार में हुआ था। “बच्चन” इनका उपनाम है। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए करने के पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वे अंग्रेजी के प्राध्यापक नियुक्त हुए तथा 1952 में उन्होने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त की थी। वे कुछ समय तक इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द में भी रहे। 1955 में उनकी नियुक्ति भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के पद पर हुई। 1966 में वे राज्य सभा के सदस्य मनोनित हुए, जहाँ वे 6 वर्षों तक रहे। 

1926 में 19 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह श्यामा बच्चन से हुआ था जो इस समय 14 वर्ष की थी, दुर्भाग्य वश 1936 में श्यामा की टीबी के कारण मृत्यु हो गई। श्यामा की मृत्यु नें उनके काव्य में घोर निराशा और वेदना भर दी थी, किंतु यह अंधकार शीघ्र ही छट गया और वे पुन: मधुरता, आस्था और विश्वास के गीत गाने लगे। 1941 में बच्चन ने तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। बच्चन नें 1973 में अपना काव्य सृजन लगभग समेट लिया था। हिन्दी कविता और साहित्य के इस मूर्धन्य कवि का निधन 18 जनवरी 2003 को मुम्बई में हुआ। 

लिखने का उत्साह बच्चन में विद्यार्थी जीवन से ही था। एम.ए के अध्ययन काल में ही उन्होने फ़ारसी के प्रसिद्ध कवि ‘उमर ख्य्याम की रुबाईयों का हिन्दी में अनुवाद किया, जिसने उन्हे नौजवानों का प्रिय बना दिया था। इसी से उत्साहित हो उन्होंनें उसी शैली में अनेक मौलिक रचनायें लिखीं, जो मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश आदि में संग्रहित हैं। अपनी गेयता, सरलता, सरसता के कारण ये काव्य संग्रह बहुत ही पसंद किये गये। बच्चन आधुनिक काल की वैयक्तिक काव्यधारा के अग्रणी कवि हैं। व्यक्तिप्रधान गीतों के कवि के रूप में उन्होंने आत्मपरकता, निराशा और वेदना को अपने काव्य का विषय बनाया है। उनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियों में निशा निमंत्रण, मिलनयामिनी, धार के इधर उधर, आदि भी प्रमुख हैं। उनकी गद्य रचनाओं में - क्या भूलूं क्या याद करूं, टूटी छूटी कडियाँ, नीड का निर्माण फिर फिर आदि प्रमुख हैं। 

विषय और शैली की दृष्टि से स्वाभाविकता बच्चन की कविताओं का उल्लेखनीय गुण है। उनकी भाषा बोलचाल की भाषा होते हुए भी प्रभावशाली है। लोकधुनों पर आधारित भी उन्होने अनेकों गीत लिखें हैं। 

आलेख रितु रंजन
********** 
संसार में कितने ही लोग प्रतिदिन जन्म लेते हैं और मर जाते हैं किन्तु कुछ लोग होते हैं जो हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। अपने कार्यों से वे लोगों के दिलों में बस जाते हैं। ऐसे ही दिलों में बसने वाले कवि हैं- हरिवंश राय बच्चन जी। अपने काव्य की मदिरा से हर पाठक और श्रोता को मदहोश कर देने वाला कवि कैसे भुलाया जा सकता है? हालावादी कवि स्वयं जब कविता का प्याला भर कर लाए तो कौन होश में रहे-

भावुकता अंगूर लता से, खींच कल्पना की हाला।
कवि साकी बनकर आया है, भरकर कविता का प्याला।
कभी न कणभर खाली होगा, लाख पिए, दो लाख पिए,
पाठक गण हैं पीने वाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।

अपने युग को सबको अनुपम, ग्यात हुई अपनी हाला।
अपने युग में सबको अद्भुत, ग्यात हुआ अपना प्याला।
फिर भी वृद्धों ने जब पूछा, एक यही उत्तर पाया।
अब न रहे वह पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला।

कितना सच कहा था कवि ने। आज अगर ढ़ूढ़ें तब भी ऐसा कवि नहीं मिलता। उनकी हाला प्रतीक है। पाठक ऐसा समझने की भूल ना करें कि कवि हरिवंश राय जी सुरा पान करते थे। वे तो अति सरल, सौम्य, सात्विक मानव थे। हृदय से भावुक। मात्र १३ वर्ष की अवस्था में कविता लिखनी प्रारम्भ की। कविता को वे अनुभूति जन्य मानते थे। अपने अनुभवों को कविता में ढाला। इसीलिए वे कहते थे-

क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए, मैं दुनिया का हूँ एक अजब दीवाना। ( मधुशाला ) 

और- 

कविता कहकर जग ने, तेरे क्रन्दन का उपहास किया। (निशा निमंत्रण)

उनकी कविता को सुनकर श्रोता झूमने लगते थे। वे कहते सहृदय पाठक कवि के अनुभवों का तो भागीदार होता ही है, उसके मस्तिष्क की प्रक्रिया का भी अनुभव करता है। इसीलिए उसका सहृदय और सम् मस्तिष्क होना भी अनिवार्य है। इसीलिए वे कहते -मिल्टन को समझने के लिए मिल्टन चाहिए।

भाव की दृष्टि से बच्चन जी ने हिन्दी कविता को बड़ी देन दी। कविता से रस अथवा आनन्द प्रदान किया। वे जीवन में खैयाम से प्रभावित थे। हिन्दी में पन्त उनको प्रिय रहे। किन्तु पन्त की निराशा उनको नहीं भाई। जीवन में अनेक कष्टों को सहा। पत्नी श्यामा की मृत्यु से गहरा आघात लगा और कवि के कंठ से निकला-

कोई रोता दूर कहीं पर
इन काली घड़ियों के अंदर
यत्न बचाने के निष्फल कर
काल प्रबल ने किसके जीवन का
प्यारा अवलम्ब लिया हर?
कोई रोता दूर कहीं पर ( निशा निमंत्रण )

किन्तु कुछ ही समय बाद स्वयं को सँभाल लिया। तेजी जी से विवाह कर जीने का मार्ग ढ़ूँढ़ा और लिखा-

मैं कल रात नहीं रोया था
दुख सब जीवन के विस्मृत कर
तेरे वक्षस्थल पर सिर धर
तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे सा छिप कर सोया था 

जीवन में सुख बाँटते हुए लिखा- 

जो बीत गई वो बात गई

और- 

मैने दुर्दिन में गाया है
दुर्दिन जिसके आगे रोता, बंदी सा नत मस्तक होता।
एक न एक समय दुनिया का, एक-एक प्राणी आया है। 
मैने दुर्दिन में गाया है

उनका जीवन दर्शन आशा से परिपूर्ण है। वे इस जीवन की हर बूँद का आनन्द उठाना चाहते थे क्योंकि-

इसपार प्रिये मधु है तुम हो
उस पार न जाने क्या होगा ?

उन्होने जीवन दुखद स्मृतियों को भुला दिया और बहादुरी से जिया। उनके गीतों में बौद्धिक संवेदन के साथ-साथ हार्दिक अनुभूति भी है। उनकी भावधारा प्राणों में रस का संचार करती है। उनकी कविता प्रिय है तो उसे गाइए, उसे स्वर दीजिए और कहिए- 

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ, मैं मादकता निः शेष लिए फिरता हूँ।
जिसको सुनकर जग झूम-झुके लहराए, मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ।

आलेख शोभा महेन्द्रू 
***** 
’साहित्य शिल्पी’ आदरणीय हरिवंश राय ‘बच्चन’ को उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण करने हुए नमन करता है। 


22 comments:

  1. हरिवंश राय ‘बच्चन’ जी को उनकी पुण्यतिथि पर हमारा भी नमन।

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  2. इस आलेख के लिए आभार और महान कवि को श्रद्धांजली !

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  3. Madhushala ke racheita ko ,yug praneita ko jinki rachnaye jeevan satya ke karib thi,unko hamari shraddhanjali.

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  4. बढ़िया मेहनत कर तैयार किया गया आलेख. बच्चन जी को श्रृद्धांजलि.

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  5. लेखिका द्वय नें बच्चन के जीवन एवं उनकी रचनाओं पर जो प्रकाश डाला है उसके लिये आभार। डॉ. हरिवंश राय बच्चन को उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण करना अच्छा लगा।

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  6. बहुत अच्छा आलेख है। बच्चन जी को नमन।

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  7. बच्चन महान व्यक्तित्व के स्वामि व अमर कविताओ के रचयिता रहे हैं। एसी महान विभूतियाँ अमर होती हैं। बहुत अच्छा लगा उन्हे स्मरण करना। शोभा जी और रितु जी नें बहुत श्रम व शोध से यह आलेख लिखा है।

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  8. आदरणीय हरिवंशराय बच्‍चन जी के जिस गुण ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वो है उनका, उनको लिखे सभी पत्रों के उत्‍तर अपने हस्‍तलेख में देने का। उनके भेजे कुछेक पत्र मेरे पास भी मेरी अद्वितीय धरोहर के रूप में संजो रखे हैं। जिन्‍हें मैं अवश्‍य ही अपनी किसी पोस्‍ट में लगाऊंगा।
    आशय यह है कि किसी के भी खटखटाने को गंभीरता से लिया जाये, यह सीख सदा याद रखी जाये।
    ऐसा भाव आजकल कम देखने को मिलता है।

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  9. madhushala jane ko ghar se nikla hai pinewala
    kis path jaaon asmanjas me hai kintu bhola bhala
    alag alag path batlate sab par mai yeh batlata hoon
    raah pakad tu ek chalachal pa jayega madhushala
    HARIVANSH RAI BACHHAN KO UNKI PUNYATITHI par mera sat sat naman

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  10. Harivansh ray bachchan ji ke lekh ko padha bahut achha lkeh likha hai
    Ritu rajan ji aur shobha mahendru ji ne

    Bachchan ji ko hamari taraf se isse behtar shrddhanjali nahi ho sakti

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  11. डा हरबंश राय बच्चन और उनका साहित्य अमर है ... उनकी पुण्यतिथि पर यह आलेख साहित्यशिल्पी के सुधी पाठकों सहित समस्त शिल्पी परिवार की भावनाओं को प्रकट करता है ... आभार

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  12. HARIVANSH RAI BACHCHAN JEE PAR
    ACHCHHEE SAAMAGREE HAI.BADHAAEE.

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  13. हरिवंश राय ‘बच्चन’ पर अच्छा आलेख बहुत श्रम व शोध से लिखा है, आभार

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  14. श्रध्धेय "बच्चन जी " को नमन ! तथा सामयिक सारदर्भित जानकारी के लिये बधाई
    - लावण्या

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  15. बच्चन जी की पुण्यतिथि पर उनको नमन और शोभा महेन्द्रू जी तथा रितु रंजन जी को इस बढिया आलेख के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

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  16. शोभा जी और रितु जी को सुंदर आलेखों के लिए साधुवाद और महान कवि को श्रद्धांजली !

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  17. हरिवंश राय बच्चन साहब पर इतनी उम्दा और उपयोगी जानकारी देने के लिए शोभा जी और रितु जी दोनों का शुक्रिया और बधाईयाँ भी।

    बच्चन जी को मेरी श्रद्धांजलि।

    -विश्व दीपक ’तन्हा’

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  18. main , shoba ji , ritu ji aur sahitya shilpi ki team ko dhanyawad deta hoon ki unhone itna accha aalekh ko prastuth kiya ..

    bacchan ji ki shaili aur unki kavita , atulniya hai ..

    mera unhe naman ..

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  19. महान रचनाकार की पुण्यतिथि पर जानकारीप्रद लेख के लिए शोभा जी और ऋतू जी दोनों को बधाई

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