सागर कितना गहरा होता है? अथाह शब्द का अर्थ हमें तब ज्ञात हुआ जब एक पूरा दिन कथाकार तेजेन्द्र शर्मा के साथ गुजारने के बाद भी, दिन बौना हो गया। तेजेन्द्र शर्मा की कहनियों, उनके कथानकों, घटनाओं और पात्रों से तो अनेको मुलाकातें हुई हैं लेकिन जब स्वयं तेजेन्द्र जी नें साहित्य शिल्पी को एक पूरा दिन देने की स्वीकृति प्रदान की तो यह एक कहानीकार की थाह पाने के स्वर्णिम अवसर जैसा था। ब्रिटेन में रह रहे तेजेन्द्र शर्मा से फिर आमने सामने की मुलाकात जाने कब होती, इस लिये उनके साथ का एक एक पल हमारे लिये महत्व का था, यह अलग बात है कि सुबह के नौ बजे से रात के दस बजे तक साथ गुजारने के बाद भी यह लगा कि प्यासे रहे। तेजेन्द्र असाधारण हैं।
सुबह लगभग नौ बजे ही साहित्य शिल्पी के मोहिन्दर कुमार, अजय यादव एवं राजीव रंजन प्रसाद, तेजेन्द्र जी से पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उनके फरीदाबाद स्थित निवास पर पहुँचे। टैक्सी में बैठ हम निकल चले, हमें एसे स्थलों की आवश्यकता थी जहाँ खुला वातावरण भी हो, भीड भाड भी न हो, जिससे कहानीकार की अपनी कहानी से अवगत होने की प्रक्रिया में कोई व्यवधान न हो सके। सूरजकुण्ड से बेहतर स्थल क्या हो सकता था, जो हमारा पहला पडाव था। महाभारत की कहानी का इन्द्रप्रस्थ, कहानीकार तेजेन्द्र का मुक्त हृदय से स्वागत करने को उद्यत था। गुनगुनी धूप में हजारों सीढियों के बीच सूखा हुआ तालाब अपनी उपस्थिति उन जख्मों को दिखा कर दे रहा था जो उसके वदन पर हजारों दरारों सी उभर आयी थीं। पत्थरों और झाडियों में दुबके प्रेमी जोडों की खामोशी और खड खड कर उडते सूखे पत्तों से टूटती चुप्पी के बीच साहित्य शिल्पी के वीडियो कैमरे और रिकॉर्डर तेजेन्द्र जी से मुखातिब हो गये। कहानीकार को स्वयं को अभिव्यक्त करने का जैसे माहौल मिल गया था। तेजेन्द्र अपने विषय में बताने लगे। अपने पिता उनकी विचारधारा...कैसे स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके पिता को गोली लगी। परिवार उसके संघर्ष और उन संघर्षों से प्राप्त अनुभवों से धीरे धीरे कैसे उनके भीतर कहानीकार पनपा यह हमने विस्तार से जाना। यहीं हमे प्रवासी लेखक और प्रवासी लेखन जैसे शब्दों से उनकी खीज का पता चला। उनका मानना था कि दुनिया की कोई भाषा अपने लेखकों को इस तरह वर्गीकृत नहीं करती, लेखन लेखन है और उसे प्रवासी लेखन, दलित लेखन आदि लेबल प्रदान नहीं किये जाने चाहिये। उन्होंने शांति धारावाहिक के लिये अपने लेखन से जुडे अनुभव तथा फिल्म में अपने अभिनय के विषय में भी बताया। चर्चा लम्बी होती गयी और तेजेन्द्र जी से बातों नें हमें एक सम्मोहन में जकड रखा था। इसे तोडने की धृष्टता की बंदरों के एक झुंड नें, जिसने अचानक हमारे लैपटॉप और डिजिटल कैमरों पर हमला कर दिया।
हम फिर गाडी में सवार हुए और चल पडे अगडे पडाव की ओर। यह बातचीत के लिये वातावरण बदलने और कथाकार को मूड में लाने में भी सहायक हुआ। द्वारका की ओर बढते हुए हम रोज़ गार्डन पर रुके। पत्थरों से निकल कर फूलों के बीच आये। प्रेमी जोडों का यहाँ भी हर कोनों-कुंजों में कबजा था। मशक्कत के बाद हमें भी जगह मिल ही गयी। जहाँ चाह वहीं राह। तेजेन्द्र जी नें हिन्दी लेखन और प्रकाशन को कटघरे में खडा किया जब उनसे यह प्रश्न पूछा गया कि विक्रम सेठ या सलमान रश्दी के मुकाबले हिन्दी के लेखक स्थान क्यों नहीं बना पाते। उनका मानना था को हिन्दी में लेखन एक “पार्ट-टाईम” एक्टिविटी है। उन्होंने साहित्य शिल्पी को इंगलैंड में उनके द्वारा हिन्दी के लिये किये गये प्रयासों के विषय में भी बताया। उन्होने अपने लेखन, उसकी दिशा, तथा अपनी प्रमुख कहानियों पर भी हमसे बात की। जब हमने पूछा कि विदेशों में हिन्दी लिखने वाले अधिकतम लेखक 50 वर्ष से अधिक उम्र के हैं व नव-लेखन नदारद है तो उन्होने नवलेखन की कमी के विदेशों में कारणॉ को उजागर करते हुए जोर दे कर कहा कि नव-लेखन की कमी भारत में भी है और बहुत जल्द इसका अहसास होने लगेगा। यहाँ पी गयी चाय भी यादगार हो गयी। पॉलीथीन में भर कर लायी गयी चाय को लुत्फ ले कर हम सबने पिया। पिकनिक और साहित्य की एसी जुगलबंदी यदा-कदा ही संभव होती है।
तेजेन्द्र जी के साथ हम द्वारका पहुँचे। अपनी आनेवाली पुस्तक के लिये उन्हे कुछ तस्वीरे लेनी थीं। यही हमने अंतर्जाल पर उपलब्ध उनकी कुछ गज़लें भी सुनीं। साहित्य शिल्पी के विभिन्न स्तंभों पर भी उनसे विस्तृत चर्चा हुई। यहाँ से हम झंडेवालान पहुँचे। इरादा था छोले-कुलछे खाने का। कुछ मोडों पर भटकने के बाद हमने एक ढाबे में आलू भरी तंदूरी रोटियाँ और छोले खाये। साथ साथ विभिन्न विषयों पर बातें होती रहीं।
शाम को हिन्द युग्म नाम के एक ब्ळोग नें तेजेन्द्र शर्मा जी का कहानी पाठ आयोजित किया था। तेजेन्द्र जी से हमारे कई साहित्य शिल्पी भी मिलने को उत्सुक थे। हम एकत्रित हुए शाम हिन्दी भवन में। बातें अब भी अधूरी थीं। यहीं तेजेन्द्र जी नें हिन्दी के मूर्धन्य कथाकार और लिविंग लिजेंड असगर वजाहत से साहित्य शिल्पी के सदस्यों को मिलवाया। असगर जी नें अपना चलभाष नं साहित्य शिल्पी को प्रदान किया व हमें मिलने का समय देनें की स्वीकृति भी प्रदान की।

यहीं कैंटीन में बैठ कर तेजेन्द्र जी से बातचीत व उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग जारी रही। तेजेन्द्र साहित्य में किसी मुख्यधारा की उपस्थिति से ही इनकार करते हैं। उनका मानना है कि मार्क्सवाद जैसे लेबल लगा कर साहित्य का केवल नुकसान ही किया गया है। तेजेन्द्र जी नें स्वयं को मिले पुरस्कारों व सम्मान के अलावा उनके द्वारा आरंभ किये गये इन्दु शर्मा साहित्य सम्मान के विषय में भी बताया।
कार्यक्रम में तेजिन्द्र जी के कथापाठ से कहानी पढने की कला से भी हमारा परिचय हुआ। कार्यक्रम के बाद चर्चा में उन्होने कहा कि केवल चमत्कार कर देने जैसी भाषा और मोटे मोटे शब्दों का इस्तेमाल कहानी नहीं होता। तेजिन्द्र जी नें उन तत्वों पर विस्तार से चर्चा की जिनसे कहानी बनती है।
रात के आठ बज गये थे। हमारी वापसी आरंभ हुई। हमनें तेजिन्द्र जी से उनकी दिवंगत पत्नि इन्दु शर्मा जी व उनसे जुडे संस्मरणो पर जब बात की तो वे भावुक हो गये। उन्होनें अपना हृदय जैसे उडेल कर रख दिया। उन्होने कहा “तालमहल केवल पत्थरों से ही नहीं बनते”। वे बोले मैं इन्दु का नाम आसमान पर लिख देना चाहता था, इन्दु नें मेरे भीतर के कहानीकार को बनाया और अब मैं टुकडा टुकडा इन्दु उन कहानीकारों में बाँट रहा हूँ जो इस विधा को समर्पित हैं। हमारा मन भी भर आया था। रात के दस बजे जब हम उनसे विदा हुए तो हजारो और प्रश्न उभर आये थे और हम जैसे शून्य पर ही खडे थे। कितना गहरा है यह कहानीकार, कितना समर्पित कितना सादा और कितना महान...।

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[नोट:- साहित्य शिल्पी के पाठको के लिये साक्षात्कार व इंदु जी से जुडे तेजेन्द्र जी के संस्मरण शीघ्र ही प्रस्तुत होंगे। समय समय पर हम तेजेन्द्र जी की आवाज में उनकी कहानियाँ भी प्रस्तुत करेंगे। प्रतीक्षा करें...]
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42 comments:

  1. rajeev ji ,

    poora lekh ek baar mein pad liya .. kya kahun , man mein is waqt kitni baaten hai ... aap akele hi aise mahaparv mana lete ho bhaiyya !!

    tejendra ji ki lekhni ko mera salaam .. katha likhne men ek kathakaar ko us katha se gujarna padhta hai , aur tejendra ji ke saath hum ye anubhav mahsoos kar sakte hai ..

    sahitya shilpi ko dhero badhai .. isi tarah agrsar rahe ...

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  2. साहित्य शिल्पी को हार्दिक शुभकामनायें। तेजेन्द्र जी अपनी कहानियों की तरह ही गहन हैं। जिस तरह से आप साहित्य जगत के वर्तमान नक्षत्रों से परिचित कराते चल रहे हैं वह नेट जगत को नई उँचाईया दे रहा है।

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  3. rajeevji,
    aapko bahut badhai ki apane tejendraji se baatcheet kee aur bakayada oonko paathakoN se maano roob-ru karwa diya.

    oonki kahaniyNa sachmuch sashakt haiN, ismeiN koi 2 raay nahin hai.
    videsh meiN rakhakar waNha ke House Of Lords amein International Indu Sharma Katha Samman ayojit karna tejendraji ke vash ki hi baat hai.oonke sahas aur lekhan ko isee tarah saflata miltee rahe.
    inheeiN shubh kamanaaoN ke saath,

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  4. बहुत खूब एक ही दिन मे आपने तो लगता है झोली भर ली... बडा अच्छा लगा आपका एक दिन का वृतांत

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  5. राजीव जी मेरा अनुरोध है टिप्पणियों में मोडरेशन लगाईये। आपने अभी अभी एक टिप्पणी डिलीट की है जिसकी भाषा शर्मनाक थी। उसपर तुर्रा यह था कि वे हिन्दी की जयकार कर रहे थे। रामलाल नाम से की गयी इस टिप्पणी से यह तो जाहिर होता है कि सार्थक प्रयास को कैसे कैसे अवरोध मिलते हैं। लेकिन जारी रहें।

    तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व को इतनी सुन्दरता से प्रस्तुत किया गया है कि कथाकार को और करीब से जानने की उत्कंठा बढ गयी है। प्रस्तुत करने का तरीका नितांत मौलिक है।

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  6. साहित्य के वर्गीकरण पर, साहित्य के वाद पर और कहानी के आयामों पर तेजेन्द्र शर्मा के विचार जानने की उत्कंठा बढ गयी है। विस्तृत साक्षात्कार की प्रतीक्षा है। बहुत अच्छी रिपोर्ट है।

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  7. तेजेन्द्र जी से मुलाकात कराने के लिए पूरी साहित्य-शिल्पी टीम का शुक्रिया।
    अब तो तेजेन्द्र जी की आवाज़ में कहानियाँ सुनने को मन विकल हुआ जा रहा है। इंतज़ार रहेगा।

    -विश्व दीपक

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  8. साहित्य शिल्पी को बहुत-बहुत बधाई। इस तरह के संयोग दुर्लभ होते हैं। एह अनुभव बहुत विशिष्ट रहा होगा। ऐसे अवसरों का भरपूर लाभ उठाना चाहिए।

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  9. रिपोर्ट अच्छी है। अजय जी, मोहिन्दर जी एवं राजीव जी को इस प्रस्तुति के लिये धन्यवाद। तेजेन्द्र जी की रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

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  10. बढ़िया रही आपकी उनसे मुलाकात .अच्छा लगा उनके बारे में पढ़ना .कहानी तो सुनी थी वहां उनसे ..उसी अंदाज़ में और कहानी सुनने का इन्तजार रहेगा ..धन्यवाद

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  11. तेजेन्द्र शर्मा की कहानी "ईटों का जंगल" मैनें साहित्य शिल्पी पर सुना था। यह मेरा उनसे पहला परिचय था। आज यह वृतांत पढ कर उनकी दो कहानियाँ नेट पर पढीं। उन्हे अब तक न पढने का दुख हुआ। वृतांत रोचक है और बाध्य करता है कि कथाकार तेजेन्द्र को पढा और जाना जाये।

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  12. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर और साथ ही याद आ गए उनके साथ मेरे घर पर बिताये पल. तेजेंद्र जी मेरे यहाँ मेरे और उनके कामन मित्र प्रसिद्द कहानी कार श्री सूरज प्रकाश जी के साथ आए थे. गले में दर्द के कारण पट्टा पहना हुआ था...कुछ क्षणों की औपचारिकता के बाद जो बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो देर रात ही रुका...वो भी भारी मन से विदाई देते वक्त...इस बार किन्हीं कारणों से उनसे भेंट नहीं हो पाई लेकिन उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व की याद अक्सर मन में गुदगुदी पैदा कर देती है...आभार प्रस्तुति का राजीव जी.

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  13. बहुत ही सुन्दर लिखा है उंनके बारे मे इतना सब जांन करी के लिय शुक्रिया

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  14. bahut achha laga ye alekh padhkar. kathakaar tejendra sharma ji se milna sukhad raha aur unki patni ke dekhant ke bare main jaan kar bhaut dukh hua

    aap sabka praayas bahut saraahneey hai
    maine ab tak inki ek hi kahani padhi hai
    inki aur bhi kahani padhne ka man hai

    aage ke aalkh ka intezaar rahega

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  15. साहित्य शिल्पी द्वारा उठाया गया एक और सराहनीय कदम....ऐसे प्रयास होते रहने चाहिए

    मेरी फोटू देने के लिए अलग से

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  16. भाई तेजेन्द्र की मुलाक़ात बहुत ही रोचक रही। अब तो आप ही जान चुके हो कि वे आज जिस मकाम पर हैं, स्वभाव से उतने ही नम्र हैं और बनावटीपन से दूर हैं। इसी पर एक पुरानी बात याद आगई। उन्होंने मुझे एक किताब और पत्रिका डाक से भेजीं। मैंने डाक और पैकेज के दाम देखे तो थोड़ा सा सोचना पड़ गया। बिल के लिए पूछ ही लिया।

    बड़ी सादगी से लिखा "सर जी यह बिल दा मामला नहीं है - बस दिल दा मामला है।"
    स्वास्थ्य के कारण अब मीटिंग्ज़ आदि में जाना कठिन हो गया है लेकिन आज साहित्य शिल्पी की मुलाकात ने फिर से उनकी याद ताज़ा कर दी।
    उनकी आवाज़ में कहानियां सुनने की इच्छा ज़रूर है।
    साहित्य शिल्पी की टीम को बधाई।

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  17. बहुत ही भावपूर्ण लेख भावना से ओतप्रोत व्यक्तित्व के साथ ...... आभार

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  18. राजीव में से जी यानी कि मन
    मेरा ही नहीं, सबका प्रफुल्लित हुआ
    उनका भी जिनकी शर्मनाक भाषा के
    संबंध में अनिल कुमार ने किया है इंगित।

    अपनी खुशी सब
    की खुशी में पा न सके
    हरकत इसलिए आज शर्मनाक कर गए
    नाक उनकी कटी, कान उनके
    लटक गए
    मॉडरेशन होना वैसे तो सही है, सेंसर ही है
    पर इसमें संपादन नहीं होता, या तो आर
    रहता है या फिर पार ही होता है।

    अब वे आर ही रहेंगे
    पार उनसे हम पा ही गए।

    कहानी पढ़ना, कहानी सुनना
    उसके बाद लिखने कहने वाले से
    दो बातां सुनना, किस्‍मत कनैक्‍शन है।

    तेजेन्‍द्र जी के कहानी वाचन का
    यूनीक डायरेक्‍शन है, एक्‍शन है
    सलेक्‍शन है, का
    म नहीं है शर्माने का
    नाम जिनका तेजेन्‍द्र शर्मा है।

    पूरा दिन साथ रहे और
    सात पेज भी नहीं लिखे
    हम साठ पेज पढ़ना चाहते हैं,
    चाहे आप दो माह में लिखें।

    ऐसे ही साक्षात्‍कार करते रहें
    विकास भंडार को भरते रहें।

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  19. वैसे हिन्दुस्तान जैसे ग़रीब देश मे भी कहानीकारो की कोई कमी नही है। नाम गिनाऊ आपके दिल्ली और ग़ाज़ियाबाद के आसपास रहने वालो का ही?

    मुझे लगता है कि आप मार्क्सवाद को गरियाने वाले दोयम त्रियम दर्ज़े के स्वनामधन्य 'महान' रचनाकारो,विदेशो में रहने वाले अफ़सरो/रईसो और उनके भारतीय क्लोनो का महामन्च बना रहे हैं । यह अच्छा है की जनवाद की बात हो तो सब गरियाये और ख़ुद की विचारधारा पर चुप मार जायें । बिना विचार के सिर्फ़ जुगाली होती है लेखन नही,मार्क्सवाद का अन्धविरोध और निज़ी जीवन मे पून्जीवादी मुल्य-मान्यताओ का समर्थन और अन्गीकार क्या बताता है?

    फिर भी मेरी शुभकामनाये कि इसी बहाने कुछ लोगो को मन्च तो मिल ही रहा है।

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  20. साहित्य शिल्पी की टीम का ये प्रयास प्रशँसनीय है तेजेन्द्र जी की बातेँ और यादोँ को सुनना / पढना यादगार रहेगा ..इँतज़ार रहेगा

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  21. अशोक कुमार पाण्डेय जी इस मंच पर मैने आपको भी छपते हुए पाया है...और आपकी तरह की सोच के मार्क्सवादियों को भी।

    बडा विचित्र मोह है आपका कि आपकी विचारधारा के विरोध में कोई अपनी बात रखता है तो आप उखड जाते हैं। बिना विचार के किसी भी तरह का लेखन नहीं हो सकता उसे मार्क्स के भूत की इजाजत क्यों? आप अपनी महानता को अपने लेखन से भी सिद्ध कर सकते हैं उसके लिये किसी लेख को गरियाने, उसे कमतर सिद्ध करने या काम करने वाले लोंगे की मंशा पर उंगली उठाने की आव्श्यकता नहीं है। ब्ळाईंड स्टेटमेंट दे कर कृपया किसी मंच या व्यक्ति का मजाक न बनायें।

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  22. ब्लाईण्ड स्टेटमेन्ट नही शायद पढने वाले की फ़ितरत है। और यह भी मज़ेदार बात है कि इस व्यक्ति से आप नेट पर स्मपर्क नही कर सकते…प्रोफ़ाईल अनुपलब्ध है।
    ना तो मैने कभी किसी मन्च का मज़ाक उडाया है ना ही कोई गाली दी है। लगता है अनिल जी में हीनभावना कुछ ऐसा घर कर गयी है कि मेरे नाम का पहला हिस्सा देखते ही आक्रमण की मुद्रा मे आ जाते है।
    रहा सवाल विचार का तो बिना विचार के मेला होता है मन्च नही। मार्क्सवाद को गरियाने के मुद्दे पर जो एकता यहा दिखाई देती है उसे देखकर साफ़ लग जाता है कि आप लोगो की विचार सरणी क्या है। बोल दीजिये खुलकर्…कोई कुछ नही करेगा।
    अगर हर विचार का सम्मान है तो अमरकान्त जी,पन्कज बिष्ट जी और दूसरे कहानीकार क्यो आपकी नज़र से ओझल हैं ? अभी शमशेर का जन्म दिवस था क्यों उनकी याद नही आयी? मुक्तिबोध का नाम सुनते आप लोग क्यो भडभडाने लगते है?

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  23. वैसे आपको मार्क्स के भूत से बडी समस्या है, हिटलर के प्रेत और मुसोलिनि के भूत से प्रेम भी ज़रूर होगा।

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  24. ashokji aur anilji ke comments padhe.ek writer kee mulaaqat prakashit huyee hai, oose padhiye aur enjoy keejiye. aapas meiN kyoN kaha sunee kar rahe haiN. hum hindiwaloN ke saath yahi dikkat hai ki kisi ko ooper uthata nahin dekh sakte. lekhan ko sirf lekhan maaniye, oosmein raajneeti aate hi gandagi panap jaatee hai.
    hameiN sahityashilpi aur kathakar tejendra sharma ka aishsaan manana chahiye ki dono ne hi samay niklakar readers ko helathy matter padhne ko diya. v should appreciate their efforts. khule dil se cheezoN ko accept keejiye.

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  25. तेजिंदर शर्मा जी से मुलाक़ात का वर्णन अच्छा रहा .. अच्छे और गहरे रचनाकारों से मंच की शोभा बढ़ती है .. ख़ास कर मुलाक़ात का अंदाज़ मुझे काफ़ी पसंद आया ... साहित्य शिल्पी पर विभिन्न रचनाकारों के साक्षात्कारों का अच्छा संकलन हो रहा है ..

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  26. मधु जी

    इन्‍हें कहने सुनने दीजिए

    इन्‍हें मालूम है कि

    इनकी कहासुनी से

    इन दोनों पर असर

    हो या न हो

    बाकियों पर जरूर
    रहा है वो

    इसलिए कह कह सुन

    रहे हैं वो।

    दिव्‍यांशु शर्मा जी

    और कहा सुनी का

    भी संकलन हो रहा है

    अच्‍छा।

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  27. आदरणीय अशोक भाई मंच के नियमित पाठक लगते हैं ... ख़ास कर उन पोस्ट्स के जो आप के हिसाब से "एंटी मार्क्स " हैं | एक ब्रिटेन में बसे लेखक का साक्षात्कार छापने से पूरा मंच आप के लिहाज़ से जनवादी ही नही रहा |पूँजीवाद का समर्थक हो गया | इस के पहले इसी मंच पर कुछ दिन पहले कम्युनिस्ट शायर "शहरयार" के साक्षात्कार पर आप की प्रतिक्रिया नदारद थी | आप को डॉ. राही मासूम रज़ा का जीवन परिचय नही दिखा न मंच पर प्रकाशित अनेको जनवादी विचारधारा से ओतप्रोत रचनायें .. आप को जिन के नाम उछालने थे आप आए और उछाल कर चल दिए | इस मंच को आरम्भ हुए ४ माह हुए हैं और इतने समय में जिस विविधता के साथ लेखको को कवर किया गया है , काबिल ऐ तारीफ है और आप ख़ुद इस सफलता को कहीं ना कहीं स्वीकारते अवश्य हैं वरना आप इस मंच के इतने नियमित पाठक नहीं होते :-)| कोई भी व्यक्ति जिस ने अब तक की प्रकाशित सभी रचनाओ को पढा हो , आप से और आप की टिप्पणियों से सहमत नही होगा .. उलटा आप की इस तरह की तल्ख़ प्रतिक्रियाओ के पीछे छुपी किसी मंशा पर संशय अवश्य कर सकता है ..

    "मार्क्सवाद को गरियाने के मुद्दे पर जो एकता यहा दिखाई देती है उसे देखकर साफ़ लग जाता है कि आप लोगो की विचार सरणी क्या है" ...आप को नहीं लगता इस तरह की तल्ख़ जुबां का इस्तेमाल कर के आप एक निजी नाराजगी को ज़ाहिर कर रहे हैं बस..?.ये नाराज़गी आप के अन्दर के सुधी पाठक को बाहर आने नही देती, यूँ प्रतीत होता है .. एक मंच को स्थापित करने और चलाने में मेहनत लगती है .. उसे आप जैसे विचारवान पाठक इस तरह नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहिए .. एक बार अपने अन्दर के इन नाराजगी रूपी चश्मों को उतार फेकें और देखें , दुनिया इतनी बुरी जगह नही है ... :-)

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  28. माननीय जी की बात काबिले गौर है... कोई भी बात हल्की नहीं होती... मैं उनकी बात से सहमत हूं कि मंच पर कुछ चुनिंदा लोग ही अभी तक आ पाये है... पर क्यों? दो कारण हो सकते हैं एक तो यह कि इतने कम समय में इससे ज्यादा लोग आ ही नहीं सकते... दूसरा यह कि हो सकता है कि जो लोग छूट गये उनके विषय में आलेख ही मंच को उपलब्ध न हो पाये हों... यदि माननीय जी को शमशेर जी का जन्म दिन याद था तो आपने उनके कृतित्व पर आलेख लिख कर राजीव भाई को क्यों नहीं भेजा यदि आपने भेजा और मंच पर प्रकाशित नहीं हुआ तो मंच इसका दोषी है... अब साहब मैं बिल्कुल निश्पक्ष हो कर यह लिखना चाहता हूं कि यह लेखन मे जो और जिस वाद की बाते आप लोग करते हैं मैं समझता हूं कि आप कुछ लोगों को छोड कर बाकियों को यह बात पल्ले ही नहीं पडती कि कौन सी रचना किस वाद की है... मुझे तो वास्तव में आजतक कोई अंतर समझ नहीं आया... मैं लिखे को लिखे गये विचार की भांति लेता हूं और यह सोच कर पढता हूं कि यह उस वयक्ति का विचार है. वह व्यक्ति किसी महान व्यक्तित्व का प्रवकता है ऐसा सोचना ही क्यों यदि इन वादों मे कोई गंभीरता होती तो बात ही कुछ और थी जनाब... रही बात किसी के विदेश से आने या स्वदेश मे रहने का प्रश्न बात गंभीर है. हमारे लिये यह बात विचारणीय भी है कि कोई हमारे आसपास गंभीर और उत्तम लेखकों का भी हम सम्मान करें पर यह सब एक प्रक्रिया का हिस्सा है, जान पूछ कर की गई उपेक्षा नहीं है... हम अच्छे रचनाकारों की तलाश कर रहे है उनसे मिल कर एक मंच की रचना करना चाहते है.. और उस मंच ने माननीय जी को भी अपना हिस्सा माना है... तो मित्र आप अपनी बात को अनौपचारिक रूप से मंच के निजि ईमेल पर लिख सकते है... इस तरह सार्वजनिक रूप से कहा सुनी जैसा माहौल बनाना तब उचित है जब मंच आपकी राय से असहमत हो आपकी बात सुनी ही न जाती हो... मैं फिर यह बात कहना चाहता हूं कि आगे से वह मित्र जो किसी भी मुद्दे पर ऐसी कोई बात कहना चाहता है तो जरूर कहे... लेकिन टिप्पणीयो को पढने वालों का ख्याल रखे टिप्पणी रचना पर देने की तय हुई है रचना कार के कुल कुनबे की बात करनी है तो एक अलग कालम तय कर लेते है... दराअसल इस तरह की टिपणी से कुछ उखड नहीं जाता है... यह सोचना गलत है कि कुछ हो जायेगा कुछ नहीं होगा... अच्छे पाठक अच्छी रचना पढने आते हैं और रचना पढ कर चुपचाप निकल लेते है... साहित्य पाने के लिये पढा जाता है... आनंद के लिये यहा वक्त गंवाया जाता है... (सब जानते है कि यह स्वांत: सुखाया लिख पढ कर आनंदित होने वाले लोगों का मंच है कुछ मंझे हुए लेखक यहा अपने मनका प्रकाशित करने के लिये स्वतंत है जो व्यवसायिक लेखन में संभव भी नही है वहा अपनी मौलिकता के साथ साथ पैसी की आगत के आनुरूप लिखा जाता है... यहा सब मन की मौज है ऐसे में आप किसी की काबिलियत और गैर काबिलियत को सर्टिफिकेट दे कर भी कुछ भला नहीं करने वाले) और यदि टिप्पणी भी आनंद देंगी तो लोग इन्हें भी पढेंगे... मेरा एक अनुरोध है कि एक अनुरोध हर रचना के नीचे डाल दिया जाये कि यदि आप इस रचना से असहमत है या आपको कुछ और गरियाना है तो कृप्या यहा टिप्पणी दे... उसे साईट के परिचर्चा कालम में ट्रांसफर कर दिया जाये और वहा वाकयुध का खुला मैदान तैयार कर लिया जाये... एक और निवेदन है कि माननीय जी और अन्य ऐसे लोगों से अनुरोध है कि वह किसी दिन समय निकाले आमने सामने मिल बैठ कर अपनी बात कहें जिस्से भी कहनी है इस्से नतीजे निकलेंगे और एक सौहार्द्य का माहोल बनेगा मैं मंच का सद्स्य होने के नाते यह अपील करना चाहता हूं कि यह मच अभिव्यक्ति का है किसी वाद का या विचार का गुलाम नहीं है.. हर विचार जो नैतिकता की सीमाएं न लांघता हो तो किसी को व्यक्तिगत क्षति न पहुंचाता हो वह यहां स्वागत योग्य है...

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  29. उपर लिखी बडी बडी बातों को तो नहीं जानती लेकिन यह अवश्य कहूँगी कि इस विवाद में जो बात छूट रही है वह है कहानीकार तेजेन्द्र जी और उनका व्यक्तित्व, जो इस आलेख में प्रस्तुत हुआ है। मैं उनसे बहुत प्रभावित हुई। उनकी कहानियों की प्रतीक्षा है।

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  30. लेख के सन्दर्भ में टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया और ऊपर कई महानुभावों के बीच जनवादी विचारधारा और मार्क्सवाद जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा-प्रतिचर्चा का छिड़ जाना .... निःसंदेह इस बात का प्रतीक है की साहित्यशिल्पी ने बहुत ही अल्पावधि में मील का पत्थर पा लिया है ......

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  31. मानकर चल रहा हूँ कि माननीय जी शायद मुझे ही कहा गया है।
    एक बात साफ़ कर दूँ कि साहित्य अगर समाज का दर्पण है तो उसमे समाज की सारी अन्तः प्रक्रिया शामिल होगी - और अगर समाज के बेहतर भविष्य के बारे में साहित्य को कहना है तो उसका ब्लूप्रिन्ट देने की प्रक्रिया मे एक प्रतिसंसार गढना होगा।यह प्रतिसंसार अगर यूटोपिया होगा तो जनता के किसी काम का नही और अगर किसी ठोस विकल्प पर आधारित बात होगी तो तय करना होगा कि यह किस के पक्ष मे होगी और इसी प्रक्रिया मे राजनीति और विचार साहित्य का अभिन्न अवयव बनते हैं । तो ग़ैरराजनीतिक होना भी एक राजनीति है - अक्सर जनपक्षधर राजनीति के विरुद्ध ।
    वैसे दिव्यान्शु जी मेरे सुधी पाठक होने की चिन्ता ना करें …तल्ख़ी लेखन और पठन दोनो का अभिन्न हिस्सा है। मीठा-मीठा लिखना - पढना काफ़ी नहीं । जो लोग सच कहने और सुनने की हिम्मत रखते हैं तल्ख़ी से नही घबराते। वैसे '''दराअसल इस तरह की टिपणी से कुछ उखड नहीं जाता है...'' के बारे मे क्या कहना है। इस मिठास पर वारे जाइये।
    मन्च के परम सम्माननीय,महाभट्टारक,साहित्यशिरोमणि वगैरह-वगैरह योगेश जी आपका मेला है जहाँ चाहिये तम्बू गाडिये…आपको बता दूँ कि जिन पत्रिकाओं को आप व्यवसायिक कह रहे हैं उनमे से ज़्यादा पैसा देती ही नहीं /दे नही पाती। बडी से बडी पत्रिका, (सरकारी को छोडकर )जो पत्र-पुष्प देतीं हैं ,उससे एक किताब भी मुश्किल से आती है। पर छपना ज़रा मुश्किल है/वहा 5 मिनट मे वाह-वाह वाली टिप्पणी भी नही आती। फिर पाठक भी काफ़ी ''तल्ख़'' होते हैं अक्सर्।

    शिल्पी के राजीव जी काफ़ी सुलझे हुए लगते है। दरअसल, इस टिप्पणी के ठीक पहले उनसे बात हो गयी…समर्पण देख कर सन्तोष होता है/मैने स्पष्ट किया था उनसे कि मेरा कोई दुराग्रह नही । नियमित पढ नही पाता ,पर हाँ अक्सर पढता हूँ। जब बुरा लगता है तो लिखता हूँ /लिखून्गा।यह मेरा हक़ है।वैसे आप मालिक हैं इसके माई बाप्…जो चाहिये करिये।
    स्वान्त सुखाय के बारे मे एक बात कहूं - कवि का स्व जितना विस्तारित होता है वह उतना ही बडा कवि होता है। जब उसके स्व मे सारा सँसार आ जाये तब वह युग का कवि बनता है। स्वान्त सुखाय को मस्ती छानने और कचरा प्रोड्यूस करने का लाईसेंस मत बनाईये।

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  32. फ़िर स्पष्ट कर दूँ …शिल्पी से उम्मीद है इसीलिये हस्तक्षेप करता हूँ ।
    आप चाहें तो ना करूँ ।

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  33. मैं मित्रवर अशोक कुमार पाण्डेय की बात से जरा भी सहमत नहीं। ऐसा उन्हें तब कहना चाहिये था जब मंच किसी खास विचारधारा या व्यक्ति-विशेष का पोषक होता। यहाँ तो अशोक कुमार पाण्डेय, त्रिलोचन और विजेन्द्र उतने ही आदर के साथ छापे जाते हैं जितने आदर के साथ तेजेन्द्र शर्मा ,
    लावण्या शाह या प्राण शर्मा जी। अगर अशोक जी बहुत चिंतित हैं तो अमरकांत,पंकज विष्ट या अन्य कहानीकार जिसे वह पसंद करते हैं पर सामग्री साहित्यशिल्पी को दें और अगर उसे न छापी जायेगी तो फिर मै बात करूंगा। दूर से शब्दों की गोली मारना तो आसान है! पर काम करना आसान नहीं। मुझे हैरत होती है कि अभी शिल्पी को अस्तित्व में आये मात्र चार माह हुये हैं और उस पर इस तरह के लांछन लगा कर उसको अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक़ से जोड़ना ठीक नहीं। अभिव्यक्ति का मतलब तब है जब हम दूसरों की अभिव्यक्ति का ख्याल करें। मै इस मंच को तब तक दोषी नहीं मानूंगा जब तक वह ऐसी कोई बात न कर दे कि पक्षपात जैसा कुछ दीखे। मैं तो राजीव रंजन जी से कहूंगा कि आप अशोक कुमार पाण्डेय जी से उन आदरणीय लेखकगण के सबंध में सामग्री की मांग करें जिनका नाम उन्होंने सुझाया है क्योंकि शिल्पी सारे काम खुद तो नहीं कर सकता। कोई जादू की छड़ी थोड़े है कि घुमाया और सामग्री तैयार हो गयी! -सुशील कुमार।

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  34. चलिये,कम से कम सुशील जी आपसे खुश तो हुए।वरना अभी कल तक तो अपमान से पीडित होकर छटपटा रहे थे,कुछ दिन पहले बाक़ायदा बहिष्कार कर रहे थे और अभी दो दिन पहले महावीर जी वाली कविता पर अशोक सिन्ह वाली टिप्पनी पर इत्तेफ़ाक जताते हुए यहां छपने वालों की योग्यता पर सवाल उठा रहे थे।
    मेरे साथ मामला दूसरा है…मन्च से असहमति नही पर इसको सही दिशा (मेरे हिसाब से) देने की कोशिश करुन्गा।
    मन्च है पत्रिका जैसा तो सामग्री जुटाने की ज़िम्मेदारी मेरी नही इसे चलाने वालों की,हाँ मुझसे सहयोग माँगा तो ज़रूर दुन्गा…सुशील भाई से अनुमति लिये बिना।
    नज़र पर एक शेर हो जाये
    ले दे के अपने पास फ़क़्त एक नज़र तो है
    क्यूँ देखे ज़िन्दगी को किसी की नज़र से हम्।

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  35. नहीं आपका कर्तव्य तो सिर्फ़ हवा में शब्दों के गोले फेंक कर हाथ झाड़ लेना है!बाकी सारी जिम्मेवारी दूसरों की है अशोक कुमार पाण्डेय़ जी। अशोक सिंह भी मित्र हैं आप ही की तरह तो उनका क्या करूं ? उनका कलम तो रोक नहीं सकता आप ही की तरह।

    उत्तर देंहटाएं
  36. श्रीकांत जी मील का पत्‍थर
    या मिल कर पत्‍थर
    लगता है अब
    हेलमेट खरीदने पड़ेंगे।

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  37. भाई राजीव जी से वादा किया है कि अगले 1 महीने तक चुप रहुन्गा तो अब इस वाद विवाद मे मेरी हिस्सेदारी बन्द।
    यह बहिष्कार नहीं है।
    एक शेर और हो जाये

    बरसा रहे हैं आग लबे कुहना गर से हम
    ख़ामोश क्यों रहेंगे ज़माने के डर से हम ।

    उत्तर देंहटाएं
  38. सभी पाठकों से अनुरोध है की वो कृपया टिप्पणी सिर्फ़ पोस्ट के बारे में दें और बहस में न पड़ें.
    जहाँ तक लेखन का प्रशन है उसके लिए पूरा आकाश भी कम है. स्वयं को किसी धारा से जोड़ कर पढ़ना या लिखना अपने आप को सीमत करने के अतिरिक्त कुछ नही. साहित्य शिल्पी मंच पर सभी को चाहे स्थापित हो या नवीन बराबर का सम्मान दे कर प्रकाशित किया जाता है.. आप सभी अपने लेखों एवं रचनाओं द्वारा इसे और समृद्ध कर सकते हैं. आशा है मेरी टिप्पणी को सार्थक रूप से लिया जायेगा.
    यदि किसी को साहित्य शिल्पी से कोई शिकायत है या आप कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आप sahityashilpi@gmail.com
    पर मेल कर के हमें सूचित करें.

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  39. अब आप चुप ही रह कर क्या कीजियेगा जब पहले सारा कुछ कह ही दिया। वैसे यहाँ कोई मुद्दा एक माह तक चलता भी है क्या जो आप चुप रहेंगे? लोगों को बेवकुफ़ बनाईएगा ,मैं तो जन्मजात मूर्ख हूँ । मुझे और बनाने की जरूरत नहीं,अशोक कुमार पाण्डेय जी।

    उत्तर देंहटाएं
  40. भाई राजीव जी, महेन्द्र जी एवं अजय जी।
    मैं किसी काम से भोपाल चला गया था, आज ही लौटा हूं और आ कर आपकी पोस्ट और उस पर टिप्पणियां पढ़ीं।

    आपकी मेहनत और लगन को सलाम। ऐसे ही हिन्दी सेवा में जुटे रहें। जब लोग आपकी आलोचना करने लगें तो समझ लीजिये कि आपके काम का नोटिस लिया जा रहा है। अब आपको नकारा नहीं जा सकता।

    बधाई

    तेजेन्द्र शर्मा
    महासचिव - कथा यू.के. (लन्दन)

    उत्तर देंहटाएं
  41. ना सुशील भाई…एक माह तक कही (अपनी छोडकर) कोई टिप्पणी नही।

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