चन्द पन्नों मे सिमटा
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दैनिक अखबार
दुनिया को
देखने समझने का रास्ता सा
सुबह का नाश्ता सा

कभी कड़्वा, कभी कसैला
कभी तीखा-कभी विषैला
हां साहमे हमने इस
अखबारी नाश्ते के
बहुत स्वाद चखे हैं
कुछ भूल गये
कुछ याद रखे हैं

आप कहेंगें
ना मिर्च ना मासाला
सफेद कागज़ पर प्रिंट काला
मात्र खबरों का हवाला
फिर स्वाद कैसा

पर साहब
हम आपको समझा देंगें
लीजिये, सुनिये

मुखपृष्ठ खून से सना होगा
अमन चैन नदारद
उग्रवाद घना होगा

पूरे अखबार का
ये आलम होगा
बेवक्त चटकी चूड़ियो का
काँलम होगा
हत्याओं की खूंडियों पर
शीर्षक तने होंगें
सभी शब्द खून से सने होंगें
अपने वैधव्य का
स्वागत करती
नारियों की तस्वीरें
अनाथ हुए बच्चों की
सिसकियां और तकदीरें
सुरक्षा व्यवस्था लड़्खड़ाती हुई
हर मौत उसके खिल्लियां उड़ाती हुई
न उठ सकने वाले
कड़े कदम का आश्वासन
अपनी
कार्य कदम का आश्वासन
अपनी
कार्य कुशलता पर हंसता कुशास

आप कहेंगें ये तो खबरें हैं
स्वाद कहां है
अरे भाई
इन खबरों में ही
स्वाद भरा है
वरना
अखबार में
क्या धरा है...?

17 comments:

  1. पंकज सक्सेना16 जनवरी 2009 को 1:41 pm

    आप कहेंगें ये तो खबरें हैं
    स्वाद कहां है
    अरे भाई
    इन खबरों में ही
    स्वाद भरा है
    वरना
    अखबार में
    क्या धरा है...?

    क्या बात कही है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पूरे अखबार का
    ये आलम होगा
    बेवक्त चटकी चूड़ियो का
    काँलम होगा
    हत्याओं की खूंडियों पर
    शीर्षक तने होंगें
    सभी शब्द खून से सने होंगें
    अपने वैधव्य का
    स्वागत करती
    नारियों की तस्वीरें
    अनाथ हुए बच्चों की
    सिसकियां और तकदीरें
    सुरक्षा व्यवस्था लड़्खड़ाती हुई
    हर मौत उसके खिल्लियां उड़ाती हुई
    न उठ सकने वाले
    कड़े कदम का आश्वासन
    अपनी
    कार्य कदम का आश्वासन
    अपनी
    कार्य कुशलता पर हंसता कुशासन

    गंभीर अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी कविता है। सचमुच अखबारनवीसों को लगता है कि सनसनी न हो तो आखिर अखबार में धरा क्या है?

    उत्तर देंहटाएं
  4. इन खबरों में ही
    स्वाद भरा है
    वरना
    अखबार में
    क्या धरा है...?

    अखबार कैसे निस्सार होते जा रहे हैं कविता प्रस्तुत कर रही है। बधाई पवन जी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रवाह बहुत अच्छा है और बात गंभीर है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. इसी मंच पर नयी कविता पर एक सार्थक बहस चल रही है .. आप की कविता उस बहस को एक dimension दे सकती है ... जहाँ एक मुलायम सी गत्यात्मकता इसमें साँस लेती है , वहीं ये आजाद नज़्म सी भी दिखायी पड़ती है .. बेहद खूबसूरत ..
    उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद का असर पत्रकारिता पर भी हुआ ही है . हमारे दैनिक समाचार पत्र एक "strategic pornography" के शिकार हो गए हैं .. जो कि कभी सनसनी तो कभी सेक्स तो कभी सेंसेक्स बन कर मुख पृष्ठों पर फैल गयी है ... पत्रकारिता की जीर्ण आत्मा के चीत्कार को आप ने बखूबी काग़ज़ पर उतारा है ....
    शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी कविता आज को दिखाती है। कविता सशक्त है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप कहेंगें ये तो खबरें हैं
    स्वाद कहां है
    अरे भाई
    इन खबरों में ही
    स्वाद भरा है
    वरना
    अखबार में
    क्या धरा है...?
    पता नहीं , आजकल खबरें ऐसी होती हैं या खबर देनेवाले।

    उत्तर देंहटाएं
  9. अखबारों को व्‍यंजन
    बतलाने वाले इस
    चंदन को वंदन।

    उत्तर देंहटाएं
  10. आज के हालात पर तगड़ा...हैवीवेट टाईप कटाक्ष...

    उत्तर देंहटाएं
  11. अखबार पर आपके आचार विचार सुन कर अच्छा लगा.. सचमुच उपहार की पेकिंग तो महज दिखावा है.. मूल्य तो उपहार का ही होता है :

    उत्तर देंहटाएं
  12. सारे टिप्‍पणीकार
    बहस में हिस्‍सा
    ले रहे हैं
    इस पर कम
    टिप्‍पणियां आने
    का यही कारण है।

    कवि महोदय
    रुकावट के लिए
    खेद है।

    इस कविता को
    कल के अंक में
    पुन: प्रकाशित
    किया जाएगा
    ताकि खूब सारी
    टिप्‍पणियां आ सकें।

    आदेशानुसार
    साहित्‍यशिल्‍पी टीम प्रबंधन

    उत्तर देंहटाएं
  13. pavan ji , aapki ye kavita padhkar aaj ke yug ki sacchai saamne aa gayi .. in fact yahi to hota hia aaj ke akhbaaron mein ..
    bahut sundar rachana.

    aapko bahut badhai ..

    vijay
    www.poemsofvijay.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  14. लाजबाब भाई साहब। आपकी कविता पर देर टिप्पणी करने के लिये क्षमा चाहता हूँ।...सुशील कुमार।

    उत्तर देंहटाएं
  15. साहित्‍य शिल्‍पी का धन्‍यवाद जिनके कारण ये रचना आप लोगों तक पहुंच पायी है। आपकी प्रतिक्रियांए मुझे हौसला देंगी। आप सब सम्‍माननीय जनों को आभार।

    उत्तर देंहटाएं

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