लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।


तू तो सृष्टा है रे पगले कीचड़ में कमल उगाता है,
भूखी नंगी भावना मनुज की भाषा में भर जाता है ।
तेरी हुंकारों से टूटे शत्‌ शत्‌ गगनांचल के तारे,
छिः तुम्हें दासता भाई है चांदी के जूते से हारे।

छोड़ो रम्भा का नृत्य सखे, अब शंकर का विषपान लिखो।।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।


उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल,
कदली जांघें चुभते कटाक्ष, अधरों की आभा लाल लाल।
अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।

बस बहुत पायलें झनक चुकीं, साथी भैरव आह्‍वान लिखो।।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।

मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

लिख चुके जाति-हित व्यक्ति-स्वार्थ , कवि आज निधन का मान लिखो।।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।
***** 

46 comments:

  1. लिख चुके मनुज की हार बहुत,
    अब तुम उस का अभियान लिखो
    आदरणीय शर्मा साहब,
    इतनी सुन्दर बहती हुई कविता पढ़वाने के आपका बहुत बहुत आभार और पर्व पर मेरा सादर प्रणाम स्वीकार कीजिएगा ।

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  2. Very Nice Poem. Thanks.

    Alok Kataria

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  3. बहुत सुन्दर व प्रेरणादायक कविता !
    घुघूती बासूती

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  4. मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
    जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
    कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
    भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

    ओजस्वी रचना है। बहुत प्रेरक।

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  5. जनवादी सोच से ओतप्रोत रचना जो कि एक आह्वान भी है .... कवि में निमित्त शक्ति को हर युग में पहचाना गया है ... मेरा अपना मानना भी है कि एक ह्रदय स्पर्शी , जनवादी रचना , अपने आप में एक आन्दोलन है ..राष्ट्र के मौजूदा हालातो को देखा जाए तो आदरणीय महावीर जी की ये पुकार सामयिक भी है .... भाव के साथ भाषा और प्रवाह दोनों प्रशंसा योग्य हैं ... वाकई कुछ उद्वेलन अनुभव होता है :-)

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  6. किन से कह रहे हैं दादा,
    सब चोली चुनरियों में उलझ गये है..
    उद्देश्य से भटके लोगों को आपने बहुत सुंदर ढंग से जगाने का प्रयास किया है
    बधाई
    लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
    लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।

    बहुत सुंदर पंक्तियां है] बार बार गुन्गुनाने को मन करता है

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  7. लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
    लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।
    " very inspiring and motivating"

    regards

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  8. MAIN SHREE MAHAVIR JEE KE KAVYA KAA
    PRASHANSHAK HOON.GEET,GAZAL,KAVITA
    ITIYAADI SAB KUCHH VE KAHTE HAIN.
    UNKEE RACHNAAYEN MUN PAR ATOOT
    PRABHAAV CHHODTEE HAIN.UNKEE IS
    OJASVEE KAVITA KEE HAI PANKTI
    PRERAK AUR UTSAHVARDDHAK HAI.

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  9. लिख चुके जाति-हित व्यक्ति-स्वार्थ , कवि आज निधन का मान लिखो।।
    लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।

    *****
    waah bahut sundar. ek ashawadi kavita .

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  10. समकालीन कविता अब छंद से बहुत दूर जा चुकी है फिर भी महावीर शर्मा जी की इस छंदयुक्त कविता की प्रशंसा करनी होगी। क्योंकि कितने कवि हैं धरती का गान लिखने वाले? चाँदी के जुते से ही सब हारे हैं। सब रम्भा पर ही कविता लिखने को आतुर हैं। कवि की दृष्टि में आज समाया है - “उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल”। क्यों नहीं लोग लिखते कि अभी जरूरत है -“अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी। ” महावीर जी , मैं आपकी कविता की अंतर्वस्तु का कायल हूँ। अगर यह कविता मुक्त छंद में लिखी जाये तो और भी निखर आयेगा। जो भी हो ,इस कविता की सराहना इसके विषय़-वस्तु के कारण समीचीन है। मगर मुझे मालूम है कि आपकी कविता ज्यादा लोग नहीं पढॆंगे , न ही टिप्पणी देंगे। क्योंकि मुझ जै्से नक्काड़ा तो चुने-गिने ही होंगे। यह पुराने शब्दों में “माया का प्रभाव है ”और अब के शब्दों में “बाज़ारवाद का तीव्र नशा”। मोबाईल- 09431310216

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  11. आदरणीय महावीर जी शत शत प्रणाम आपको इस अद्भुत रचना के लिए...क्या कहूँ प्रशंशा के लिए शब्द नहीं मिल रहे...
    नीरज

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  12. कई बार गुनगुना चुकी हूँ और कई बार अभी गुनगुनाना है.........भाव और भाषा दोनों ही दृष्टि से मन-मोहक ......


    महवीर जी !
    बधाई...
    और आभार....
    मन-भावन गीत के लियें......


    सादर
    गीता पंडित

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  13. aaj ye padh kar harioodh ji aur dinkar ji ki lekhani ki yaad aa gai
    badhaai


    brijesh

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  14. सुन्दर...प्रेरणा देती कविता....

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  15. आदरणीय महावीर जी,
    प्रेरणा से भरी यह रचना हुंकार भरती है और यहाँ मैं आदरणीय सुशील जी से भी इत्तेफाक नहीं रखता, अगर एसी समकालीन कविता नहीं है तो होनी चाहिये। जिस कविता में प्राण न हो वह भी वृथा है। कविता के बदलते स्वरूप के साथ उसे पढने वाले भी कम होते गये हैं। छंद को सिरे से नहीं खारिज किया जा सकता और उसकी संप्रेषणीयता कहीं अधिक है इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

    एसी कवियायें काल जयी हैं। ओजस्विता की यह बानगी देखिये:-
    मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
    जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
    कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
    भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  16. आदरणीय महावीर जी की भाषा मेँ केशव का आह्वान है "तस्माद्` उत्तिष्ठ कौन्तैय .." की स्मृति हो आई
    - लावण्या

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  17. लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
    बहुत सुंदर और प्रभावी पँक्तियाँ हैं! आदरणीय महावीर जी को बधाई!
    सुशील जी से एक प्रश्न पूछना चाहूँगा कि क्या कोई कविता छंदबद्ध होने से ही समकालीन अथवा जनवादी होने से वंचित हो जाती है? यदि इस बात को मान लें तो फिर क्या कारण है कि घाघ, भड्डरी और गिरधर जैसे कवियों (यहाँ मैं जान-बूझकर वे नाम गिना रहा हूँ जो किसी भी रूप में धर्म आदि से नहीं जुड़ते वरना तो सूर, तुलसी, रसखान, रहीम, कबीर जैसे अनेक नाम हो जायेंगे) को आज भी सामान्य जन आधुनिक प्रगतिवादी या जनवादी कवियों से ज़्यादा अपने नज़दीक पाता है?

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  18. बहुत दिनों बाद वीर-रस की कोई कविता पढ़ने को मिली! एक अच्छी छंदबद्ध रचना पढ़वाने के लिये आभार स्वीकारें!

    उत्तर देंहटाएं
  19. मुझे आप सभी का जो प्यार मिला है उसके लिए आभारी हूं। राजीव रंजन जी और अजय यादव जी ने सुशील कुमार जी के कुछ विचारों से सहमत ना होकर अपने विचार दिए हैं उन शब्दों और सुशील जी का भी धन्यवाद देता हूं क्योंकि टिप्पणी अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए ही होती है।
    सुशील जी, आपने कहा है कि समकालीन कविता अब छंद से बहुत दूर जा चुकी है, आपकी इस बात से मुझे गरेज़ नहीं है लेकिन अपने विचार देना चाहूंगा। इसका ध्यान रहे कि मैं अपनी कविता के विषय में नहीं कह रहा हूं।
    यदि ग़ौर से खोजें तो किसी हद्द तक कविता छंद का पर्याय ही बन जाता है क्योंकि कविता प्रवाह के बिना गद्य समान हो जाती है। इसके अतिरिक्त कविता का संगीत से भी गहरा संबंध है। प्रवाह-रहित कविता संगीत के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसी कारण चाहे वे फ़िल्मों में हों, चाहे अन्यत्र वही गाने, गीत, प्रवाहमयी कविताएं, ग़ज़लें, आदि कालजयी बने हैं। आज भी हमारे भक्ति-गीत, ग़ज़लें, प्रवाहमयी कविताएं, लोक-
    गीत, देश-भक्ति, प्रेम-रचनाएं, वीर-रस रचनाएं, सभी दीर्घ काल से अभी तक चले आरहे हैं -
    मेरा रंग दे बसंती चोला, सर फ़रोशी की तमन्ना जैसी ओज भरी प्रवाहमयी (छंदयुक्त या
    बहरो-वज़न में) रचनाएं वर्तमान की फ़िल्मों में धूम मचाते रहे हैं।
    काव्य विभिन्न फूलों और उनकी विभिन्न सुगंधों से भरे हुए, सजे हुए उद्यान की भांति है जहां विभिन्न छंदयुक्त, छंद मुक्त, गीत, लोक गीत, ग़ज़ल, प्रेम-गीत, ओजपूर्ण वीर गाथाएं, मुक्तक, क़ता, रुबाई, अंग्रेज़ी के सॉनेट, ओड
    आदि आदि सभी बाग के फूलों की छटा दिखाते हुए काव्य की सार्थकता बनाए रखते हैं।
    केवल एक अंग से पूरा शरीर नहीं बनता। यदि किसी वशाल बाग में एक ही फूल के पौदे लगा दिए जाएं तो बाग कुछ ही दिनों के बाद नीरस दिखने लगेगा।
    जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि कविता और संगीत का गहरा संबंध माना गया है। वैसे तो कविता का पूरे ब्रह्मांड से संबंध है जो प्रकृति के नियमों में बंधा हुआ करोड़ों करोड़ों वर्षों से चल रहा है। खैर, बात संगीत की थी। जैसे संगीत कई प्रकार के हैं- शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत, पॉप संगीत, लोक संगीत आदि चिर काल से अलग अलग रूप में चलते आए हैं, आज भी चल रहे हैं। यदि ऐसा ना हो तो आज सितारवादक प. रविशंकर विश्व-मंच पर ख्याति नहीं कर पाते।
    अंत में यह भी कहूंगा कि सभी विधाओं का सम्मान होना चाहिए। सभी विधाएं काव्य की
    समृद्धि में सहायक हैं। केवल एक ही धारा और विचार को सर्वश्रेष्ट मान कर प्रधानता देकर पूरे विश्व को एक ही लकड़ी से हांकना 'ब्रेन वाशिंग' समान है। वैसे भी एक ही विधा, एक ही धारा और एक ही विचार को श्रेष्ट मानना अनभिज्ञता का द्योतक है।
    जहां तक कम टिप्पणियों की बात है, वह मेरे लिए गौण है। मैं कविता को अभिव्यक्ति की दृष्टि से लिखता हूं, बेचने के लिए नहीं।
    मेरे इस लिखने में कहीं कहीं धृष्टता का आभास लगे तो मैं हार्दिक रूप से क्षमा मांगता हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत सार्थक चर्चा चल पडी है। क्या है समकालीन कविता? सब तोड दो? बहुत से मार्क्सवादी लेखकों से लम्बी चर्चाओं का भागी रहा हूँ और पाता हूँ कि योजनाबद्ध तरीके से कविता का नुकसान किया गया है। बंधन का विरोध करने वाले एक खास विचारधारा के बंधन में हो कर वक्तव्य देते हैं। कारण भी है कि समूह बन गया है जिसमें खास विचारधारा के लेखक और उन्ही को पढ कर वाह वाह करने वाले लेखक और वाह वाह को पुरस्कार देने वाले लेखक और पुरस्कार वालो की समीक्षा करने वाले लेखक। इन सनके बीच हिम्मत हो तो तलाशिये कविता को।

    जो आज लिखी जा रही है वही समकालीन है। महावीर जी इस बेहतरीन समकालीन कविता के लिये आभार।

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  21. कविता ही नहीं, पूरे साहित्य पर परिवेश का दबाव काम करता है। कविता भी समय को अपने ताने-बाने में रचती है। आज जीवन में जितना तनाव और घिराव का वातावरण है, जितना द्वंद्व और संघर्ष है उतना पहले कभी नहीं रहा। कवि को उसी में रचना करना होता था जिसके लिये ही मुक्त छंद की सृष्टि हुयी है जो स्वभाविक है। साहित्य हमेशा काल-सापेक्ष होता है,यह भी हमेशा हमें स्मरण रखना चाहिये। कबीर और तुलसी महान हैं क्योंकि उन्होंने समय और समाज को दिशा दिया। पर इसका अभिप्राय यह थोड़े ही है कि आज भी दोहे और चौपाईयाँ रची जाय तो वह समकालीक होगी! रही बात कविता के कवित्व की,तो मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि कविता अपने छंद से विलग हुयी है न कि अपनी छांदस प्रकृति से। कविता बिना लय और संगति के आज भी प्राणहीन है। वैसे छंद को एकदम से नकारा नहीं गया है,आज भी लोग रच रहे हैं पर समकालीन कवितायें और अभी के वरिष्ठ समकालीन कवि भी इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि मुक्त छंद ही अब आगे कविता की दशा-दिशा तय कर रही है।उनलोगों ने छंद की घटाटोप से अपने को बाहर निकाल लिया। आप लोग मुक्तिबोध का एक आलेख ‘नई कविता का आत्मसंघ्रर्ष’ पढ़िये। उसमें यह बात मुखर होकर आयी है।

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  22. अब भ्रम और बढ गया। दुश्यंत प्रभावित करते हैं तो अच्छा है महावीर जी प्रभावित करते हैं तो कबीर के युग की कविता लिखते है। बात जचती नहीं। निदा और बद्र उनसे अधिक जन प्रिय है जो मजदूर किसान लिखते तो हैं लेकिन नामवर जी को पढवाने के लिये। सुशील जी विनम्रता के साथ आपसे असहमत होते हुए मैं कहना चाहती हूँ कि कविता कविता की दुकानदारी से मुक्ति चाहती है। वह ही कविता है जिसे मैं अपनी आत्मा की गहराई से लिखती हूँ न कि राजेन्द्र यादव की थ्योरी के अनुसार। मुझे किसी छंद में अपनी बात कहनी प्रिय है और मैं आज के समय में किख रही हूँ तो आप इसे छंद के दौर का लौटना क्यों नहीं मानते। हिन्दी की छात्रा होने के नाते मैं जिस दौर दौर और रतह की कविता को आप कविता कहते हैं उनसे बमुश्किल प्रभावित होती हूँ। कविता को कविता क्यों न रहने दिया जाये?

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  23. सोते को जगाती,जागे को ललकारती सी बहुत ओजपूर्ण रचना।
    और लय पूर्ण भी।
    मान्यवर !सौभाग्य आपको पढ़ा।

    श्रद्धा सहित
    प्रवीण पंडित

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  24. कविता मन के लिये हो अथवा जन के लिये,
    लिखी और पढ़ी जानी चाहिये।
    सुधार अपेक्षित हो तो परामर्श सर माथे।धार दी जा सकती हो , तो रहनुमा बनाने से गुरेज़ नहीं।
    वरना कोंपलों के लेखन शैशव को निरुत्साहित करने का हक़ किसी को नहीं पहुंचता।

    प्रवीण पंडित

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  25. लिख चुके मनुज की हार बहुत,
    अब तुम उस का अभियान लिखो-

    padhtey hi jaise kavita mein bah gaye hain..

    bahut hi achchee aur prerna dayak kavita hai--badhayee

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  26. महावीर जी आपकी कविता बहुत अच्छी है। यह पूरी तरह समकालीन है और अनंतकालीन भी।

    सुशील जी नें टिप्पणीकारों की बुद्धि व समझ पर जो टिप्पणी की है वह उचित नहीं है "आपकी कविता ज्यादा लोग नहीं पढॆंगे , न ही टिप्पणी देंगे। क्योंकि मुझ जै्से नक्काड़ा तो चुने-गिने ही होंगे। यह पुराने शब्दों में “माया का प्रभाव है ”और अब के शब्दों में “बाज़ारवाद का तीव्र नशा”।" मैं कैसी कविता पसंद करूंगा इसका अधिकार केवल मुझे है।

    उत्तर देंहटाएं
  27. इस बहस में पडना जरूरी है। मेरी साहित्य शिल्पी के संचालक से अनुरोध है कि इस विषय पर साहित्य के विद्वानों के विचार आमंत्रिक करें। आपके माध्यम से यह बाहर आये कि समकालीन क्या है और छंद का कविता में कितना महत्व रह गया है। आप साहित्य के लिये महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं इस लिये मेरे अनुरोध को भी पूरा करना आपकी जिम्मेदारी है।

    उत्तर देंहटाएं
  28. SUSHEEL KUMAR JEE KABHEE REETI-
    KAALEEN KAVITA KO NAKAARTE HAIN,
    KABHEE PREM RACHNA KO AUR KABHEE
    GAZAL-GEET KO.APNEE IS BAAT KEE
    DALEEL MEIN VE MUKTIBHODH KAA LEKH"NAYEE KAVITA KAA AATMSANGHARSH" PADHNE KEE SALAAH
    DETE HAIN.TULSIDAS KEE CHAUPAEE HO
    YAA SURDAS AUR MEERA KE PAD UNMEIN
    YADI CHHAND NAHIN HOTAA TO UNKEE
    STHITI VAHEE HOTEE JO AAJ KEE KAVITA KEE HAI.LOGON KO AB YAH
    NAHIN KAHNAA PADTA-KAVITA MAR GAYEE
    HAI.KABEER ,TULSEE,SOOR,MEERA AADI
    KE ASANKHYA PAD JAN MAANAS MEIN
    AAJ BHEE RACHE-BASE HAIN.SACH TO YAH HAI KI AALOCHKO KEE AESEE JAMAAT PAEDAA HUEE HAI JISNE RASBHEENEE KAVITA KO HAASHIYE MEIN
    DAAL DIYAA HAI.PUNJABEE MEIN EK
    UKTI HAI"PINGAL BAAJH KAVISHVAREE
    GEETA BAAJH GYAAN".SAMBHAV HAI KI
    PANJAABEE MAHAKAVY"HEER-RANJHA"KE
    RACHYITA WAARISH SHAH INHIN AALOCH-
    KON KE BAARE MEIN YAH KA GAYE THE-
    ILM SHAYREE JISNOO PATAA NAHIN
    USNOO ILM AROOZ PADHAAEEYE JEE

    उत्तर देंहटाएं
  29. सुशील जी ने सच कह दिया है तो ब्लॉग-लेखकों को इतनी मिर्ची क्यों लग रही है। ज़रा सुप्रतिष्ठित प्रिंट-पत्रिकाओं में छप कर दिखाईए और वहाँ जाकर बकवास कीजिये तो समझ में आवे भी, जहाँ साहित्य के मूल्य तय किये जाते हैं। ज्यादा हैरत- अंगेज तो उन टिप्पणीकारों को पढना है जो महावीर शर्मा जी की कविता के पक्ष में दी गयी सुशील जी की टिप्पणी को तोड़-मोड़कर समझ रहे हैं। और महान कवि-लेखक बनने का दंभ भर रहे हैं। मुझे मालूम नहीं क्या कि इन तीस टिप्पणीकारों में कितने ऐसे लेखक-कवि हैं जिनको साहित्य-जगत जानता है!आप किसी भी समालोचक या युवा कवि से पुछ लें कि समकालीन कवि और समकालीन कविता क्या है? उसकी भाषिक रचना और छंद -सीमा क्या है। कितने समकालीन कवि हैं साहित्यशिल्पी के पास जिनकी साहित्य-जगत में प्रतिष्ठा है? जरा अशोक पाण्डेय जी से भी शिल्पी के उन ब्लाग-कवियों के सबंध में राय लिया जाता तो मै समझता कि बात में दम है!
    साहित्य-जगत की दशा-दिशा की बात करनी है तो ब्लाग की दुनिया से बाहर निकलिये।फिर आपको अपनी औकात का पता चल जायेगा। साहित्य वह है जो साहित्य के मनीषियों ने रचा है और सुशील जी का वक्तव्य उन मनीषियों की परम्परा में है ,उससे अलग नहीं। कोई भी गैर-साहित्यिक चिंतन का भला मतलब क्या है? क्या यहां कोई राजनीति हो रही है? वैसे महावीर शर्मा जी बहुत सधे कवि हैं ,मैं और सुशील जी उनकी रचना-कर्म की सराहना करते हैं और यहां भी सुशील जी ने किया ही है पर छुटभैय्यों को देखिये.... क्या हाल बयां किया है!इसीलिये मै ब्लाग पर आता नहीं यहां डिंगे बहुत पादने वाले हैं और काम नदारद।

    उत्तर देंहटाएं
  30. अशोक जी आपकी समस्या यह है कि आप चर्चा में भाग लेने की जगह एसी भाषा में उपस्थित होते है कि यह सोचने पर बाध्य होना पढता है कि आप लेखक हैं? भाषा संयत रखिये। आप जिन ब्ळॉग लेखकों से मुखातिब हैं उनमे से अनेको प्रतिष्टित पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं और अनेको की पुस्तके प्रकाशित भी हैं। यहाँ हिन्दी को नया मंच देने की लडाई है। आप को बुरा इस लिये लग रहा है कि पुस्तक और पत्रिकाओं में लिखने वाले लेखक एक स्वप्न लोग में जीते हैं उनकी बात पर प्रतिक्रिया या तो चमचे देते हैं या गुटबाज कम्युनिटी से जुडे लोग। इंटरनेट एसा मंच है जहाँ आपकी बात पर सीधे प्रतिक्रिया आती है, वैसे ही जैसे आप दूसरो को सीधे प्रतिक्रिया देते हैं। आप पाठक पर नाराज हैं और गालिया साहित्य शिल्पी जैसे प्रयास को भी बक रहे हैं, बडे संवेदनशील हैं आप तो। यदि टिप्पणी देने वाले लेखक नही केवल पाठक भी हैं तो भी उनकी राय महत्पूर्ण है। आपकी पिछली कई टिप्पणियों पर यह मेरी राय है।

    यहाँ यह चर्चा नहीं है कि सुशील जी ने सही लिखा या गलत बल्कि बहस यह है कि समकालीन कविता क्या है?

    आप ब्ळोग पर नहीं आते यह आपका निजी निर्णय है, शायद आप प्रतिक्रियाओं से घबराते हों। सच की आदत कम ही लेखकों मे है। आज मुझे ब्लॉग जगत की ताकत पर भरोसा बढ गया। (मैं स्वयं पुस्तकों का लेखक हूँ,लेकिन यह मेरे लिये उस डींग का हिस्सा नहीं जो आप हाँक गये।)। आगे आनेवाले समय में इंटरनेट सही छननी सिद्ध होगा। आप की बात मैं अवश्य सुनना चाहूँगा लेकिन आपकी गालियाँ नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  31. ASHOK JEE,AAPNE TEES TIPPANIKARON
    KEE YOGYATAA PAR PRASHNCHINH LAGAA
    DIYA HAI YANI USE NAKAAR DIYAA HAI.
    AAPKO BLOG PAR AANAA ACHCHHA NAHIN
    LAGTAA HAI KYONKI SAB KE SAB CHHUT-
    BHAIYE HAIN,UNKO AAPNEE -APNEE
    AUQAAT KAA PATAA NAHIN HAI KYOKI
    VE BLOG SE BAHAR NAHIN NIKALTE HAIN,VE SAMKAALEEN KAVITA AUR
    KAVION SE ANBHIGYA HAIN,BLOG PAR
    DHEENGE PAADNE WAALE HEE HAIN AUR
    KAAM NADAARAD HAI.WAH BHAI,AAPKE IN
    UKTIAN PAR DAAD DETAA HOON.TIPPANI-
    KAAR YAA SAARE SAHITYA KAA JAANKAAR
    HO TO AAP JAESA.

    उत्तर देंहटाएं
  32. समय की पुकार है आपकी रचना .. आभार

    उत्तर देंहटाएं
  33. mere mitro , aaj bahut dino ke baad main yaha tippani dene aaya hoon , kyonki main tour par tha .

    mahaveer ji ne ek kaal jayi rachan likhi hai , isme koi do mat nahi hai ..

    main hamesha se ye kahta hoon ki , kavita ko sirf aaaj ke parivesh men dekhna chahiye . aaj ke yug men , aur specially sahitya jagat men , jahan kavita ka koi mol nahi hai , wahan par aisi ojhasvi rachana ko likhna apne aap men ek bahut hi saahas poorn prayaas hai ..

    susheel kumar ji , tatha ashok ji , aur specially ashok pandeya ji , hamne ye kabhi bhi nahi bhoolna chahiye ki kavita ka uddeshya kya hai ... kya ye kavita hame jaagne ke liye nahi kahti .. kya koi aur kavita hamen us samy maatr ke liye hoti hai , taki paathko ko khushi ho , aur wo us waqt ke liye kavita se jud jaate hai ..

    aaj bhaarat ke liye ye jaagrut karti hui kavita ki jarurat hai ..

    hamne anawashyak bahas men na padhte hue , kavita aur kavi ki bhhavnao ka samman karna chahiye ..

    aur rahi baat sahitya ki , jo chalta hai ,bus wo chal jaata hai ..

    in fact sahitya shilpi ek aisa plateform hai , jis par mujhe garv hai

    vijay

    उत्तर देंहटाएं
  34. कविता पर पहली टिप्‍पणी बवाल की क्‍या आई कि
    बवाल ही मच गया, ज्‍यादा उबाल आ गया।

    सबने अच्‍छा बतलाया और
    बतलाया अच्‍छा सुशील ने भी
    शीलपूर्वक।

    उन्‍होंने तो सच्‍चाई ब्‍यां करी
    असलियत से रूबरू क्‍या कराया
    कि मानो सांप सूंघ गया।

    अब सांप सूंघेगा तो
    असर तो होगा ही
    कोई कितना भी हो महावीर
    पर जहर के हरने से बड़ा
    नहीं कोई धीर।

    कोई सच नहीं हर सका
    जहर क्‍या हरता
    आमने सामने होते
    तो सब लड़ मरते।

    साहित्‍य शिल्‍पी को
    बना दिया है टिप्‍पणी शिल्‍पी।

    टिप्‍पणी देने में कौन कितना
    शिल्‍पकार है,
    इसकी भी दरकार है।

    सुशील ने शीलपूर्वक
    किया खुलासा
    फिर भी घना कोहरा
    छंट न सका
    हरा न था फिर भी
    घट न सका
    लेकिन घट गया।

    माया का प्रभाव
    इंसान पर समूचा है
    बाजार इंसान का
    पुराना तरीका है।

    राजीव जो चाहते हैं
    चाहना अलग होती है
    जो घट रहा है
    वो सच होता है।

    सच को चाहने से
    अलग थलग करो
    तो लगेगा कि
    आप सुशील जी से
    इत्‍तेफाक रखते हैं।

    अगर यह होता फिल्‍मी गाना
    तो हो सकता है चाहते सब
    गुनगुनाना, सर्दी है न इसलिए।


    असलियत यह भी है कि
    फिल्‍मी गानों से भी गेयता
    हो रही है गायब
    संगीत के जोर पर
    बज रहा है बेछंद नायाब।

    अतुल्‍य वीर रस की कविता
    होने का यह मतलब तो नहीं
    कि सब अपनी वीरता यहीं
    पर लगें आजमानें।

    महावीर जी संगीत युक्‍त कविता
    जरूरी नहीं कि छंदयुक्‍त ही होती है
    छंदमुक्ति में संगीतयुक्ति सूक्ति होती है।

    जिस काल की कर रहे हैं आप चर्चा
    वो भी अब कहां कालजयी रहा है।
    जब आप बगीची में सब तरह के फल चाहते हैं
    तो कविता भी सभी तरह की ही चाहेंगे।

    आपकी इस बात में पूरा दम है
    समकालीन कविता नहीं बेदम है
    इसमें जनवादी होने की सरगम है
    सरगम जो सर तो रखती है
    पर गम हटाती है
    आनंद लाती है, सच्‍चाई बतलाती है।

    कविता अपने छंद से विलग हुयी है न कि अपनी छांदस प्रकृति से। कविता बिना लय और संगति के आज भी प्राणहीन है।

    सुशील कुमार के इस लिखन से स्‍पष्‍ट है कि
    छांदस प्रकृति में ही कविता के प्राण बसते हैं।
    तो फिर अशोक जी आप न करें शोक,
    सब रहे हैं सच को विलोक
    यही है कविता का समकालीन लोक।

    अनिल कुमार देते हैं सीख
    रखने की भाषा संयत
    पर वे खुद भी रख पाते हैं
    लगाम अपने शब्‍दों पर
    लिखकर दोबारा पढ़ें तो
    ऐसी गलती न करें।

    खैर ....
    मेरा टिप्‍पणी देना कहीं न हो जाए गलता
    इसलिए मैं तो इतना ही बता कर चलता
    कि नामवर जी को बुलायें या उनकी राय ले आयें
    तो मिट जाए सारा बवाल
    खत्‍म हो उबाल
    पर इस पर न उबल पड़ना
    कि नामवर जी को ही क्‍यों बुलायें ?

    उत्तर देंहटाएं
  35. अनिल कुमार जी, आपकी अभी तक कोई कविता कहीं पढ़ी नहीं हिंदी की प्रतिष्ठित प्रिंट पत्रिका में ,कविता इसलिये क्योंकि कविता और उसकी समकालीनता ही बहस के केन्द्र में है तो बहस करने से पहले यह जान लूं कि आप किन-किन साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे हैं,ताकि मैं भी जरा उन्हें उलट-पुलटकर देख लूं या फिर आपके काव्य संग्रह का ही नाम बतायें। अब तो तीव्र इच्छा हो गयी है आपकी रचना से मुखतिब होने और फिर बात करने की।

    उत्तर देंहटाएं
  36. साहित्य शिल्पी के पाठकों का आभार कि आपने अपने महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किये।

    यह चर्चा-परिचर्चा कई मामलों में सकारात्मक है। साहित्य शिल्पी नें यह निर्णय लिया है कि समकालीन कविता और छंद की समकालीनता पर हिन्दी साहित्य जगत के स्थापित विद्वानों के विचार मंच पर प्रस्तुत किये जायेंगे। इस संदर्भ में साहित्य शिल्पी समूह सभी वरिष्ठ रचनाकारों से संपर्क में है।

    मित्रों, अंतर्जाल जगत पर बहस और उसकी सार्थकता से इनकार नहीं किया जा सकता। बह्स सकारात्मक और मुद्दों पर आधारित हो तो उसकी शोभा है।

    साहित्य शिल्पी मंच व्यक्तिगत तथा अशोभनीय भाषा में की गयी टिप्पणियों की अनुशंसा नहीं करता। हम किसी तरह का मॉडरेशन नहीं लगाना चाहते क्योंकि यह उस अभिव्यक्ति को बाधित कर सकता है जो स्वत:स्फूर्त है। लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियों के लिये इस मंच का इस्तेमाल करने की किसी को अनुमति नहीं दी जा सकती।

    यह गंभीर विचारों के लिये मंच है कृपया परिहास और विनोद के लिये इसका प्रयोग न करें। कष्ट पूर्वक दो टिप्पणिया हमें हटानी पडी हैं जिन्होने सीमा पार कर दी थी।

    साहित्य शिल्पी मंच अपने दोनों वरिष्ठ लेखकों आदरणीय महावीर जी एवं आदरणीय सुशील कुमार जी से अनुरोध करता है कि वे कृपया परिचर्चा की दिशा से आहत न हों। अंतर्जाल पर आपके विचारों की आवश्यकता व मान्यता है। मंच आपसे क्षमाप्रार्थी है।

    माननीय पाठक, प्रतीक्षा करें कविता पर मानक विचारों का।

    उत्तर देंहटाएं
  37. अब इन तमाम बहसों में इस खूबसूरत रचना की बात तो सब भूल ही गये.
    महावीर जी को दंडवत प्रणाम इस छंदमुक्त होती कविता की दुनिया में छंद का परचम लहराने के लिये.
    मैं तो बहुत छोटा हूं अभी कुछ कहने के लिये मगर इतना तो जरूर कहना चाहूंगा कि जिन बड़े लोगों का नाम लिया जा रहा छंद-मुक्त कविता की वाहवाही में,उन्होंने भी पहले छंद पे मास्टरी हासिल की और तब जाकर उतरे मुक्त-छंद की तरफ.यहां तो लोगों को छंद का क-ख-ग मालूम नहीं होता और कुछ गद्य जैसा कुछ लिख-लिखा कर छप जाते हैं कथित रूप से बड़ी पत्रिकाओं में
    ...हमें,हिंदी साहित्य को तो शुक्रगुजार होना चाहिये श्रद्धेय महावीर शर्मा जी और प्राण शर्मा जी जैसे विशारदों का इनकी वजह से कविता,’कविता’ है.

    उत्तर देंहटाएं
  38. मुझे ऐसा लग रहा है कि एक छोटी सी बात मेरी कविता को बाहर निकाल कर एक नई बहस में बदल गई है। मैं आप सभी को याद दिला दूं कि सुशील जी ने अपनी टिप्पणी में बड़े संयत शब्दों में कविता की दो पंक्तियों का उल्लेख किया है, सराहनीय है। मेरा उनकी एक छोटी सी बात पर मत-भेद था, मत-भेद तो मैं अशिष्टता समझता हूं तो यह कहूंगा कि सभ्यरूप से उनसे पूछना चाहता था जिससे मेरी शंका दूर हो जाती ,लेकिन उससे पहले ही अखाड़ा तैयार हो गया जो मुझे अच्छा नहीं लगा। लोगों पर आपस में ही छींटाकशी होन लगी,कीचड़ उछलने लगी। आप सब भद्र पुरुष हैं, सभ्य हैं; भई टिप्पणी का मैदान इस लिए
    नहीं है कि कौन बड़ा है कौन छोटा है, क्षुद्र है, किस ने कितनी किताबें लिखी हैं, मेरी कविता ऐसी टिप्पणियों से कोई संबंध ही नहीं है। भई, मेरी कविता के नाम पर अपनी आपस की भड़ास मत निकालिए। मेरी करबद्ध विनती है।
    लीजिए, केवल बात यह है कि सुशील जी ने बड़े आदर सहित यह मश्वरा दिया थाः
    "अगर यह कविता मुक्त छंद में लिखी जाए तो और भी निखार आयेगा।" उन्होंने अपना विचार प्रकट किया था। मैं अपनी शंका दूर करना चाहता था वह यह थीः
    "मेरा मत है कि कवि रचयिता है, एक स्वतंत्र अस्तित्व रखता है और इसी कारण उस की स्वतंत्रता छीनना उसकी आत्मा का हनन है। वह स्वतंत्र है कि अपनी मन-पसंद शैली में लिख सके और यह भी है कि उस पर किसी 'वाद' और 'सीमित विषय-वस्तु'आदि के सीमित कटघरे में डालने को बाध्य करना या उसे अपने विचारों का आवरण उसकी मौलिक प्रतिभा को ही बदलने की कोशिश करना और एक 'विचारधारा-वशेष' में डालना उचित नहीं है। उसे यह आज़ादी तो होनी ही चाहिए कि वह यदि छंदमुक्त कविता लिखना चाहता है या छंदयुक्त चाहता है या गद्य-कविता चाहता है, लिख सके। उसका अपना भी अस्तित्व है। हाँ, इतना भी सांस लेने दें कि वह अपना विषय-वस्तु चुन सके - जनवाद, भक्ति, विज्ञान, प्रेम, मैडिकल, प्रकृति, पशु-पक्षी आदि।
    कवि की कल्पना और कविता के विस्तार को एक छोटे से दायरे में सीमित नहीं कीजिए। कविता को अपने निजी विचारों की नकेल डाल कर उसे कमर्शियल बना कर ब्रैंडिड मत करें।"
    यह मेरे विचार हैं जो जरूरी नहीं कि ठीक ही हों।
    यह भी कहना चाहता हूं कि मैं छंदमुक्त कविता के विरुद्ध नहीं हूं। मेरे ब्लॉग पर विजय कुमार सपत्ती जी की छंद मुक्त कविता ही इस बात की पुष्टि करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  39. Aadarneey MAhavir Sharama SIr,
    Aapki kalam se chetna ko jagata hua lekh pad kar laga ki jaise sote hue logon ko jhinjhoda bahut zaruri hai
    log jaise andhi dhor main chal rahe hain unhe sahi galat ka nahi pata

    उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल,
    कदली जांघें चुभते कटाक्ष, अधरों की आभा लाल लाल।
    अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
    माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।

    बस बहुत पायलें झनक चुकीं, साथी भैरव आह्‍वान लिखो।।
    लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।


    aapki kavita bahut kuch sochne ko mazboor karti hai

    ki kya hai aaj ke naye yug ke lekhak ka kartavy

    उत्तर देंहटाएं
  40. पूर्णिमा वर्मन17 जनवरी 2009 को 10:18 am

    -छंद कभी भी आउट ऑफ डेट नहीं हुए

    -जो कविता अपने समय के साथ चले वह समकालीन कविता लेकिन इसके साथ इतने विवाद और खेमे जुड़े हैं कि बहस सार्थक नहीं रहती है

    -आज आप बड़े बड़े कवियों को देखिए
    गुलज़ार को देखिए
    या कुँवर नारायण को
    वो जानते हैं कि कब कैसे इफ़ेक्ट देना है
    फिर छंद चाहें प्राचीन हो या नव निर्मित

    -गीत है इसका मतलब नहीं समकालीन नहीं| आप नईम को देखें, यश मालवीय---ये सब नितांत आधुनिक लोग है और शायद 90 प्रतिशत गीत ही लिखते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  41. ODIEI ESSE BLOG! N DA PRA ENTENDER NADA COM ESSES BORRÕESINHOS JAPONESES SEUS BURROS!

    उत्तर देंहटाएं
  42. अरे भाई,साहित्य मे बहुत सारे अशोक है इसीलिये मै अशोक कुमार पाण्डेय लिखता हूँ …जिस टिप्पणी से मुझे जोडा गया वो भाई अशोक सिह है दुमका के।

    चलिये मै अपनी राय भी दे ही दूँ …देखिये छन्द पुराना है या नया/समकालीन या प्राचीन यह इतना सरलीकृत नही किया जा सकता। छन्दमुक्त रचना भी बकवास और जनविरोधी हो सकती है और छन्द्युक्त भी। सवाल यह है कि आपका कन्टेन्ट क्या है और उसके लिये फ़ार्म क्या चुना है आपनेऽब रघुवीर सहाय भी एक छन्द प्रयोग करते थे,त्रिलोचन भि,शम्शेर ने भी किया है।मुक्तिबोध ने भी दोनो तरह लिखा है तो केवल छन्द के आधार पर समकालीनता तय करना भी एक तरह का कठ्मुल्लापन है।
    रहा सवाल लोकप्रियता का तो भाई जाईये इन नये पब्लिक स्कूलो मे वहा तो अब सूर-कबीर भी गायब है। दादू वगैरह से ज़्यादा माया अलग और एक्स वाई ज़ेड के फ़िल्मी गाने है। तो क्य किया जाये? देखिये प्रेम्चन्द हो या कबीर या निराला अपने समय मे कोई लोकप्रिय नही था…तुलसी भी नही। एक सुकवि अपने समय से आगे होता है और भविष्य के इतिहासबोध पर भरोषा करता है। तुरन्त तो चनाचोर गरम ही बिकता है। आप ही बताइये कि फ़िर आज कॉन सा छान्दस रचनाकार है जिसकी क़िताब 10-15 हज़ार छोडिये 500 भी बिकती हो लाइब्रेरी के बाहर्। भाई ना पढने की समस्या के कारण अपने बाहर सामाजिक आर्थिक व्यवस्था मे भी तलाशिये तभी बात आगे बढेगी।
    हाँ महावीर जी अच्छा बुरा एक तरफ़ पर जो आपने लिखा है वह छन्द में ही लिखा जा सकता था।

    उत्तर देंहटाएं
  43. हाँ किसी ने यश भाई,नईम जी और सुधान्शु जी का ज़िक्र किया था मै महेश अनघ और तमाम और नवगीतकारो का नाम भी जोड दूँ …ये अवश्य ही बेहद आधुनिक और समकालीन कवि हैं …पर गीत इन्हे भी तोडना पडा तभी नवगीत बना। अब ज़रा इनके कन्टेन्ट के बरक्स नेट और शिल्पी पर आ रही कवितायें (?) देखें ,फ़र्क मालूम हो जायेगा। हँसी तब और आती है की व्यक्तिगत तथा बकवास प्रेम कविताये(?)लिखने वाले लोग महावीर जी कि इस कविता पर वाह वाह तो कर रहे हैं लेकिन कन्टेन्ट पर चुप हैं। छन्द निबाहना भी आसान नही। मैने भी जन्गीत लिखे हैं जो आम मज़दूर और कार्यकर्ता मुझे जाने बिना गाते हैं पर उनकि सीमाये पहचानता हूँ इसीलिये लेख भी लिखता हूँ और कविता भी।
    जो बहस मे उतरे कम से कम नक़ाब उतारकर कि उस तक नेत पर तो पहुँचा जा सके।

    उत्तर देंहटाएं
  44. मुझे तो महावीर शर्मा जी इस कविता का कन्टेन्ट यानि वस्तु कहीं से कमजोर नहीं दीखता। हाँ, कहने का ढंग पुराना हो सकता है। जहाँ तक छंद के युक्त या मुक्त होने का कविता की समकालीनता से जुड़ा सवाल है,यह कोई लक्ष्मण -रेखा भी नहीं खिंची गयी है कि छंद वाली कविता समकालीक नहीं होगी। पर वर्तमान ट्रेन्ड क्या है नई कविता का? छंदोबद्ध या छंद-मुक्त? क्या अभी भी उसी मात्रा में छंद वाली कवितायें लिखी जा रही है जितना पहले लिखी जाती थी? फिर यह भी सही नही कि यह कविता छंद को तोड़ कर नहीं लिखी जाती। यह तो कवि की व्यक्तिगत मनोदशा और उसकी रुचि पर निर्भर है।

    उत्तर देंहटाएं

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