देवता !
यह तुम्हारा
अद्भुत दीप्तिमान मुखमंडल
लकदक वेशभूषा
अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित
तुम्हारे इस जादुई रूप का आकर्षण
भयानक है

जो निठल्लों को लुभाता है
डराता है कायरों को
और उससे भी भयानक है
तुम्हारी यह झूठी और मादक महिमा
जो मतवाला बना देती है

जिसके बूते तुम बिराजते हो
बडे ही ठाठ-बाट के साथ
जगह-जगह नाना रूपों में
लोग करते हैं मनमानी
तुम्हारा ही नाम ले-लेकर
छीन ले रहे हो हमारी धरती
हमारी शांति, हमारी एकता
तुम्हें, शर्म नही आती ?
*** 

11 comments:

  1. देवताओं को कटघरे में खडा करती बहुत सी कवितायें हिं। इस कविता में भी यही कोशिश है और जिन मानवीय स्ंदर्भों को उकेरने के लिये आस्था पर प्रश्न खडा किया गया है वह कविता का सकारात्मक पहलु है। बधाई डॉ. नंदन।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पंकज सक्सेना29 जनवरी 2009 को 1:13 pm

    निस्संदेह अच्छी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. धर्म की आड़ में होने वाले गलत कृत्यों पर सवाल उठाती कविता अच्छी बन पड़ी है....बधाई स्वीकारें

    उत्तर देंहटाएं
  4. वसीम बरेलवी साहब का एक शे'र है ..
    " सलीका ही नही शायद उसे महसूस करने का , जो कहता है खुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है "
    सारा खेल उस ईश्वर के नज़र आने का है , उसे देख लेने कि चाह का है .. इसी वजह से इश्वर हमारे मन से निकल कर मंदिरों मस्जिदों में चला गया ... इश्वर के इस "tangible" स्वरुप की खोज ने उन लोगो को मौका दे दिया जिनका पेशा दीवारें उठा देना है , किसी न किसी वजह से.. इन्हीं सब बातो की ओर इंगित करती है ये कविता ... और सवाल करती है इश्वर से और हमारे अंतरतम से ..कि इश्वर के "स्वरुप" का इस्तेमाल हमें अखरता क्यूँ नही है ..
    बेबाक कविता नंदन जी.. शुक्रिया ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. तुम्हारा ही नाम ले-लेकर
    छीन ले रहे हो हमारी धरती
    हमारी शांति, हमारी एकता
    तुम्हें, शर्म नही आती ?

    कडुवा प्रश्न है। कविता अपने उद्देश्य में सफल है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. जिसके बूते तुम बिराजते हो
    बडे ही ठाठ-बाट के साथ
    जगह-जगह नाना रूपों में
    लोग करते हैं मनमानी
    तुम्हारा ही नाम ले-लेकर
    छीन ले रहे हो हमारी धरती
    हमारी शांति, हमारी एकता
    तुम्हें, शर्म नही आती ?

    गंभीर अभिव्यक्ति है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. कविता को कथ्य समझने के लिये कई बार पढा...
    शब्द शिल्प की दर्ष्टि से कविता जितनी अच्छी है, कथ्य की दर्ष्टि में उतनी ही गंभीर... धर्म की बात तो निरंतर हुई, व्यापार भी हुआ पर जिन नैतिक पैमानों को प्रतिस्थापित करने के लिये समाज मे भगवान का अस्तित्व पैदा किया गया वह मार्ग भ्रम पैदा करने वाला हो कर रह गया तब कवि को यह सवाल उठाना पडा खुद भगवान से कि तुम्हें शर्म नहीं आती...
    बहुत अच्छी रचना जो विचारों को उत्तेजित करती है. चिंतन के लिये मजबूर करती है... उत्तम रचना के लिये बधाई....

    उत्तर देंहटाएं
  8. नन्दन जी,
    मैने एक महीने तक शिल्पी पर कमेन्ट न देने का तय किया था पर आपके चलते आज वादा तोड़ना पड़ गया।
    अच्छी ऑर विचारपरक कविता के लिये बधाई। अब आप ही बताये कि यह कविता क्या किसी ऑर छंद मे लिखी जा सकती है?
    कविता मे विचार के विस्तार की जो सँभावना मुक्त छंद में है वह कहीं नहीं । अब यह कविता जनता की कविता है लेकिन इसे जन जन गायेगा तो नही। हाँ यह कविता बॉद्धिक विमर्श मे जनता का पक्ष लेकर खडी होती है। विचार कविता की यही भूमिका होती है। इसे लोकप्रियता के चालू पैमानो पर कसा नहीं जा सकता। जनता के लिये लिखे जायेंगे जनगीत …जिनके शब्द आसान होन्गे,गेयता होगी ऑर शायद लोकप्रियता भी होगी। लेकिन वह भी तभी जब उसमे जनता का दुखदर्द बयान होगा। गाया तो उन्हे तभी जायेगा जब आन्दोलन होगा। आन्दोलन होगा तो वह एक वैकल्पिक व्यवस्था के लिये होगा ऑर उस व्यवस्था का नक्शा बनेगा तो किसी विचार के आधार पर ही- चाहे वह कोई भी हो।
    यही बात है जो मै बार-बार करता रहा हूँ ।
    एक बार फिर अच्छी कविता के लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. संदर्भ चैलेंजिंग है। साहस के कवि कर्म किया है। बधाई नंदन जी।

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget