ईंट  बिलख उठी।पथेरा उम्र भर ईंटें ही पाथता रहा है। सांचे से पाथते हुए या अलाव मे पकाते हुए कभी सोचा तक नहीं था कि एक दिन यही ईंट उसके सामने यूं रो पड़ेगी। सवेरे सवेरे ,शिवाले की परिक्रमा करके,सिंह् पौर पर माथा टिका कर, फ़र्लांग भर चलकर, गंदा नाला पार कर,घर आने के लिये जैसे ही दायीं ओर घूमा-नाले की दीवार मे लगी ईंट बिलख पड़ी।
पथेरा धक्क!हां-गंदे नाले की दीवार की चिनाई उसी के अलाव की पकी ईंटों से हुई है,जानता है वो।
पर इसमे रोने की क्या बात है?

रहा ना गया पथेरे से,बोला,
"अरी बावली ! रो क्यों रही है?"
ईंट के बैन फूट पड़े- "जनक पथेरे!एक ओर मैं- और दूसरी ओर-- शिवाले के देवासन मे लगी वो दूसरी  ईंट -दोनों एक मिट्टी-पानी से बनी, एक सांचे मे ढ़ली, एक तेरे ही हाथों से पाथी गयी। यहां तक कि अलाव की तपन भी एक। किंतु प्रारब्ध ?,हाय! कितना अलग।"
पथेरा ईंट के शब्द-पथराव के बीच एक बारगी निःशब्द हो गया।

ईंट रुदन-धारा मे बहे जा रही थी- "सच कह रही हूं मैं -  निगोड़े भाग्य  अलग अलग । वो  तो लगी  शिवाले के गर्भ गृह मे देवासन पर , देवता की तरह ही पुजी। और मैं? मैं विधना की मारी -गंदे नाले की दीवार मे-चौबीस घंटे नगर समाज के गंद को ढ़ोती। जनक पथेरे ! करम फूट गये ना मेरे।" 
चौतरफ़ा शब्द-आवेग रुका तो  शून्यता ने पल भर को सन्नाटा बिखेर दिया।

चुप्पी ईंट को दिलासा न दे पाई।
सुता-सम ईंट के आत्म रुदन ने पथेरे का  कर्तव्य-बोध जगा दिया। भाव-विह्वलता मे संतुलन न चला जाय,सोचते सोचते पथेरे ने थपथपाहट की तरह कहा- "बावली! अपने को पहचान। तेरे करम नहीं फूटे, वरन तेरे कर्म बहुत ऊंचे हैं। नगर को. समाज को, पंथ-वीथियों को  साफ सुथरा रखने के लिये, तू लेती है गंदगी को अपनी बाहों मे। बहा कर लेजाती है उसके गंतव्य तक, ताकि वातावरण और परिवेश संक्रमित न हो, दूषित न हो।..। अरे पगली ! तेरा काम तो शिवाले के देवता के कार्यों की भांति  है , जिसने  समाज  की भलाई के लिये गरल पान करलिया था। तू भी गंदगी का गरल ही तो पीती है, नगर को स्वच्छ और स्वस्थ रखने के लिये। तू सबल न होगी  तो सभ्य समाज को मैला होते पल न लगेगा। तू महान कारज मे सहयोगिनी है। बोल ,  गलत कहा क्या मैने?"

जनक के बोलों का अपेक्षित प्रभाव हुआ और ईंट अपने ही परिचय से गर्वान्वित हो उठी। 
अरे वाह! कार्य मात्र कार्य नहीं ,दायित्व भी है , फिर लाज कैसी?

नव-परिचय से जागरूक व गर्वीली हुई गंदे नाले की ईंट सहज हास्य से किलक उठी।
*****

22 comments:

  1. Work and Responsibilities ane nicely explained in the short story. Appreciable.

    Alok Kataria

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  2. प्रवीण जी की कहानी पढते हुए कविता पढने जैसा अहसास होता है। गंभीर संदेश देती है आपकी लघुकथा।

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  3. कार्य ही इंसान को महान बनाते हैं और यह भी कि कई बात महानता की बूझ खुद उन्हे नहीं होती जिनका योगदान होता है। बहुत खूब।

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  4. निर्जीवों से जीवन का मर्म कहलवा दिया आपनें।

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  5. नव परिचय अच्छा शीर्षक है जो पूरी कहानी का मर्म बता रहा है। बहुत अच्छी हकानी है।

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  6. पंकज सक्सेना7 जनवरी 2009 को 3:11 pm

    प्रशंसा के लिये शब्द नहीं मिले।

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  7. वाह पंडित जी, ज्ञान की गंगा बहा दी आपने तो। प्रफुल्लित कर दिया।

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  8. दर्शन उडेल दिया गया है लघुकथा में। बहुत अच्छी प्रस्तुति है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपके भाव और भाषा ने कथा को और भी रोचक बना दिया। एक सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  10. LAGHU KATHA MEIN AAPNE BAHUT KUCHH
    KAH DIYA HAI PRAVEEN JEE.

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह ! अतिसुन्दर,सार्थक, प्रेरक इस कथा हेतु साधुवाद ! मन मुग्ध कर लिया इसने.
    बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह ! अतिसुन्दर,सार्थक, प्रेरक इस कथा हेतु साधुवाद ! मन मुग्ध कर लिया इसने.
    बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत ही अच्छी लघु कथा...जिसमें जीवन का सार छिपा है..वाह...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  14. प्रवीण जी
    विभोर हूँ...कथ्य और शिल्प पर ....... :)

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  15. बहुत ही बढिया....जी खुश कर दिया जी आपने


    आज पहली बार आपको पढने का मौका मिला।अब लगता है कि आपको बार-बार पढना पढेगा।

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  16. बहुत बढिया..
    शब्दों की क्या महत्वता है और मानवीय भावनाओं को किस तरह शब्दों के माध्यम से सांचे में ढाला जा सकता है... सशक्त उदाहरण..
    दूसरा मनुष्य का दष्टिकोण ही अधिक मह्त्वपूर्ण है..कार्य कभी छोटा बडा नहीं होता...

    एक सीख देती रचना के लिये आभार

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  17. सच को ईंटों के माध्यम से कहा जाना अच्छा लगा। शब्द बड़े हीं करीने से चुने गए हैं। और अच्छी बात यह है कि आधे तक पहुँचकर कहानी का सस्पेन्श बरकरार रहता है।

    एक सफल लघु-कथा।
    बधाई स्वीकारें।

    -विश्व दीपक

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  18. जिग्यासु लेखनी का उत्साह बढ़ाने के लिये आप सभी का आभार ।
    कुछ अच्छा कह पाया तो श्रेय,निःसंदेह ,आपको ।
    मैं मात्र माध्यम हूं।

    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  19. Praveen ji ,

    aapki is lagu katha men bahut bada saar chipa hua hai...itne sandesho se bhari hui...

    main umeed karta hoon ki bhavishya mein ,aur bhi kahaniyan padhne ko milengi ..

    bahut bahut badhai ..

    aapka
    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

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