न अपनों की दुतकार से
न किसी खंजर के वार से
मैं सबसे ज्यादा
तुम्हारे शब्दों से आहत हूँ
जिसे देते हुए तुमने
मेरी पीठ थपथपायी थी ।

ये शब्द बताशे की तरह मीठे थे
पर एकदम जहरीले थे
हलक में उतरते ही इसने
मेरे सब संवेदी शब्द मार गिराये
और मेरी भाषा नाकाम हो गयी।
बुद्धि भी मेरी मात खा गयी।

इन शब्दों से अब तक
न तो कोई कविता बन सकी,
न कोई गीत
न लोरी, न प्रार्थनाएं ही
चैन और चमन को लूटा है सिर्फ़ इन शब्दों ने ।

मैं अब समझ सकता हूँ
तुम्हारे शब्दों की बानगी
इनके अंखुवे वहीं फूटते हैं
जिस ज़मीन से अपराध के कनखे निकलते हैं
क्योंकि तुम्हारी भाषा की नंगी पीठ
जिन हाथों ने सहलाये हैं
उन्हीं हाथों ने उडा़ये हैं शब्दों के जिन्न
सुरखाब के पर लगाकर
सब ओर दिगंतों तक।

इसलिए हर बुर्ज़, हर इलाके में
गुप्त हो रहे हैं तुम्हारे शब्द अब।

क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।
फ़िर असंख्य मौन दग्ध होठों को जगाकर
तुम्हारे शब्दों के खिलाफ़
एक जंग का एलान कर दूं !
***** 

22 comments:

  1. इस कविता के लिए एक ही शब्द काफ़ी है- वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
    तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
    और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।
    फ़िर असंख्य मौन दग्ध होठों को जगाकर
    तुम्हारे शब्दों के खिलाफ़
    एक जंग का एलान कर दूं !

    सशक्त और बेहतरीन।

    उत्तर देंहटाएं
  3. निस्संदेह, साहित्य शिल्पी पर पढी श्रेष्ठ कविताओं में से एक है यह कविता -

    क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
    तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
    और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर प्रयास- बधाई- शम्भु चौधरी

    उत्तर देंहटाएं
  5. जब कवि यह जान गया है कि

    मैं अब समझ सकता हूँ
    तुम्हारे शब्दों की बानगी
    इनके अंखुवे वहीं फूटते हैं
    जिस ज़मीन से अपराध के कनखे निकलते हैं

    तो उसे जंग के एलान के लिये अब किसके शब्दों की प्रतीक्षा रह गयी है? वह अब भी सोच में प्रतीत होता है।

    क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
    तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
    और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।
    फ़िर असंख्य मौन दग्ध होठों को जगाकर
    तुम्हारे शब्दों के खिलाफ़
    एक जंग का एलान कर दूं !

    अभी कवि मन नहीं बना पाया। सोच में है को उस पार जाउं या न जाउं?

    उत्तर देंहटाएं
  6. पंकज सक्सेना1 फ़रवरी 2009 को 10:10 am

    निधि जी सोच का पनपना ही एक मायने में आन्दोलन का आरंभ है और इस मायने में सुशील जी की कविता सफल होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुशील जी
    अब शब्‍दों की गठरी बनाकर
    चौखट के नीचे जमींदोज करने
    की नौबत अब तो नहीं आने वाली
    आखिर ब्‍लॉगिंग की विधा आ गई है
    मतवाली,
    चाहो तो शब्‍दों की उस गठरी को
    पवन चंदन की चौखट (ब्‍लॉग)
    पर लगा सकते हो।

    और जंग के लिए एलान के लिए भी
    हाजिर हैं ब्‍लॉग जैसे विस्‍फोट
    जिसे चाहिए शब्‍दों की गठरी
    न हो गर उसके पास तो
    वो अजित वडनेरकर (शब्‍दों के सफर)
    पर जाकर सैर कर आए
    जो पसंद आए छांट लाए
    अपने वहां पर टिप्‍पणियों में बांट आए।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आज तो साहित्य शिल्पी का नजारा ही बदला हुआ है। हैडर और साईड का रंग संयोजन अच्छा लग रहा है। बीच वाले हिस्से को भी मिलता हुआ बैकग्राउंड दें। साईड बार में दी गयी सामग्री के फॉंट आदि के आकार को एक जैसा रखने का यत्न करें।
    ------
    सुशील जी की कविता बहुत अच्छी है। असंतोष ही आन्दोलन की पहली सीढी है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. गुरूवर, कविता के मामले में नासमझ,अज्ञानी और अनाड़ी हूँ...इसलिए आपकी गहरी बातें सही निशाने याने के मेरे दिमाग को बेंधते हुए उसमें सेंध नहीं लगा पाई....कृपा अपने ज्ञान से कृतार्थ कीजिए
    rajivtaneja2004@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  10. मान्यवर, यहाँ मैं अपनी कविता या उस पर टिप्पणी के विषय पर कुछ कहने नहीं आया हूँ। आज ‘साहित्यशिल्पी’ का रंग-रूप बदला-बदला और ज्यादा आकर्षक है। क्यों न हो,वसंतागमन पर प्रकृति में भी आमूलचुल परिवर्तन गोचर होता है, धरती से गगन तक अपना पुराना चोला उतारकर नव्यता को धारण करते हैं!सभी साहित्यजन- शिल्पियों को वसंतागमन पर शुभकामनायें।-सुशील कुमार ( www.sushilkumar.net )

    उत्तर देंहटाएं
  11. क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
    तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
    और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।
    फ़िर असंख्य मौन दग्ध होठों को जगाकर
    तुम्हारे शब्दों के खिलाफ़
    एक जंग का एलान कर दूं !

    kya kahun bahut shashkat bhaavnaaye bahut hi vidorhi bhaav lekin kahi na kahi sach kahta hua
    shabad waqayi shool se zayada dard dete hain

    bahut bahut achhi kavita

    उत्तर देंहटाएं
  12. न अपनों की दुतकार से
    न किसी खंजर के वार से
    मैं सबसे ज्यादा
    तुम्हारे शब्दों से आहत हूँ
    जिसे देते हुए तुमने
    मेरी पीठ थपथपायी थी
    वाह वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  13. कविता परिणति नहीं होती अन्यथा वह नारा हो जायेगी अत: पूरी विनम्रता से मैं निधि जी की बात से असहमत हूँ। कविता पूर्ण और पूरी ताकत से अपनी बात कहने में सफल है।

    क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
    तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
    और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।
    फ़िर असंख्य मौन दग्ध होठों को जगाकर
    तुम्हारे शब्दों के खिलाफ़
    एक जंग का एलान कर दूं !

    उत्तर देंहटाएं
  14. प्रभावी कविता है सुशील जी। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  15. एक अच्छी रचना। बहुत गहरी बातें कह दी आपने। दिल से बस वाह वाह वाह ही निकल रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत अच्छी कविता... उम्दा शब्दों में गहरी अभिव्यक्ति... सुशील जी को बधाई सुंदर रचना के लिये...

    उत्तर देंहटाएं
  17. क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
    तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
    और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।

    वाह !


    सुशील जी!
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  18. सुन्दर भाव भरी रचना..
    शब्द निश्चय ही गहरे घाव करते हैं...जो शायद ही कभी भर पायें...
    घहन रचना के लिये बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  19. susheel ji ,

    this is ultimate poem. one of the best poems i have read....

    क्यों न इन शब्दों की एक गठरी बनाकर
    तुम्हारे चौखट के नीचे जमींदोज कर दूं?
    और लौट आऊं नि:शब्द अपने घर।
    फ़िर असंख्य मौन दग्ध होठों को जगाकर
    तुम्हारे शब्दों के खिलाफ़
    एक जंग का एलान कर दूं !

    in pankhtiyon ne to bus nishabd kar diya hai ..

    ultimate..
    dil se badhai ..

    उत्तर देंहटाएं
  20. धारदार तो है ही आपकी कविता, देशज शब्दों के सुंदर प्रयोग ने उसे ज़्यादा तेज़ करदिया।
    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  21. सुँदर कविता -
    नई साज सज्जा भी
    नयनाभिराम लगी
    बसँत आगमन पर
    सभी को,
    रँगमय जीवन के लिये
    शुभकामनाएँ
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं

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